Tuesday, March 24, 2020

आदर्शों पर अमल आवश्यक है



rivival of youth power
युवा शक्ति का पुनुरुत्थान


 

Thursday, June 21, 2018

उम्र -प्रेम और कर्त्तव्य का समन्वय (coordination of age-love and duty)

उम्र -प्रेम और कर्त्तव्य का समन्वय (coordination of age-love and duty)


सोमेश ने आज ही  सौराष्ट्र के एक नगर में जिलाधीश का पद ग्रहण किया था, पत्नी और उनके तमाम घरवाले नए कलेक्टर साहब के पद ग्रहण की ख़ुशी में मग्न थे ,बड़े बड़े अफसर अपनी आमद दर्ज करा रहे थे, पिताजी का कल ही पत्र आगया था बेटा,  बुवाई चलरही है ,बादमे तेरी माँ और मै आ जाऊँगा ,कुछ ज्यादा आग्रह भी नहीं किया था सोमेश ने , पत्नि ठीक ही कहती है कि दुनियां का हर बाप अपनी संतान के लिए वो सब करता है ,जो उसके पिता ने किया है, आई आई  टी की डिग्री पूरी करने में भी वो २-३ बार ही गया था घर, अब मन नहीं लगता  गांव में, एक दो दिन अपनी पुरानी   सफ़ेद अम्बेस्डर गाड़ी चलाई और फिर जा पहुंचा कॉलेज ,पैसे की जब जैसी जरूरत पडी वो बिना मांगे आजाता था ,और सयोग की बात यह की उसकी शादी भी कॉलेज  के पास के नगर में  ही हो गई थी , वहां आना जाना ज्यादा होता था और जीवन की नई  करवट थी, कि वह आज कलेक्टर के पद पर  बहुत गौरवान्वित था | माँ -पिताजी आये और चलेगये सब ठीक ही  तो था, न कोई शिकायत थी ,न कोई उम्मीद, बस एक मूक प्रश्न था, कि क्या बेटा हमें  कभी मन से याद  किया तूने  या नहीं ,जाते में  आंसुओं से  मूक आवाज  बहुधा दब जाती  थी


 एक रोज अचानक पिताजी के मित्र शर्मा अंकल दिखे वोभी पिताजी वाली अम्बेसेडर गाड़ी में बड़े आश्चर्य के साथ सोमेश ने उन्हें बुलाया पांव छुए, ऑफिस ले गया और आश्चर्य भाव से पूछा ये गाड़ी अंकल आपके पास ,पापा कैसे है सब ठीक है न , शर्मा अंकल ने आश्चर्य से पूछा बेटा चार पांच वर्षों से तुम गाँव नहीं गए क्या ,हाँ है बड़ी व्यस्तता  नहीं जा पाया ,कोई प्रॉब्लम है क्या, नहीं बेटे ,अब सुनो वह कहानी जो आपको कभी पापा ने नहीं बताई ,बेटा तुम्हारी एडमिशन के समय पापा ने अपनी सारी  प्रोविडेंट फण्ड से रकम निकाल कर तुम्हे प्रवेश दिला दिया ,तुम्हारी हर वर्ष की फीस और खर्च के लिए हर वर्ष ५ बीघा जमीं मुझे बेचते रहे , तुम्हारी यू पी एस सी के परीक्षा की तैयारी और फ़ीस-टूशन  के लिए उन्होंने मुझे बांकी बची ७ बीघा जमीन और यह कारभी बेचा दी , बेटा मै  और तुम्हारे पिताजी बचपन के साथी रहे है मैंने बहुत मना किया मगर वो माना नहीं ,बस यही कहा , मित्र होने का यदि अहसान करना चाहते हो तो इतना ही करना कि,  जब सोमेश आये  तो यह गाडी जमीन जायदाद हमारी ही लगनी चाहिए ,तेरी जोइनिंग की पार्टी में वो इस लिए नहीं आया ,कि बहुत बड़े बड़े लोग आएंगे न, तो कपडे है वैसे ,न  ही मै  कलेक्टर के बाप जैसा लगता हूँ ,बाद में हो आऊंगा कभी इसकी  माँ को लेकर घंटा दो घटे को | बेटा  तेरे पिता के हर बलिदान को मेरा लाख लाख सलाम है ६ माह पहले सुना था कि उसकी तबियत ज्यादा ख़राब है |  
सोमेश को पिता का तिलस्मी जीवन और स्वयं  का हर आवरण उसपर डालना और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर देना और अपना व्यवहार उनका  अंतिम स्वांस तक निः शब्द भाव से सबकुछ बलिदान कर देना गहरे आघात में बदल गया था , एक बड़ा वज्रा घात हुआ था सोमेश पर ,काँपते हाथों से उसने फ़ोन का रिसीवर उठाया नंबर डायल किया, और जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा सारा बांध टूट चूका था, पिता लगभग रोते रोते हुए चिल्ला रहे थे ,क्या है बेटा मुझे बता ,शर्मा जी ने हाथ से रिसीवर लेकर कहा  सर्वेश्वर तुम्हारा पुत्र आज तुम्हारी कुर्बानी जान गया है ,उसे पश्चाताप का मौका जरूर दो ,उसे यह पद प्रतिष्ठा ,झूठी दुनियां के व्यवहार नहीं बल्कि तुम्हारा प्यार चाहिए ,हम आरहे है--------- सोमेश को सहलाते हुए शर्माजी  बोले  बेटा कर्त्तव्य ,उत्कर्ष और उम्र की आपूर्तियों के साथ तुम प्रेम के वृहत साम्राज्य को भूल गए थे ,पुत्र  जीवन  उनका अपमान कभी नहीं भूलता जो ,आपके परवरिश के आधार रहे हों और आज यदि तुम्हारा पश्चाताप जागा है  तो तुम अपना लक्ष्य  जरूर प्राप्त कर लोगे यह मेरा  विश्वास है | 


समय ----- जीवन में व्यतीत होते हुए तमाम क्षण अपना परिणाम  जानना चाहते है ,कि उनका प्रयोग सकारात्मक हुआ या नकारात्मक,  परन्तु अधिकांशतः हमारे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर होता भी  नहीं है | समय की बहुमूल्यता का आंकलन हम कभी कर ही नहीं पाए , अपनी  उपलब्धियों और लालच के तूफ़ान में हम केवल अपनी झूठी उपलब्धियों का गुण  गान करते रहे ,जबकि जाते हुए समय की परीक्षा सूची  में हमें शून्य है प्राप्त हो पाया और कालांतर में समय ने यह सिद्ध भी करदिया कि उसका उतना बहुमूल्य काल निरर्थक हो गया है ,जैसे धातु की किसी बड़ी कलाकृति  बनाता कलाकार अंतिम क्षणों ंमें नैराश्य में डूब गया क्योकि अचानक जिस चित्र को उसने सुबह नाम देना चाहता  था वो रात्रि के अंधकार जैसा दिखाई जैसी अनुभूति पैदा कररही थी , जिसे अब सवांरने ठीक होने का मौका  भी नहीं रहा | 

बचपन में हर चीज की मांग और हर चीज उपलब्ध थी, हम ,शहंशाह होते थे  पिता के साथ ,माँ के साथ होने पर एसपीजी ,रॉ और बड़ी सुरक्षा एजेंसी भी दुनियां की सारी सुरक्षाएं  फीकी थी ,आँचल के पल्लू को मुंह पर डाल कर वो अनुभूति कि अब दुनिया में  कोई  कुछ  नहीं बिगाड़ सकता था हमारा, यह जानते थे हम ,धीरे धीरे स्कूल के दोस्त उनका झूठ सच सीखा गया, फिर कॉलेज ने प्रेक्टिकल बनाते बनाते हमें, तमाम अराजक नुख्से सिखाये झूठ फरेब कैसे भी काम निकालने की कला सब सीखा डाला ,हमें स्वयं को अपनों से बहुत दूर कर दिया और अंत में  नए नए रिश्तों और उनके नए वातावरण ने निहायत स्वार्थी मक्कार और धूर्त बनाने में अपनी अहम् भूमिका अदा की ,और सबसे मजे की बात यह की हम हर रोज स्वयं को सराहते रहे कि हमसे अधिक आदर्श -भाग्यवान और श्रेष्ठ कोई है | 

प्रेम 
मनुष्य क्या  दुनियां के  हर जीव स्वभाव गत रूप में सदैव प्रेम की खोज में  लगा रहा है, वह जीवन के आरम्भ से अंत तक इसी  खोज में रहता है कि उसे अनवरत, एक सच्चा प्रेम ,अवश्य प्राप्त होता रहे, मगर  विडम्बना यही है कि वो जिस परिष्कृत प्रेम की आकांक्षा करता है, बस उसे वो ही नहीं मिल पाता, उसका स्वभाव ऐसा है कि वह  प्रेम को न तो बाँटना चाहता है और नहीं यह चाहता है कि उसे जीवन के किसी भी  भाग से कम प्रेम प्राप्त हो ,इसमें सबसे बड़ी   समस्या यह है कि वह जो  चाहता है और जो स्वयं की  कार्य प्रणाली अपनाता है वह दोनो ही विपरीत  परिणाम  देती है   ,यहाँ सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह सबकुछ हासिल कर लेता है ,मगर वह नहीं  जिसकी खोज  में वह निकला था, परिणाम सारे जीवन का अथक प्रयत्न व्यर्थ हो जाता है ,फिर कर्म-प्रेम -उम्र  सामंजस्य मुँह चिढ़ाता लगता है | 

जीवन का सार भूत सिद्धांत यह था कि सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श भावना से जीकर उस तथ्य की खोज अवश्य करें जिसके लिए  आत्मा हमे  उसे प्रोत्साहित कर सके ,ध्यान रहे   सांसारिक एवं भौतिक वादी उपलब्धि  कितनी भी बड़ी क्यों न हों ,आत्मा के प्रोत्साहन का विषय नहीं बन पाती, जबकि निस्वार्थ कर्म की परिभाषा के परिणाम से जो सत पैदा होता है ,वह आत्मा और मनुष्य को दीर्घ कालिक संतोष अवश्य दे सकता है | जब भी कर्त्तव्य की बात आयी तब, यह अधिक महत्व पूर्ण माना गया कि , यदि कर्त्तव्य ने उम्र -प्रेम और जीवन की वास्तविकता को समझते हुए व्यवहार किया, तो उसकी उपलब्धि में  आपको आनंद का वह स्तर अवश्य प्राप्त कराएगी जो  संसार में विरलों को ही प्राप्त हो पाता  है | हम क्या चाहते है और  उसके लिए हमारे कर्त्तव्य बोध की दिशा क्या है , सारी सफलता इसपर ही निर्भर है  
संसार की भौतिक पूर्तियाँ संपत्ति वैभव धन और साम्राज्य  बांटने के साथ अपना अस्तित्व खोने की संभावनाओं तक पहुंच जाते है ,मगर सर्वप्राणी से प्रेम काभाव जितना अधिक बांटेंगे ,ध्यान रहे वो हजारों गुना बढ़ कर आप तक लौट आएगा ,ध्यान यह भी रखिये कि हम  प्रेम की कल्पना स्वयं की लिए किये हुए है हमें वैसा ही प्रेम बांटना चाहिए ,यदि कर्त्तव्य बोध के  क्रियान्वयन में इस संकल्प को प्राथमिकता मिल गई, तो आप निश्चित जानिए कि आपको वो स्थान  सहज प्राप्त हो जाएगा जिसे लोग मोक्ष ,आनंद चरम  संतोष या परम गति के नाम से जानते है जो  सम्राटों को भी नहीं मिल सकीहै |

