Sunday, April 23, 2017

सफलता से एक कदम पहले one step before success

सफलता से एक कदम पहले 
one step before success 

बचपन से बाबा ने नितिन को यही समझाया था  कि  पुत्र पूरी ताकत से ब्रह्माण्ड से जो भी मांगोगे और उसके लिए खुद को क्रियान्वित करदोगे,  तो दुनिया की कोई मांग ऐसी नहीं है ,जो आप प्राप्त न करपायें ,आप जीवन के चरम लक्ष्य सफलताएं ,सहज ही प्राप्त कर सकते है ,आवश्यकता इस बात की है कि आप निरंतर सार्थक प्रयास करते रहे और सोते जागते अपने लक्ष्य को दोहराते रहें | 
गांव के एक छोटे स्कूल से पास होने के बाद शहर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था हमारा नितिन  अंतिम वर्ष था इंजीनियरिंग का बड़ी बेज्जती झेली थी हमारे नितिन ने विश्वविद्यालयों में बड़े दोस्तों के समूह रोज की पार्टियां और होटलबाजी ,आधे अधूरे नशे में लड़के लड़कियों की टोली ,क्या क्या नामों से बुलाते थे उसे , फूहड़ गंवार देहाती लल्ला , और मामू  ये सब सुनते सुनते क्षुब्ध होगया था मन ,यदाकदा भटकता रोता , और इन दोस्तों के बाह्य दिखावे से  प्रभावित जरूर होता था , ऐसा मेँ  क्यों नहीं हो पाया, बाबा हमेशा कहते बेटा तू क्यों करता है ,इनसे अपनी तुलना, एक दिन सबको मालूम पढ  जायेगा  कि , तू सबसे अच्छा है ,और थोड़ा बहुत बोलकर वह  बाबा की बात पर विशवास कर ही लेता था | 

इंजीनियरिंग की अंतिम परीक्षा में नितिन के ८७%अंक आये, टॉप किया था उसने, परन्तु मन में यहीं  फाँस बनी रहती थी कि   मै स्मार्ट क्यों नहीं हूँ ,शायद मै ही ऐसा लगता होऊंगा, जैसा ये सब बोलते है, बाबा के निरंतर प्रयास प्रोत्साहन और प्रेरणाओं से नितिन ने  आई ए एस परीक्षा की आरभिक परीक्षा में संभाग भर में अकेला स्थान पाया , जो लोग कल तक नितिन को फूहड़ -देहाती- गंवार- मामू बोलते रहे थे ,उन्हें समझ नहीं आरहा था वो कैसा व्यवहार करें ,कई तथाकथित सहपाठियों ने एक पार्टी रखी ,लड़के -लड़कियां मना  कर नितिन को  भी ले  गए पार्टी में , नितिन गौरवान्वित सा उन लोगो को देख रहा था ,जो कल तक उपहास बना रहे थे,आज कुछ ज्यादा  लिपट चिपट रहे है , आज उसे बड़ा सकूं मिला, उन स्मार्ट लड़के लड़कियों द्वारा स्वागत पाते हुए ,सबको यह वादा करता हुआ कि  समय समय पर  आपको सहयोग करता रहूँगा ,पार्टी ख़त्म हुई | नितिन को बाबा की बातया याद अवश्य आई ,एक दिन तुम ही श्रेष्ठ साबित होंगे | बाबा ने ठीक  ही तो कहा था | 


आगे की परीक्षा की तैयारी बहुत जोरो शोरो से आरम्भ हो चुकी थी, अब क्या था एक बार और हिम्मत दिखाई और पार हो जाऊँगा मै,  परन्तु एक बड़ा परिवर्तन नितिन में आया था कि ,उसे यदा कदा  उन   कक्षा के सह पाठियों का ध्यान आ जाता था और मन कहता था,   तू ही सर्व श्रेष्ठ है, कैसा मजाक उड़ाया था मेरा, अब सब ठीक होगये  ,बधाई देने वालों का ताँता लगा रहता था ,दोस्त भी उसकी प्रसंशा  करने आते रहते थे ,बाबा कभी दबे स्वर में कहते बेटा समय का ध्यान रखो, वो बड़ी उपहास भरी नजर से देख कर बाबा को कह्देता ,देखूँगा मालूम है मुझे क्या करना है ,घरवालों पर यदाकदा चिल्ला देता था ,कि  दिखता नहीं है ,कि  मुझे काम है ,मन कहता मै सर्वश्रेष्ठ हूँ ,इन्हे नहीं मालूम की कितना काम करना होता है ,श्रेष्ठ बनने के लिए ,बाबा उसके इस व्यवहार को देख कर कुछ कहते नहीं थे मगर दुखी हो जाते थे मन ही मन | 

 परिवर्तन का समय इतना आहिस्ता ,धीरे- धीरे निकलता है ,वह मालूम ही नहीं पड़ने देता कि  आपपर उसका प्रभाव नकारात्मक हो रहा है, या सकारात्मक ,वह तो आपके जरा से लापरवाह होने पर, सबकुछ छीनने का साहस रखता है|  नितिन पूर्ण आश्वस्त था ,कि अब  आगे के लिए उसे क्या क्या करना है ,बहुत उत्साहित -प्रसन्न और लापरवाह सा| 

रिजल्ट शीट में कहीं भी नितिन का नाम  नहीं था ,कई साइड्स पर जा कर देखा कहीं नहींथा नाम , बदहवासी और बेहाल सा नितिन सब जगह खोज खोज कर थक गया था ,फोन पर फोन की घंटियां----- नितिन ने फोन बंद किया ,और एक अँधेरे कमरे में जाकर लेट गया ,जोर से चक्कर  आरहे थे उसे , यह समझ नहीं आरहा था क्या हुआ यह ,हाल में गुजरा हुआ एक एक पल उसके सामने सिनेमा की भांति गुजरने लगा , सारा का सारा अव्यवस्थित , लुटा हुआ , और अस्त व्यस्त सा लग रहा था उसे, हाल में बिताया हुआ अतीत ,दोस्तों के स्वार्थी व्यवहार -समय की बर्बादी ,घरवालों से उसका बेरुखा व्यवहार , सब  घूम गया था उसके सामने ,बाबा के द्वारा बड़ी हिम्मत करके बोले गए शब्द आज भी घूम रहे थे उसके कानों में , में  बेटा  समय का ध्यान रखो और उसका रूखा सा जबाब और बाबा का मायूस चेहरा ,न जाने कब तक रोता  रहा था वो ,अचानक बाबा ने कमरे की लाइट जलाई, भीगा चेहरा भारी व्यग्रता देख कर वे धीरे धीरे उसके सिर पर हाथ फेरने लगे और उन्होंने कहना आरम्भ किया -----

पुत्र जीवन का यह अध्याय बहुत आवश्यक  ही था, बेटा जिसतरह ठंडी ,भारी वायु  की तरफ, खाली और गर्म हवा पूरी तीव्रता से उसपर एक ही क्षण में आक्रमण  करके उससे सारी नमी और गरिमा या भारी पन ख़त्म करके उसे पल भर में उसे रिक्त बना कर अस्तित्व हीं कर देती है ,वैसे ही जब समाज को आपके भारीपन का एहसास होने लगता है, तो उसकी प्राकृतिक क्रियान्वयनता आपके विचारों एकाग्रता और उद्देश्य को नष्ट भ्रष्ट करने हेतु क्रिया शील होजाती है, आपको मालूम ही नहीं पड़ पाता तबतक, आप में शारीरिक मानसिक विकृतियां पैदा हो गई होती है ,आपके अहंकार के सहारे समाज की नकारात्मकता आप में प्रवेश कर जाती है ,परिणाम हम अपने उद्देश्य से पथ भ्रष्ट होकर अपने आपसे ही मति भ्रम की स्थिति पैदा कर बैठते है ,सार यह कि हमारा लक्ष्य और हमारी सफलता के उच्च शिखर हमे प्राप्त होते होते ओझल होजातेहै , हमारी  स्थिति उस राजा की तरह होती है ,जिसका भव्य राज तिलक होरहा होता है ,सारे शहर में उत्सव का माहौल था और मुकट  पहनकर राज तिलक होते ही यह  अहंकार में भर गया ,मुझसे बड़ा संसार में कोई है ही कहा ,और नींद खुल गई  सर्वत्र  शून्य था उसके अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं था | जीवन इसी तरह एक लम्हे में सबकुछ दे सकता है और एक पल में सबकुछ छीन लेता है | पुत्र यह सब नव जीवन की शुरुआत है तुम्हारी ,एक बार उठो और फिर जुट जाओ देखो सफलता तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कररही है  | 

