Sunday, July 26, 2015

Why are you worried for Likes and comments लाइक्स और टिप्पणियों के लिए आप क्यों चिंतित हों

Why are you worried for Likes and comments
लाइक्स और टिप्पणियों  के लिए आप क्यों चिंतित हों


देवानी आंध्रा के एक प्रतिष्ठित मंदिर के प्रमुख पुजारी की संतान थी धर्म , कर्म , आचरण , और सुबह शाम सत्य और आदर्शों में बंधें जीवन का सशक्त चलचित्र था उसका जीवन , भगवान बालाजी का श्रृंगार सेवा और हर व्यक्ति से उसके  मधुर सम्बन्ध ने उसे पूरे क्षेत्र में ख्याति लब्ध बना दिया था , बहुत दूर दूर तक लोग यही कहते थे संस्कृति सभ्यता,और संस्कार इन लोगो से सीखने चाहिए , जीवन का इससे  सुन्दर सांकल और चित्र हो ही क्या सकता था |
१५ वर्ष की उम्र पूरी करने के जश्न में देवानी की बड़ी बहिन जो अमेरिका में रहती थी ,ने उसे एक लेपटोप दिया और
ढेर  सारी बधाइयां , उसने बताया विश्व कहाँ से  कहां  पहुँच गया है सब तरफ केवल विकास , बाजारों की चक चोंध और असंख्यों उपयोग के सामान है , और हम अभी भी वहीँ पड़े अपने आप को केवल मंदिर और रूढ़िवादी जंजीरों से बधें बैठे है, कुछ दिन साथ रहते रहते बड़ी बहिन ने अनेकों साइट्स से उसे जोड़ दिया  आरम्भ में वह जब कोई मंत्र या धर्म के आदर्शों की बात शोशल साइड्स पर डालती थी तो उसे एक -दो  यह एक भी लाइक्स मिलता ही नहीं था भूले बिसरे कोई एक आध लाइक्स मिलता भी था तो बहुत दिनों में --- दोस्तों के हजारों लाइक्स , और बड़ी बहिन की बातों से मन छुब्ध होने लगा , सपनों में भी उसे अपनी हीनता का बोध होने लगा --- फिर धीरे धीरे मंत्र के साथउसका सेक्सी सजा धजा उसका स्वरुप दिखाई देने लगा और समय बीता जीवन ने स्वयं को और ढीला छोड़ दिया धीरे धीरे भद्दे भद्दे कमेंट्स के साथ देवानी दूसरे किसी नाम  से उस शोशल साइट्स की सबसे बदनाम मेंबर थी ,  इस बीच कई बार लोगो ने उसे बुरी तरह ठग डाला था ,मन में गहन पीड़ा थी अपने पारिवारिक मंदिर में भगवान के सामने बैठी देवानी अलग अलग तरह की कसमें और संकल्प  करती  दिखी और अचानक वह भगवान का वही गीत गा उठी जिसे वह रूढ़िवादी सोच कर ६ माह पहले छोड़ चुकी थी ,उसे लगने लगा था कि  जीवन लाइक्स से अधिक अपनी अंतरात्मा  के लाइक्स की प्रतीक्षा करता है , जबकि  अधिक प्रसंशा की आकांक्षा में लोग  हममें अपनी वासनाओं की आपूर्ति में हमें अपनी अंतरात्मा की गहराइयों से दूर एक बनावटी संसार में लेजाता है जहाँ हम केवल भोग्य का सामन भर होते है | देवानी संकल्प के बाद  रोते  रोते  अचानक मुस्कुराने लगी शायद उसे उसकी अंतरात्मा का सत्य समझा आ गया था | और उसने सही दिशा में जाने का संकल्प कर डाला था |


जीवन  में  आकांक्षाएं मनुष्य को गुलाम बनाये रखती है और सबसे अधिक महत्वपूर्ण तीन आकांक्षाएं  प्रबल मानी गई है  उसमें प्रथम धन की कामना , द्वितीय  पुत्र की कामना और तीसरी  यश की कामना  इनमे यश की कामना सतत और अधिक प्रबल है जिसमें आदमी स्वयं को बड़ा बताने की होड़ में किसी भी स्तर पर जा सकता है वहां स्वयं को सिद्ध करने के लिए वह हर बुराई और स्वार्थ को अपना सकता है , यही है जीवन में यशकी कामना की प्रबलता है , जीवन बार बार स्वयं की कमियों  से परेशान स्वयं को स्थापित करने की होड़ में लगा  रहता है , और स्वयं के इस स्थापत्य में उसे केवल यही फिक्र बनी रहती है की वह सबसे श्रेष्ठ साबित हो सके |


शरीर आत्मा और संसार जीवन एक सामंजस्य ही तो है सबका यहाँ  सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि  मन शरीर और संसार कैसे भी स्वयं को सबसे ऊपर खड़ा देखना चाहता है वह किसी भी स्थिति में स्वयं को हर्ता नहीं देखना चाहता जबकि आत्मा उसके हर कर्त्तव्य पर अपना मत अवश्य देती रहती है ,एक नौकर व्यक्ति ने अपने स्वामी से मरते समय उसकी सारी दौलत अपने नाम करवा ली  और  मरते हुए स्वामी को इस लिए मार दिया की वह सारी घटना अपने पुत्रों को न बतादे , पुत्रों ने इससबको अपनी अकर्मण्यता और उसकी सेवा का फल समझा और भूल गए मगर इस नौकर को जब भी समाज से प्रसंशा मिली इसे अपने हत्यारा होनेका और  बेईमानी से धन हड़पने का चल चित्र सैदेव दिखाई देता रहा, अंत में मरे हुए सेठ का ध्यान उसे पागलपन की उस सीमा पर ले गया जहाँ उसे पागलखाने में  बंद करना पड़ा , यदा कदा वह चिल्लाता रहता था , मैं  अमीर हूँ साले  को मार दिया , फिर जोर जोर से रोता था हत्यारा हूँ मैं मैंने अपनेको पालने वाले को मार दिया , तेरे को भी मार दूंगा , ------- दोस्तों इस आदमी के वैभव ,और यश कमाने की चाहत  में किये गए कर्म को इसकी अंतरात्मा ने अस्वीकार  उसे आईना दिखा दिया था , यही जीवन का अकाट्य सत्य है जो यह बताता है जीवन का जीवन का मायने लाइक्स कमाना  नहीं वरन  अपनी अंतरात्मा के लाइक्स को जीतते रहने में है |


हम सदैव यही उधेड़ बुन में लगे रहते है  कि कैसे भी स्वयं अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने मैं  लगे रहें ,जबकि  मन हर जीत के बाद  स्वयं को ठगा महसूस करते हुए आगे की चिंता में व्यस्त हो जाता है हर जीत अपना सुख छोड़कर स्वयं थोड़े ही समय बाद नए सुख की कामना करने लगता है , और और की मानसिकता उसे उस बिंदु पर पहुंचा देती है जहाँ सुख होते ही नहीं है , आप ही बताइये जिस भोजन में तृप्ति का गन ही ख़त्म हो जाए उस भोजन की उपयोगिता ही क्या हो सकती है , मन बुद्धि और आत्मा की अतृप्तता सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक अपूर्णता सिद्ध करने लगती है और अंतरात्मा हर बनावटी और असत्य को झुठलाते हुए बार बार ऐसे कर्म की मांग करने लगती  है जो वास्तव में आदर्श , सत्य और श्रेष्ठता की परिभाषा बन सके |


लाइक्स या आपकी प्रसंशा निश्चित तौर  पर  मन को अच्छे लगते है  परन्तु उनकी सीमा क्या हो , यह बात हमें अवश्य याद रखनी चाहिए , मित्रों हम अधिकाँश शोशल साइड्स पर जहां  स्वयं को श्रेष्ठ देखना चाहते है एक पल उनकी वास्तविकताएं अवश्य देखें , पड़ोस की एक अधेड़ आंटी ने १५ वर्ष के एक लड़के से ऐसी दोस्ती की कि उस किशोर का सारा चैन छीन लिया और एक दिन उसने आत्महत्या कर ली,एक अन्य आंटी ने पड़ोस की एक  बच्ची से ऐसी ही साइड्स पर दोस्ती की एवं  लम्बे समय तक ब्लैक मेल करती रहीं , मित्रों इनमे अधिकांश साइड्स वासनाओं की पूर्ती का एकमात्र  केंद्र बन गए है वे केवल स्वार्थ वासनाओं और शारीरिक मानसिक शोषण के लिए काम उम्र के बच्चों को गुमराह कररहे है , शायद समय आगया है जहां  बड़ी संख्या में लाइक्स इकट्ठे करने की बजाय आप स्वयं  अपनी अंतरात्मा का  लाइक  पा सकें |


लाइक्स या आपकी प्रसंशा निश्चित तौर  पर  मन को अच्छे लगते है  परन्तु उनकी सीमा क्या हो , यह बात हमें अवश्य याद रखनी चाहिए , मित्रों हम अधिकाँश शोशल साइड्स पर जहां  स्वयं को श्रेष्ठ देखना चाहते है एक पल उनकी वास्तविकताएं अवश्य देखें , पड़ोस की एक अधेड़ आंटी ने १५ वर्ष के एक लड़के से ऐसी दोस्ती की कि उस किशोर का सारा चैन छीन लिया और एक दिन उसने आत्महत्या कर ली,एक अन्य आंटी ने पड़ोस की एक  बच्ची से ऐसी ही साइड्स पर दोस्ती की एवं  लम्बे समय तक ब्लैक मेल करती रहीं , मित्रों इनमे अधिकांश साइड्स वासनाओं की पूर्ती का एकमात्र  केंद्र बन गए है वे केवल स्वार्थ वासनाओं और शारीरिक मानसिक शोषण के लिए काम उम्र के बच्चों को गुमराह कररहे है , शायद समय आगया है जहां  बड़ी संख्या में लाइक्स इकट्ठे करने की बजाय आप स्वयं  अपनी अंतरात्मा का  लाइक  पा सकें |


 लाइक्स और यश की कामना के समय निम्न को भी ध्यान रखें

  • अपनी सीमाएं बनाएं और कड़ाई से अपने नियमों का पालन करें क्योकि जीवन में अपने आदर्श सीमाएं ही आपको उन्नति के शिखर पर ले जा सकती हैं | 
  • दुनियां में हर इंसान बिना किसी कीमत के आपको कुछ नहीं दे सकता और जो लोग बिना किसी सशक्त कारण  के आपको लाइक्स भेज रहे है उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है | 
  • जीवन में सांसारिक लाइक्स  की तुलना में अपनी अंतरात्मा के लाइक्स की फिक्र करना सीखें वह नितांत सत्य और आपका वास्तविक विकास का मान दंड भी बना पाएगी | 
  • जब तक आप दूसरों को समझ ना पाएं तबतक उनसे प्रसंशा और आलोचना की अपेक्षा भी मत करें क्योकि उनकी आलोचनाऔर प्रसंशा आपके लिए घातक ही होगी 
  • जीवन का हर कदम इस बात पर निर्भर है की आप जीवन से चाहते क्या  है  और यदि जीवन शार्ट कट चाहता है तो आप निश्चित समझे की आप धोखा खाने जा रहा है | 
  • हर इंसान अपने गुण  और अवगुणों के साथ  जीवन गुजार रहा है और उसमें अपनी अपनी गुणवत्ता है यह ध्यान रहे  कि आप अपने गुणों का विस्तार और कमियों को ख़त्म करें | 
  • आलोचनाओं और प्रसंशा में आप स्वयं को न तो अधिक प्रसन्न और अहंकार में देखें और न ही आलोचनाओं में स्वयं को अत्याधिक्  दुखी करें यह सब विधाता की इच्छा है और उसमे स्वयं को स्थिर रखें | 
  • जीवन के हर पथ पर अपने गुरु पिता माता से परामर्श लेते रहें क्योकि समय समय पर आपको परामर्श की आवश्यकता होगी और ये रिश्ते आपको नया रास्ता देते रहेगा | 
  • धर्म और आदर्शों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाये रहें क्योकि यह आपको नए सिरे से निर्माण करने की शक्ति प्रदान कर सकता है | 
  • जीवन के हर पल को अपने हिसाब से मूल्यांकन चाहिए होता है आप स्वयं आप अपना मूल्यांकन करते रहें और अपने को दोषों पर पैनी नजर बनाये रखें |