कर्त्तव्य के साथ प्रेम और उम्र के  सामंजस्य में भी प्रयोग करें 

  •    जीवन की प्राथमिकताएं ,आवश्यकताएं  और लक्ष्य पहले से निर्धारित करें उन्हें दोहराते रहें 
  • उम्र के साथ साथ अपने नियत सिद्धांत अवश्य बनाइये क्योकि जीवन सैदेव शोर्टकट की चाह करता रहता है जबकि इससे सम्पूर्ण  नाश होजाता है 
  • जीवन में आयु केसाथ अपने आधारभूत संबंधों को हल्का नहीं पड़ने दें नए सम्बंधोंके कारण यदि इन संबंधों पर असर हुआ तो स्वयं की शांति नष्ट हो जायेगी | 
  • जीवन के प्रतिपल अपने लिए नई  आदर्श पृष्ठ भूमि की मांग करता रहता है और   मन शार्ट कट और वासनाओं की आपूर्ति की परिणाम सारे सिद्धांत टूटने लगते है अपनी नियत शैली और सिद्धांतों को  अपनाइये |
  •  उम्र के साथ अनुशासन ,कठोर नियंत्रण और सही गलत की जानकारी पर विचार अवश्य करें, क्योकि कुछ पल का सुख लम्बे समय का पश्चाताप बन जाता है | 
  •  जैसा प्रेम आपकी आत्मा चाहती है और हर पल उससे अविभूत रहना चाहती है, क्या आप उस प्रेम को बाँट रहे है यदि नहीं तो आज से ही अपने कर्त्तव्य में इसे अवश्य जोडलें| 
  • कर्त्तव्य बोध का आधार इतना संयमित हो कि हम अपने स्वप्नों से पूर्व उसे क्रियान्वित करना सीखें , हम मन की क्षमता को आत्मा की सच्ची साधना के अनुसार क्रियान्वित करें| 
  • प्रेम का मतलब बहु आयामी है अर्थात अपने आपसे प्रेम कर्त्तव्य से प्रेम हर इंसान और जीव से प्रेम और सशक्त भावनाओं के साथ सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम, इससे ही सकारात्मक जीवन की शुरुआत होगी | 
  • उम्र -प्रेम और कर्त्तव्य के बोध के लिए सतत चिंतन की आवश्यकता है यही सोच समय समय पर आपको आपकी रण नीति बदलने को कहेगी ध्यान यह रहे ,कि  इन सबमे आपके जीवनके मूल सिद्धांत बने रहें |


 




Saturday, June 16, 2018

स्वयं की खोज और जीवन(Self realization and life)

स्वयं की खोज और जीवन(Self realization and life) 

मलया गिरि  का राजा पुष्प सेन हजारों यद्धों का अजेय सम्राट सिद्ध हुआ ,परन्तु था बहुत घमंडी ,किसी के अस्तित्व को न मानने वाला ,राजा अपनी चहेती रानी को लकवा मार जाने के कारण बहुत दुखी था, सारे इलाज बे असर हो गए ,थे राजा को लगा वो इतना महान और ताकतवर होकर भी निरीह सा है ,राज गुरु कल ही कह रहे थे पानी जैसी है जिंदगी कभी भी जीवन मृत्यु हमें प्रभावित कर सकती है ,राजा बेचैनी और सोच में पड़  गया मेरे बाद मेरे परिवार  संपत्ति का क्या होगा , एक बार अपने गुप्तचरों  और सैनिको के साथ आखेट पर गया ,रास्ते में घोर जंगल में उन्हें दिशाभ्रम हो गया, तीन दिन चलते हुए होगये ,सारा पानी खाना ख़त्म हो गया और एक भयानक तूफ़ान में भटकते  भटकते बेहोश  हो गए , बेहोशी के अंतिम छणों में राजा को कभी लगा की वो समुद्र की गहराइयों में ,उससे सैकड़ों गुना बड़े जीवो से स्वयं को बचने का प्रयत्न कररहा है ,कभी उसने देखा कि हजारों चीटियां गर्व से आपने गंतव्य को चली जारही है ,उसने पहाड़ों का गिरना ,ग्लेशियर के टूटने की भयावह आवाजें और समुद्री तूफ़ान के बड़े तांडव ,जंगल में लगी आग के स्वप्नों में स्वयं को जीवन रक्षा करते देखा, एक निरीह, बेचारे की भाँति ,जब उसको होश आया तो एक सन्यासी सामने था ,कुछ फल शीतल जल दियासन्यासी ने उसे,सन्यासी ने कहा पुत्र तुम और तुम्हारे साथी बेहोश पड़े थे इस लिए आपको यहाँ लाया हूँ |
राजा  घबराहट  में बोला  मुझे बचाइए मैंने भयानक स्वप्न देखे है, मुझे जीवन का भय लग रहा है,सन्यासी ने कहा राजा मैं  सब जानता हूँ ,तू अपने भय से मुक्त हो जा ,तूने स्वप्न में जो जल पहाड़ जंगल अग्नि और तूफानी हवाये देखी  है ,वे  इस प्रकृति के पांच तत्त्व एवं  धरती के शक्तिशाली अवयव है ,ये पांच तत्त्व ही महँ शक्तिशाली है ,पुत्र ये सब तेरे अहम् और युद्धों के स्वभाव का जबाब था कि तू वास्तव में अपने को पहचानें , हर जगह तेरा अहम् तुझे व्याकुल करता रहा है ,पुत्र मन से अहम् निकल जाए तो उस चीटीं की तरह हम भी गर्व से चल सकते है,राजा निरुत्तर और शर्मिंदा था ,सन्यासी ने कहा पुत्र सुबह मैंने हजारों फलों में से  ४ फल लिए तीन तुम लोगो को दिए ,एक मैंने खाया कल ईश्वर फिर देगा ,राजा समझ गया की साधु यही कह रहा है, हे राजन मैं  तो शाम तक की चिंता नहीं करता तू, क्यों परेशां है ,पीढ़ियों के इंतजाम में | अचानक राजा की सेनाये वहां आ गई अपने गले का रुद्राक्ष देते हुए साधु ने कहा , जा अपनी रानी को पहना देना वो ठीक हो जायेगी, यह कहकर साधु हिमालय की हिमाच्छादित घाटियों पर चल दिया राजा निरुत्तर भरी आँखों से उसे चरण वंदन करता रहा | 

 सुख- दुःख जय -पराजय लाभ- हानि सब ही तो तुलनात्मक है ,जब तक आपको  किसी नकारात्मकता का अनुभव नहीं है तो आपको सकारात्मकता भी व्यर्थ लगने लगती है ,एक गुरु से शिष्य ने कहा  गुरु देव जीवन में आराम ही नहीं है सब ख़त्म होगया है , गुरु कुछ नहीं बोले अचानक वही शिष्य रोता  हुआ आया मै  जल गया हूँ  गुरु ने तुरंत मलहम लगाया पुचकारा हाथ फेरा और पूछा अब अच्छा लग रहा है वो बोला अब आराम है मलहम चमत्कारी है आनंद आगया मै  तो मर ही गया था ,अचानक गुरु की और देख कर खुद शर्मा गया शिष्य ,गुरु ने कहा पुत्र ईश्वर जो दे रहा है , जो कररहा है , जैसे रख रहा है  हम सब उसे सहर्ष स्वीकारें तो जीवन आनंद है, पुत्र  मुर्ख बनाकर  स्वार्थ सिद्ध करने वाले केवल धोखा स्वयं धोखा। यातनाएं  और  ही पाते है वे खुद से ही शिकायते करने लगे तो यही अविश्वास स्वयं को न जानने की भूल के कारण दुःख पराजय हानि जैसा होकर हमें नकारात्मक बना देता है | 

 आपका जन्म का कारण क्या है क्या आप जीवन में किसी उद्देश्य को लेकर आये  है और क्या आप उसके लिए कुछ सकारात्मक पहल कर पाए है ,जीवन को उसके उद्देश्य से परिचित करना बड़ा कठिन और जटिल कार्य है ,कुछ लोग जो अपना उद्देश्य तय भी कर पाए है उनके सामने उसको क्रियान्वित करने  चिनौती और अधिक बड़ी समस्या के रूप में खड़ी हो जाती है ,क्योकि उसके क्रियान्वयन की समस्याएँ जीवन के सामान्य कार्यों और उपलब्धियों से अधिक कठिन होती है ,उसके संकल्प इतने अधिक दृण होते है जिनके साथ और कुछ चल ही नहीं सकता  , परन्तु हिन्दू दर्शन कहता है यदि आप अनासक्त भाव से, जीवन के संकल्पों को क्रियान्वित कर पाए तो जीवन आपको  एक दिन अवश्य अपने लक्ष्य के उच्चतम शिखर पर अवश्य ले जाएगा | 

सन्यासी ,योगी ,जितेन्द्रिय ,महात्माओं और उच्च धार्मिक विचारकों और एक सामान्य आदमी,धन ,व्यक्ति संपत्ति ,तथा भौतिकता के पीछे भागते लोगो में ,फर्क केवल एक तथ्य का है ,वह है आत्म बोध , जो जिज्ञासु की भाँती जीवन   पूर्ण करने में लगा है, वह प्रथम श्रेणी का है और जो सुख धन वैभव और भौतिक लिप्साओं के जाल में लिपटा भागा चला जारहा है वह दूसरी श्रेणी में आता है ,मित्रों इसके जीवन की नियति ही एक भोग्य है और बीच बीच में थोड़े सुस्ताने को यह सुख मानता है यही इसका सबसे बड़ा भ्रम है ,स्वयं अपने आपको धोखे में रख कर अपनी अकर्मण्यता को दूसरों पर थोपते रहना कोई हल नहीं हुआ न , वहां हर असफलता का जिम्मेदार भी यह स्वयं ही होता है | 


 
 अपने आचरण में सबको धोखा देते देते हमारा मन स्वयं को भी नहीं छोड़ता वह हमें ही धोखा देने लगता है परिणामतः हम स्वयं की शांति खोकर एक मनोरोग के रोगी होते जारहे है ,शांति, सौहार्द,दया , सकारात्मकता ,सत्य ,परमार्थ और सहष्णुता सब ख़त्म होकर हम एक बहरे व्यक्ति की भांति अपना प्रलाप जारी रखते है , यही सामान्य जीवन के वो पहलू है जो आदमी को चारो तरफ से जकड़ कर नाकारा अशांत और यातनाओं में सिद्ध किये हुए है|  बाह्य संसाधनों। अपनी शारीरिक  मानसिक जटिलताओं के कारण हमारा स्वाभाव केवल स्वयं के स्वार्थ सिद्ध करने का रह गया है. स्वयं को बड़ा बताने की चेष्टा और अपने  आपको आदर्श बताते हुए हम सारी  ऋणात्मकताओं को दूसरे पर थोपने के आदि हो रहे है , क्रोध , द्वेष , वैमनस्यता एवं अपनी मनमानी करके हम स्वयं को श्रेष्ठ समझ रहे  है ,परिणाम हम अपने खोदे हुए गड्ढे में फिसलते जा रहे है