नितिन की समझ में आगया था कि  उसने  अतीत में क्या गलतियां की थी, क्यों उसने अपने दोस्तों से अपनी तुलना की थी ,क्यों बाबा सहज और समय के अनुसार स्वयं को एकाग्र करने को कह रहे थे , और क्यों उसे अपनी आधी अधूरी जीत का इतना उन्माद या अहंकार हुआ ,उसने एक बार परमपिता परमात्मा से मन ही मन क्षमा मांगी और बाबा के पाँव छूकर अपनी टेबल पर पंहुचा और अपना स्टडी लेम्प जला दिया, बाबा पूर्ण आश्वस्त होकर प्रसन्न मुद्रा में अपने कमरे की और बढ़ गए उन्हें मालूम था की अब जीवन नितिन को कभी हरा नहीं पायेगा | 

सफलता के पूर्व का छण इतना शक्तिशाली और सूक्ष्मानिवेशी होता है ,जिसमे शरीर- मन -बुद्धि की तीव्रता कई गुनी अधिक हो जाती है , वही प्रसंशा का अतिरेक , अहंकार का प्रस्फुटन , स्वयं का गलत आकलन , और दूसरों से स्वयं की तुलना जैसे नकारात्मक भाव स्वतः पैदा होजाते है, ऐसे में लक्ष्य सिद्धि हेतु अडिग एकाग्रता की आवश्यकता होती है ,जबकि उसको भ्रमित करने वाले कारक बहुत अधिक होते है ,दूसरी और सर्वश्रेष्ठ होने का भ्रम विष बन कर समाज परिवार की उपेक्षा करने लगता है ,शारीरिक -मानसिक और आंतरिक उद्वेग लक्ष्य से भटकाने लगते है ,वे नकारात्मक मांग बन जाते है, फिर सबकुछ शांत लक्ष्य उद्देश्य और सफलता सब अदृश्य उस पानी - साबुन के बुलबुले की तरह जिससे अभी कोई अबोध खेलरहथा अचानक वो गायब होगया, बालक हतप्रभ है कहा गया मेरा रंग बिरंगा गेंद | 


आप यही समझिये कि बहुत बड़े काले  केनवास पर, एक छोटा सा सफ़ेद बिंदु। यही लक्ष्य था और अनंत तक फैली कालिमा या नकारात्मकता का साम्राज्य था ,अब यदि पूर्ण एकाग्र भाव से स्वांसों को स्तब्ध कर अपना लक्ष्य देखा पाए ,तब ही आप सफल हो सकते है ,अन्यथा नैपथ्य में फैला विशाल अंधकार ही, नकारात्मकता बनकर खड़ा हो जाता है, एक मार्ग यह भी है की लक्ष्य के साथ पूरे केनवास को ही पूरा नाप डालो ,वहां की हर असफलता नैराश्य और न उम्मीदी को पूरा समझ कर ,उसपर नजरें गड़ा दो, अंधकार की कालिमा सकारात्मकता के सहारे अचानक ही सूर्य के प्रचंड वेग की रोशनी की तरह सफलता विजय और उत्साह बन करखड़ी हो जायेगी, ये १००%सफलता होगी जहाँ तुलना- नकारात्मकता के भाव होंगे ही नहीं | 

अर्ध सफलता के साथ सफलता के पहले वाला समय बहुत ही चिनौती पूर्ण होता है ,यह समय अति शक्ति शाली  संवेदनशील और निर्णायक होता है,यह आपको अधिकाँश सफलता मन बुद्धि और बाह्य वातावरण से प्राप्त हो चुकी होती है ,परिणाम जीत  काउन्माद ,आप में एक खोखला अहंकार पैदा कर देता है ,मन बुद्धि का भाव अपनी जीत से अधिक दूसरों की जीत के भाव की तुलना करने लगता है ,समाज -परिवार और वातावरण का आकलन प्रभाव सब नकारात्मक होने लगता है ,अंतिम जीत के लिए जो  मानसिकता होनी चाहिए होती है, वह तीव्र वेग ,शक्ति ,लगन सब गतिहीन होने लगती है ,क्योकि एक मात्र स्वयं का विजय उद्देश्य अपने लक्ष्य से भटकजाता है | 


बहुत बारीक अंतर होता है गर्व और घमंड में,  दोनों का उद्भव केंद्र मन ही पैदा करता है, मन मष्तिष्क में दबी पिसी भावनाएं सदैव अपनी आपूर्तियों की मांग करती है और कुछ हम समाज कोदेख कर समझ कर झूठी प्रसशा के लिए अपने में पैदा कर लेते है ,परिणाम वे नकारात्मक होते हुए भी ,हमे उस समय थोड़ा संतोष अवश्य देसकते है , मगर उसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक ही होते है | 
लक्ष्य और जीवन के सच्चे उद्देश्यों के साथ कुछ चल ही कहा पाता है ,आत्मबल जब स्वयं पर गर्व के रूप में चिंतन शील होता है ,तब उसमे दूसरों से तुलना का भाव होता ही नहीं है ,उसमें आकाश की ऊंचाइयां ,सूर्य का तीव्र प्रकाश, सन्निहित होता है ,जबकि घमंड का उद्भव नकारात्मक भाव से उत्पन्न होता है ,जिसमें स्वयं का सर्वांगीण विनाश स्वयं पनपने लगता है ,गर्व पोषण करता है और घमंड स्वयं को समूल नष्ट कर देता है | 

यदि जीत के अंतिम पलों में हम लापरवाह हुए तो हमारे क्रियान्वयन में भटकन के हजारों आयाम खड़े होने लगते है, हम क्या अच्छा लग रहा है ,क्या नहीं ,इसकी फिक्र करने लगते है ,हमारे पास बहानों की लिस्ट आजाती है , आधी अधूरी जीत के अहंकार से उपजी शारीरिक मानसिक नकारत्मकताये समय विशेष में हमे अच्छी लगने लगती है , पूर्व के लक्ष्य मानदंड हमें धूमिल होते दिखते है ,जीवन अपने अनुसार परिभाषाएं गढ़ने लगता है ,वे सारी  बातें जो जीवन के उत्कर्ष के लिए जरूरी थी महत्व हीन दिखाई देने लगती है ,अपने ही लक्ष्यों  में हम हजारों कमियां निकालकर खड़े होजाते है, उन सब लोगो का सामना करने से हम बचने लगते है ,जो हमे अपने लक्ष्य के सामने खड़ा करें ,फिर सफलता संतोष और जीवन की उपलब्धियां अपने अर्थ खोने लगती है, और  बचता है उपलब्धियों से समायोजन समय से समायोजन और कल से समायोजन जो हमारा लक्ष्य नहीं था | 