Sunday, July 5, 2015

अपने भविष्य और अतीत के बारे में परेशान न हों Do not worry about your future and the past


अपने भविष्य और अतीत के बारे में परेशान न हों 
Do not worry about your future and the past


सुचित्र सेन एक महा प्रतापी और अजेय सम्राट था राज्यों की सीमाये बढ़ती जा रहीं थी और सम्पूर्ण राज्य में बहुत अधिक धन संपत्ति वैभव होने के बाद भी शान्ति सुख और अतृप्तता का माहौल था | राजा को आक्रमण करना राज्यों पर कब्ज़ा करना और उनके खजाने को हड़पना अच्छे से आता था | एक बार एक पहुंचे हुए योगी  राजा के यहाँ आये राजा ने उनकी खूब सेवा की और उनसे पूछा महाराज आप मेरे राज्य में सुख शांति वैभव धन सबकी वृद्धि का आशीर्वाद दें , साधु ने ध्यान लगा कर देखा और कहा राजा मैंने सब देख लिया है मैं  तेरी सेवा से प्रसन्न हूँ जाओ आपके राज्य के बाहर एक साधु की कुटिया है वहां जाकर उनका आशीर्वाद लें  और उनकेउनके निर्देशों का पालन करें आपका कल्याण होगा , राजा ने तुरंत बड़ी भीड़ और असंख्यों उपहार लिए और पूरे वैभव के साथ साधु की कुटिया में पहुंचा नंग धडंग साधु राजा को देख कर हंसा ,उसने राजा से कहा इस भीड़ को कहो  कि  वो दूर रहे ,और जहाँ तक उपहारों की बात है मैंने सुबह एक बुढ़िया माँ का दिया खाना खा लिया है और अब मुझे किसी चीज की जरूरत है नहीं , शाम को मालिक फिर देगा इस बहाने मैं  रोज उसकी कृपा को प्रत्यक्ष अनुभव करता हूँ ,साधु बोला राजा आज से ३ वर्ष पहले युद्ध के मैदान में एक भाला तुम्हारी गर्दन से छूकर निकल गया था , जानते हो यदि उस दिन तुम मर जाते तो अगले पल ये सारा साम्राज्य और खजाना दूसरे का हो जाता |

पुत्र जीवन में संपत्ति ,सम्बन्ध और सुख  सबसे गतिशील वस्तुएं है  जबकि हम जब भी इन्हें हम स्थिर, गुलाम और अपने खजाने की जेल में बंद करना चाहते है ,वहीँ से यह हमारे मन मष्तिष्क में अपनी ऋणात्मकता के साथ पैदा होने लगते  है , फिर तो जीवन अपनी उपलब्धियों से ही परेशान होकर और और और के फेर में उलझने लगता है , अतीत और वर्तमान केवल अफ़सोस का आश्रय बन कर रह जाता है , प्राप्तियों का सुख ख़त्म और व्यर्थ हो जाता है , और जीवन छीना झपटी में अपने मूल उद्देश्य खो देता है , पुत्र दुःख  देकर सुख की खेती कैसे कर सकते हो आप , अंत में साधू ने कहा  पुत्र  मैं  तुम्हें तुम्हारे भविष्य की एक झलक दिखाता हूँ तुम्हे उत्तर मिल जाएगा आपके प्रश्न का------- राजा ने देखा हमेशा की तरह उसने अपने दोनों पुत्रों से एक राजा से युद्ध करने भेजा , और उनके ही राज्य के गुप्तचर ने राजा के दोनों पुत्रों का वध करवा दिया , राजा ने स्वयं को विलाप करते देखा ,वह रो रहा  था ------मैंने जो अकूत संपत्ति कई पीढ़ियों के लिए इकट्ठी की है अब क्या करू मैउसका , उसने देखा  कि  फिर वही साधु आया उसने पुत्रो को जीवित किया , राजा ने कहा कि  आप मांग लो जा माँगना है ,साधु बोला राजन कल भी मुझे कुछ नहीं चाहिए था आज भी नहीं चाहिए | राजा समझ गया था कि जीवन नश्वर है और जो संपत्ति वैभव और जीत का  मोह है वह आज मेरा कल दूसरे का है , पसीने में भीगा  घबराया राजा स्वप्न से  जागा, वह  अपने  सारे उत्तर पा चुका था ,अपने पुत्रों को नेकी और परमार्थ का वचन लेकर  वह साधु के साथ जंगल की और चल दिया |

जीवन में हम सब यह जान ही नहीं पाते कि  हम किन स्थितियों के मोह में बार बार परेशान होकर अपने आप को परेशान  करते रहते है , जो है नहीं उसे अपनी सोच से खड़ा करलेते है , और जो नहीं है उसे भी खीच कर हम अपने आप  पर लाद  लेते है और पूरे व्यक्तित्व पर निराशा ,  आलस्य और अस्थिरता का अनुभव होने लगता है  ,पूरा जीवन सबसे कठिन , और  स्वयं को निरीह समझने लगता है परिणाम जीवन  की सम्पूर्णता ही व्यर्थ साबित होने लगती है
हम संबंधों  - धन - वैभव - ऐश के  फेर में अपने ही सत्य से काफी दूर चले जाते है और ये परिभाषाएं हमे हमारा ही मुँह चिढ़ाने वाली लगने लगती है |


हर बार हम  जब अपने अतीत  में झांकने का प्रयत्न करते है तो एक गहरी वेदना हमें घेर लेती है , हमपर क्या नहीं था और हमने कैसा बुरा समय निकाला है ,इसका बड़ा दुःख हमे परेशान करने लगता है दूसरी और हमपर बहुत संसाधन थे पर आज हम सारे संसाधनों  के अभाव में है , कल हमसे सब कामके वक्त अपने मतलब सिद्ध करने खड़े थे आज कोई नहीं है , वो लोग जो हमे अथाह प्यार करने का नाटक करते थे  वो आज हमे तिरस्कृत कररहे है , और जिस यौवन , धन वैभव और अपनत्व पर हम कभी गर्व कररहे थे  वो हमारा रहा ही नहीं फिर तो एक बड़ी निराशा होना स्वाभाविक ही था न , उम्र , समय ,शक्ति ,यौवन और हर चीज संसार से लूट कर अपने कब्जे में करने वाली मानसिकता धीरे धीरे शिथिल होने लगी थी -- और अतीत शिकायत निराशा और अफ़सोस सा बनने लगा था | यह सब एक जीवन की प्रक्रिया थी मगर क्या यह सब ठीक था इसी पुनर्चिन्तन की आवश्यकता थी जीवन के इस पल को |

भविष्य की संभावनाएं है जीवन हमें अधिकांशतः अपने अतीत के किये कार्य और  अपने अनभिज्ञ भविष्य की सम्भावनाये डराती ही रहती है ,कल यह न हो जाए कल कहीं मुझसे मेरे स्वामित्व के सम्बन्ध और  प्राप्त वस्तुएं  न छीन ली जाएँ , भविष्य मुझसे मेरा प्रेम अपनत्व और संसाधनो की परेशानी बनकर खड़ा न होजाये , मुझे सामाजिक पारिवारिक और राष्ट्रिय आधारों पर तिरस्कृत न करदिया जाए , मेरे अपने वास्तव में मेरे ही है क्या कहीं वे मुझे मूर्ख तो नहीं बना रहें है , हम  जिन उद्देश्यों ,  और कार्यों के लिए प्रयत्न कररहा हूँ कहीं उसमे असफल न हो जाऊं ,और हम  जिन वस्तुओं व्यक्तियों और अपनत्व के सहारे को अपने जीवन में स्थापित करना चाहते है कहीं वे हमें ही तिरस्कृत न करदें ,

आशय यह हुआ की जो निकल गया वह उस घाव के निशान  की तरह हमे उस दुःख की अनुभूति में खड़ा  कर देता है जैसे हमे उस घटना के समय कष्ट हुआ था ,संबंधों की सोच में कई बार हम  अपने आपको उसी अतीत की बड़ी याताना  में स्वयं को खड़ा पाते है ,उतना ही दर्द महसूस करता है मन मष्तिष्क, और कई बार या अतीत  हमारी ही नजर में हमारी हत्या करता रहता है भविष्य में हर आने वाले सम्बन्ध प्रश्न वाचक बने खड़े रहते है और वर्तमान का विश्वास  , धैर्य और सत्य अपनी तुलनात्मक दृष्टी से खुद ही परेशान हो जाता है , अब ऐसे समय में  हर स्थिति को परखना क्या गलत है , जीवन जैसे अनुभावों से निकला है वह भविष्य की वैसी ही कल्पना करता है तो कहाँ गलत है ,मित्रों यही से कही जीवन को अपनी धनात्मक सोच का भवन बनाना होगा, जो आपको अपने अंतिम विकास बिंदु तक ले जाने में सक्षम है |


एक दार्शनिक ने लिखा  आप  ईश्वर की अनमोल कृति है , आप गुणों का भण्डार है , और आपकी चिंतन शीलता आपको अद्वितीय सिद्ध कर सकती है आप स्वयं के  के सामने एक बहुत मोटी और ऊंची दीवार बना डालिये ऐसी ही दीवार आप अपने पीछे भी बना डालिये और अब आप स्वयं को वर्तमान में खड़ा पाएंगे , बस यही से आपकी आगामी यात्रा आरम्भ होनी है जहां अतीत के कष्टों का मलाल और भविष्य की अनभिज्ञता का डर नहीं होगा ,जीवन को अपने महान उद्देश्य के लिए संकल्पित मानते हुए जिसने भी  वर्तमानकी क्रियान्वयता को मूर्त स्वरुप प्रदान किया वह स्वयं काल जयी सिद्ध हुआ है ,


जिस छण  वर्तमान अतीत  और भविष्य के स्वप्नों से मुक्त होकर स्वयं की साधना करने लगता है आप सही मानलें कि वहीँ से दुनिया की सारी सफलताएं उसके पीछे दौड़ने लगती है , अतीत का दुःख और भविष्य की कोरी कल्पनायें अपना अस्तित्व खोने लगती है , वैचारिकता में निराशा और अकर्मण्यता आती ही नहीं है , व्यक्ति और अपनत्व अपनी परिभाषाएं नहीं बना पाते मन उन्हें छोड़कर अपने वास्तविक उद्देश्यकी क्रियान्वयनता में लग जाता है और व्यक्ति स्वयं को कालजयी सिद्ध  कर देता है ,ध्यान  रहे कि  जीवन का साश्वत सत्य यहीं है कि जीवन यौवन , शक्ति ,ऐश , और भौतिक सुख सुविधाये  तथा सम्बन्ध समय के साथ अपना अर्थ और  सार्थकता बदल लेंगे , केवल सकारात्मक लक्ष्य  के साथ आपका वर्त्तमान क्रियान्वयन आपको श्रेष्ठ सिद्ध कर सकता है आवश्यकता इस बात की है कि उसका सही प्रयोग निश्चितता के साथ किया जावे जहाँ वर्तमान के लक्ष्य के अलावा कुछ न हो |