स्वयं का साक्षात्कार बड़ा  अनोखा है ग्यानी आत्म बोध ,आत्मानुभूति , और साक्षी भाव आदि  नामों से जानते है  जबतक स्वयं के भीतर गहरे में नहीं उतरोगे ,तबतक अपनी खोज नहीं कर पाओगे ,और न ही तुम स्वयं की नकारात्मकता और सकारात्मकता के पहलुओं को समझ पाओगे ,संसार को सही मायने में समझा हुआ  या हारा हुआ इंसान जब उसके आधारभूत स्वभाव को समझ गया ,तब उससे शिकायत ही नहीं रही सारा चिंतन स्वयं   के चारो तरफ घूमने लगा परिणाम यहीं से आरम्भ हो गया स्वयं की खोज का प्रथम अध्याय | 
 जब मन ने स्वयं का साक्षी भाव जागृत किया तब, हमारे व्यक्तित्व की कमियां ही कमियां हमारे सामने खड़ी हो गई, स्वयं को परिष्कृत करने हेतु अनेक संकल्प और क्रियान्वयन  के बाद, मन -बुद्धि को बाँध कर स्वयं की शक्ति को जागृत किया गया, तब कही जाकर धीरे धीरे सब सत्य सामने आने लगा ,संसार का हर सम्बन्ध भावों से परे भूख और फिर भूख की आपूर्ति समझ आया ,जबकि  सुख दूसरों पर या भौतिक संसाधनों में  न होकर मुझ में ही निहित था , परन्तु इस सुख का अनुभव भाषा और व्याख्या से परे ही रहेगा और इसके बाद किसी सुख की आवश्यकता ही नहीं होगी | 

निम्नांकित का प्रयोग करें और देखिये चमत्कार 

  • यहाँ सारे सम्बन्ध आवश्यक है मगर सबकी अपनी अपनी सीमाएं है , यहाँ कोई भी बहुत करीब और बहुत दूर नहीं है ,सबकी अपनी अपनी वासनाएं इच्छाएं है   जिनके अंत का  कोई  छोर नहीं है | 
  • जबतक आपके सुख की चाबी दूसरों  हाथ में होगी तबतक आपको सुख मिलाना ही नहीं है बस आपका उपयोग ही होना है ,कोई सहानुभूति के नाम पर ,कोई अधिकार दिखा कर ,या मज़बूरी बताकर ,इनसे दूर रहें 
  •  मानसिक  शारीरिक और सामाजिक   आपूर्तिओं का संघर्ष आपसे हर तरह की शांति छीन लेगा ,क्योकि आप इनसबके गुलाम बने बैठें है और इनको  नियंत्रण के बगैर नियंत्रित नहीं किया जा सकता | आवश्यकता है  की इनकी सीमाएं बनाइये | 
  • हर रोज अपनी अंतरात्मा की  मौन साधना अवश्य करें कि  आपके साथ क्या क्या अच्छा हुआ है, जीवन की सकारात्मकता और कैसे बढ़ने जा रही है | 
  •  प्रति दिन एकांत में बैठ कर स्वयं को पढ़ने का प्रयत्न करें और आज जो कमियां हुई है कल वो फिर न हों संकल्प लें | 
  • जीवन से किसी भी चीज के आदि होने का स्वभाव ख़त्म करें ,क्योकि यही से  कमियां आपको अपना गुलाम बना लेती है | 
  • ईश्वर पर  विश्वास रखे जिन स्थितियों पर आपका वश न हो,  उनका असमय शोक न मनाये ,क्योकि शोक उनका मनाये जहाँ कुछ किया जा सकता था पर नहीं किया गया | 
  • स्वयं को जितना सहज बना सकते है बनाइये, क्योकि जैसे ही आप व्यवहार में जटिलताएं लाएंगे आपका सम्पूर्ण अस्तित्व  और यातनाओं से भर जाएगा | 
  • सत्य ,सरलता और दूसरों के प्रति दया सहष्णुता का भाव रखिये इससे आपको संतुलित रहने की कला वैसे ही प्राप्त हो जायेगी || 
  • प्रत्येक व्यक्ति के प्रति नकारात्मक सोच को ख़त्म कर दें ,और भविष्य के प्रति संकल्प लें और स्वयं को किसी को भी बुरा भला कहने से बचाएं | 
  • आपका लक्ष्य केवल आपकी नकारात्मकता से प्रभावित होता है , मन के दृण निश्चय , संकल्प की साधना  में लगे कोई भी व्यक्ति को कोई व्यक्ति परिस्थित  बाधा पहुंचा ही नहीं सकती | 
  •     स्वयं की सक्षमता एवं अक्षमता के लिए कोई परिस्थिति कोई व्यक्ति जिम्मेदार हो ही नहीं सकता अतः स्वयं की क्रियान्वयता पर पुनर्विचार   कर आत्मा की गहराइयों से स्वयं को पहिचाने हर सफलता आपके क़दमों में ही होगी |  





Sunday, June 3, 2018

मन (विचार ),सफलता और शांति Mind (thought), success and peace

मन (विचार ),सफलता और शांति Mind (thought), success and peace

प्राचीर का राजा अनंत सेन बड़ा पराक्रमी था हर युद्ध में उसे मन चाही सफलता प्राप्त होती थी ,राजा जिस की भी चाह  करता  था ,वह उसके  होनी ही चाहिए थी ,, एक भयानक ताकत वर जिद्दी बच्चे जैसी सोच थी  उसकी ,उसकी इन आदतों से उसकी पत्नी ,राजा के धर्म गुरु एवं उसके पिता बहुत दुखी थे ,क्योकि कभी कभी वो ऐसी ऐसी जिदें करता था जिसमे परिवार और मानवता दोनो शर्मिंदा होजाती थी ,एक बार राजा शत्रु का  पीछा करते करते  घनघोर जंगल में जा पहुंचा ,रात  होने को थी,  प्यास और भूख से मन व्याकुल था ,अचानक उसे दूर पर एक दीपक जलता  हुआ दिखा और तत्काल वह वहां जा पहुंचा ,उसने बाहर से  देखा कि एक सौम्य और अति बल शाली सन्यासी ,ध्यान में बैठे है ,उनके पास दो शेर बैठे चौकसी कर रहे है, महात्मा के चेहरे पर अपूर्व शांति और तेज छाया था, राजा शेरो को देख कर भयाक्रांत होगया ,अचानक सर्वज्ञ सन्यासी ने शेरो से कहा जाओ ,शेर उठ कर पीछे के दरवाजे से चले गए, फिर उसने राजा को आवाज दी ,अन्नंत सेन आजाओ  ,राजा  विस्मित सा जाकर बैठ गया ,साधु में उसे पानी फल दिया उसे लगा ये फल उसने कभी खाये ही नहीं है ,अद्वतीय स्वाद पानी ऐसा जैसे अमृत का सरोवर मिल गया हो ,राजा ने सोचा इतना बल शाली साधु , इतना तेज ,इतना वैभव ,और इतनी शान्ति और प्रसन्नता ,के साथ कैसे रह सकता है यह सन्यासी, मै राजा हूँ परन्तु इसके सामने तुच्छ महसूस कर रहा हूँ स्वयं को ,जबकि मैं इससे हर हाल में कमजोर अशांत और वैभव हीन  हूँ मुझे भी यह सब चाहिए ,साधु  बड़ी देर तक राजा को देखता रहा अचानक कहने लगा राजन ये सब जो तुम चाहते हो वो सब तो तुम्हारे पास भी है, परन्तु तुम्हारे पास थोड़ा रुक कर उसे भोगने का समय ही नहीं है ,इस लिए तुम कभी आकलन नहीं कर पाए ,राजा काफी  शर्मिंदा हुआ उसके ज्ञान चक्षु अचानक खुल गए थे ,उसने कहा मुझे आप शरणागत मान कर इस अज्ञान से दूर कर सफलता और शांति का दान दें | साधु ने एक अपनत्व के भाव से उसे समझाना आरम्भ किया |

हे राजन शक्ति सम्पन्नता और शांति  समय और आकलन पर निर्भर है आपके राज प्रासाद बहुत बड़े है मगर क्या उनमे वो  सदभाव दिखाई पड़ा , तुम सम्राट हो मगर यदि आज ईश्वर तुम्हे पानी , भोजन नहीं देता तो तुम  भी मर जाते , कितने कमजोर निराश्रित थे तुम ,तुम मन और बुद्धि को एकत्रित करके सोच ही नहीं पाए पुत्र शत्रुता से राज्य जीते जाते  है मन हार जाता है और हारे हुए व्यक्ति में तो केवल पराजित होने का दुःख ही होगा न ,राजन दौड़ते दौड़ते थक जाओगे , कहाँ तक दौड़ना है उसकी अंतिम रेखा नहीं मिल पाएगी ,क्योकि तुम्हारे साथ समय भी दौड़ रहा है और अंतिम रूप से उसमे तुम्हे ही हारना है ,इसलिए भागो मत समय को स्तंभित रखने का प्रयत्न और त्याग यही से तुम्हें असली विजय प्राप्त होगी हे राजन मन की आपूर्ति और कामनाओं  और वासनाओं की  पूर्ती से हो ही नहीं सकती ,उसपर ध्यान न लगते हुए परहित के कार्य और जीवन समर्पण का उद्देश्य ही सर्वोपरि  है ,राजा ने   सर झुका दिया मानो उसे आज सही रास्ता मिलगया हो  |



मन की स्वच्छंदता कुछ समझती ही कहां है ,एक आपूर्ति होती नहीं दूसरी तमाम आपूर्तियाँ आपको खाली साबित कर देती है , तिनको का एक बड़ा पहाड़ एक चिड़िया को मिल गया ,जल्दी जल्दी तिनके इकठ्ठा करते और एकत्रित तिनकों की रक्षा में उसके प्राण चले गए  , उसे चिंता थी कहीं कोई और न ले जा पाए ये तिनके, उसने   जल्दी में दाना पानी तक नहीं लिया था उसने ,मरते मरते भी यही स्वप्न था कि उसने ढेरों तिनके इकट्ठे कर लिए है ऐसा ही परिवेश हम सबका हो गया है ,जिसमे हम मन को सर्वोपरि मान कर खुद स्वछंद हो बैठे है, परिणाम हमारी शांति सफलता भी भटक  गई है और जीवन का अमृत घट  हमारे मन की उद्विग्नता के कारण छलक कर ख़त्म होता जा रहा है शनैः शनैः मन का साम्राज्य हमारे दिलो दिमाग को अपंग  और नाकारा बनाता जा रहा है फिर हमे जीवन से शिकायत क्यों है |