निम्न का  प्रयोग  ध्यान रखिये
  • जीवन के क्रियान्वयन का सूत्र केवल यही रहे कि, सफलता से  पूर्व  कुछ नहीं , यही से जीवन के लक्ष्य की स्पष्टता सिद्ध हो सकती है | 
  • समय के साथ आरहे परिवर्तनों को बहुत बारीकी से अध्ययन करें क्योकि कई परिवर्तन आज सही  हो सकते है मगर उन्ही  अपनाये जो दीर्घकालीन एवं आपके  अनुकूल हों | 
  • नकारात्मक  विचारों पर  ध्यान न दें ,क्योकि ये  विचार आपको अपने सफलता के लक्ष्य से दूर लेजा सकते है ,और यह सत्य है की आपकी वैचारिकता से ही आप में सकारात्मकता और नकारात्मकता का जन्म होता है | 
  • नकारात्मक विचारो और सकारात्मक विचारों पर पैनी नजर बनाये रखे और उनपर विजय हेतु एक कार्यकारी योजना अवश्य बनायें | 
  • निरंतर अपनी कमियों और गुणों के सम्बन्ध में अपने आदर्श लोगो से सलाह लेते रहे ,क्योकि परिवर्तनों का मार्ग सकारात्मक रहना ही आपकी विजय का प्रथम प्रतीक है | 
  •  अधूरी विजय पर आपमें पैदा होने वाला अहंकार , प्रमाद और व्यवहार में नकारात्मकता न आजाये नहीं तो सफलता स्वयं व्यर्थ सिद्ध हो जायेगी | 
  • झूठ फरेब अहंकार और अपने आपसे छलावा न करें सत्य हमेशा शक्तिशाली ही रहेगा ,जबकि झूठ बार बार आपको कमजोर और कमजोर बनता जाएगा | 
  • जिन लोगो के बारे में आपको झूठ फरेब और असत्य का सहारा लेना पड़े, उन्हें तुरंत छोड़ने में आपका हित होता है, अन्यथा आप अपने जीवन के चरम तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे | 
  • क्रियान्वयन की निरंतरता आपको लक्ष्य के प्रति जागरूक रखती है, यदि आप पूर्ण गतिशील भाव से क्रिया को निरंतरता देते रहे तो, आप निश्चिततः सफल सिद्ध  होंगे | 
  • व्यक्ति वातावरण परिस्थिति स्थिर नहीं हो सकती, परन्तु आपका लक्ष्य क्रियान्वयन और एकाग्रता वैसी ही बनी रहनी चाहिए, जो आपकी विजय के लिए जरूरी हो | 
  • सफलता के लिए निरंतर बढ़ते हुए क्रम में प्रयास किये जाने चाहिए ,प्राथमिक स्तर पर सामान्य ,दूसरे स्तर पर तीव्र और अंतिम स्तर पर पूरी तीव्रता से प्रयास करें ,जितना आगे बढ़ें लक्ष्य के प्रति उतनी सावधानी और लेलें यहीं से आपको निश्चित सफलता मिलेगी |

Tuesday, March 14, 2017

सर्वोत्कृष्ट एवं निकृष्ट (superior and inferior )

सर्वोत्कृष्ट एवं निकृष्ट  (superior and inferior )

हितेश  के जन्म पर हजारों डिब्बे मिठाई बाँट  दियेगये थे ,सारे नगर से बधाई  आने लगी थी ,सारे  घर हर्षोउल्लास से भर गया था ,गोरा चिट्टा गोल मटोल सुन्दर बच्चा हुआ था सेठ हजारी लाल के ,यह दूसरा पुत्र था उनके ,नगर सेठ  की पदवी थी उन पर और फिर इन के  परिवारों में लड़का  पैदा होने की ठसक ही बहुत थी | उसके ४ वर्ष बाद हुई थी हिमानी घर में  कोई ज्यादा उत्साह था नहीं था , बस एक रस्म अदायगी और कहना यह कि  अब भाई को राखी बांधने वाला भी तो होना चाहिए ,  समय की गति और चक्र का पहिया तेजी से  घूम रहा था , हिमानी  अब स्कूल पास करके कालेज में पहुँच गयी थी बड़े भाइयों में एक तो हायर सेकेंडरी के बाद पढ़ ही नहीं पाया , दूसरे ने जैसे तैसे  डॉक्टर बनने के चक्कर में बीएससी थर्ड क्लास से पास अवश्य कर ली थी | माता पिता और सारा परिवार बस यही समझाता था हिमानी को  कि पराये घर जाना है चौका चूल्हा सीख ले , छोटी हिमानी  ने गजब का  सब्र  पाया था वो जानती थी कि घर के नए कपडे भाइयों के लिए होते है , अच्छा खाना, तफरीह , और ऐशो-आराम पर बेतहाशा पैसे उड़ाना भाइयों का ही काम है ,उसे तो केवल जो मिलजाए उसमे सब्र करना चाहिए या रोकर अपने आपको समझा लेना चाहिए , महा पुरषों की जीवनी और जीवन में सत्य की खोज ने उसे एक सूत्र जरूर दे दिया था कि कठिन परिश्रम और सकारात्मक  विचार उसे उस गंतव्य तक अवश्य लेजा सकते है जिसकी चाह आदमी करता है |

पिता भाइयों को अपने स्टैण्डर्ड बनाये रखने के लिए १०-१५-हजार रु प्रति माह देते थे ,फिर भी  वो कम ही पड़जाते थे, कई बार क्लेश हुआ था इस बात पर, घर में माँ और हिमानी सहमे से बैठे रहते थे , भाई पिताजी से खूब लड़ते थे और पिता जी बहुत कुछ चिल्ला कर , रोकर उनकी जिद पूरी कर देते थे ,बड़े पुत्र ने एक बार तिजोरी से १० लाख रु निकाले और वह घर से भाग गया , पूरे घर ने क्रोध किया  चिल्लाये और २० दिन बाद माँ के खाना  न खाने और रोते  रहने के कारण उसकी खोज चालू की गई और ३ माह बाद वो लुटापिटा सा घर लौट आया , पूरे घर में कोहराम था बंटवारा करों नहीं तो कल यह और रु चुरा लेजायेगा १माह  चला था  वो क्लेश और अंततः पिता ने बंटवारा करदिया था दौनों  को दूकान का आधा आधा  भाग देदिया गया,  सारे माल के भी हिस्से करदिये गए ,घर के दरवाजे रसोई सब अलग होगये ,हिमानी पिताजी और माँ अपनी दुर्दशा में अकेली बेसहारा रह गए  ,दौनो भाइयों ने पिताजी से सम्बन्ध ख़त्म करलिए थे, उनका कहना था उन्होंने अन्याय किया है बंटवारे में , माँ रोती रहती थी समस्या यह थी कि अब बेटी की पढ़ाई और शादी कैसे होगी ,सारे रिश्तेदारों  ने सम्बन्ध तोड़ लिए थे कही हम उनसे पैसे न मांगने लगें |पिताजी बिलकुल गुमसुम और मनोरोग के शिकार हो गए थे, मानो किसी जागृत नरक का निरीक्षण कररहे हो जिसका निर्माण खुद उनसे ही होगया था, उसके पश्चाताप और निराकरण की असफल खोज में | 

सबसे ज्यादा  बोझ ,छोटा ,  हीन  और तुच्छ समझी जाने वाली हिमानी के कन्धों पर उन पितामाता का दायित्व आगया था, जिन्होंने अपने बेटों के लिए जीवन भर उसे न केवल हेय  दृष्टी से देखा, बल्कि समय समय पर उसकी न्यायोचित जिद पर भी जानवरों जैसे  पीटा था ,भाइयो के बराबर हक की जिद में वो सबसे ज्यादा पीटी  गई थी ,आज हिमानी समझ गई थी , वास्तव में जो भाई स्वयं को सुपीरियर बताते रहे  वो थे नहीं और उसपर केवल एक दायित्व है कि,  उसे अपने मातापिता को सम्मान दिलाना है | ,, एम् ए इंग्लिश केबाद एक आई. ए.एस. कोचिंग में पढ़ा रही थी हिमानी ,जैसे तैसे घर का खर्च चल ही जाता था २० हजार रु मिलते थे ८ घंटे में ५ व्याख्यान होते थे और बाकी समय हिमानी खुद क्लास अटेंड करती थी ,  रात दिन की पढ़ाई मेहनत और लगन ने उसे केवल एक लक्ष्य दे दिया था की उसे स्वयं को सिद्ध करना है ,उसने विवेकानंद, आइन्टीन , सुकरात , और हजारों विचारकों के दर्शन से यह पाया कि जीवन का आशय यही है कि  आप अपने आदर्शों के चरम  पर पहुँच कर जीवन समाज और संस्कृति को नया आयाम दे जाएँ ,उस कठिन डगर में आप बोर होना  बुरा लगना ,मन नहीं लगना आदि की अनावश्यक स्थितियों से दूर एक लक्ष्य के लिए संकल्पित  रहजाते है  जिसमे आपका लक्ष्य भर होता है |