निम्न का प्रयोग कर कर अवश्य देखें


  • सकारात्मक सोच के साथ जीवन को जीने का प्रयत्न करें , यदि आप आदर्शों पर चलने वाले हुए तो आपको कई समस्याओं का सामना करते हुए जीत हासिल होगी क्योकि ,जीवनका सत्य जानने वाला ही संघर्ष कर पाता  है|
  • अतीत और भविष्य पर  मोटी दीवारें बनाई जाए और उनमे झांकने का प्रयत्न न करें आपको सदैव यह ज्ञात रहे आपकी वर्तमान की क्रियान्वयनता का सम्बन्ध ही आपको सफलतम सिद्ध करेगा | 
  • संबंधों का एक नियत  क्षेत्र  है और उन्हें उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए , जीवन कर्त्तव्य के मार्ग में संबंधों के कर्त्तव्य निभाने आने चाहिए उन्हें कमजोरी नहीं बनाऐ | 
  • संसाधन , बल , धन , और सम्बन्ध और उनका प्रयोग समय के साथ अर्थ खो देता है  ,अतः आपको यह अवश्य ध्यान रहे की जो आपके अस्तित्व के साथ नहीं है वो आपका नहीं है और उससे एक गैप अवश्य बनाये रखें | 
  • भविष्य की अनभिज्ञता आपको भय क्रान्त न कर पाये और अतीत के दुःख आपको अधिक परेशान न कर सकें आपको अपने कर्त्तव्य और शक्ति से इन्हें जीतना है | 
  • छीनने और दूसरों को दुःख देने  के स्वभाव से दर्द और पश्चताप ही पैदा हो सकता है हम जीवन में जिसे जीत समझते है वह जीत केवल वर्तमान को क्रियान्वयन और  सबको  परमार्थ दे सके तो श्रेष्ठ है | 
  • गतिशील दिखने वाली हर वास्तु और व्यक्ति समय के साथ अपनी आस्थाएं , प्रेम और अपने स्वार्थ बदल लेगा ऐसे में जो साश्वत सत्य है उसका पालन करते हुए वर्त्तमान  के कर्म को सार्थकता दें | 
  • रिश्ते भोग और संसाधन आज किसी के साथ है कल किसी और के होंगे परसों किसी और के पास होगी तो जो भी साश्वत और अमर गुण  धर्म हो  उनको प्राप्त करने की चेष्टा की जानी चाहिए | 
  • परमार्थ और सत्य दो मार्ग है जीवन को जीतने के इनका अनुशरण करने में अपनी आत्मा की आवाज को सदैव अपने सामने रखकर अपना आंकलन करते  रहें | 
  • जीवन को ऐसा आकार दें की आप दूसरे की आलोचनाओं से बचें रहें क्योकि आपालोचना के लिए आपकोउसका ध्यान करना होगा और उससे आपको भी नकारात्मकता घेर लेगी,अतः आप  किसी की आलोचना न करें |



Sunday, June 14, 2015

झूठी प्रसंशा पतन का सबसे बड़ा कारण है False praise is cause of downfall

  झूठी प्रसंशा पतन का सबसे बड़ा कारण है 
  False praise is  cause of downfall 

एक शिष्य  समूह ने अपने गुरु से पूछ गुरुदेव  हमारे देश का राजा बहुत ही घमंडी है उसे चाटुकारिता बहुत प्रिय है, वह हमेशा अपने चाटुकारों से घिरा अपने राज्य में अजीबोगरीब हरकतें करता रहता है, कभी वह किसी को बे वजह दंड दे देगा कभी वह बिना किसी कारण के दूसरों से अपनी तुलना करने लगेगा ,और उसके द्द्वारा कभी भी किसी को भी फांसी चढ़ा दिया जाता है क्योकि वह राजा की प्रसंशा नहीं कर पाया था , गुरुने पूछा वहां कोई धर्म पारायण ग्यानी  पुरोहित या श्रेष्ठ मनुष्य नहीं है क्या, शिष्यों ने बताया हाँ महाराज वहां के राज पुरोहित बहुत ग्यानी और विद्वान है ,शास्त्रार्थ  में उनसे कोई नहीं जीत पाता , मगर उन्हें भी अपनी योग्यता पर बहुत घमंड है, और दोनों ही अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहते है ,पुरोहित जी भी समय समय पर लोगो को शाश्त्रार्थ में हरा कर सार्वजानिक रूप से सजा देते है , गुरु गंभीरता से बहुत देर सुनते रहे अचानक वे अपने शिष्यों से बोले पुत्र जाओ आप दो समूहों में बंट कर राजा और राज पुरोहित की झूठी प्रसंशा करो ,इस समय आपका काम बिना सोचे प्रसंशा करना ही रहे बस ,शिष्यों ने गुरु को प्रणाम किया और अपने गंतव्यों की और चलेगये राजा से शिष्यों ने कहा महाराज आपके यश बल और ज्ञान की चर्चा सर्वत्र हो रही है आपका रूप , यौवन , ज्ञान और बल की पूरी दुनियां दीवानी है , पड़ौसी राज्य की  जनता भी आपके गुणों की तारीफ़ करने से नहीं थकती और आप बाहुबल धन बल और शौर्य में सबसे श्रेष्ठ है , बड़े शिष्य ने बोल रहे शिष्य की ओर विस्मय से देखा, की पड़ौसी राजा बहुत बलशाली और बहुत बड़े राज्य का मालिक है ,उसे कोई नहीं जीत सका और उसकी धर्म परायणता के किस्से जगह जगह सुनाये जाते है ,वो इससे सब अर्थो में श्रेष्ठ है ,पर झूठी प्रसंशा की बात सुन कर वो चुप रहा ,दूसरे शिष्य ने राज पुरोहित को यही कहा, महाराज आपके ज्ञान , तपश्चर्या और त्याग के किस्से आज राज्य और राज्य से बहार भी सुनाये जाते है लोग आपके ज्ञान का लोहा मानते है ,और राजा भी आपके ज्ञान के कारण ही शांति से राज्य कररहे है , भावावेश में राज पुरोहित राजा को बुरा भला कहने लगा , राजा को तुरंत खबर हुई उसने राज पुरोहित को बुलाया दोनों में विवाद होने लगा राजा खुद को बगड़ा बताने लगा पुरोहित अपने को , राजा बोला सब कह रहे है मैं  सबसे ग्यानी हूँ ,बलशाली हूँ ,पड़ौसी राज्य वाले भी कहीं नहीं लगते मेरे सामने , पुरोहित ने कहा पड़ोसी राज्य बहुत शक्तिशाली है , राजा ने तुरंत अपनी बात की अवहेलना के लिए पुरोहित को फांसी पर चढ़ावा दिया, और पड़ोसी राज्य पर हमला कर दिया पड़ौसी राजा को राजा की मूर्खता पर पहले से ही संदेह था उसने पलक झपकते ही युद्ध जीत लिया ,और अपना धर्म पारायण राज्यउस राजा के साथ मिला कर और बढ़ा लिया , दुष्ट राजा इस युद्ध में मारा  गया |
  

मूर्ख और अहंकार  से ग्रस्त महा ग्यानी की दशा एक जैसी ही होती है महा ग्यानी को ज्ञान का अतिरेक का अहंकार एक कीटाणुं की तरह उसके सम्पूर्ण ज्ञान का छरण करने लगता है , उनसे जीतने का केवल एक ही  शस्त्र है वह है उनकी झूठी प्रसंशा क्योकि मूर्ख की अति प्रसंशा उसे और अधिक मूर्खता करने के लिए बाध्य करती  है, और एक दिन उसकी बढ़ती हुई मूर्खता  उसके पतन का कारण बनजाती है ,दूसरी और महाज्ञानी यदि अहंकार के कीटाणु से ग्रस्त है तो वह भी झूठी प्रसंशा के कारण और अधिक स्वछन्द और स्वार्थी हो जाता है वह ज्ञान और धर्म का प्रयोग अपने हिसाब से करने लगता है , और आदर्शों और सत्य की परिभाषाये भी अपने हिसाब से बना डालता है ,परिणाम यह कि उसका यह भाव उसे ही नष्ट कर डालता है जबकि वह स्वयं को ग्यानी और सर्वश्रेष्ठ समझता रहता है ,परन्तु  अहंकार उसे कब भ्रष्ट , असत्य और अनादर्शों के तराजू में रख कर  असफल सिद्ध कर देता है यह मालूम ही नहीं पड़ता |


आधुनिक युग में हम सब आदी  होगये है अपनी प्रसंशा सुनने के, हमारा हर कार्य  प्रसंशा के लिए होने लगा है , हम धन ,बल, रूप, रंग ,सौंदर्य और सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए इतने लालायित है कि उसके लिए किसी भी हद  पर जाने को तैयार दिखते है , जबकि हम यह जानते है  इन सब चीजों में सर्वश्रेष्ठ साबित होने के लिए हमें दूसरों की तुलना में खड़ा होना होगा और जहाँ से भी कोई तुलना आरम्भ होती है वहां से तमाम नकारत्मकताएं अपने आप आरम्भ हो जाती है, आज जो धन , बल, रूप, रंग, यश वैभव मेरा है कल वो दूसरे का होगा जो सौंदर्य मेरे नाज का विषय था कल किसी और को उपकृत करेगा और वह हर गुण  कल  जो मुझे सबकी तुलना में श्रेष्ठ साबित करने के लिए दिखाना होता था आज दूसरों के पास था और यही सत्य भी था , मैं  झूठी प्रसंशा के कारण कभी अपना स्वरुप ही नहीं देखा पाया कि वास्तव मैं मैं  हूँ क्या | 


 कई बार हमारे साथ यही होता है कि  हम अपने प्रयत्नों से जो अर्जित नहीं कर   रहे होते उनकी भी प्रसंशा हमे लोग दे रहे होते है , जबकि आत्मा की गहराइयाँ यह जानती है  कि उसपर किसी और का हक है, परन्तु स्वार्थों के वशीभूत वह प्रसंशा हमें मिल रही है , प्रसंशा एक ऐसा नशा है जिसका आदी  मनुष्य उस   नशेड़ी की तरह व्यवहार करता है जैसे  उसका अस्तित्व इस पर ही निर्भर होकर रहगया है , नशे के  पूर्णतः  आदी  रोगी की तरह उसकी गति बड़ी दयनीय होती है जिसमे हर एक से यही याचना छुपी होती है वो कैसे भी आपकी प्रसंशा करें , मित्रों भिखारी को कम्बल ,पैसे , भीख देते में आप भिखारी से भी प्रसंशा की मांग कररहे होते हों कि भिखारी और देखने वाले आपको झूठी प्रसंशा दे सकें |

  how are  you -----fine         looking --------smart 

इन्हीं शब्दों के बीच कही छुपा है एक ऐसा व्यवहार जो आँखों ही आँखों में अपनी तुलना करके  देखना चाहता है की मैं  कैसे सामने वाले से श्रेष्ठ हूँ , मेरा पहनावा ,ओढ़ावा , चलने बैठने उठने बोलने चालने और तथा संसाधनों की बहुतायत या आभव सब मिलकर ही तो मैं समाज को प्रदर्शित कररहा होता हूँ और वह समाज आप भी उसे वैसा ही उत्तर देकर उसकी आत्मा को शांति  देंगे इसलिए वह भी आपकी और देख रहा है , और हम सब एक सी मांग लेकर जीवन के समायोजन कररहे है ,एक दूसरे से हजारों शिकायतें लिए ,लेकिन ध्यान रहे कि  हमें ये खोखलापन हमारा वही व्यक्तित्व दे रहा है जिसे हम  बिना गुणों के प्रसंशा पाने के लिए दूसरों के हाथ में सुपुर्द कर चुके होते है | 