मन की स्वच्छंदता कुछ समझती ही कहां है ,एक आपूर्ति होती नहीं दूसरी तमाम आपूर्तियाँ आपको खाली साबित कर देती है , तिनको का एक बड़ा पहाड़ एक चिड़िया को मिल गया ,जल्दी जल्दी तिनके इकठ्ठा करते और एकत्रित तिनकों की रक्षा में उसके प्राण चले गए  , उसे चिंता थी कहीं कोई और न ले जा पाए ये तिनके, उसने   जल्दी में दाना पानी तक नहीं लिया था उसने ,मरते मरते भी यही स्वप्न था कि उसने ढेरों तिनके इकट्ठे कर लिए है ऐसा ही परिवेश हम सबका हो गया है ,जिसमे हम मन को सर्वोपरि मान कर खुद स्वछंद हो बैठे है, परिणाम हमारी शांति सफलता भी भटक  गई है और जीवन का अमृत घट  हमारे मन की उद्विग्नता के कारण छलक कर ख़त्म होता जा रहा है शनैः शनैः मन का साम्राज्य हमारे दिलो दिमाग को अपंग  और नाकारा बनाता जा रहा है फिर हमे जीवन से शिकायत क्यों है |


सफलता का सीधा सम्बन्ध संकल्प से होता है और संकल्प की अस्थिरता का मुख्या कारक मन होता है मन का लक्ष्य हमेशा बदलता रहता है यदि उसपर बुद्धि अंकुश न लगा पाए तो , मन की गति हमेशा सुविधा ,मजा और स्वयं को बिना काम , मेहनत किये सफलता के उच्च शिखर पर देखना चाहती है ,इस पर सफलता के लिए तमाम सहानुभूति के संवाद ,नकारात्मक तर्क और स्वयं को कोसते रहने के शस्त्र है जिससे वो समाज के सामने बेचारा बन कर रहने की चेष्टा अवश्य करता है कारण केवल एक है कि उसकी मानसिक शक्तियों  ने    कम्फर्ट  जोन  ढूढना चालू कर दिया है और यही उसकी सफलता का बाधक तत्त्व भी है

सफलता का एक  बड़ा बाधक तत्त्व है दूसरों का चिंतन ,आलोचना।  और व्याख्या करना अनेक धर्म ग्रंथों ने इसे पाप की संघया दी है और इसके गंभीर परिणाम भी बताये है जिनका नकारात्मक असर आपके व्यक्तित्व पर पड़ना ही है
                               परम धरम श्रुति विदित अहिंसा --पर निंदा सम अघ न गिरीशा
                               को न  काहु  सुख दुःख कर दाता --निज कृत कर्म भोग सब भ्राता
                                                                                                                                 रामायण
हमारा ८०%चिंतन केवल दूसरों के विषय में ही चलता रहता है , शायद जीवन इसका ही नाम है ,कि हम शारीरिक मानसिक आपूर्ति करते रहे ,लोग हमें  हर हाल मे सम्मान देते रहें और हर वक्त हम अपने को ऊंचा बताने के लिए सबको छोटा सिद्ध करते रहें ,परिणाम हम स्वयं नकारत्मकताएँ बो रहे है ,जिनसे स्वयं का व्यक्तित्व कुंठित हो गया है ,द्वतीयतः हम सब अपने कर्मों के कारण ही सुख दुःख भोग रहे है ,अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन करके केवल अपने उत्थान का चिंतन करें जो सहायता करनी है अवश्य करें मगर अपने जीवन के मूल उद्देश्यं को छोड़कर आप न तो समाज को कुछ दे पाएंगे, न स्वयं का ही भला कर पाएंगे ,सफलता के लिए अपनी शारीरिक , मानसिक ,और उत्तेजनाओं ,क्रोध सबको नियंत्रित करना ही होगा |

शांति का सीधा सम्बन्ध चेतना शक्ति से है धर्म ग्रंथ उसे सोल , आत्मा , आत्म  ब्रह्म  आदि नामों  से जानते है यही जीवन का न्यायालय है जो प्रथमतः हमारे हर कार्य पर सटीक निर्णय देता है और उसका निर्णय ही हमे जीवन की उन्नति या अवनति के रूप में मिलता है , हम जो कर रहे है जो देख रहे है जो अनायास महसूस कररहे है उसका एक निर्णायक बनकर आत्मा जो निर्णय करती है निर्णय करती है  शायद  वही शांति दे पाती है , शांति का सीधा सम्बन्ध अपनी सम्पूर्ण चेतनाओं से पूर्णता का भाव है सामायिक रुप में जो संतोष दिखता है उसे तात्कालिक संतोष मजा सुख कह सकते है मगर जब जीवनमें आत्मा उसे चिरंतन बना दे सुख संतोष समर्पण और किसीचिज की जरूरत ही न रह जाए आप समझलो यही परम शांति है और यह सांसारिक जीवन में समाज और कर्म के साथ सहजता से प्राप्त की जा सकती है |     


   मन सफलता और शांति के लिए इन्हें प्रयोग करें सफलता अवश्य मिलेगी 

  • रोज के कार्यों में १० मिनट स्वयं को एकाग्रकरने का प्रयत्न करें उसके लिए स्वयं की आती जाती स्वासों को देखना सर्वश्रेष्ठ उपाय हो सकता है इससे मानसिक शक्ति में परिवर्तन होगा | 
  • चितन को ३ भागों में बांटे प्रथम वह जो आपके संकल्प और उद्देश्य हो द्व्तीय जिसके लिए आपकार्य योजना बनाये और उसे क्रियान्वित करें और तृतीय वो जो प्रकृति के आधीन है उनपर धनात्मक विश्वास | 
  •  व्यक्तित्व में घमंड न आने दे क्योकि आपके हर पतन का रास्ता यहीं से पैदा होगा चाहे वह शरीर ,समाज या सहायता का हो आपको उससे बचाना चाहिए | 
  • आपको किसी से भी तुलना नहीं करना है अच्छे और आदर्श लोगो से कुछ जरूर सीख सकते है मगर तुलना से आपका कद जरूर नीचे होगा ये हमेशा याद  रखें | 
  • दूसरों की आलोचना और चिंतन बिलकुल न करें क्योकि इससे आपका ब्रह्मांडीय ओरा स्वयं नकारात्मक वेव्स छोड़ने लगता है और वह व्यक्ति आपका आलोचक हो जाएगा ,जो आपके मार्ग की बड़ा बनेगा | 
  • हर इंसान अपने कर्म योग से बंधा है आपको अपने कर्म की सकारात्मकता को बनाये रखना चाहिए यदि उसमें कमी हुई तो व्यक्तित्व भी प्रभावित होगा अतः प्रति दिन अपने कामों की समीक्षा अवश्य करें | 
  • मन को अनुशाशन के अंकुश में अवश्य रखे यही से गांधी कीमहानता पैदा होती है और यही से व्यक्तित्व का गंदला परिवर्तन आदमी को गर्त में गिरा देता है ,उसकी स्वच्छंदता पर विचारोंका नियंत्रण लगाइये | 
  • स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार अवश्य करें जिसमें सिर्फ  अपने सकारात्मक चिंतन एवं  अपने दुष्कर्मों के लिए ईश्वर से क्षमा का भाव हो इससे आप थोड़े ही समय में एक अनोखी शक्ति से परिपूर्ण हो जाएंगे | 
  • संकल्प की स्थापना से ही आप स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर सकते है जब आप अपने संकल्प को बहुत बार दोहरा कर उसे पूर्ण करने के प्रयत्न करेंगे तब आप सफलता के लिए आश्वस्त हो सकते है | 
  • स्वयं को बेचारा कमजोर नाकारा न बनाये उस सैनिक  बारे में सोचे जो माइनस ५० डिग्री पर देश के लिए प्राण न्योछावर करने को संकल्पित है केवल  रास्ता है देश प्रेम  रक्षा और बलिदान आप कैसे युवा है अपने आपको ही कोसते कोसते कमजोर होते जारहे है एक बार उठो और संकल्प की प्रबलता में खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करो |

 


Saturday, August 19, 2017

बढ़ता विज्ञान और घटती सवेदनाएँ ( Increasing science and decreasing sensitivity)

बढ़ता विज्ञान और घटती सवेदनाएँ
 Increasing science and decreasing sensitivity

प्रोफेसर रंगा विज्ञान के बहुत बड़े हस्ताक्षर थे ,देश विदेशों में उनका बहुत बड़ा नाम था, कई पुस्तको  , लेखों  और कई व्याख्यानों से मूर्धन्य सस्थाओं को वे अपना लोहा  मनवा चुके थे , एक बेटा सुकेश और बेटी रीमा को भी बहुत बड़े स्कूल कॉलेज में शिक्षा दिलवाई गई थी ,कॉलेज के बाद सुकेश को सर्जन बनने के बाद किसी  अमेरिकन विश्वविद्यालय से अतिरिक्त डिप्लोमा करने भेजा गया था, और वो आज विश्व का बहुत बड़ा डॉक्टर था ,बेटी सॉफ्टवेयर में पी. जी. करने के बाद किसी बड़ी कंपनी में डायरेक्टर हो गयी थी ,और प्रो रंगा अब रिटायर होकर अपने नौकर के साथ ही रहा करते थे पत्नी की मृत्यु कई वर्षों पहले ही हो चुकी थी ,ले दे कर केवल एक नौकर और एक दो विद्यार्थी ही उनके आस पास थे जिन्हें उन्होंने बहुत नीचे से उठा कर योग्य बनाया  था |

अचानक एक रोज नौकर ने उठकर देखा प्रो साहब ने दरवाजा नहीं  खोला है, थोड़ा और इंतज़ार किया फिर मन नहीं माना तो जंगले से झांक कर देखा ,प्रो साहब बिस्तर से नीचे पड़े थे ,कुछ अस्पष्ट सा बोल रहे थे दरवाजा तोड़कर उन्हें निकला गया, डॉ के आने पर मालूम हुआ उन्हें पैरालेसिस का अटेक पड़ा है ,,आनन फानन में डॉ ने उन्हें भर्ती करलिया स्वजनों ने बताया कि  बाबूजी का लड़का भी तो इसी एरिया का विश्वविख्यात डॉ है ,उनसे भी चर्चा कर ली जाए बहुत फ़ोन किये बड़े मेल और मैसेज भेजे गए मगर ५ दिन तक कोई कॉन्ट्रैक्ट ही नहीं हो पाया, फिर एक दिन फोन कॉल आया नौकर ने उठा या  दूसरी तरफ से आवाज आई कौन सर्वेंट देवा बोल रहें है ,डॉ सुकेश  ने पूछा है क्या प्रॉबल्म है  क्या चाहिए  ,देवा ने पूरी सूचना दी, दूसरे दिन फिर फ़ोन आया है देवा मैं बोल रहा हूँ देवा जोर जोर से रोने लगा भैय्या बाबूजी को पैरालेसिस अटैक आया है, दीदी आयी ही नहीं, वो शायद बाहर विदेश गई है ,सुकेश बोलै चुप होकर मेरी बात सुनो मैं अगले वीक देखने आता हूँ अस्पताल में कोई जरूरत हो  बताओ , डॉ से बात कराओ ,डॉ सर सर करके बात करता रहा एक अकाउंट न  बताता रहा और कभी उत्साहित और कभी मायूस जैसा दिखा ,फ़ोन कट  चुका था डॉ पूरी ताकत से इलाज में जुट गया था और सबकी दुआएं दवाएं रंग लाइ और डॉ रंगा एक बार होश में  आ ही गए | १० वे रोज डॉ रंगा को छुट्टी मिल गई थी |