आज फिर आने वाला था आई ए एस  परीक्षा का रिजल्ट एक मित्र ने पूछा हिमानी रिजल्ट आने वाला है क्या सोचती हो आप, हिमानी ने गम्भीर स्वर में कहा, देवेश मैंने तो परीक्षा देकर अगली परीक्षा की तैयारी फिर चालू कर दी है, क्योकि मुझपर समय और विकल्प दौनो ही नहीं है, मित्रने कहा दोस्त आप मेरिट में फर्स्ट आयी हो ,आपकी साधना को ईश्वर ने स्वीकार कर लिया है ,धन्यवाद ज्ञापित कर हिमानी उठी और उसने अपने माता पिता के पाँव छुएं और रोती  रोती अपने कन्हैय्या के कमरे में भगवान् के सामने आकर   बिखर गयी ,भगवान् की मुस्कुराती मुद्रा मानो यह कह रही  हो अरे पागल तू ही तो है सुपीरियर , और हर पल मैंने तुझे जो सकारात्मक भाव ,जो तेरे मन को मैंने दिए , वही तो मैं था , बेटा ये एक कर्म छेत्र की सफलता है ,अभी आगे विराट तक जाना है ,तुझे और हर नकारात्मक भाव में जब तू मुझे सहारा बनाकर पुकारेगी ,तब मैं साहित्य ,परामर्श ,स्वप्न के रूप में तुझे रास्ता अवश्य दिखाऊंगा ,पुत्री मेरे लिए एक अर्जुन ही क्या, मुझे हर रोज उस भक्त की खोज  करनी होती है जो पूरी निष्ठां  से अर्जुन की भाँति , मुझसे प्रश्न पूछता है ,मैं  किसी को भी साधन बनाकर, उसको उत्तर देता हूँ और कार्य की प्रेरणा बनता हूँ ,माँ, पिता ,और एक भीड़ उसके कमरे में आगई जोर जोर से बधाइयाँ दीजाने लगी |


जीवन  ऐसा ही विचित्र है, यहाँ हम जिसपर गर्व करते है ,वह हमारा नहीं होता, हम जिसे अपना समझने की भूल करते है ,वह स्वप्न सा जान पड़ता है, हर सम्बंध, हर रिश्ता ,केवल अपने अपने लालच से हमसे जुड़ा होता है ,जिनके लिए हम सर्वस्व दांव  पर लगाए रखते है, वे भी एक पल में अपना रुख बदलकर खड़े होजाते है, क्योकि उन्हें यही डर  रहता है ,कही ये हमसे कुछ मांग न ले या उन्हें यह विश्वास होजाता है कि अब इनपर लूटने के लिए कुछ बांकी रह  ही नहीं गया है, वस्तुतः संसार का यही नियम है, कि  शक्ति के संचालन के  केवल एक शक्ति ही कार्य करती है , समाज राष्ट्र और संस्कृतियों को दिशा देने वाली शक्ति भी एक ही होती है और उसे समझना ही जीवन को प्राप्त करना है |


मनुष्य नितांत खोखला ,अधूरा और अपूर्ण ही है जन्म से वह अबोध ,बेसहारा और अप्रिय ही होता है मगर समय समाज और प्रकृति की शक्तियां उसका सकारात्मक निर्माण आरम्भ करती है , वह अपने अबोध काल में हर परिस्थिति से लड़ना , संघर्ष करना , रोरोकर अपनी परिस्थिति को व्यक्त करना सब सीख़ लेता है मगर इस समय उसमे बोर होना , अच्छा न लगना ,नैराश्य , ग़म ,धोखा ,और झूठ फरेब कुटिलता जैसे व्यवहार होते ही नहीं है ,हम बड़े होने के साथ जो हम पर है नहीं उसे अपने में आरोपित करने में लग जाते है ,मतलब यह कि आवरण पर आवरण और अपने को सुपीरियर बनाते बनाते स्वयं ही ख़त्म होजाते है ,अपने व्यक्तित्व से अपने कृतित्व से अपने संस्कारों और आदर्शों से स्वयं शून्य होजाते है , फिर सुपीरियोरिटी के लिए किये प्रयास जीवन भर उसे कॉम्प्लेक्स ही बनाये रखते है और जीवन से सकारात्मक  ऊर्जा स्वतः ख़त्म होजाती है |



लक्ष्य तो जीवन का मनोबल है आप जब भी जीवन के हर आते हुए समय को लक्ष्य से नहीं बांधेगे तो जीवन आपको अपनी नकारात्मकताओं  सामने खड़ा करदेगा ,हर रोज आप एक नया विकल्प ढूढेंगे और हर बार आपके पास कोई ठोस योजना होगी नहीं ,समय के महत्व और भविष्य की कल्पनाएं आपकी अकर्मण्यता के सामने समस्या बनी रहेंगी और आप समस्या , मन , बोरियत , अभाव और अन्याय का रोना रोते रहेंगे ,मगर इसके मूल में केवल यही सत्य रहा कि आपके पास भविष्य के लिए कोई सकारात्मक विचार , योजना ,लक्ष्य नहीं था और आप यह सत्य जानिये कि बिनालक्ष्य का जीवन उस मृतप्रायः जीव की तरह है ,जिसका शव तक विषाक्त होगया है ,और जो किसी को जीवन देने के योग्य नहीं रहगया है |


लक्ष्य के साथ प्रयत्न का संकल्प  अवश्य करें , मित्रों समय सबसे बहुमूल्य और कीमती चीज है जीवन में  और उसे यदि जीवन के हित  सार्थक उपयोग में लाना है ,तो आपको लक्ष्य और सार्थक प्रयत्न के संकल्पों का सहारा अवश्य लेना होगा ,क्योकि ध्यान रहे की आप जिस जीवन की नाव को लेकर चल रहे है ,उसकी पतवार किसी और के हाथ है, आपके पास केवल एक विचार है कि  आप उसका सकारात्मक उपयोग कर सके तो सफल ,अन्यथा आपभी ९९%जन सैलाब की   तरह   रहजायेंगे जिसके पास केवल भौतिक वादी सोच रही ,उसका आंकलन केवल धन ,बिल्डिंग , जमीन जायदाद से सम्बंधित रहा, वह यह भूल ही गया कि इन सबके प्रयोग के बाद जीवन फैसला करेगा कि यह तमाम समय आपने केवल व्यर्थ के कामों में व्यतीत किया है ,इससे मन के संतोष आत्मा की शान्ति से कोई मतलब ही नहीं है और जीवन आपको असफल सिद्ध कर देगा |