भारतीय साहित्य और धर्म ने कई स्थानो पर यह लिखा कि मनुष्य को मनुष्यता और आदर्शों के  गुण साहित्य और धर्म ही सिखा सकता है तो कई साहित्य कारों ने यही भाव लिखा 

|| निंदक नियरे रखिये आँगन कुटी छबाय || बिन पानी साबुन बिना निर्मल कराइ सुभाय || 

अर्थात अपनी आलोचना करने वाले को अपने साथ ही रखना चाहिए जिससे वह आपको आपकी गलतियों के लिए समयानुसार सुझाव दे सके ,और इस प्रकार वह पानी और साबुन के बिना ही आपके आचार विचार और व्यक्तित्व को पवित्र कर सकता है मगर आज के युग में ------ जब भी आप समझाइश दे , ये आपका टाइम नहीं है  ,किया ही क्या है आपने , मेरी गलती निकालेगा ---- how dare he say  ,  और भी तरह तरह के वाक्यांश , सत्य का और आदर्शों की बात आपको स्ववकार ही नहीं है क्योकि जीवन ने आपको आपकी आत्मा के सामने आने का अवसर ही नहीं दिया आप भी जानते थे आप गुणों , और संसाधनो में समय और समाज से हारे हुए है और ऐसे में आपको केवल ऐसी झूठी प्रसंशा की आवश्यकता है जो आपको झूठा ही सही मगर थोड़ा सकूँ अवश्य देदे | दोस्तों यही कहीं से जीवन में बदलाव का सूत्र आरम्भ  होगा बस इस नशे का त्याग सबसे आवश्यक है 

  

एक दिन जीवन ने खुद को पलटकर देखा वहां हजारों लुटेरे खड़े थे जिसे जितना बड़ा स्वार्थ था ,उसने उतना ही बड़ा झूठी तारीफ के  अम्बार खड़े कर दिए और जैसे ही हमे उस प्रसंशा का नशा चढ़ा उसने नशे की हालत में हमे कई बार हमें  लूटा और जैसे ही उसका मतलब ख़त्म हुआ वह जीवन से गायब हो गया ,और हम झूठी प्रसंशा के आदी ।  वो लोग झूठी प्रसंशा के जाल में फसाने वाले शिकारी बने रहे ,हमारा नशा इतना अधिक हो गया था कि  हमपर कि हर सच्चाई हमें रूढ़िवादी , हर आदर्श और सत्य हमे दूसरे युग का  वाक्य  लगा, 
 आईना हमे पलट कर रख देना पड़ा क्योकि झूठी प्रसंशा के नशे में हम स्वयं का सामना करने का साहस ही नहीं जुटा पाये थेजीवन के सत्य के सामने हम यह मानाने  को तैयार ही नहीं होते कि एक दिन यौवन, धन , बल सौंदर्य सब दूसरों के हक में होंगे समय के साथ चलता चलता शरीर मन मष्तिष्क सब हार जाएगा तब  मन और आत्मा उस भाव को ढूंढेगी जिस पर वह सही मायनों में आपको  प्रसंशा दे पाये और यह कह पाये  कि आप जिंदगी के खेल के एक और सफल खिलाड़ी सिद्ध हुए आपको सलाम है | 


जीवन के इस भाग में इन्हें भी आजमाइयें 

  • अपने व्यवहार और बात चीत में सामान्य रहने का प्रयत्न कीजिये क्योकि यहीं से आपको जीवन में सरलता का गुण आरम्भ होगा और यहीं से जीवन में सहजता के साथ व्यवहार करना सीखेंगे हम | 
  • आप अपने आपको पूर्ण मानकर  ईश्वर को समर्पित कर अपना जीवन कार्य आरम्भ करें इससे आपको अपने आपमें पूर्णता का ज्ञान होने लगेगा और यही से आपको नया मार्ग प्राप्त हो सकता है | 
  • दूसरों की प्रसंशा के  आशय से स्वयं को दूर रखें और यह माने कि यह प्रसंशा आपके उन कार्यों की है जिनमे सम्पूर्ण समाज परिवार परिवेश सबका हिस्सा है और यह प्रसंशा सबकी है | 
  • प्रसंशा का सबसे केंद्र है मन जब आपकी आत्मा आपको श्रेष्ठ साबित कर दे बस आप यह जान लीजिये की आपको अब किसी बाह्य प्रसंशा की आवश्यकता नहीं है 
  • उन  वस्तुओं और गुणों  पर प्रसंशा की कामना न करें जो समय और परिस्थिति के कारण बदल जाने वाली है क्योकि उनका स्वाभाव ही ऐसा है  | 
  • सत्य आदर्श और सबका सम्मान करने का गुण ये सब आपमें होना ही चाहिए क्योकि इन गुणों के कारण ही आपको स्वयं से प्रसंशा प्राप्त होती है | 
  • प्रत्येक व्यक्ति में अलगअलग गुण   विद्यमान है आप उससे यदि ज्ञान में श्रेष्ठ है तो वह रूप में श्रेष्ठ हो सकता है अर्थात वसमें भी कोई न कोई गुण  है  जिसकी प्रसंशा आपको करनी चाहिए | 
  • झूठी प्रसंशा करने वालों से सावधान और दूरी बनाये रखें क्योंकि ये आपके विकास पथ पर आपको अकर्मण्य बना देते है और आपका मानसिक स्तर भी ख़राब कर देते है | 
  • जीवन में काम बोले सुने ज्यादा और उससे ज्यादा चिंतन करें इससे हर इंसान का असली स्वरुप आपके सामने होगा और सहजता में आप ठगे नहीं जाएंगे | 
  • अपनी आलोचना करने वालों से अच्छा व्यवहार बनाये रखिये एक दिन आप इनके कारण ही उन्नति के शिखर पर पहुंचेंगे | 
  • हर  प्रसंशा जप बाह्य व्यक्ति द्वारा की जा रही है उसका उद्देश्य क्या है इसका उत्तर आपको सहजता में मिल जाएगा आप वैसा ही व्यवहार करें जैसा अंतरात्मा कहें | 
  • भावावेश में कोई निर्णय न ले झूठी प्रसंशा के बाद आपको कड़वा जहर भी पीने को दिया जा सकता है यह हमेशा ध्यान रखें |

Sunday, June 7, 2015

powerful rule of universe (Get what you sow) ब्रह्माण्ड का शक्तिशाली नियम जैसा बोओगे वैसा ही पाओगे

powerful rule of universe (Get what you sow)
ब्रह्माण्ड का शक्तिशाली नियम

 जैसा बोओगे  वैसा ही पाओगे 

कृष्ण पांडवों से कह रहे थे पुत्र हम जाने अनजाने और किसी भी क्रियान्वयन और चिंतन के फल को बदल नहीं सकते कर्म का फल तो सबको ही भुगतना होता है उससे देवता भी मुक्त नहीं हो सकते ,यह कहते हुए कृष्ण  ने कहा यह देखो ---
युद्ध क्षेत्र में  पितामह भीष्म शर शैय्या पर पड़े थे और लोगों  की भीड़ लगी थी उनसे मिलने को सब अपने अपने हिसाब से उनके पास अभिलाषा लिए खड़े थे अचानक पांडवों के साथ भगवान वासुदेव कृष्ण पधारे , उनकी पदचाप सुनते ही मौन भीष्म ने अपनी आँखें खोली और उन्हें प्रणाम किया, कृष्ण बोले आपको असह्य पीड़ा है मैं  जानता हूँ भीष्म ने हंस कर कहा आप तो सब जानते है जनार्दन मुझे इन  बाणों की तकलीफ नही है मुझें तकलीफ इस बात की है कि  मैं मरते वक्त भी सत्य  का ज्ञान होते हुए भी मुझे असत्य के लिए लड़ना पड़ा ,अचानक अर्जुन ने पूछा पितामह आपके हाथ में तो इच्छा मृत्यु है फिर यह कष्ट क्यों ?भीष्म ने गंभीर स्वर में  कहा पुत्र इसके दो कारण है प्रथम तो यह कि इस समय सूर्य दक्षिणायन है और जब तक उत्तरायण नहीं होता तबतक मुझे प्राणों को रोककर रखना होगा ,दूसरा यह  कि  एक जन्म में मैं एक सम्राट था अपनी रानी के साथ एक बार मैं  बगीचे में घूम रहा था अचानक रानी  चिल्लाई सांप सांप मैंने बिना कुछ विचार किये अपने हाथ की छड़ी से उसे दूर फ़ेंक दिया पुत्र वह सांप एक बेरिया की झाडी पर गिरा और जैसे जैसे वो हिला उतने ही कांटे उसकेशरीर में चुभ गए पुत्र आज भी मैं  उस अपराध बोध से मुक्त नहीं हो पाया हूँ , आज जब मई शर शैय्या पर हूँ उतने ही बन मेरे चुभे है जितने उस सांप को चुभे थे ,पर  मन काफी हल्का है ,लगता यह है अब मेरे जीवन का कोई भी ऋण मुझ पर बाँकी नहीं रह गया है ---यह कहकर भीष्म मौन होगये और कृष्ण पांडवों की और देख कर मुस्कुरा दिए |

  महाभारत में यह  घटना कितनी सत्य या असत्य है यह प्रश्न नहीं बल्कि यहाँ यह किस्सा शायद युवाओं को  कुछ दिशा निर्देशित जरूर करेगा

जीवन भी एक ऐसा हिसाब का गणित है जो हर कर्म का हिसाब मय  ब्याज के चुकता  करने का सामर्थ्य रखता है , सामान्यतः जब जीवन अपने यौवनके वेग की शक्तियों की अधिकता महसूस कररहा होता है उस समय अच्छे बुरे , कर्त्तव्य और उसकी दायित्वशीलता तथा सत्य और असत्य, का भेद कुछ मालूम ही नहीं होता हम अपनी शक्ति के चरम पर उन सारे सत्यों को सहज ही भूल जाते है जो मानवीयता के लिए भी निर्मित हुए है ,हम कैसे भी जीत हांसिल करने की जल्दी में अपनों को ही  कुचलते हुए आगे बढ़ जाते है ,हमें यह कभी एहसास ही नहीं हो पाता  कि इससे हमारे अपनों को कितना कष्ट हुआ होगा , परन्तु जब उसके परिणाम हमारे सामने आते है तब हमारे पास कोई रास्ता ही नहीं बचता  क्षमा के लिए , यह जीवन भर एक बड़े अपराध बोध की तरह हमें मुंह चिढ़ाता रहता है | 

 प्रकृति के नियमों और सिद्धांतों में  क्षमा जैसा कोई शब्द नहीं होता वहां सारे न्याय शास्वत अवस्था में वैसे ही होते है जैसे आपने कर्म किये है , एक बहुत बलबान आदमी कुंएं की मेड पर खड़ा जोर जोर से गालियां बक रहा था अंदर से कोई पहलवान उसे भी गालियां दे रहा था , अचानक एक साधू ने उसे रोक और कहा  पुत्र नहीं, आप अपनी जवान क्यों ख़राब करते हो मेरे कहने से एक बार वो बोलो जो  मैं कहता  हूँ  उसने  दोहराया मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ आदर से आवाज आयी मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ , मुझे क्षमा करदो वैसी ही प्रतिध्वनि फिर आई , साधु ने समझाया पुत्र हम अपने कर्म को न बदलते हुए सबको  अपने अनुसार कार्य करते देखना चाहते है ,तब सहज ही हमारा अपनी ही अंतरात्मा से युद्ध होने लगता है जबकि सामने वाला केवल माध्यम भर होता है हमसे युद्ध करने वाले के स्वरुप में ,  हम जैसा सबके बारे में सोच रहे होते है वैसा ही वेलोग हमारे बारे में सोचने लगते  है  फिर शिकायत कैसी | 

