जीवन भर आदमी को केवल दो ही चीजें परेशान करती है प्रथम अपेक्षा और दूसरी है उपेक्षा ,जीवन से, अपनों से, समाज से और परायों से हम सब से कुछ न कुछ चाहते रहते है जिससे हम कुछ नहीं चाहते उससे इतना तो चाहते ही है की वह हमारी स्वायंभू सत्ता को आँख बंद करके मानता रहे और वह हमसे छोटा है उसे यह ध्यान बना रहे ।दूसरी और हमे सबसे ज्यादा आहात केवल यह करता है की कोई हमे उपेक्षित करके छोड़ दे और हम उस उपेक्षा के लिए कुछ न कर सके ।महाभारत के महा योधा गुरु पुत्र अश्वथामा की हत्या न करके उसे उपेक्षित करके छोड़ देना यही दर्शाता है की आदमी के लिए उसकी उपेक्षा करदेना मृत्यु से भी अधिक बड़ा दंड है।मृत्यु उसके जीवन की भौतिक यातनाओं को समाप्त करके नए सिरे से उसे पुनर्विचार की स्वायत्तता प्रदान कर देती है ।
सुख मय जीवन के लिए सबसे पहले यही विचार किया जाना चाहिए कि जीवन से बहुत सी अपेक्षा की ही नहीं जाएँ ,हम अपने जीवन की हर छोटी स्थिति के लिए भी किसी न किसी पर आधारित हो बैठते है या सामने वाले से अधिक अपेक्षा कर बैठते है परिणाम यह होता है कि हमारे मन और आत्मा को वह अन्दर तक ऐसा दुःख देजाती है जिससे लम्बे समय तक हम अपने आपमें दुखी होकर रह जाते है और जीवन इसीतरह दुःख यातना और संघर्ष का मायने बना रहता है कोई आपके मन को और आत्मा के दर्द तक नहीं पहुच पाता मन को अपना दर्द खुद उठाना होता है अकेले, निःसहाय और बेबस सा ।
जरूरत है कि अपने आपसे भी न बहुत अपेक्षा रखी जाएँ न उपेक्षा से मन को दुखी होने दें एक अडिग और चिरस्थाई विश्वास रखे की आप उस परम सत्ता के एक शक्तिशाली अंश हो और आपका कर्तव्य आपके तमाम जीवन को सफल बनाएगा यदि आप जीवन को केवल अपने लिए जिए तो शायद आपने अपना जीवन व्यर्थ गँवा दिया और आपको बहुत सी स्थितियां विपरीत रूप में उठानी होंगी ।यदि आपने अपने जीवन के साथ दूसरों को समझने का प्रयत्न कर लिया तो शायद आप् जीवन के मूल को सफल बना कर जीवन की दिशा को सही मार्ग दे सके ।
देगी ।