 एक माह बाद घर के सामने एक सैलून वाहन आकर रुका, २ दरबान आगे आकर कोई स्प्रे कररहे थे ,एक सामने पैसेज की सफाई में जुटा  था  प्रोफेसर रंगा के कमरे तक स्प्रे किया गया रूम को साफ़ किया गया और जब ग्रीन सिगनल हुआ तो डॉ सुकेश निकले और धीरे धीरे बाबूजी के कमरे में पहुंचे ,बड़े विह्वल थे बाबूजी आधे अधूरे बैठ गए थे ,सुकेश ने पाँव छुएं फिर हैंड क्लीनर निकलकर हाथ धोये ,और बात करने लगे , देवा तबतक पानी और नाश्ता लेकर आया सुकेश ने मना  कर  दिया ,अभी कुछ नहीं लेना सब है, उसने इशारा किया एक दरबान पानी के साफ गिलास और बोतल से पानी दे गया , पिता कहते रहे बेटा अब तू आगया है ,अब मैं जल्दी ठीक हो जाऊँगा ,तेरे बराबर तो इस रोग का डॉ है ही कौन, सुकेश बोलै है वो तो ठीक है उस डॉ को समझा दिया है ,ठीक इलाज कर रहा है ,आपको यह कसम है की आप सच सच यह बताओ की आप क्या सोच रहे थे जब ये अटैक आया था ,आपको ,मेरी कसम आपको ,पिता भावुक हो गए थे बोले बेटा तेरी माँ की मृत्यु के बाद मुझ पर बहुत दबाब था की मैं  एक शादी और करलूं मुझे लगा कि  सौतेली माँ मेरे बच्चो से न्याय नहीं कर पाएगी, तो मैंने वो प्रस्ताव ठुकरा दिया , और तुम दोनों भाई बहिनों को माँ और बाप दोनो रूप में पाला है, उस रात यही सोच रहा था कि अब हाथ पैर जबाब दे रहे है ,अब मुझे अपने बच्चों के कन्धों की जरूरत है जो मुझे सहारा दे, सकें बस यही सोचते सोचते बेहोश हो गया था मैं | और सुकेश कही खो गया था विचारों में |

बी  प्रेक्टिकल बाबूजी आप तो जानते है मै  उस घर में भी कहाँ रह पाता हूँ, कभी न्यूयार्क कभी इंगलैंड कभी जर्मनी रोज भागना रहता है ,और इतनी सुविधाएं और देवा और शशि ,प्रभात को देख कर बोला की ये सब लोग सेवाकर ही रहे है, तो कोई प्रॉब्लम है ही कहाँ ,हाँ फिर भी एक बार सोचूंगा जरूर की मुझे क्या करना चाहिए , अब नाश्ते का टाइम होगया है ,दरबान  तुरंत गर्म ब्रेड बटर और एक एक गिलास दूध की ट्रे लेकर आगया यह सैलून में पहले से ही था , पिताजी हतप्रभ , मूर्तिवत उसके साथ ब्रेड चबाने लगे , और अचानक सुकेश बोलै बाबूजी मुझे जाना होगा  रात 8  बजे  दिल्ली  के सबसे बड़े अस्पताल में मुझे एक आप्रेशन  करना है , और  फिर ३ बजे रत में मेरी फ़्लाइट है --------और बिना पिताजी का कोई उत्तर सुने सुकेश उठा उसने बेमन से फिर पाँव छुए --फिर हैंड क्लीनजर से हाथ साफ किये और टाटा करता हुआ चल दिया पिता की समझ ही नहीं आया कि  उसे क्या कहना या क्या नहीं कहना  चाहिए |


 कुछ ही दिन बाद डॉ रंगा को फिर अटैक पड़ा उस ही डॉ के यहाँ लेजाया गया पूरी घटना सुनने के बाद डॉ कहीं खो गया था ,नौकर और प्रोफ साहब के विद्यार्थियों को  उन्होंने कहा  कि अब आप लोग पैसे के लिए परेशांन मत होना ,क्योकि प्रोफ साहब से मेरी बात होती ही रहती थी ,आप सब लोग तो उनकी सेवा ही करें ,यही सबसे बड़ा सहयोग होगा इलाज जोरो शोरो से चल रहा था और १०  दिन बाद प्रोफेसर साहब चल  बसे थे ,तीनों लोगबहुत रोये थे उनके अलावा कोई  था ही नहीं ,फ़ोन पर फ़ोन लगाए जा रहे थे सुकेश और दीदी के फ़ोन आउट ऑफ़ कवरेज थे डॉ साहब ने शव को डीप फ्रीजर में रखवा दिया था अचानक डॉ साहब को याद  आया कि दूसरे अटैक से तीन दिन पूर्व ही प्रो रंगा एक बैग यह कहकर छोड़ गए थे  कि डॉ साहब ये रखना आप मैं  अभी आया , और वो बैग अभी क्लीनिक में ही पड़ा होगा शायद उसमे कोई एड्रेस फ़ोन न मिलजाए ,डॉ ने बैग खोलकर देखा उसमे एक चिट्ठी खुली रखी थी कांपते हाथों से डॉ और प्रो रंगा के स्वजन सुनने लगे -----चिट्ठी का विवरण


डॉक्टर साहब नमस्ते  बड़ा बोझ है, जीवन का आज सोच रहा था ,कि मैं  दुनियां का बहुत बड़ा साइंटिस्ट सिद्ध हुआ संसार के सारे देशों का भ्रमण करते में मैंने अपने बच्चों को कभी अकेला नहीं छोड़ा, हर जगह साथ ले जाता था, आपसे बहुत बात की मालूम हुआ आपके पिता ने भी बहुत कठिनाई से आपको इस मुकाम तक पहुंचाया और वो चल बसे,मैं उस दिन से आपको भी पुत्र जैसा मानता  रहा बोला।  कभी नहीं ,बेटा इतना बड़ा वैज्ञानिक होकर मैं यह नहीं समझ पाया कि  जीवन में मूल्यों और आदर्शों की कक्षा तो सहानुभूति दया  सेवा और संवेदनाओं के पहियों पर ही चलती है ,और जहाँ विज्ञान के रथ पर ये पहिये ही नहीं हों वहां नीरस , बदरंग फीका और अभावों का जीवन खुद ही व्यर्थ सिद्ध हो जाता है बेटा अब मैं अब जो कह रहा हूँ वो ध्यान से सुनना मैं  भगवान् का बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि  पहले अटैक के समय मुझे जीवन की असली पहिचान ,और मेरे अपने मुझे मिले है ,मेरे मरने के बाद मेरीअचल  संपत्ति आप  तीनों लोगों में आप बाँट दें जो लग भग ५० करोड़ की होगी और मेरा संस्कार भी आप सब मिलकर करदें मैंने अपने मन और न्यायालयीन कागजों में यही लिखा है ,और आपके लिए मैंने अपना बेटा समझते हुए आपके अकाउंट में १०  करोड़ रूपए ट्रांसफरके लिए चेक  दिए है ,जो एक माह बाद आपके  खाते  में पहुंच जाएंगे, आप सबसे यही  विनती है कि ,आप यह अवश्य ध्यान रखें की जो विज्ञान सहायता दया श्राद्धा  और संवेदनाओं से परे है उसका हर परिणाम केवल विनाश कारी ही होगा |

चारों लोग जोर जोर से रो रहे थे ,अचानक फ़ोन की घंटी बजी मई सुकेश बोल रहा हूँ ---- डॉ ने तुरंत कहा हाँ बाबूजी आपके लिए भी एक पेरा  लिख गए है सुनिए ---बहुत बिजी हो तुम और तुम्हारी बहिन -----  आउट ऑफ़  कवरेज ----एरिया -------- बेटा  बहुत बड़ा होने ------ विश्वप्रसिद्ध डा होने का मतलब होता है सवेदना हींन ,आदर्श हीन , दया प्रेम वात्सल्य और ममत्व जैसे शब्दों से परे होना , हां तुम इन सबसे आउट ऑफ़ कवरेज एरिया ही बने रहे ,खैर अब तुम बिजी ही रहो ,मैंने तुम्हे सब मेल कर दिया है और तुम्हारे ऊपर ही छोड़ दिया है की तुम एक बार फिर साइंस ----और अपने सेन्स को परख करके  देखना जीवन तुम्हे हारा हुआ सिद्ध कर देगा | फिर भी मैंने अपने संपत्ति से १०-१०-करोड़ तुम्हे भेज दिए है क्योकि तुमपर टाइम नहीं है | ईश्वर तुम्हे खूब खुश रखें | दूसरी तरफ से आवाज बंद हो गई थी|


 साइंस और सेन्स का युद्ध जीवन भर चलता ही रहा है और यही विडम्बना बनी रही कि, जो साइंस को बहुत ज्यादा जानता गया, वैसे वैसे उसमे विचार शून्यता ,आभाव , आदर्श और मानवोचित गुणों के स्थान पर अहम् , वैमनस्यता ,अहंकार ,और विद्वेष भरता चला गया, जबकि संसार  की पूर्णता के लिए हर विज्ञान को माध्यम बनाया गया था , जीवन के सर्वोन्नत शिखर पर दया- सहष्णुता -करुणा - प्रेम और परमार्थ का विशाल मैदान है जबकि भटके हुए साइंस से केवल विनाश -चीत्कारें -अपमान -प्रतिद्वंदिता -स्वार्थ और पराभव ही प्राप्त हुआ है ,इतिहास गवाह है की शक्तियों और वैज्ञानिक पराकाष्ठा की सोच के साथ यह भाव स्वतः जुड़ जाता है कि  हर कोई आपके दासत्व को स्वविकर करले बढ़ता हुआ साइंस कम होता हुआ सेन्स और यही क्रम एक दिन इंसान को महा विनाश के सामने खड़ा कर देता है, ठीक वैसे  ही जैसे दो जानवर अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए जान से मरने मारने की हदपर  लड़ाई लड़ रहे हों| 