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हम  जड़ और चेतन किसी के लिए भी जो विचार प्रेषित करते है वे विचार हजारों मौन की अद्भुत सांकेतिक भाषा में उस तक पहुँच जाते है जिनके लिए वो प्रस्तुत हुए है , ब्रह्माण्ड की अनगिनत शक्तियां आपके नकारात्मक और सकारात्मक भावों को इसीतरह कई गुना बढ़ाकर आपके साथ व्यवहार पैदा करती है ,भारतीय धर्मशास्त्र के तांत्रिक अध्याय में ऐसे कई वर्णन है जहाँ दूर से ही वैचारिक संवाद किये जा सकते थे ,ब्रह्माण्ड की शक्तियों को एकाग्र चित्त से धारण करके वैसे ही गुण  धर्म व्यक्ति में पैदा किये जा सकते है जिन शक्तियों की वह उपासना कररहा है | 

यहाँ यह स्पष्ट है कि आप जो ब्रह्माण्ड को दे रहें है वहीँ कई गुने में परिवर्तित होकर आपको मिलने वाला है चाहे वह धोखा है , या कोई छल आप यहाँ  यह अवश्य ध्यान रखें कि  छल ,  बल ,अपने अंत में आपको उस फल तक अवश्य ले जायेंगे जहाँ आपको आपकी बुद्धि के हिसाब से ही फल मिलेगा, और वह वही होगा जो आप ब्रह्माण्ड को दे रहे  है ,जब आपके सारे कर्त्तव्य और सोच के बिंदु प्रकृति की उस प्रयोगशाला में लिपिबद्ध हो रहे है जहाँ आपकी एक भी सोच और कर्त्तव्य उसके फलों से मुक्त नहीं होगा तब आपको सजग होना आवशयक होगा और सजगता का यह अध्याय आप आज ही कंठस्थ करलें तो अधिक अच्छा रहेगा । 



ईश्वर  सबसे शक्तिशाली प्रयोग  शाला का एक सर्वोत्कृष्ट वैज्ञानिक है ,जो आपको भौतिक रूप में अपने अनगिनत नेत्रों से उसी प्रकार नजर में रखता है जैसा  कि सुपर कम्प्यूटर अपनेसी सी टीवी कैमरों से एक क्षेत्र पर निगाह बनाये रखता है , परन्तु ईश्वर की तकनीक केवल बाह्य आवरण , परिवेश  को ही नहीं अपितु ,मन मष्तिष्क की सोच को भी अपनी सुपर मेमोरी में नोट करके रखती  है और उन्हीं फलों को  चाहते न चाहते हमें  भोगना ही होता है | अतैव न्याय की इस बड़ी पाठ  शाला में हम सब अपने को यदि पूर्ण सफल और श्रेष्ठ देखना चाहते है तोहमें  जड़  , चेतन , और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सकारात्मक ऊर्जा का विकास करना चाहिए, जिससे आपकी सकारात्मक ऊर्जा ब्रह्माण्ड की सकारात्मकता पा कर आपको अनगिनत सफलता के वो पुरूस्कार दे पाये जिससे इंसान देव तुल्य हो जाता है |

जीवन  की  सार्थकता के लिए निम्न को अपनाएँ 
  • हमारी उपस्थिति से हमारा समाज राष्ट्र और परिवार तथा परिवेश सब बंधा है और हमारे हर कार्य से   उसमे धनात्मक और ऋणात्मक परिवर्तन होने ही है इसका हम ध्यान रखें | 
  • ब्रह्माण्ड में हमारा हर कार्य और सोच एक ऐसी वैज्ञानिक प्रणाली से जुडी है जिसका आकलन करने हमे दण्डित या पुरस्कृत किया जाना है अतैव  अपने कर्तव्यों और सोच का ध्यान रखिये | 
  • समाज और  अपने परिवेश के साथ हम सहज और सरल भाव से मिलें और समय समय पर अपने व्यवहार का आकलन करते रहे समयानुसार उसमे धनात्मक परिवर्तन करें | 
  • जीवन और जड़ चेतन सबके प्रति सकारात्मक सोच बनाये रखिये क्योकि जीवन में आपकी सकारात्मक सोच के परिणाम भी अति सकारात्मक होकर ही मिलने वाले है | 
  • सत्य की सफलता का कोई शार्ट कट नहीं होता , आप आपने आदर्शों पर चलते हुए अपनी राह बनाइये आपको दीर्घ कालिक सफलता अवश्य प्राप्त होगी | 
  • क्षण भंगुर सुख के लिए अपने आदर्शों  से समझौता मत कीजिए क्योकि थोड़े समय बाद आपका यह त्याग आपके भविष्य को बहुत बड़ी सफलता देने वाले है | 
  • आपके कारण किसी को कष्ट नहीं पहुचना चाहिए यदि ऐसा हुआ तो आपकी सफलता में नकारात्मकता स्वयं शामिल हो जायेगे जो आपको अंत में असफल सिद्ध कर देगी | 
  • आप  अपनी तुलना दूसरों से करके स्वयं को सफल सिद्ध करने का प्रयत्न न करें , क्योकि दूसरों की सफलता के साथ ही आप सफल सिद्ध हो सकते है | 
  • ब्रह्माण्ड की शक्तियों को एकाग्र होकर समझने का प्रयत्न करें एवं उसको सकारात्मक भाव से  स्वीकार करें साथ  ही समय समय पर अपने व्यवहार में धनात्मक परिवर्तन भी करें | 
  • किसी भी नकारात्मक व्यक्ति या स्थिति का चिंतन निरंतर नहीं करें क्योंकि इससे अपने  व्यवहार और शक्तियों में भी नकारात्मकता आ जाती है |

Wednesday, May 27, 2015

the power of silence मौन की शक्ति


the power of silence  मौन की शक्ति



पूर्ण क्षेत्र का राजा विश्वजीत बड़ा ही पराक्रमी और दिलेर  माना जाता था सारे इलाके में उसके शौर्य की चर्चा  होती रहती थी ,राजा ने अपने सारे शत्रुओं पर विजय हासिल करली थी  , सारे राज्य में सुख शान्ति थी और सभी लोग खुश थे एक दिन रात्रि में अचानक यद्ध के नगाड़ों की आवाज आने लगी राजा ने गुप्तचरों को चारों दिशाओं में हाल जानने भेजा गुप्त चरों ने बताया की ४ हारे हुए राजाओं ने यह हमला  किया है , और वे सेनाये चोरों और बिछा चुके है ,कई दिन राजा ने अलग अलग तरीके से व्हियू रचना की ,मगर हर बार  उसे लौटना पड़ा ,और ऐसे में बहुत निराश होकर वह चिंता में बैठा था ,अचानक उसकी पत्नी ने उससे कहा की मैं  जानती हूँ यह समय विपरीत है ,मगर आप अपना धैर्य मत खोइए, हमारे राज गुरु इसका जरूर कोई उचित हल निकाल लेंगे ,राजा तत्काल गुरु आश्रम पंहुचा गुरु गहरी समाधि में थे , राजा नत मस्तक होकर उनके चरणो में बैठ गया,  पता नहीं क्या परम शक्ति थी उस आश्रम में राजा भाव विभोर और विस्मृत  सा बैठा रह गया ,अचानक गुरु ने उसे जगाया पुत्र उठो सुबह हो गई है , राजा ने गुरु को सारी समस्या बताई वे बोले मैं  जानता हूँ पुत्र कि  इस समय तुम संकट में हो ,अधिक चिंता , सोच और आवेग में तुम सही गलत का विचार ही नहीं कर पा रहे हो ,पुत्र एकांत में एकाग्रचित्त होकर अपनी मौन की परम शक्ति को जाग्रत करो वहां  से तुम्हे शक्ति और समाधान  अवश्य मिलेगा , राजा ने स्वयं को एकाग्र किया अचानक उसे आक्रमण कारी सेनाओं ने रसद बंद करने की नीत  पर घेरा डालने की चाल दिखाई दी ,और  हल भी साथ दिखा , कि किले के बड़े पहाड़ से जाने वाला जल ही एक नहर जैसे स्वरुप में  निकलकर पड़ोस के राज्य में जाता है, राजा ने तुरंत उस जल की  धारा बड़ी बाबड़ी  की और करदी ,पानी बंद होने, गर्मी से आहात सेनाओं में  व्याकुलता बढ़ गई सेनाओं का बड़ा भाग जब पानी के इंतजाम में भटका , उसी समय राजा की सेनाओं ने एक बड़ा आक्रमण कर शत्रु सेनाओं को परास्त कर दिया | राजा ने अपनी सभा में अपने गुरु को विजय का श्रेय दिया गुर ने गम्भीर स्वर में कहा सभा सदो यह जीत महाराज विश्वजीत की ही है , जब हमारे पास समस्याएं आती है तब सबसे पहले नकरात्मक विचार हजारों की संख्यां में हमारे मन मष्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेते है , फिर निरंतर नकारात्मक प्रभाव स्वयं को और अधिक और अधिक नकारात्मक कर देता है और हम अपने स्वभाव के विपरीत गलतियां करने लगते है यही हमारी पराजय का कारण भी बन जाता है ,राजा ने जिस छण  स्वयं को एकाग्र करके मौन का सहारा लिया उसे वह दिव्यरास्ता दिखने लगा जो उसे नहीं दिख रहता ,  मौन और एकाग्रता इन्हीं नकारात्मक विचारों से व्यक्ति को मुक्त करता है और वहीं  व्यक्ति विजय प्राप्त कर सकता है राजा सभासदों के साथ गुरु चरणों में नत मस्तक था | 


जीवन विचारों की श्रंखलाओं का कोई सुगठित समूह है निरंतर चेतनाएं मनुष्य को एक ऐसी दलदल में फंसाए रखतीं है जहां सत्य का कोई भी नामो निशान होता ही नहीं है , वह संसार में जो भी कुछ दिख रहा है उससे प्रेम और जो अदृश्य और सत्य है उससे  आँखें बंद रखने की चेष्टा करता रहता है , उसके विचारों में स्वयं को बड़ा और श्रेष्ठ बताने की लालसा उससे इतने पाप कराती है की वह स्वयं पापों को गिनने की गिनती भूल जाता है , स्वयं को बड़ा सिद्ध करने में सारे आदर्श , प्रतिमान और सिद्दांत धरा शाही होते है और सदैव की तरह अंतर का झूठ सच सा दिखने लगता है ,लगता यह है कि यह ठीक है ,मगर इससे आत्मा कभी भी सुख का अनुभव नहीं कर पाती है, और  इसके विपरीत जब भी हम अपने बड़े होने का व्याख्यान दूसरों को देते है हमारी ही आत्मा हमे धिक्कारने लगती है जैसे हमने सब कुछ खो दिया हो | 


मानसिक शारीरक स्थितियां नित्य नई समस्याओं के साथ  हमारा परीक्षण करती रहती है , और जैसे ही नयी समस्याएँ आई  हमारे हजारों नकारात्मक विचार उसे घेर लेते है मन मष्तिष्क हल और भय के भविष्य की कल्पना में और अधिक संवेदनशील होजाता है , अलग अलग कल्पनायें हमारा सोच इस प्रकार बनाने लगती है कि हमारा सारा आत्म विशवास चूर चूर हो जाता है और हर आने वाले क्षण से हमें भय लगने लगता है , परिणाम यह  कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व बदहवासी की स्थिति में एक हारे हुए प्रतियोगी की तरह जीवन से व्यवहार करने लगता है , और ऐसे में विजय की कल्पनाएं कितनी सार्थक होंगी ये आप भी समझ सकते है 