निम्न  का प्रयोग अवश्य करें

  • सुपीरियर ,इन्फीरियर दौनो ऋणात्मक  विचार है और दौनो को अपनाने वाला अपने आपमें खोखला पन लेकर जीवन को झुठलाने का प्रयत्न करता रहता है मगर एक दिन वहीजीवन  उसे नाकारा सिद्ध कर देता है | 
  •  स्वयं को और  कुछ बताना छोड़ दें ,जबतक आप स्वयं अपना साक्षत्कार   करके अपने आपको स्वीकार नहीं कर पाएंगे ,तबतक आप अपने आपको कभी कुछ कभी कुछ बताते ही रहेंगे | 
  • स्वयं से और अपने गुरु से जो असत्य और झूठ बोलने की प्रक्रिया में लगने लगते है उन्हें बार बार स्वयं के कार्यों के लिए ही पछताना होता है ,अतः स्वयं से और गुरु से अपनी हर त्रुटि को बताते रहे | 
  • जीवन को बिनालक्ष्य के छोड़ने का मतलब यह है  कि , आपको पतन के उस रास्ते पर लेजायेगा जहाँ से आपको सफलता के लिए शून्य से प्रयत्न करने होंगे | 
  • भविष्य और वर्तमान को खराब मत बताओ कठिनाई , धोखा , हादसा इसलिए आपके सामने है कि आप एक नए मनोयोग से स्वयं को सिद्ध करने का प्रयत्न करें , सफलता आपको ही मिलेगी | 
  • बोर , बेमन ,टेंशन ,नैराश्य , भय और ग़म  इस बात का प्रतीक है की आपके सामने लक्ष्य पूरी निष्ठां से नहीं बना पाए है या उसके क्रियान्वयन में आपने कोई कार्य नही किया है और आप ईश्वर पर कोई विशवास नहीं करते है यदि आप स्वयं को इन सकारात्मकताओं से सजा लें तो ये नाकारात्मकताएं स्वयं ख़त्म हो जाएंगी | 
  • न्याय के लिए स्वयं अपने परिश्रम और लक्ष्य पर निर्भर रहें यहाँ सांसारिक लोग आपसे लाभ उठाना , अपने को बड़ा बताने के लिए आपका प्रयोग और आपके शोषण से जुड़े है आपको अकेले ही मान दंड स्थापित करने है || 
  • सहारों की जरूरत गिरते हुओं को होती है आप स्वयं अपनी सकारात्मकताओं और उस सर्वशक्तिमान से स्वयं को जोड़कर अपने लक्ष्य बनाये और पूरी ताकत से उसे क्रियान्वित करें सारी  सफलताएं आपको ही मिलेंगी | 
  • स्वयं को कभी भी शक्ति हीन , अभावों में और समस्या में मत महसूस करें यही विचारकारें कि जीवन की हर समस्या में आपने अच्छे निर्णय और प्रयत्न करके जीत हासिल की है और यहाँ भी हम जीत हासिल करेंगे | 
  • जो त्रुटियां जीवन ने हमे बताई  है उन्हें दुबारा न करें , हर गलती से सबक लेकर आगे बढ़ने का संकल्प अवश्य करें जीवन की हर विजय आपकी ही होगी | 
  • नकारात्मक , नैराश्य और क्लेषकारी व्यक्तित्व को अपने विचारों से निकाल दें अन्यथा आपकी हर विकास की सोच में आपकी क्रियान्वयन्ता को ये नष्ट भृष्ट कर देंगे ,वर्तमान , लक्ष्य , और सफलता आपकी यही सोच हो |




Sunday, November 6, 2016

Success will be yours one day एक दिन सफलता तुम्हारी ही होगी

Success will be yours one day
एक दिन सफलता तुम्हारी ही होगी
एक सत्य घटना
श्रेय का परिवार मध्यम ही था, दो बहिनें बड़ी थी शादी हो चुकी थी, तीन  भाई और थे, उनकी अपनी अपनी दुनिया थी, पिता रिटायर ,माँ घर में ही काम काज करती थी और वह बहुत आधुनिकता के साथ समाज में उन्हें उनके काम के लिए काफी सराहना मिलती थी ,कम्प्यूटर का एक  डिप्लोमा  करने के बाद  श्रेय  और पढने का अवसर ही नहीं मिला ,शादी जबरन करदी गई ,दो बच्चों  के साथ वह एक संघर्ष भरी दुनियां में अकेला था ,सबके साथ होते हुए भी, श्रेय ने एक कम्प्यूट घर में ही लगाकर कुछ कुछ काम चालू किया , परिवार की  आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी  भी नहीं थी ,बस गुजारा चल  जाता था । पूरे परिवार में सारे भाई अपने अपने कामों में लगे ,अपना अपना खर्च खुद उठा रहे थे पिता को जब तब जिसकी सहायता करनी होती थी करते ही रहते थे , कुल मिला कर सब एक साथ रहते हुए भी अपने अपने परिवारों के साथ सीमित आय में  गुजारा कररहे थे |

श्रेय की उम्र भी ३० -३२ के करीब थी एक बच्ची और बच्चा था उसके पास आय के स्त्रोत दिन ब दिन  खर्चों के सामने काम होते जा रहे थे परिवार के सदस्योंकी सहानुभूति भी अब ख़त्म हो गई थी खर्चा जीवन को उदासीन और नैराश्य के उच्चतम शिखर पर पहुँचा  गया था , माता पिता को छोड़कर सब लोग उसे तिरस्कृत दृष्टी से देखते थे एक अन बोला अपमान सहा था श्रेय ने  परिवारके सदस्यों  तक से ,अकेले कम्प्यूटर से आने वाली आय बहुत कम  पड़ने लगी थी ,, अनेकों उपाय और व्यवसाय किये उसने ,मगर सारे उपाय व्यर्थ हुए , साधन हीनता ने उसे  अवश्य सिखा  दियाथा कि अपने कम्प्यूटर के ख़राब होजाने पर उसकी  मरम्मत खुद कैसे करे ,कैसे डाटा सेव  करे, कैसे नष्ट डाटा को पुनः प्राप्त करे, और कैसे अपना काम बिना ज्यादा खर्च किये पूरा करें ,कैसे प्रोग्रेममिंग ,साइट्स बनाना और नया कार्यक्रम बनाने की प्रक्रिया पूरी की जाए ,और कैसे हार्डवेयर का काम घर में ही करके कम्प्युटर को दुरस्त किया जाए , ये सब उसे उसकी साधन हीनता ने हीसिखाया और समझाया था ।

एक बार श्रेय परेशान होकर अपने गुरु के पास पंहुचा , बहुत परेशान और हारा हुआ सा ,उसने कहा अब मैं  सब कुछ छोड़कर   व्यवसाय करना चाहता हूँ , कोई  कच्चा उत्पाद दिल्ली से  लाया जाएगा और उसे पैक्ड करके घर घर बेचने का प्रयत्न करूंगा , वैसे पहले भी मैं  कई व्यवसायों में असफल होता रहा हूँ ,गुरुने कहना आरंभ किया पुत्र आप अपनी समस्याओं से इतना  प्रभावित हो कि  आप अपनी  कार्यकारी शक्ति का भी प्रयोग नहीं कर पा रहे है परिणाम  सफलता भी प्रश्न वाचक होगी है , अब आप यह समझलो कि आप जिस कार्य में पारंगत हो उसमे ही काम चालूकरें आपको जो थोड़ा बहुत कम्प्युटर आता है ,आप उसकी ही कोई छोटी नॉकरी करो और स्वयंको सकारात्मक व्यक्तित्व में बदलो , हर आदमी आपसे बड़ा विद्वान और कुछ सीखने योग्य है ,इसे ध्यान रखना एक नया जीवन तुम्हारा इंतज़ार कररहा है |


ईश्वर का इतना शुक्र था कि श्रेय को दिल्ली में एक कप्यूटर कंपनी में ८००० रूपए माह पर नॉकरी मिलगई , कुछ समय बाद गुरुने कहा पुत्र आप अपने प्रयास जारी रखे इस प्रकार नई  नोकरियों मेजाते हुए वह १२०००,१८०००,
२४००० , ४००००  ७०००० रुपयों के वेतन पर काम करता रहा और आज वह एक कंपनी का प्रमुख विश्लेषक है जिसका काम जटिलतम , नष्ट  प्रायः कम्यूटर से डाटा निकालने का है, आज अनेक देशों की यात्रा करके स्वयं को सिद्ध कर चुका  है हमारा श्रेय , परिवार समाज में उसका एक अलग और ऊँचा स्थान है