  आउटऑफ़ कवरेज एरिया ------ है आप अपने आपसे ---- आदर्शों और अपनी सोच से -------- अपने खुद से दूर जाने के कारण ही शायद आप अपनी आतंरिक शक्तियों को नहीं ढूढ़  पा रहे है ,हजारो लाइक्स , हजारों दोस्त और हजारो मैसेज में हम अपने आपको कहीं पा ही नहीं रहे , लाखों फोटो लिए बैठे है हम अपनाचेहरा  ही  भूल गए है ,हर बार नई फोटो मैसैज ----- और हजारों लाइक्स  और भयानक नशा एक अडिक्ट की भाँति अपने आपको ढूढ़ते ढूढ़ते खुद खोते जा रहे है परिणाम यह कि जीवन जिस बड़ी खोज के लिए चला था वो स्वयं भटकने लगा है ,और हम शायद अपने आप से इतना दूर निकल गए है ,की जहाँ दूसरे की सोच से  हमारा कोई वास्ता ही नहीं रह गया है  परिणाम हम स्वयं अपने बनाये हुए कारागार में ऐसे कैद होते जारहे है जहाँ केवल यही आवाज आ रहीं है  जिस शख्श को आपने फ़ोन लगाया है वो आउट ऑफ़ कवरेज एरिया है ---------


सहानुभूति -विचारोनुभूति -सवेदनाएँ मानवोचित आदर्शों के लिए जरूरी है यदि किसी विज्ञान की सार्थकता का प्रश्न कही पाया जाता है तो वह इनके उद्गम से ही पहिचाना जाएगा ,इतिहास ने जो जो क्रांतियां देखी  है उनके पीछे यही तथ्य रहा है की समय विकास औरउसके लिए किये गए प्रयास केवल इसलिए किये गए थे, कि  वे मानवीयता के लिए वरदान बन कर सामने आये मगर जैसे जैसे समय ने राष्ट्रों और व्यक्तियों ने अपने  आपको सर्वशक्तिमान सिद्ध किया वैसे वैसे वे सब  लिए ख़तरा  बन बैठे , और विकास का वरदान ही जब आपके लिए विनाश का अभिशाप सिद्ध होने लगे तो आपको एक बार पुनर्विचार की आवश्यकता अवश्य है जो आपको सही आइना अवश्य दिखाए गा |

आज जब सम्पूर्ण विश्व की शक्तियां एक दूसरे पर आँखे तरेर रही है, कोई किसी का वर्चस्व मानने को तैयार ही नहीं है ,वहां हम कौन  से विज्ञान और मानव कल्याण की कहानी सूना रहे है ,एक राष्ट्र कहता है उसकी सेनाएं सुरक्षित है उसपर परमाणुबम्ब है ,दूसरा कहता है उसपर भी वही शक्तियां है जो सामने वाले देश पर है , तीसरा कहता है मुझ पर दूर बॉम्ब  भेजने की तकनीक नहीं है, मगर मुझ पर हाइड्रोजन बम है मैं  अपने ही एरिया में विस्फोट करके सारी पृथ्वी को  ख़त्म कर दूंगा क्या आपकी  साइंस का मूलभूत उद्देश्य यही था ,कि  आप मानव कल्याण के नाम पर स्वयं विध्वंसक सिद्ध हो जाए, शायद साइंस के साथ आपने अपना सेन्स --सेंस्टिविटी और सहानुभूति सब खो दी है |




निम्न पर विचार करें
  •  जीव न में मूल्यों को कभी नहीं भूलें उनके बिना विकास का कोई महत्व है ही नहीं 
  • मानव कल्याण और सहष्णुता  से ही जीवन को बढ़ते हुए क्रम मे   रखा जासकताहै,  यदि आप स्वयं से दूसरे की सहायता के लिए तैयार न हो पाए तो स्वयं नष्ट हो जाएंगे | 
  • विकास ----साइंस ------ सेन्स का उद्भव परमार्थं  और कल्याण के लिए हुआ है और उसे सकारात्मक रखना आवशयक है | 
  • निरंतर विचार शीलता के साथ विकास में दूसरे अपनों को शामिल करते रहें ,क्योकि उनके शामिल होने पर ही आपकी असल जीत होगी | 
  •  सुख सबकी आवश्यकता है मगर जब तक आप किसीके सुख के कारक  नहीं होंगे ,तबतक आप को भी सुख प्राप्त नहीं होगा| 
  • विकास विज्ञान का यह मतलब कभी नहीं रहा कि वह अपने आपको कर्तव्यों और आदर्शों से मुक्त समझे ध्यान रहे नकारात्मकताओं और सकरात्मकताओं का फल अलग और अवश्य मिलता है | 
  • साइंस के साथ अपने सेन्स को सकारात्मक बनाये रखे, क्योकि यही आपके सेन्स को सकारात्मक  रख सकता है | 
  • विकास और कर्त्तव्य दोनों में सामंजस्य रखने वाला ही जीवन को समझ पाता  है और दोनों की ही आवश्यकता आपको उत्कर्ष पर ले जाएगी | 
  • साइंस का प्रयोग सेन्स को जागृत करते हुए ही करें अन्यथा निर्माण के औजारों से हाथ भी काट जाते है |

Sunday, July 23, 2017

सही दिशा बताने वाले लोगों का सम्मान करें Respect the people who gave the right direction

सही दिशा बताने वाले लोगों का सम्मान करें 
Respect the people who gave the right direction
एक बड़े पुलिस जिला मुख्यालय पर पिता कार्य करते थे ,मूल्य आदर्श और ईमानदारी उनके खून में लिपटी थी ,कभी कभी पिता  जोर से चिल्ला रहे होते थे, कि तुम्हारा मैथ्स अच्छा है ,तुम मैथ्स लेकर कम्प्यूटर के क्षेत्र में खूब सफल हो सकते हो, मगर  रोषित केवल इसी   पर अड़ा बैठा था कि ,  मै  बीएससी ही करूँगा , यह क्लेश पिछले ४ दिनों से चल रहा था ,माँ की स्थिति ज्यादा ख़राब थी, वो कभी रोषित को बोलती ,भैय्या वो तेरे लिए ही तो सब कररहे है ,और रोषित गुर्राता तो  शांत हो जाती थी , फिर वो कभी पिताजी को कहती आप ठीक कह रहे होआप पर  आज के लड़के तो सुनते ही नहीं है कुछ ,न माँ बाप की इज्जत है, न जीवन की चिंता, बस अपनी ख़राब यारी दोस्ती निभाने को ,किसी भी स्तर पर जा सकते है ये लोग,पिता गहरी खामोशी में माँ का मुँह देखते रह गए हरे सहमे से , लगभग १० दिन चला  था यह सब ,  पिता को याद  आने लगा कि एक बार महंगे मोबाइल की खरीद की जिद पर अड़े ,रोषित को दिलाना ही पड़ा था न मोबाइल, अपने कपडे, इसकी माँ की साड़ी, सब छोड़कर , अच्छेकपडे ,घड़ी ,बाइक ,स्कूल ट्रिप सब ही तो, उसने जिद करके पूरे कर लिए थे , बाबा हमेशा समझाते थे प्रेम अपनी जगह होना ही चाहिए ,मगर अनुशासन के बिना तो सब तहस नहस हो ही जाएगा न | बीएससी में प्रवेश हो ही गया था रोषित का और पढाई ,मटरगश्ती ,और यारी दोस्ती का दौर भी चल पड़ा था अपने पूरी ताकत से | 
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यदाकदा पिता की बात करते हुए रोषित कहता था कि ,हर बात में आदर्शों की बातें करने वाले पिता को यह मालूम ही नहीं था ,कि दुनियां कहाँ  पहुँच गई है ,वो अपने पुरातत्व विभाग जैसे कपडे पहने हुए बड़ी बड़ी बातें करतें है ,मगर यह नहीं जानते कि मेरे दोस्त मेरे समाज में जो मित्र है ,उनके पिता, केवल पैसे ,साधन और बड़ी विलासता की हर चीज देते है ,मगर कोई बात नहीं करते ,दोस्त बताते है कि  उनपर टाइम है नहीं है, जो हमारा दिमाग ख़राब करें और एक हमारे पिताजी है ,जो केवल पीछे लगे रहते है ये करो ,यह गलत है ,यही सही है ,बहुत टाइम है उनपर परेशां हो गया हूँ मैं ,माँ सुनती रही बोली नहीं जानती थी कि यदि कुछ बोली तो फिर कलेश हो जाएगा --- सीने में कितना दर्द होता है उस कलेश के समय ,डर --भय ---विषाद  ---घुटन क्या क्या होता है यह कुछ कैसे बताऊँ इसे यह सोचते सोचते माँ की आँखें भर आयी | 

बीएससी -फिर एमएससी की पढाई पूरी होगई  थी ,मगर नौकरी के कोई अते पते नहीं थे , कई जगह फॉर्म भरे थे मगर निराशा ही हाथ लगी ,पीएससी , और बहुत सी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की गई ,वहां भी नतीजा शून्य पिता शून्य भाव से यदाकदा बोलते थे ,बेटा कोई बात नहीं  ईश्वर सब ठीक करेगा ,और रोषित सुनकर चुप होजाता था उसे लगता था ,शायद ये अपने आप को सांत्वना दे रहे है ,कभी उसे लगता था शायद कोई बड़ा अपराध होगया है उससे , उसके समाज के स्वार्थी लोग दूर बहुत दूर चले गए थे , जो उससे अधिक स्तर वाले थे, वो अपना बिज़नेस खोल कर बैठ गए और सहायता के नाम पर उसने बहुत  कुछ सुना था उन लोगो से, उसकी सबसे करीब दोस्तों ने उसे यह आइना दिखा दिया था, कि दुनिया में दोस्ती वोस्ती क्या होती है ,केवल एक सिद्धांत होता है  बी प्रेक्टिकल और जैसे को तैसा | अचानक आर्थिक बदलाव के अंतर्गत हजारों छापों की कार्यवाही में दोस्तों के प्रतिष्ठान पकडे गए हजारों अनियमितताएं मिली थी , और पेपर में भ्रष्टाचार की अनेक ख़बरों के साथयह भी था की उनलोगो को जेल भी जाना होगा | उसी समाचार पत्र में एक ओर पिताजी की भी फोटो छपी थी , लिखा था प्रदेश में ईमानदारी और श्रेष्ठ कर्त्तव्य के लिए पुरुस्कृत |, आज पहली बार उसे अपने पिता पर गर्व और अपने मित्रों के पिताओं के बोन पन का अहसास हुआ था | 