भगवान बुद्ध  से एक शिष्य ने पूछा परम गुरु आप यह बताये कि मौन की शक्ति क्या है और वह क्यों श्रेष्ठ है ,गुरु ने बोलना आरम्भ किया पुत्र हम जिस संसार में आज दृश्य मान है ,जानते हो वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अपनी पहिचान भी बड़ी मुश्किल से तय करपाता है , जब हम संसार के हिसाब से व्यवहार कररहे होते है तो हमारे सामने बहुत छोटा सा क्षेत्र होता  है, समाज , प्रदेश देश या इक गृह मगर यह एक छोटी सी सोच होती है छोटा सा वातावरण होता है और उस दृश्य मान में हम सबसे श्रेष्ठ बनने की चाह और प्रयत्न में अपने जीवन के मूल उद्देश्य को ही भूल जाते है कि हमारा जन्म क्यों हुआ है और हमे क्या करना चाहिए ,ऐसे ही उस छोटे से कुंएं रुपी परिवेश में हम बार बार असफल होते घसटते , कराहते  अपने आपको ही नहीं पहचान पाते ,इसी लिए मनुष्य जीवन यातना  बना मालूम होता है , जबकि मौन में जिस अनंत की व्याख्या होने लगती है वह इतना अनंत होता है की उसे हर बार नए सिरे से अलग अलग समझ कर भी उसके अंदर की खोज जिज्ञासा कभी ख़त्म ही नहीं हो पाती और वही जीवन के मूल में जाकर उसके रहस्यों से नित्य नए परदे हटाती रहती है ,और यही कारण है कि गहन समाधि के बीच का साधक  मौन की गहराइयों में हजारों गुना सकारात्मक और क्रियान्वित रहता है , और बुद्ध ने कहा  हजारों वर्ष की साधना के बाद भी हर बार साधना में कुछ नया जानने को शेष रहजाता है अतः योगी सदैव ध्यान और मौन में ही रहना चाहते है |यही जीवन का अमृत्व भी है | 


 दुनिया के हर धर्म में मौन और उसकी शक्तियों का प्रयोग प्रत्यक्ष दिखता है , ईसा को सूली परचढ़ाया गया वहां स्वयं उस देव पुरुष ने अपने प्राणों को समाधिस्थ करके  एक नियत समय के लिए सम्पूर्ण पीड़ा से स्वयं को मुक्त रख कर स्वयं को उस अन्नत में समाहित कर लिया और बाद में अपनी चेतना के लौटने पर जीवत हुए , भारतीय धर्म में शिव को समाधि का देवता भी बताया गया है , निरंतर समाधि और मौन की शक्ति से देवता ओतप्रोत है ,नानक , कबीर ,और हर धर्म का साधक और देवता इसी मौन और साधना से अपनी चरम शक्ति प्राप्त करते है
 
कलाकार दार्शनिक और साहित्य की सृजनात्मकता इसी मौन की शक्ति से पैदा होती है , असंख्य समस्याओं और उलझनों का हल है यह मौन एक सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बिंदु  जहाँ से सम्पूर्ण शक्ति एकाग्र होकर जीवन को वह लक्ष्य  दे देती है जो आदमीको देव तुल्य बना देता है , मौन का चिंतन क्षेत्र इतना वृहत है की जिसकी खोज में कई जन्मों की तपश्चर्या कम पड़ जाती यही खोज जीवन के सार्थक उद्देश्यों को इतने पास से दिखाती है जहाँ दुनियां की हर दृश्य अदृश्य शक्तियों का भेद स्पष्ट हो जाता है| 

मौन और साधना के प्रत्यक्ष प्रभाव से चेतना का धरातल प्राप्तियों और अप्राप्त के भाव से दूर होकर अपने पूर्ण लक्ष्य की तरफ मुड़कर चलने लगता है जीवनका क्षेत्र और सूक्ष्म होकर सांसारिक और पारलौकिक शक्तियों से जुड़ने लगता है , अनंत की खोज में एक सतत अमृत की धार साधक के दिल दिमाग में स्पष्ट हो जाती है , नश्वर और अनश्वर की पहिचान होने लगती है , सुख और दुःख के कारण और परिणाम अपना अर्थ खो देते है ,और जीवन साश्वत सत्य की और चलने लगता है जहाँ न चोरी का भय होता है ना ठगी का , ना लूट की चिंता होती है और, न होती है ख़ूबसूरत और बद सूरत की भावना तथा वहां केवल्य भाव होता है ,और हमारा पूरा समाज और समूह होता है, जिज्ञासु जिसे उस अमृत पान की लत लग गई है ,और उसका सम्पूर्ण जीवन बदल गया है |

जीवन के इस  इस अध्याय में इन्हें भी याद बनाये रखिये 

  • मौन का सम्बन्ध आतंरिक चेतना शक्ति से है और हम यह प्रयास स्वयं के साक्षात्कार हेतु कर रहे  है जिससे हम क्या है और किस उद्देश्य के लिए प्रयासरत है यह स्पष्ट हो जाएगा | 
  • मौन की साधना से पूर्व स्वयं को एकाग्र करें संकल्प लें कि सारी समस्याओं और सारी जीवन की विषमताओं का समाधान हम इस साधना के बाद सोचेंगे ऐसा करने से साधना में अधिक शक्ति आ जावेगी |
  • साधना से पूर्व यह स्पष्ट चिंतन करें कि हम जिस संसार को जानते है उससे हजारों लाखों गुना संसार हमारे लिए अनभिज्ञ है और आज हम उस  अनभिज्ञ  को समझने की चेष्टा कर रहे है | 
  • जीवनके बाह्य स्वरुप से अंतर्मुखी होकर हम स्वयं की चेतना का आंकलन कर रहे है अतैव बाह्य आवरण से सम्बंधित तथ्य आपको प्रभावित नहीं करें इसके लिए स्वयं को एकाग्र करें | 
  • मौन और साधना के लिए वातावरण तैयार करें सादे कपडे अनंत का ध्यान , और सकारात्मक चिंतन यहीं से आरम्भ होगा आपका सहज योग | 
  • अपने चिंतन को शून्य से सकारात्मकता की और मोड़नेका प्रयत्न करें , यह प्रयास करें की आप सहजता और शून्यता की स्थितिमे प्रवेश कररहे है | 
  • विचारों को रोकना और उन्हें अपने हिसाब से सोचना दोनों ही सहज नहीं है  अतः केवल स्वयं को शिथिल और शिथिल  तथा शरीर  में और शरीर से बाहर स्थापित कीजिए | 
  • एकाग्र और चिंतन रहित स्थिति के लिए आपको केवल यह प्रयास करना चाहिए या तो आप स्वयं की स्वांस को एकाग्रता से देखे या अपनी नाक के अग्रभाग या अपनी भ्रू मध्य को देखने का चिंतन और प्रयास करें | 
  • ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां अखिल ब्रह्माण्ड में समायी हुई है और उन सारी शक्तियों की उपस्थिति का अनुभव आपको करना है और ध्यान में आप उसका प्रयास कररहे  है | 
  • समस्याओं  विषमताओं , और साधन और रूप हीनता को आप जैसे ही ध्यान की गहराई में जाएंगे आप सब भूल जाएंगे , मन स्वयं उस रस से ओतप्रोत और स्वाभिमान का अनुभव करने लगेगा | 
  • मौन और ध्यान का मध्य भाग आपके चिंतन से बड़े छोटे अच्छे बुरे और हीन और सर्वोत्कृष्ट का भाव ख़त्म करदेगा एक सहज प्रेम कीअनुभूति देगा यह मौन | 
  • मौन और साधना से प्राप्त शक्ति और बदलाव आपको और अधिक विनम्र और जहाज बनाएंगे , उनसे प्राप्त शक्तियां आपको और अधिक सज्जन और सहज बनाएंगी |




Saturday, May 23, 2015

women empowerment (महिला सशक्तिकरण )

women empowerment (महिला सशक्तिकरण )

 एक चिंतन 

वाज्ञा  का कलेक्टर के रूप में ज्वाइन करने का स्वागत कार्यक्रम था यह , आगे बैठी माँ वाज्ञा को देखते देखते सम्पूर्ण अतीतमें विस्मृत सी हो गई थी , आँखों के सामने  अतीत चल  चित्र की तरह घूमने लगा , पूरे गाँव   से दुश्मनी लेकर जीवित रख पाई थी मालती इसको ,जन्म के दिन ही उसे सास के कहने पर दाई ने तम्बाखू मुह में रख कर डलिया से ढक  कर रख दिया  था ,सुबह उसे मरा हुआ समझकर फेंकने जा ही रहे थे कि बच्ची  जोर से रोई ,गहरे नशे में थी वह ,माँ का ह्रदय चीत्कार उठा उसने किसी की परवाह किये बगैर बच्ची को परिवार के सेवादार से छीना और जोर से चिल्लाई खबर दार अब किसी ने हाथ लगाया तो सबको जेल करवा दूंगी ,सारा घर परिवार पड़ोस सब सकते में आगये थे और बच्ची जीवित बच गई थी ,खूब शान और पूरी स्वतन्त्रता  से पाला  था सबनेउसे ,बड़ी पार्टिया , खुला वातावरण ,पैसे और स्वतंत्रता ने उसे अधिक बद दिमाग बना दिया था, जिद और बेतहाशा पैसे के प्रयोग ने सारी जिद पूरी करने का संकल्प ले लिया था पूरे घर ने | आज वाज्ञा  अपने साथियों के साथ दूर पिकनिक स्पॉट पर थी , साथियों ने कोल्ड ड्रिंक में शराब मिलाकर सर्व करदी थी,और बाद में उल जलूल हरकत करने लगे थे , वाग्या  ने पूरी ताकत लगाकर रेस लगा दी ,सड़क के किनारे आकर वह बेहोश हो गई थी किसी सज्जन  ने उसे अस्पताल पहुँचाया घर को सूचना दी ,अब सारा घर उसे घेरे खड़ा था ,होश आने पर वाज्ञा माँ से लिपट कर खूब रोइ फिर केवल माँ से एक लाइन बोली---- माँ आप तो जानती हो दुनिया कितनी स्वार्थी , खुद गरज और ख़राब है आपने मुझे उससे दूर क्यों नहीं रखा , क्यों नहीं टोका हर जगह गलत जिदों पर ,मुझे मैं  तो अबोध थी , आपतो बड़ी थी न , माँ के सामने पूरा जीवन चक्र एकबार में घूम गया , उसे लगा मैं  समाज परिवार की रूढ़िवादी सोच को तो हरा आई पर आज इस बिंदु पर खुद को हारा  सा महसूस कर रही  थी खुद को, माँ भी रोने लगी , हा बेटा यह गलती हो गई, मगर आज वादा करती हूँ की मैं  और तुम दोनो जीवनको इतना बड़ा बनाएंगे जहाँ समाज का हर विकास छोटा पड़ जाए , समय बीता और आज वाज्ञा उस जिले की नई  कलेक्टर बनी बैठी अपने अतीत को सोच कर जीवन की बारीकियों को समझ रही थी | और तालियों की गड गड़ाहट ने माँ की सोच पर विराम लगा दिया  था और माँ हंस दी थी |


हम या तो बहुत कठोर अनुशासन अथवा अनुशासन हीनता की परा काष्ठा  पर स्वयं को रखना चाहते है ,और दोनो ही स्थितियों में  आपको सहज उन्नति और चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती , क्योकि यदि आप स्वछन्द भाव से स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सके तो आपका पतन निश्चित है, क्योकि जीवन का उर्ध्वगामी सत्य स्वयमेव  विपरीत परिस्थितियों  के कारण जब भी रुकता है तो ,वह अपने स्वाभाव के अनुसार नीचे की और जाने लगता है ,ऐसे में यदि नियंत्राण कारी शक्तियों से अंकुश लगा कर उसे नहीं रोका  गया तो उससे समूल विनाश की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है और यही मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चिनौती भी है |