 मनुष्य का उत्थान और पतन उसकी ही सोच का एक साश्वत परिणाम  है, वह स्वयं को जैसा बनाना चाहता है उसमें उसकी सोच ,क्रियान्वयन ,एवम  भविष्य और अतीतके विचार उसे प्रभावित करते रहते है , हर कार्य नियोजित और निश्चित प्रक्रिया में होना चाहिए ऐसा मानने वाले यह नहीं जानते कि , जब भविष्य की घटनाएं , उम्र , परिस्थितियां और भविष्य का हर पल अनिश्चित है और उसमे धनात्मक और ऋणात्मक चिंतन के दो द्वार है ,तो हर बार हम ऋणात्मकता के द्वार खोलकर कही स्वयं को नाकारा सिद्ध तो नहीं कररहे है ,यदि समय की मान्यता के साथ आपने स्वयं को धनात्मक आधारों पर सिद्ध  नहीं किया तो आप सफलताको केवल एक स्वप्न मानकर व्यवहार करते रहेंगे और हर बार जब  का ध्यान आएगा वह हमें मुंह चिढ़ाती दिखेगी, क्योकि हम अपनी सफलता के उद्देश्य से अधिक अपनी समस्याओं को महत्व देते रहे |


सम्पूर्ण परिस्थितियां सामान्य  होने पर ही आप अपनी सफलता के उद्देश्य के लिए  प्रयास रत होंगे, या सम्पूर्ण समाज कार्य क्षेत्र परिस्थिति सामान्य होजाने पर ही जीवन की विकास यात्रा चालू कीजाएगी, ये सारे विचार  और जीवन को  धोखा देने  वाले है क्योकि जीवन कभी  भी सहज और  शांत होता ही नहीं है, हर रोज एक नया अध्याय  अधिक प्रबल होकर अपनी परिस्थिति समस्या को पूर्ण करने की मांग करेगा और जीवन का आधार भूत उद्देश्य फिर हारने लगेगा, आपकी आवश्यकता यह हो कि  आप पूरी कठोरता के साथ अपने आपको  नियोजन के नियमों में बांधें ,साथ ही हर उद्देश्य के लिए विकल्प जरूर रखें, जिसने भी  विपरीत स्थितियों में  स्वयं को सिद्ध किया है ,उसे  जीवन का पूर्ण संतोष अवश्य प्राप्त होगा, क्योकि अपने कार्य  से  मूल्यांकन में यदि सहज संतोष  प्राप्त होना और किसी से  शिकायत न  होना ,ही इस बात का प्रतीक है कि ,  आप जीवन को भी सफल सिद्ध कर चुके है चुके है|

हजारों रुकावटें , अनिश्चितताएं ,  अज्ञात भविष्य ,और  अपने ऋणात्मक आकलन के शिकार हम बहुधा अपने  लक्ष्य के लिये ही बहुत सारी  समस्याएं पैदा कर  लेते है ,अपने आपको  यह समझने का प्रयत्न अवश्य करें कि जीवन में जिन समस्याओं से हम स्वयं की क्रियान्वयनता ख़त्म करके खड़े होने को है ,वह स्वयं एक  हार की निशानी है ,किसीभी हालात में अपने आपको दोषारोपित किये बगैर स्वयं को सिद्ध करना ही जीवन का सही मायने है ,अपनेआपको कृतसंकल्पित रखें ,एवं लक्ष्य की और बढ़ने का प्रयत्न अवश्य करें ,जिससे बाह्य ऋणात्मकता  अधिक प्रभावित नहीं कर सकेगी |

 लक्ष्य के साथ समाज अपने परिवेश से सामंजस्य बनाना भी अति आवश्यक है यदि आप अपने आस पास के लोगों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना जानते तो निश्चिततः उनकी  नकारात्मकता हम पर असर करने लगेगी रामतीर्थ से एक शिष्य ने पूछा  कि  एक मित्र मुझ पर थूकता है, गुरु ने कहा दूर हट  जाओ ,वो फिर भी थूके तो ,और दूर हट  जाओ वो और आगे आके थूके तो गुरु बोले पुत्र आपके पास आपका लक्ष्य है ,और वह मशक से तो थूक नहीं रहा है ,अपना सब्र  बनाये रखो, उसकी गति विधि आपको अपने मन बुद्धि से हटा न पायी तो आपका सफल होना तय है ,अपने लक्ष्य का ध्यान और एक बड़े सब्र के साथ आपको अपना लक्ष्य अवश्य मिल सकता है |



निम्न पर भी ध्यान रखने का प्रयत्न करें

  • स्वयं को सकारात्मक रखने का प्रयत्न करें , किसी भी परिस्थिति में स्वयं को नकारात्मक न होने दें अन्यथा आने वाला समय भी उस नकारात्मकता का शिकार हो जाएगा | 
  • जीवन में जिस लक्ष्य के प्रति हम संकल्पित है उसे हर परिस्थिति में पूर्ण करने का भाव रखे यह आपको अपने संकल्प में जीत अवश्य देगा | 
  • स्वयं के लिए एक निर्धारित योजना अवश्य रखें और हर हाल में उसे पूर्ण करने का प्रयत्न अवश्य करें क्योकि यही योजना आपके समयबद्ध विकास को गति देगी | 
  • लक्ष्य के क्रियान्वयन के लिए एक विकल्प अवश्य रखें जो अपरिहार्य स्थिति में आपको सिद्ध करने में अधिक महत्व पूर्ण सिद्ध होगा 
  •  सकारात्मक चिंतन करते समय दूसरों से स्वयं को छोटा सिद्ध करने का प्रयत्न न करें अन्यथा आपअपने लक्ष्य से भटक कर अपनी नकारात्मकता पर पहुँच जाएंगे | 
  • अपनी सुविधा और अपनी रूचि के लिए अपने लक्ष्य से समायोजन नहीं करे ,आपयह जान लें की जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं के लक्ष्य को पूर्ण करना ही है | 
  • क्रोध एवं दूसरों का आंकलन बिलकुल नहीं करें क्योकि दौनों ही से आप अपने लक्ष्य से दूर  होकर वैसी ही नाकारात्मकताएं पैदा करलेंगे जो सामने वाले में है | 
  • नकारात्मकता और सकारात्मकता का भेद समय समय पर अपने जीवन मूल्यों के साथ परखते रहें जो हमे बहुत अच्छा लगता है वो हमेशा ठीक नहीं होता है | 
  • गरीबी ,अभावहीनता , परिवार एवं जाति  की निम्नता ,आपके मार्ग में बाधक नहीं हो सकती ,बशर्ते आप स्वयं का चिंतन सकारात्मक रूप में करसकें | 
  • दूसरों की कमियां को दर्शाने का प्रयत्न न करें स्वयं उनकी आलोचनाओं से बचकर रहें इससे आपके व्यक्तित्व में सकारात्मकता स्वयं आने लगेगी | 
  • आप दूसरों की दृष्टी में क्या है यदि यह सकारात्मक है तो आपके लक्ष्यों और उपलब्धियों में स्वयं सकारात्मकता आजायेगी |




Sunday, September 4, 2016

सफलता का मूल मंत्र है स्वयं का साक्षी भाव self witness is basic mantra of success


 सफलता का मूल मंत्र है स्वयं का साक्षी  भाव

self witness is basic mantra of success

मेरा जन्म राजिस्थान के बहुत बड़े राज घराने में हुआ था हजारों नॉकर चाकर दास -दासियाँ और बड़े बड़े राज प्रासाद थे मुझ पर ,रोज बहुत बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था , सुन्दर अति योग्य नृत्यकियॉं अपनी  अपनी कला को ऐसे जीती थी जैसे भगवान् ने उनको सीधा कला के सारे मानदंड देकर पैदा कर दिया हो , युद्ध , वीरता , पुरूस्कार सजा और आक्रमण तथा बंदी बनाकर फांसी क़त्ल और खजाने लूटते लूटते हम सब अपनी आधार भूत दया ,करुणा और अपरिग्रह जैसे शब्दों से काफी दूर निकल आये थे| 