नौकरी की भाग दौड़ और तरह तरह की तैयारियों के मध्य सब कुछ फिसलता सा दिख रहा था ,पहली बार उसे लगा कि शायद यदि कम्यूटर साइंस से पढाई की होती तो शायद नौकरी आसानी से मिलजाती शायद पिता सही थे ,मन में
बड़ी व्यग्रता थी ,  उसी समयमालूम हुआ कि , शहर में एक मूर्धन्य सन्यासी आये है , वो त्रिकालज्ञ थे,आँख बंद करके सब  बता सकते थे ,उनकी ख्याति बहुत अधिक थी ,रोषित ने कई बार कहा मैं नहीं मानता  ये सब, तो उन्होंने कहा वो बहुत बड़े इंजीनियर थे ,आईआईटी पास और सिविल सर्विसेस के वरिष्ठ अधिकारी रहे है ,एक झटके में में सारे भ्रम टूट गए थे ,रोषित के और एक अनजान बंधन में वह उनके पास जा पहुंचा ,और प्रणाम करके बैठ गया साधु ने पूछा कौन  है आप ,तो बड़े विनम्र भाव से कहा मैं  रोषित हूँ --- पिता का नाम ----- श्री कामता नाथ ----- अचानक साधु ने खड़े होकर किसी को आकाश की तरफ प्रणाम किया और ध्यान में चलागया और उसने कहना आरम्भ किया ---पुत्र जीवन में अच्छे कुल ,धर्म और श्रेष्ठ  समाज में पैदा होने के बाद भी तूने नर्क भोगा है ,उसका मूल कारण यह कि तूने अपने रोकने टोकने वालों को ही ख़त्म कर दिया है ,इससे कर्म और सुख से शून्य तू सांसारिक बंधनों के पराभव की और अग्रसर है ,मै  सब जानता हूँ तेरा पिता संसार में रहकर भी सबसे मुक्त है ,मैंने उसको ही प्रणाम किया था , तेरे नर्क जैसे जीवन की यातनाये ख़त्म होने का समय आगया है ,जा अपने पिता माता गुरु शाप का प्रायश्चित कर, तुझे श्रेष्ट सेवा का अवसर मिलेगा ,साधु शांत होगया ,रोषित को लगा एक बड़ा पहाड़ उसके ऊपर लुढ़कता आ रहा है बिना आवाज के | 

जोर से दरवाजा खटखटाया था और पिता ने ही दरवाजा खोला था बिखर गया था  रोषित पांवों में गिर गया ---- पिता पूछ रहे थे क्या हुआ बच्चे माँ रोने लगी थी क्या होगया बता तो  ---- बस माफ़  करदो  मुझे मारो -डाटों ---ख़राब व्यवहार करो  मगर मुझे ऐसे मत छोड़ों कि  मुझे हक से कोई डाटनें वाला ही न हो ,  मैं  थक गया हूँ इस जीवन से - अपनी गलतियों से और अपने प्रेक्टिकल व्यवहार से ,अब मुझे  वो ही पिता माता गुरु चाहिए जो मुझे बात बात पर अपना परामर्श दे ,अच्छे और बुरे का भेद बता पाए ,बस इतना व्यवहार चाहिए आपसे ,इसके बदले में मै दुनियां की सारी  सफलताएं आपके क़दमों में बिछा दूँगा ----- माता -पिता और रोषित की आँखों से धरा प्रवाह आंसुओं का वेग था, उन्हें ऐसा लगा कि आकाश से कोई कह रहा हो ,कामतानाथ यह समय और आदर्शों की लड़ाई थी और उसमे तुम जीत गये हो, तुमने समय और उसके परिवर्तन को हरा दिया है ,पिता ने पुत्र को और  कस कर  गले से चिपका लिया | 


इस लूट मार वाले समय में जहाँ जंगल का बड़ा कानून चल रहा है, जहाँ हर काम -सम्बन्ध किसी न किसी स्वार्थ के धरातल पर खड़ा है ,वहां कोन किसको -क्यों  रोकेगा ,क्यों किसी को किसी कार्य से क्यों डाँटेगा, किसी गलत मार्ग पर जाने से क्यों आपके व्यवहार को सुधारने की बात करेगा ,क्यों आपको जीवन के सच्चे मार्ग का पथ प्रदर्शनकरेगा यह प्रश्न वाचक है ,क्योकि यदि सत्य मार्ग का दर्शन होगया तो ,आप उस का शोषण कैसे कर पाएंगे ,और शोषण ही नहीं होगा तो आपके सम्बन्ध के मायने भी शून्य हो जाएंगे ,पूरे संसार में जीवन बहुत काम लोगों के साथ वह व्यवहार कर पाता  है ,जहाँ आपका व्यवहार बिना किसी प्रयोजन के ,संबंधों को पूर्ण करने की चेष्टा कर पाता  है ,और यदि आपका मन मष्तिष्क इन बातों में से सार निकाल कर अपने आदर्शों कामार्ग बना पाया , तो वह सबसे अधिक श्रेष्ठ है | 




प्रेम की पारा काष्ठा पर गलत  कार्य करते अपने को देखकर कितना दर्द होता है ,सीने को  कितनी  यातना सहनी होती है ,मष्तिष्क और मन को ,और कितना भयानक होता है, वह भय जो अपने किसीको नुक्सान पहुंचाने की कोशिश में देखने से होता है ,और विडम्बना यह कि सामने वाले को आपके  क्रोध के आवेग और संबंधों की आकलन शून्यता के कारण यह अहसास ही नहीं हो पाता  कि  वास्तव में सही कौन है ,निरंतर अपने मानसिक एवम शारीरिक आपूर्तियों के लिए , अथवा जिद -अहम्  या अपने आपको सर्वश्रेष्ठ बताने की तूफानी सोच में आपको अपने बहुत करीबी लोग तो प्रतिद्वंदी दिखते है , उनकी पाबंदिया आपको अपने लिए  बहुत ख़राब जान पड़ती है , शायद आप अपने तमाम आवेशों से से हारे बैठे है और अपने मन की हर बात पूरी करने चाहते है जैसे एक नन्हा सा बच्चा जलते हुए दीपक को खाने की जिद कररहा हो |




 || किसी ने न रोका किसीने न टोका ,दुआ बद दुआ लेके न कोई आया|| 

|| ये कैसी खिज़ा थी ये कैसी रिवायत ,यहाँ कौन मेरा ,समझ ही न आया||

 दिल्ली सल्तनत का बादशाह बहादुर शाह जफ़र अपने जीवन के अंतिम पलों में था अल्लाह का सहारा था , उस तक ही पहुँच रह गई थी  उस जेल की कोठरी में , और अल्लाह के दूत से बात कररहा था , हे राजा तू तो जीवन को जीतने और अपने आपको ऐशोआराम में डुबोये हुए पूर्णनाद की और जा रहा था  मै  तुझसे यही जानना चाहता हूँ की तेरे जीवन की भूल क्या रही हे दूत मैं जनता हूँ अपनी गलतियां दूसरों को कष्ट न देना अच्छा आदर्श है मगर स्वयं की रक्षा का विषय  छोड़  देना सबसे बड़ा अपराध है , और मेरी अंतिम इच्छा यह है कि मुझे अपनी जमीन पर दो गज जमीन जरूर मिलजाती मरने के बाद और मेरी नाकामी की सबसे बड़ी कोइ वजह थी तो वह यहकि मेरे सामने किसी ने जुबान ही नहीं खोली और मई अंधेरों के फैलने की भनक तक नहीं पा सका क्योकि मुझे कोई टोकने वाला ही नहीं था यह कहते हुए उस शासक ने अपनी बंद कर ली | और इन्हीं विचारों की गहराई में दिल्ली सल्तनत का वह शहंशाह  जीवन से प्यासा ही प्रयाण कर गया | 



निम्न को जीवन में उतारने का प्रयत्न करें 
  • जीवन को समझने का प्रयत्न करें उनके मानदंड बनाये और यही विचार करें कि उन्हें पूर्ण कैसे किया जा सकता है उन्हें अपने आपमें उतारने का प्रयत्न करें | 
  • समय के साथ आपको अपने संस्कारों।,सत्य और हर विचार को परिष्कृत करना होगा जैसे जैसे समय बदलेगा आपके विचारों में और श्रेष्ठता आने लगें यह ध्यान रखना आवश्यकहै | 
  • उन लोगो को अपने पास बनाये रखें जो आपको टोकते है क्योकि इनके कारण आप स्वयं को और अधिक परिष्कृत कर सकते है | 
  • क्रोध वैमनस्यता और आपनसे तुलना करने वालों के प्रति अपना रवैय्या सकारात्मक बनाये रखें क्योकि वे यही चाहते है कि आप अपना धैर्य खोकर उनके जैसे हो जाए | 
  • माता पिता गुरु को जैसा व्यवहार कररहे है करने दें --उनसे कोई तुलना नहीं करें ,क्योकि उनसे  बंधन उत्पन्न होंगे यदि वे सही हुए तो ,आपका जीवन बनेगा और यदि वे गलत हुए तो बंधन उनका होगा आपका नहीं स्वयंको सकारात्मक बनाये रखें 
  •  तुलना- जलन - क्रोध का सम्बन्ध प्रेम से बंधा होता है क्योकि इसके पीछे हमारी कोई कामना छुपी होती है और यही कामना का भाग प्रेम कहलाता है | 
  • सही अपनत्व का आकलन हमेशा करते रहना चाहिए क्योकि यदि आप ने अपने व्यवहार में उन्हें पहिचान कर अपना व्यवहार स्थिर कर दिया तो आपकी गलती की सम्भावनाये बहुत काम हो जाएंगी | 
  • सत्य और जुल्म के प्रति सजग रहें मगर गलती के प्रतिकार का तरीका इस तरह का अवश्य हो जिसमे सहजता और सरलता से हम  आपको सत्य आदर्श के निकट रखे ,जुल्म न करें न सहन मगर अपने को नकारात्मक किये बिना | 
  • स्वयं की रक्षा प्रणाली बनाये रखें बिना कीसी को दुःख पहुंचाए आप स्वयं को सरल मजबूत , सत्यशील और परिपूर्ण सिद्ध करते रहें ,| 
  • आपके आचरण और व्यवहार से दूसरे को कष्ट न पहुँचे  मगर उसके कष्ट को देखते हुए आप अपने आचरण ,आदर्श और अपनी मर्यादाओं को न लांघे | यही आपकी पूंजी है |


Sunday, July 16, 2017

सफलता समय-धैर्य और सकारात्मकता की खेती है(success is cultivation of time-patience and positiveness )

सफलता समय-धैर्य और सकारात्मकता की खेती है(success is cultivation of time-patience and positiveness )