अभी  हाल  में एक भारतीय अभिनेत्री को मीडिया ने खूब उछाला ,क्योकि उन्होंने जीवन को एक सिद्धांत पर रख दिया वह था ------------   MY CHOICE  -----खूब हंगामा हुआ  लोगोने यह  कहा शर्म ,लाज , सम्मान , व्यवहार और श्रेष्ठ जीवन शैली के सिद्धांत अपना अलग महत्व रखते  है , माय चॉइस का आशय यह कदापि नहीं है कि आप सामजिक और सांस्कृतिक मान्यताये छोड़ कर पाश्चात्य सामाज जैसे  आचरण करना और समाज का उपहास करना सीख जाएँ , शायद आपको सुसंस्कृत वातावरण प्रदान करने के पीछे केवल एक सत्य था  कि आपमें हर कार्य की ललक बनी रहें , मित्रों भारतीय धर्म यह जानता था कि जीवन के हर भोग को उसने एक सीमा में बांधने  का प्रयत्न किया है जिससे वह भोग सुख और संतति का साधन बने ,न  कि वह भोग के अतिरेक के कारण मानसिक दबाब , नैराश्य , या जीवन से मोह भंग  का कारक  भी बन जाये |



1 --------- अति सर्वत्र वर्जयेत

2 ---------- परम स्वतंत्र न सिर पर कोई आवहि मनही करो तुम सोई

3 ----------महा वृष्टि  जहिं  नसत कियारी ॥ जिम स्वतंत्र होइ बिगरहिं नारी

कहने का अर्थ यह कि चाहे स्त्री हो या पुरुष अपनी  सीमाएं तो हमे ही निर्धारित करनी होंगी अति हर स्थान पर आपको कष्ट और हानि के सामने ही खड़ा कर देगी , दवा का अधिक डोज प्राण घातक है ,भोग का अधिका अधिक प्रयोग आपको मानसिक व शारीरिक रोगो और नैराश्य के भाव से  जोड़ देगा , कहने का आशय जहां भी अति की वह परिणाम जान लेवा ही होंगे , वहीँ अति से आदर्श , संस्कृति और प्रतिमान सब कुछ ख़त्म होजाते है | अधिकार दायित्व और शक्ति की अति भी असामायिक विनाश का कारण खड़ा कर सकती है , इतिहास गवाह है की जहां भी अति गुण  या दोष किसी में समाहित हुए है वहां विनाश अवश्यम्भावी हो ही जाएगा |



मित्रों पाश्चात्य देश अपना सारा भोग विलास छोड़कर एक नए सिरे से जीवन को समझने में लगे है , आपने उन भोगवादी व्यवस्थाओं को काफी समझ लिया होगा , जहाँ १३ वर्ष का बच्चा घर से अलग अपनी दुनिया में मस्त है भोग वादी प्रवृती  ने उन्हें स्वतंत्र सम्पूर्ण भोगों से तो जोड़ दिया है मगर उनसे शिक्षा , ज्ञान एकाग्रता , लक्ष्य और जीवन के उद्देश्य छीन लिए है , जीवन में नैराश्य , पार्किंसंस ,  पागलपन , और अति हिंसा ये सब कारण उस अति भोग से पैदा हुए परिणाम है , रिश्तों  का जीवन अस्तित्व तलाक और मिचुअल  सेपरेशन के इर्द गिर्द घूम कर रह गया है दोस्तों आप सच मानिए कि उनका जीवन उत्तरार्ध और भी अधिक कठिन है |



महिला सशक्तिकरण का आशय यह है  कि उसे जन्म का अधिकार दीजिये उसे अच्छे संस्कार और शिक्षा और संस्कृति से जुड़ने का सामान अवसर दीजिये , उसे अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सोचने का अवसर अवश्य दीजिये साथ ही उसकी समस्याओं और उनके समाधानों को समझने समझाने का प्रयत्न भी कीजिए , उसके  सम्मान  और मर्यादाओं की इज्जत कीजिए तथा उसे और अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया जाए , उद्यमिता विकास कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी और बढाई जाए और उसे अपने पैर्रों पर खड़ा करने का मौका दिया जावे , शायद यहीं कहीं से जीवन को महिला सशक्तिकरण का लाभ प्राप्त हो जाएगा |



मनुष्य के दिल से दिमाग तक के भाग में एक ऐसा सेंसर मौजूद है जो शरीर से किये जाने , सोचेजाने और मन में आने वाले विचारों से पहले ही उसकी नकारात्मकता सकारात्मकता को प्रकट कर देता है ,यही है आत्मा |

मन बुद्धि और कर्म के सिद्धांत यह बताते है की जीवन चिंतन , चेतना , और उसे मूर्त स्वरुप प्रदान करने वाले कर्म से बंधा है और सबसे अधिक जीवन का जो मूल्यांकन करने वाला भाग है वह है आत्मा , यह मन मस्तिष्क के त्रिकोण में घूमती हुई कोई जीवन लहरें है जो  शरीर और मन के छोटे से छोटे भाग पर पड़ने वाले हर प्रभाव को आंकलित करके उसका तुरंत निर्णय करती है ,और इसका सम्बन्ध केवल त्याग, अपरिग्रहता , प्रेम  सौहार्द और अपनत्व में निहित है , अतः यह स्वीकार करने योग्य है कि  भोग विलास और मानसिक चिंतन का सार्थक स्थान स्वतंत्रता के लिए अति उपयोगी शस्त्र है जो इंसान को जीवन भर शिक्षा देते रहते  है आवश्यकता यह है की आप उसे ध्यान से सुन पाएं |


        इन विषयों पर पुनः विचार करें


  • जीवन का आशय भोग नहीं है उसका आशय मन वचन कर्म की सच्चाई को समझाना एवं शारीरिक मानसिक चेतना में जितना आवश्यक हो उतना प्रयोग आवश्यक है | 

  • जीवन में पथ प्रदर्शन अति आवश्यक है और जीवन के हर पल आप गुरु माँ पिता के परामर्शों को नाकारात्मक स्वरुप में न लें उसपर चिंतन का प्रयत्न करें | 

  • महिला शशक्ति कारण हेतु आपको संस्कार , शिक्षा , सामाजिक मान्यताएं और उन्हें जन्मकी अनुमति अवश्य दी जानी चाहिए जिससे समाज सुसंस्कृत हो सके | 

  • प्रेम सौहार्द और स्वतंत्रता की सारी सुविधाएं देने वालों से यह भी अपक्षा की जाती है कि  वे सही गलत सिद्धांतों की व्याख्या करना अवश्य सीखें | 

  • नितांत अन्धे होकर किसी भी बात को मान लेना पूर्ण स्वरुप में ठीक नहीं है क्योकि जहा आपको यह लगे  कि आप स्वयं अपने मार्ग से भटक रहे है आप उसमे सुधार अवश्य करें | 

  •   मन वचन कर्म से सकारात्मक  भावों को अधिक आश्रय दें क्योकि जैसे ही आपने तीनो स्तर पर सकारात्मक भाव बनाये सारी नकारत्मकताएं स्वयं नष्ट हो जाएंगी | 

  • मन की चेतना शक्ति सबसे प्रबल है जब भी आपकी अंतरात्मा का सत्य आपको यह विचार दे कि आप उस कार्य में गलत हो या गलत साबित होगे आप सावधान होकर कार्य करना आरम्भ करदें | 

  • जीवन को कमियों और अच्छाइयोंके साथ स्वीकार करें जिससे आपको कभी दुःख नहीं होगा जब हम पूर्णता से आदर्शों की  बात करते है तब भी स्वयं अपनी अंतरात्मा में दोषी बने रहते है इससे विकास रुका रहता है |


Sunday, May 17, 2015

powers of universe and you ब्रह्माण्ड की शक्तियां और आप

powers of universe and you
ब्रह्माण्ड की शक्तियां और आप 
 (UNDERSTANDING , POWER OF UNIVERSE , PRACTICAL APPROACH)
ब्रह्माण्ड की शक्तियों को समझिए और स्वयं में पैदा करें


एक राजा के राज्य में एक चोर रहता थानाम था वीर मणि बहुत ही शातिर और तेज दिमाग था उसके पास महल और नगर में ऐसी चोरियां करता था कि किसी को कानों कान  खबर नहीं होती थी ,एक बार उसने एक बूढ़े साधु के वेश में महल में चोरी की और सामान लेकर भाग रहा था उसके पीछे सुरक्षा कर्मी लगे थे , अचानक  उसने सड़क पर सोते हुए एक लड़के के पास चोरी का सामान रखा और थोड़ी दूर पर वो भी सड़क के एक कोने में सोने का नाटक करने लगा सुरक्षा कर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया लड़का चिल्ला रहा था कि मैं तो कल रात ही गाँव से आया हूँ माँ की तबियत बहुत ख़राब है खाने के लाले पड़े है ,बहिन शादी को है, पिता मर चुके है ,मैं  तो महल में काम करके धन कमाने की इच्छा से आया हूँ ,अधिकारियों ने एक न सुनी उसकी और जेल में डाल दिया| 
आज घटना को तीन रातें गुजरगई  थी वीर मणि पूरी रात सो नहीं पा रहा था ,उसे बार बार साधु के वेश के कपडे और उस लड़के के शब्द कानों में गूंजते मालूम पड रहे थे ----- सब कुछ ख़त्म हो जाएगा ,रहम करों  सब मर जाएंगे ,और फिर मेरी तरफ देख कर भी बोला था इन साधू महाराज से पूछ लो मुझे कुछ नहीं मालूम मैं तो सो रहा था बस ,मुझे साधु शब्द सुनकर आत्म ग्लानि होने लगी कितना विशवास था उसे साधु और उन कपड़ों पर ,सुबह वीर मणि ने जाकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया , राजा ने पूछा जानते हो तुम्हे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा , वीर मणि ने बताया हाँ  महाराज जानता हूँ ,परन्तु  मैंने पिछले तीन दिन इस प्रकार बिताये है स्वप्न में मुझे कई साधुओं ने घेर कर पिटाई की है मेरी , आत्म ग्लानि से  कई बार मैं सूली पर चढ़ाया गया हूँ मैं ,और कई बार अपने आपसे घृणा का भाव पैदा हुआ है, राजा   ने सत्य बोलने के  लिए वीर मणि को देश निकाला ,और युवक को नौकरी देदी ,कालांतर में वीर मणि ने घन घोर जंगल में एक बड़े साधु को गुरु मानकर यह पूछा मेरे संग ऐसा क्यों हुआ गुरुदेव ,साधु ने कहा पुत्र तुमने जो वेश धारण किया था वो स्वयं अपराध था ,वहां  ब्रह्माण्ड की अनेक शक्तियां तुम्हारे विरुद्ध एक जुट  होगई  ,उन्होंने तुम्हारे मन मष्तिष्क पर काबू कर लिया, यदि  तुम अपना अपराध स्वीकार  न करते तो वो शक्तियां तुम्हें नष्ट कर देती , दूसरे यह की तुमने जिस साधू स्वरुप का वेश रखा था वह तुममे जाग्रत होगया और उसने तुम्हे अपराध बोध देकर मुक्त कर दिया। वीर मणि ने एक बार गुरु बनाये साधु को देखा और दूसरी और ब्रह्माण्ड को ध्यान से देखा उसे लगा की एक परम शक्तिशाली शक्ति चारों और संसार को नियंत्रित कर रही है उसने दोनो को साष्ट्रांग प्रणाम किया |