 हर अच्छी लगने वाली चीज लूट ली जाए , हर ख़ूबसूरत वस्तु उनकी अपनी हो और न्याय का आशय वो हो जो हमे अच्छा लगे , इन्ही संस्कारों में पला बढा मैं एक निरंकुश ,विलासी बाद दिमाग और खुद को सर्व शक्तिमान मानने वाला था ,मैं राजा का एक मात्र पुत्र था, एक बार एक युद्ध में मुझे भी जाना पड़ा ,बड़ी वीरता और शौर्य से लड़ी मैंने अपनी लड़ाई और युद्ध जीत कर घर लौटा , सारे राज्य में बड़ी खुशियां मनाई गई और शराब के नशे में  मैं अचानक एक हाथी से फिसल गया  और जबतक संभल पाता कि  एक हाथी के पाँव से चोटिल होगया ,पूरा बदन दर्द से भर गया, मालूम यह हुआ की मेरा कमर से नीचे का बदन सुन्न हो गया है , वैद्य  हकीम दुआ करने वाले पूजा करने वाले सब लगे थे , कही से तो कुछ अंतर आजाये ,मगर सब बेकार हुआ ,मैं  एक अपाहिज की तरह महल के एक कौन में डाल दिया गया , पिता को सलाह दी गई की आप दूसरी शादी करके वंश बढ़ाये काफी कुछ  ना हां करके वो तैयार होगये | समय बढ़ता गया अब तो दो वर्ष भी होगये थे मुझे अपनी हालात पर रोते रोते , बेहद कमजोर ,लाचार और अपनी मौत को पल पल जीता  हुआ मैं | 

अपने अकेले कमरेमे अलग अलग भाव, मेरे दुश्मन बन गए थे, कभी मुझे लगता की मुझे खुश करने में असमर्थ एक ख़ूबसूरत दासी को पिता ने दंड स्वरुप हाथी के पैर  से कुचलवा दिया ,हजारों दास - दासियों को अपनी हवस में हमने फांसी चढ़ावा दीथी  ,अनेक वीरों को बहुत अच्छा प्रदर्शन करता देख मैंने अपने हाथों मौत के घात उतार दिया था ,क्योकि वे मुझसे अधिक वीर थे , हर अच्छी चीज का उपयोग मैं  ही करूँ ,इस हविश ने मुझे एक क़ातिल ,दुरा चारी  और सिरफिरे राजकुमार की तरह पेश कर दिया था ,और मैं  इससे भी अधिक आतातायी की शक़्ल  में नजर आने लगा था खुद को | 

डॉक्टर वैद्य हकीमों ने सारी आशाएं छोड़ दी थी ,दासियाँ दास सेवक सेवा में लगे थे, मगर कोई ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था ,   एक परिवर्तन था  कि खाना प्रतिबंधित था , शराब मांस ,गरिष्ट भोजन बंद हो गया था और दुनिया के सारे भगवान् मुझे अपनी और आकृष्ट कररहे थे ,आत्मा का साक्षी भाव  अंतिम समय देख कर पूर्ण रूपेण जाग चूका था , हर कर्म की सजा जीवन के इस रूप में देखते देखते मैं थक गया था , मैं  अपने दुष्कर्मों का एक मात्र गवाह  बना ,अपने दुष्कर्मों का प्रायश्चित कररहा था ,दिन ब दिन  अपने कर्मों से घृणा और अपने कर्मों की सीढ़ी पर चढ़ कर देखने पर अगला भविष्य मुझे बड़ा अन्धकार मय  दिखाई दे रहा था ,अब  मैं स्वयंका हर कर्त्तव्य पर आंकलन कररहा था ,कि अब कोई भूल न हो हर वक्त अपना मूल्यांकन करते   हुए मन बार बार अपने किये  पर रुआंसा हो जाता था, कई कसमें खाता था क्षमा मांगता था,मगर अब क्या॥ 

एक दिन एक फ़क़ीर राजा से आज्ञा मांग कर  मेरे पास पहुंचा ,वह मुझसे बोला  कि 
 पुत्र ईश्वर क्या है  --- मैंने कहा सत्कर्म और आदर्श ,
 वो बोला दुष्कर्म क्या है मैंने कहा वो तो अकाट्य भोग्य है  ,जिसे सबको भुगतना है ,
 उसने कहा जीवनक्या है ,मैंने  कहा  स्वयं को सिद्ध करने का माध्यम है , 
उसने कहा फिर भ्रम क्या था ,मैंने कहा लालच , जीवन को न समझ पाना और खुद को अमर समझना ही भ्रम था , उसने कहा कि सर्व शक्तिमान कौन है मैंने कहा  ईश्वर , खुदा ,और प्रकृति,और  आत्मा तथा  सकारात्मक भाव ,
 उसने  पूछा मैं ईश्वर को नहीं मानता, तो किसको मानूँ सबसे शक्तिशाली ,मैंने कहा हे देव आप अपने कर्म सकारात्मक भाव , और अपने उस साक्षी भाव को  ईश्वर मानते है और हर पल उसमे ही विद्यमान है वही ईश्वर है और उसके लिए सब कुछ संभव है , 
साधु हंसा और बोला पिछले२ वर्षों   में तुमने जीवन का क्या अनुभव सीखा ,मैंने कहा  देव ऐसा लगा कि मैं  एक राक्षस योनि से निकालकर ,देव योनि में आगया हूँ ,और अपने दुष्कर्मों के साथ मारने जा रहा हूँ 
 साधु में स्वयं को कैसे और किस विधि से जागृत किया जा सकता है , मैंने कहा वह  साक्षी भाव है  ,जिसके निरंतर चिंतन से मैं इस सोच तक आया हूँ ,
साधु ने कहा  पुत्र ठीक है मैं  भी तुम्हारे साक्षी भाव में तुम्हे बचाने की आर्त नाद सुनकर आयाहूं , यह कहकर साधु ने मुझे एक पाउडर दिया कड़वा ,मेरे पूरे शरीर में कपकपाहट पैदा हो गई ,साधु ने चिल्लाकर कहा उठो और दरवाजा खोलो , मैं  कापते हुए उठा और दरवाजा खोल दिया, साधु ने कहाअब तुम ठीक हो गए हो पुत्र, इस साक्षी भाव के साथ ही जीना ,कि  परमात्मा हर पल तुम्हारे साथ तुम्हारा आंकलन कररहा है ,यह कहकर साधू चला गया ,और मैं  एक कुशल शासक बना जीवन की हर स्थिति भाव से अपने साक्षी भाव के साथ जीवित हूँ, हर पल की सजगता के साथ, कि कहीं कोई कर्म मुझे असफल  सिद्ध न कर दे || 

जीवन को जीकर राम, कृष्ण  ने यह सिद्ध कर दिया, की यदि आदर्शों के  शिखर पर अपने मानदंड बनादिये जाए तो इंसान भी स्वयं ईश्वर बन सकता है , यहाँ जीवन का वह भाव काम करता है ,जिसे परमार्थ की तराजू ने सबसे ऊपर तौला है, वह तो यही सीखा पाया कि, आप जितना सुखी और प्रसन्न रहना चाहते हो, आप दूसरों को उतना ही प्रसन्नकरना सीखिये ,अन्यथा आप स्वयं की स्वयं से दौड़ में भी हार जायेगे, क्योकि आपकी आत्मा ही सिद्ध कर देगी कि आप यह रेस हार चुके है | क्योकि जब भी मैं  कुछ करता हूँ ,मेरा साक्षी भाव निर्णायक होकर मुझ पर अपना फैसला सुना देता है ,हो सकता है कि तात्कालिक स्थिति में वह फैसला  मुझे सुनाई न दे, मगर एक दिन वह अपनी सत्यता के साथ मेरा ही भोग्य बन कर मुझे मिल जाता है | 