राजा शूरसमर  एक प्रतापी राजा था अपने पूरे जीवन काल में हजारों युद्ध जीत कर अपने आपको कई बार साबित कर चुका था वह , रानियां पुत्र पौत्र और भरा पूरा परिवार था उसके पास बस राजा की एक ही समस्या थी की वह हमेशा इसी उधेड़ बुन में रहता था कि  कही कोई उसका राज्य न हथिया ले कोई उसे हानि न पहुंचा सके, कोई उसको लूट न ले और सबके साथ एक बड़ा भय यह भी कही मै  मर न जाऊं | राजा कभी भी परिवार की छोटी छोटी बातों में उलझ जाता था, रानी की समझाइश पर, बच्चों की शैतानियों पर और एक दूसरेको छोटा बड़ा बताने पर भी हर जगह लड़ बैठता था | राजा की इस सोच से पूरा राज परिवार परेशान  था, न कोई उत्सव न कोई त्यौहार न कोई कार्यक्रम जिससे प्रजा और  राजा  का मनोरंजन हो सके|  एक दिन राजा ने यह मुनादी करवा दी कि  जो कोई उसे इस रोग से मुक्त कर देगा उसे आधे राज्य की दौलत दे दी जायेगी और जो उसमे सफल न हुआ तो उसे मृत्यु दंड दिया जाएगा कई लोग आये और शिकार हो बैठे उसकी सनक का ,एक दिन एक साधु आया और उसने कहा मै आपके रोग का इलाज कर सकता हूँ, मगर आपको मुझे १ माह देना होगा और आप मेरे साथ ही रहेंगे मै   आपके राज्य की सीमा में ही अआपके साथ रहूँगा राजा ने बहुत सोचा और सबको बताया मेरा राज्य चारो और से सेनाओं से सुरक्षित है चलो यही सही यह कहकर वह साधु के साथ चल दिया
चलते चलते वे दोनो एक घने जंगल में पहुँच गए प्यास के मारे बुरा हाल था राजा का ,उसने कहा मै  तेरी गर्दन काट कर फेक दूंगा, पानी  लेकर आ साधु मुस्कुराया और अपना कमंडल लिए आगे बढ़ गया ,उसके जाने के ५ मिनट  बाद  ही एक शेर की जोर से दहाड़ सुनाई दी और राजा बेतहाश भागने लगा और भागते भागते बेहोश होकर गिर पड़ा जब उसे होश आया तो उसने स्वयं को बहुत बलिष्ट और ताकतवर महसूस किया, पास ही वही साधु बैठा उसकी सेवा कर रहा था , राजा को भूख लगी थी  उसने आधे अधूरे खाये फलों को देखा ,फिर तेज भूख के कारण कुछ न बोलते हुए खाना चालू कर दिया , अद्वतीय स्वाद था उन फलों का , राजा ने साधु से पूछा हम कहाँ है साधु बोला  ,राजा हम जंगल में भटक गए है पिछले २माह  से आप अपनी याददाश्त खोये पड़े थे ,उस रोज मै आपको भागता देख, आपके साथ चला आया यहाँ आकर आप बेहोश होगये , होश आने पर आप अपनी याददाश्त खो बैठे थे ,और उसी अवस्था मेँ आपने कई शेरो और जंगली जानवरो को वीरता पूर्वक भगा दिया ,आप निर्भीक , अजेय योद्धा की तरह व्यवहार करते रहे और ये फल मेवा और दूध आप ही एकत्रित  करके लाये हो और पूरी सफाई आपने ही मेरे साथ की है ,कई आदिवासी आपसे ही शिक्षा के लिए आते  है , शाम में राजा ने देखा कि  वह एक चमत्कारिक बहाव में आदिवासियों को जीवन के गहरे राज समझा रहा है , जीवन के वे दार्शनिक सत्य जो उसने कभी सुने थे वो उसे एक एक कर  याद आरहे है ,राजा ने  कहा साधु महाराज ये कैसा परिवर्तन किया है आपने ---- तो साधु ने कहा  राजा तू पिछले जन्म में एक बहुत तेजस्वी राजा था जो कालांतर में सन्यासी हुआ ,परन्तु घोर साधना के बाद भी तेरा मोह नष्ट नहीं होपाया ,परिणाम तुझे फिर एक असंतुष्ट राजा बनना पड़ा ,मैं तेरा पूर्व जन्म का गुरु था मैंने तुझे केवल तेरा विस्मृत स्वरुप याद  दिलाया है और तूने उसे पूर्ण भी किया है |


साधु ने कहा पुत्र जीवन के मूल में जो सबसे शक्तिशाली तत्त्व है, वह है समय और वह  इतना विराट स्वरुप वाला है जिसके सामने सभी नगण्य है, इतने विराट तत्त्व को जीतने का एक मात्र उपाय है  सब्र और स्वयं की साधना और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को स्वयं की चेतना में अविभूत करना, बस यही एक मात्र कुंजी है ,उस अमृत्व को पाने की , भय , विषाद ,कामनाएं और अच्छा बुरा तुम्हे उलझाने वाले जाल है और जितनी देर आप इनकी कामनाओं में उलझेंगे आत्मतत्व से उतनी ही देर में मिल पाएंगे और आत्म तत्त्व से साक्षात्कार बिना आप अपने ही बोये कर्मों से इसप्रकार घबराते और डरते  रहेंगे जैसे आग से खेल खेल में आपने अपने कमरे  को जलते हुए और खुद को घिरा हुआ पाया है और अब आप खुद डरे सहमे और चिल्लाते हुए दिख रहें है | यही गति है हम सबकी |


अंत में साधु ने बताया की पहले ४ दिनों में ही आप खाना लाना पानी लाना और अपनी रक्षा  करना जानते थे आप सुनसान में बैठ कर निरंतर चिंतन करते रहते थे   और आप पूर्ण और विद्वता के शिखर पर खड़े दिखाई देते थे , राजन अब आपकी सेनाये आपको ढूढते हुए आरही है, आप स्वयं को नयी यात्रा के लिए तैयार करलें ,राजा और साधु  राज्य में लौट आये  एक नैतिक ,आदर्शों और जीवन को जानने वाला पूर्ण पुरुष से  | साधु को राजा ने आधा राज्य दिया तो उसने हँसते  हुए लौटा दिया और कहा, पुत्र आज तूने जिस सब्र और समय को जीतने की दौलत प्राप्त की है, वह कई राज्यों से बहुत बड़ी है, राजा साधु के सामने नत मस्तक हो गया और अपने पुत्रों को राज काज सूप कर साधु के साथ हो लिया | 

आम जीवनमे हम सभी एक तिलस्मी व्यक्तित्व लिए घूम रहे है उसमें केवल बनावटी ,अधूरा और नकारात्मकता से भरा मन जीवित है ,समय की अबाध गति की दौड़ में केवल इस कृत्रिमता के सहारे हम बहुत दौड़ चुके है और अपनी नकारात्मकता को सराहकर भी स्वयं को श्रेष्ठ  बताने की होड़ में लगे है ,जबकि मन आपके इस आचरण से  छुब्ध होकर आपको और  अधिक नकारात्मक बना रहा है , क्योकि  ध्यान रहे आत्मा को आपकी झूठ से सदैव कष्ट ही प्राप्त होगा ,और आप सामायिक उपलब्धियों के लिए कोई भी दांव लगाने को तैयार है ,आपकी दशा उस हारे हुए जुआरी की तरह है जो अपने दांवो में सब कुछ हार चुका है , मगर समाज से यही मांग कररहा हो कि आपको सर्वश्रेष्ठ ही समझा जाए ,अब आप बताइये कि जब आपकी आत्मा ही स्वयं कोअपराधी की तरह समझ रही है और आप  स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने की जिद कररहे है ऐसे में आप सुख शांति कैसे पाएंगे यह प्रश्न चिन्ह है |


सफलता का सूत्र  सकारात्मकता -सब्र - साधना -सहजता और स्वयं को सत्य स्वरुप में समझने और समझाने में ही निहित है समय के प्रवाह की तेज धार को केवल इनसे ही जीता जा सकता है ,इसके अतिरिक्त विराट समय को ब्रह्माण्ड में कोई बाँध  ही नहीं पाया है ,साधना के सूत्र से सकारात्मक विश्वास  के सहारे निरंतर कार्यकरने का प्रयत्न आपको पूर्ण सफलता दे सकता है बस आवश्यकता स्वयं के प्रति ईमानदारी बनाये रखने की है, क्योकि इसके आभाव में आप स्वयं सफल भी होजाये तो ,जीवन के अंतिम छोर पर पूर्णानंद और शांति के पास कभी नहीं पहुँच पाएंगे, जो आदमी का चरम लक्ष्य भी हैऔर उसके बिना आदमी  की सारी उपलब्धियां शून्य वत  हो जाती है या  इंसान स्वयं अपने लिए एक ऐसा जाल बना  डालता है जिसमे उसका स्वयं का अस्तित्व उलझ जाता है सफलता का आशय सारी नकारात्मक सोच से स्वयं को मुक्त कर स्वयं को परमानंद तक लेजाना है ||


   निम्न  का प्रयोग अवश्य करें

  • जीवन कर्त्तव्य  साधना और सब्र का ही मायने है जितना संभव हो उसे अपने व्यवहार में लाते रहें ध्यान रहे सब्र से कर्त्तव्य की साधना जितनी सटीक होगी सफलता का पूर्ण रूप उतना ही बड़ा होगा | 
  • सकल्प के साथ विषम स्थितियों में भी अपना सब्र बनाये रखें क्योकि जितना गहरा सब्र  होगा आपकी सफलता के आयाम वैसे ही होंगे | 
  • स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बनाने की चाह के लिए अपने आचरण और व्यवहार को सदैव परखते रहें किसी भी स्थिति में उसमे नकारात्मकता पैदा नहीं होने दें | 
  • निरंतर स्वयंको बड़ा  चेष्टा में दूसरों को हीन  सिद्ध न करें अन्यथा  स्वयं की नकारात्मकता में स्वतः वृद्धि होने लगेगी जो आपके विकास में बाधक होगी | 
  • विषम स्थितियों में यह अवश्य ध्यान रखा जाए कि एक अमोघ शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड  की नियंता है और वही सब समस्याओं को हल करेगी ,और यही विश्वास आपके जीवन को सफल बना देगा | 
  • समय की बहुमूल्यता को समझते हुए, अपने हर जीवन पल का प्रयोग उसप्रकार कीजिये जिसप्रकार तपते रेगिस्तान में जल की कुछ बूँदें आप समय को बहुमूल्य समझेंगे तो समय आपको बहुमूल्य बनादेगा | 
  • सकारात्मकता मूल मंत्र है जीवन का जिसके सहारे विश्वास ,कर्त्तव्य संकल्प  सब धनात्मक होकर आपको उन्नति की और लेजाने लगते है | 
  • सफलता का मतलब यह कदापि नहीं है की आप भौतिक रूप से साधन संपन्न होजाये या आप बहुत सारा धन -संपत्ति अर्जित करलें , सफलता का आशय यह है की आपकी आत्मा पूर्ण प्रसन्न होकर आपकी उपलब्धियों को सफल सिद्ध करें | 
  • अपने स्वयं को सदैव सत्य के सामने खड़ा रखें ,जीवन के किसीभी स्तर पर आपको बनावटी चरित्रों और परिवेश का सहारा नहीं लेना पड़े अन्यथा आप अपनी पहिचान खो डालेंगे | 
  • स्वयं को अपने अंदर से पहिचानने का प्रयत्न करें क्योकि जब तक आप स्वयं की शक्तियों से अपरचित रहेंगे तबतक आप केवल  शोषित होकर दुखी होते रहेंगे | 
  • स्वयं को एकाग्र कर शक्तियां पहिचानें और उनका श्रेष्ठ प्रयोग करें आपको जीवन बहुत सुलझा हुआ लगने लगेगा और सारी जटिलताएं ख़त्म हो जाएंगी | 
  • क्रोध से बुद्धि का नाश और बुद्धि नाश से समय की मृत्यु होने लगती है अतैव तुरंत क्षमा का व्यवहार सबसे उचित है जिससे आपके समय की जागृति आपके काम आ सके | 
  • तुलना और श्रेष्ठता की परीक्षा प्रकृति का विषय न होकर अहम् की  लड़ाई है और यही  अहम् आदमी में नकारात्मकता पैदा कर देता है |

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...