आधुनिक चिकित्सा  शास्त्र मनुष्य को केवल वैज्ञानिक आधारों पर सिद्ध करने का प्रयत्न करता है वह यह बताता है की मनुष्य में हजारों लाखों  घटक कार्य करते है उनकी कमी और अधिकता से रोग , स्मरण और विस्मरण तथा शारीरिक -मानसिक समस्याएँ पैदा होती है जबकि कई बार यह देखने में आया है कि कोई समस्या नहीं होने पर भी अचानक कोई विपरीत परिस्थिति खड़ी हो जाती है , सारे  लेबोटरी टेस्ट श्रेष्ठ होते हुए भी इंसान , जीवन से हार जाता है ,भारतीय पुरातन सिद्धांतों में यही कहा  गया है , कि  
                                          मृत्यु से पूर्व सब कुछ सामान्य और ठीक हो जाता है 
शायद यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण है ,वही यह  भी देखने में आता है  कि कहीं कोई शक्ति उसके मन बुद्धि और क्रियाओं को नियंत्रित अवश्य  कर रही है | 
                                                           I TREAT HE CURES 

की परंपरा पर चलने वाला  चिकत्सीय विज्ञान यह मानता है कि  सारी परिस्थितिया सामान्य होने के बाद भी  कुछ  ऐसा है जो बुद्धि और मन से परे  है  कुछ अलग घट रहा है सामान्य स्थितियों में चिकित्सा विज्ञान के ये शब्द आपको विस्मित अवश्य कर सकते है     
                                 PLEASE START PRAYER THERE IS NO SIGN OF LIFE 

अर्थात आप  जिस भी धर्म को मानने वाले हों आप प्रार्थना आरम्भ कीजिए यहाँ जीवन का  कोई संकेत नहीं मिल रहा है और प्रार्थना चालू की जाती है तथा कई बार विस्मय कारी परिणाम आपके सामने होते है जिसे आदमी अपनी ही जीत बताने लगता है | कई लोगो के संस्मरण में मृत्यु के बाद उनका पूरे ध्यान में एक अलग लोक का वर्णन करना और वहां की घटनाएं बताना , ये सब झूठ कैसे बता सकते है आप | 

एक विस्मय कारी घटना में अभी हाल ही में दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल में घटित हुई ,एक मरीज का ओपन हार्ट सर्जरी किया गया सब कुछ सामान्य था मरीज डॉक्टर को बोला मुझे बचा लीजिये मैं मरना नहीं चाहता डॉ बोले आप बिलकुल ठीक है और धीरे धीरे आपके टांके ठीक हो रहें है , मरीज आश्वस्त नहीं हो सका पत्नी को भी यही कहा  सब कुछ सामान्य होने के बाद भी एक ७ वे दिन सोते सोते अचानक तेजी से उठ गया सारे टाँके टूट गए और वह मर गया | 
आप इन घटनाओं को सामान्य कैसे मान  सकते है | 

भारतीय धर्म की मान्यताओं के अनुरूप जो महत्वपूर्ण मान्यताएं आतीं है उनपर जरा दृष्टी डालें 

दिखारावा मातही निज अद्भुत रूप अखंड॥ रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्माण्ड 

हरी अनंत हरी कथा अंनंता ॥ कहै सुनहि सब विद्धि सब संता 

सोहास्मि इति  वृत्ति अखंडा ॥ दीप शिखा सोई परम प्रचंडा 

अर्थात प्रथम पक्ति में ब्रह्माण्ड की अनंतता का वर्णन है यहाँ यह बताया गया है कि जैसे उस सुप्रीम पावर गॉड  के शरीर के हर रोम ब्रह्माण्ड की गैलक्सी की तरह है जिसमे करोड़ों या अनगिनत ब्रह्माण्ड या गृह समाये हुए है ,जिसे वैज्ञानिक मानते है कि यह ब्रह्माण्ड का विस्तार  है या ब्रह्माण्ड बढ़ रहा है | 

 द्व्तीय पक्ति में यह  कहा गया है कि उस सुप्रीम पावर गॉड  का रूप और विषय बहुत बड़ा  और  अन्नंत है उनका  जितना अध्ययन और शोध किया जाएगा उतनी ही गहराई प्रकट होगी ,यह दोनो बड़े शोध के विषय है ,| 

तृतीय पक्ति में यही बताया गया है कि  मनुष्य उस ब्रह्माण्ड का शक्तिशाली अणु  है और उसकी परम  चेतना यह भाव पैदा करती  है कि वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तियों का उपयोग कर सकता है । अर्थात मनुष्य की चेतना सबसे शक्तिशाली विषय है जिसके विस्तार  का प्रयास करना ही चाहिए ।
 उसकी सकारात्मकता और अबूझी पहेलियों पर निरंतर शोध, चर्चा होती रहनी चाहिए

चीन रोम  भारत तथा  ज्ञान और तपस्थली के रूप में , तिब्बत का तवांग मठ  ज्ञान गंज ,चीन,   कश्मीर , बिहार और नालंदा के शोध स्थल तथा मोहोम्मद साहब ,नानक देव, और अनेक वैज्ञानिक संतों ने केवल परम चेतना के भाव से ऐसे ऐसे चमत्कार किये और किये जारहे है जिसे विज्ञान की भाषा में असंभव ही कहा जाएगा 

कितने बौने  और  कमजोर है हम कि जिस बड़े काम को हम असंभव मानते है उसे तुरंत नकार देते है की यह हो ही नहीं सकता, विज्ञान पोलीग्राफ , ईसीजी और हर्ट ब्लड प्रेशर तो नाप सकता है मगर इंसानी चेतना की उँचाइयों को नापने का कोई स्ट्रूमेंट  आज तक नहीं बना पाया है , वह तो केवल एक दौड़ के खिलाड़ी की तरह बार बार गिरता खड़ा होता और फिर भाग कर अपनी परम शांति की खोज में लगा रहता है,  ,उसकी गति इस प्रकार की होती है जैसे एक पागल आदमी के हाथ में बड़ा बांस है, और उसके सिरे पर लाल रूमाल बांधा  गया है ,और वह तेजी से भागता रहता है बांस आगे किये पर जीवन भर वो रूमाल उसकी पकड़ में नहीं आ पाता क्योकि उसकी चेतना ही तो शून्यता प्रकट कर देती है | 


 विश्व भर के इतिहास में यदि दृष्टी डाली जाए हजारों स्थान पर ऐसी धार्मिक प्रयोग शालाएं थी जिनका प्रयोग ब्रह्माण्ड  को समझने के लिए किया गया है , आज अनेक स्पेस सेंटर , परमाणु केंद्र और वैज्ञानिक जो  प्रकृति को समझने की चेष्टा कररहे है वो हर रोज कुछ न कुछ नया कररहे है अपनी चेतना शक्ति से , सारे फॉर्मूले फ़ैल होजाते यही , सहज एकाग्रता में नया फार्मूला तय करलिया जाता है , किसी की सफलता के प्रयास में कुछ और सफल हो जाता है और हम बड़े प्रसन्न बने रहते है की हमने यह किया या वो किया ,

संसार के हर इंसान को मैं  दो मिनट आत्मानुभव का मौका देता हूँ दोस्तों ९०%लोगो को अपने आपमें बड़ा खालीपन लिए मालूम होते  है ,क्योकि उनके पीछे जीवन को समझने की शक्ति नहीं है ,  
शरीर रिस्पॉन्ड नहीं कररहा है ,इसलिए आधुनिक चिकित्सा काम नही कररही है ,
मन में भोग और विलासता के बीच कुछ एकाग्रता का भाव नहीं बना  पा रहा हूँ इस लिए इसके अलावा सब बेकार है यह सब स्वयं की चेतना को नही समझने के कारण है ,कहने का आशययह कि आप स्वयं की परम चेतना को जाग्रत कीजिए तब आप नये जीवन की शुरुआत करपाएंगे | 

 परम चेतना को परिष्कृत कर ब्रह्माण्ड से शक्ति प्राप्त करने के लिए भारतीय तंत्र शास्त्र के इन बिन्दुओं को अपनाइये
  • जीवन और संसार को समझने का प्रयत्न करें अपने लक्ष्य और  अपने आस पास की स्थितियों को समझे और उनके अनुसार स्वयं को सकारात्मक रखें | 
  • स्वयं को एकाग्रता का भाव प्रदान करने के लिए  दिन में १य़ा २ घंटे मौन धारण करने का प्रयत्न करें इससे आपकी चेतना को विस्तार मिलना आरम्भ हो जाएगा | 
  • स्वयं  को एकाग्र करके अनन्तायः नमः (ANAN-TAAYAH -NAMH--)को ३ से ५ मिनट तक आँख बंद करके रिपीट करें  ध्यान  रहे  कि  आप  पारलौकिक सत्ता से जुड़े है | 
  • प्रथम स्थिति के बाद आपको शांत और एकांत में अपने भ्रू  बिंदु का चिंतन करना चाहिए यहां आपको जितना संभव हो दोंनो  आखों से भ्रू मध्य को देखने का प्रयत्न करें | 
  •  स्वासों को नियंत्रित रखकर आँख बंद करके स्वयं की चेतना से उन्हें देखना आरम्भ करें जैसे आपकी स्वास आरही है तो वह सकारात्मकता लारही है और जाने वाली स्वास ऋणात्मकता लेजारही है  यह बहुत प्रभावी योग माना गया है | 
  • अपने सारे कार्यों में पूर्ण मनोयोग रखें एवं हर कार्य के लिए उन शक्तियों को धन्यवाद अवश्य करें जो आपके साथ सहयोगी और अदृश्य है , इससे आपको अहम और घमंड नहीं पैदा होगा | 
  • स्वयं को हर कार्य में पूर्ण मनोयोग देकर भी आप निर्लिप्त बने रहें ध्यान रहे कि जीवन बहुत सारे भागों में बंटा  हुआ कोई सत्य है और हर स्तर पर आपको स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना है | 
  • जिन स्थितियों पर आपका नियंत्रण नहीं हो उनमे सकारात्मक रुख अपनाये रखें क्योकि अतीत भविष्य और दूसरो के सम्बन्ध में आप निर्णय लेकर भी कोई कार्य नहीं करवा सकते | 
  •  नियमित स्वरुप में स्वयं के कार्यों का आकलन अवश्य करें और जहाँ आप गलत हों अगले आने वाले समय में वह गलती की पुनरावृत्ति न होने दें । 
  •  आकाश में रोज  बैठ कर  आकाशीय दृश्यों का अवलोकन करें और अपने मंत्र का जाप करें , इससे आपको अनभिज्ञ को जानने में सरलता होगी | 
  • रोज कुछ समय पानी में थोड़ा सा नमक डालकर पांव डालकर अवश्य बैठे इससे आपकी नकारात्मक ऊर्जा निरंतर कम होती जाएगी | 
  • ध्यान के समय एक पानीके चौड़े  पात्र में कोई इत्र डालकर आँख बंद करके ध्यान करें , यह अवश्य ध्यान रहे कि जहाँ ध्यान किया जा रहा है वहा कम से कम से सामान हो | 
  • ध्यान के समय सुबह पूर्व दोपहर २ बजे के बाद पश्चिम और संध्या के बाद उत्तर की और मुंह करके ध्यान करें , अमावस्या  ,  रविवार , में गरीबों को दान एवं एक दो सिटिंग दक्षिण की और भी ली जा सकती है | 
  • ब्रह्माण्ड का मूल भाव देना त्याग और सबको खुश रखना है , आप ब्रह्माण्ड साधना के लिए ऐसे ही भाव जाग्रत रखे क्योकि इससे आपको नित्य नई  ऊर्जा मिलेगी | 
  • दूसरों के कार्यों की आलोचना और आंकलन करना आपका विषय नहीं है और इससे आपमें भी ऋणात्मकता पैदा होगी आप  जीवन के प्रति सकारात्मक रवैय्या अपनाइये |

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...