 जीने का तरीका ही हमे सुख दुःख जय पराजय और दुःख और तमाम नकारात्मकताओं के द्वार पर लेजाकर खड़ा करदेता है हमारे सामने सफलताएं  खड़ी हमारा इंतज़ार कररही होती है और हम  उनका ध्यान ही नहीं रखपाते क्योकि जीवन की प्राथमिकताएं  ही हम ध्यान में नहीं रख पाते , जीवन के बाह्य तत्वों पर ही उलझ कर सत्य को पूर्णतः भुला देते है हमारे सामने झूठे संबंद्ध , शारीरिक आपूर्तियां , भौतिक संसाधन , और कैसे भी जो अच्छा लगा वो छीनने की पृवृत्ति इतनी प्रबल होती है की हम केवल स्वयं तक सीमित होकर रह जाते है , हमारा अपना मन आत्मा और आदर्शों का यहाँ तो सवाल ही नहीं उठता , कालांतर में जब , जीवन अपने उत्तरार्ध को जाने को होता है तब हर कर्म आपसे  अपना औचित्य प्रश्न दागता है , परन्तु जीवन पर कुछ होता ही नहीं है उत्तर के रूप में , क्योकि वह अगले जन्म में भी अपने साक्षी भाव से दूर जन्म लेता ररहेगा  रहेगा किन्तु कभी उस सत्य तक नहीं पहुँच पायेगा जिसके लिए उसने जन्म लिया था ,यदा -कदा जीवन आप्टे कठोर ठोकरों से इस भाव को अवश्य समझा देता है | 


जीवन के समक्ष बहुत सारी  उपलब्धियां है ,कुछ बेस्वाद , बेरंग,  भाव शून्य सत्य है ,जो बताते है कि यही जीवन का वास्तविक सत्य है ,जिसमें आपको ही रंग भरने है मगर दूसरी ओर  रंग ,मस्ती,  वासनाएं , राग ,द्वेष, और विलासिताओंका साम्राज्य है नशीली भाव भंगिमाएं है रूप ,सौंदर्य ,  काम- क्रोध -लोभ- मोह  मत्सर और अनगिनत विमोहित करने वाले विषय बिखरे पड़े है तो ऐसे में सत्य आदर्श और शून्य ता का प्रश्न ही कहा है, यहाँ तो संसार को पूर्ण भाव से जानने का भाव का मतलब है संसार का जितना उपयोग हो करलें , जीवन पर उसका ही अधिकार है और यही उसका चिरंजीवी भविष्य है , जबकि इसमें कुछ भी सत्य है ही नहीं ,जब वासनाओं , काम क्रोध मोह लोभ के तूफ़ान उतार पर होते है तब जीवन शेष ही कहाँ होता है  वहां तो जाता हुआ समय सबकुछ में एक ऐसी आग लगा कर जाता है जिसका पश्चाताप का धुंआ देर तक धधकता रहता है , और जीवन अपनी गलतियों को अपने साक्षी भाव से देखता रहता है | 


 भाव का आशय है अपने  हर कर्त्तव्य  क्रियान्वयन और जीवन की गति पर पैनी नजर बनाये रखें , हर पल हर घड़ी एक नए क्रियान्वयन की मांग करता है मन अपनी आपूर्तियों  की और सोचता है और आत्मा अपने सत्य और उसके परिणामों का भय दिखाती है , भावा वेश में कभी मन जीतता है तो आत्मा बिना समय गवाये उसे आरोपी सिद्ध कर देती है और
  जैसे ही वह आदर्श कार्यों में आती है वह उसे प्रोत्साहित करती है इतना प्रोत्साहन जिसे दुनिया की किसी चीज से नही खरीद जा सकेगा , इसी लिए  नानक, महावीर , रामतीर्थ विवेक नन्द अरस्तु , टालस्टाय ,ईसा मोहम्मद , साईं और अनगिनत ऐसे संत फ़कीर हुए जिन्होंने स्वयं को साक्षी भाव के बंधन से इतना अच्छीतरह बाँध लिया था कि  वे स्वयं ईश्वर होगये ,क्योकि उनका साक्षी भाव उन्हें जिस दिशा में कर्त्तव्य के लिए प्रेरित करता रहा जिस ओर कोई भूला भटक ही जा पाता है, और यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी थी | 


         इन सबका भी प्रयोग करके देखें 


  • कर्म के दो भाग है प्रथम शरीर के लिए और दूसरा आत्मा के लिए ,ध्यान रहे कि   आप  न तो शरीर है, न ही आप मन है, जो आपको देख रहा है, निरंतर आपका आंकलन कररहा है, वह  अलग है ,जो आपको जन्मते मरते और उसके बाद भी देखता रहता है उसकी उपस्थिति को महसूस कीजिये ,की वह आपके हर कर्त्तव्य में साथ है | 
  •  आपको स्वयम को सिद्ध करने के लिए भेजा गया है न कि  खो जाने के लिए आप यदि अपना लक्ष्य भूल कर दुनियां की रंग बिरंगी मृग मरीचिकाओं में उलझे रह गए तो निसंदेह आपको पश्चाताप करना होगा 
  • सुबह से शाम तक अपने किये हर कार्य का आंकलन करें , सांसारिक भोग्य का प्रयोग उतना ही हो जितना आवश्यक है , उसके बाद अपने पूर्ण लक्ष्य के लिए स्वयं पर नजर रखें।
  • संकल्प की साधना में आपका साक्षी भाव एकमात्र साधन है जो उसे पूर्ण या अपूर्ण कर सकता है क्योकि वही आपको स्वयं के बंधन में बांधने में सक्षम है | 
  • साधना एकाग्रता और संकल्प आपके साक्षी भाव का ही नाम है आप जब संकल्प को अपनी अंतरात्मा के सामने रखकर समय  बद्ध  आकलन करने लगते है तब साक्षी भाव अपना थोड़ा सा सहारा देता अवश्य है | 
  • ध्यान रहे साक्षी भाव  में न तो दुःख होता है न सुख होता है वह तो एक अडिग न्यायाधीश की तरह  स्थिर अडिग निष्प्रभावी भाव से हर पहलू का निर्णय करता रहता है यह बिना जाने की वह आपको अच्छा लगा या बुरा | 
  • आप सतत स्वयं के साक्षी भाव की निगरानी में है जो आपके  सी सी  टीवी कैमरा से हजारों गुना परिष्कृत है जो आगे के भाव और सोच की सकारात्मकता और नकारात्मकता का भी बखूबी से आंकलन कर देता है | 
  • स्वयं के साक्षी भाव को इतना प्रबल बनाएं कि आपके व्यक्तित्व की सारी नाकारात्मकताएं उसके सामने अपना अस्तित्व खोने लगें ध्यान रहे यही अभ्यास आपको एक दिन उच्च शिखर पर लेजायेगा | 
  • आपको केवल अपने साक्षी भाव पर नजर रखने की आवश्यकता है जैसे कोई हर पल आपकी निगरानी कररहा है अच्छा बुरा  जैसा भी कुछ है वो देख रहा है निर्णय अवश्य देगा बिना प्रभावित हुए | 
  • आपका साक्षी भाव आपको प्रसंशा दे ने लगे तो आप निश्चित समझिये की आपको दुनियां की सबसे अनमोल  सौगात प्राप्त हो गई है क्योंकि जीवन का परम संतोष साक्षी भाव के सकारात्मक होने में ही है| 

 मनुष्य के जन्म से पहले और मृत्यु केबाद तक उसका साक्षी भाव जागृत रहता है वह आपके सीसीटीवी कैमरों से लाखोंगुना परिष्कृत है जो आपके अतीत की हर कर्म की सजा और भविष्य की चेतना को कर्म से पूर्व ही चेतावनी देने लगती है , एक बार आपने इसकी उपस्थिति को पहिचान लिया तो सच मानिये आपको समय ऐसा ही सिद्ध करदेगा जैसे सफलता के हर मान दंड भगवान् ने आपके लिए ही बनाये हों

    Sunday, August 28, 2016

    सुख और दुःख क्या है what is pleasure and pain

    सुख और दुःख क्या है  what is pleasure and pain

    प्रशांत बहुत बड़ा वैज्ञानिक था अन्वेषण खोज और मानवीय सेवा के लिए कृत संकल्पित , वेतन बहुत ज्यादा नहीं था,  बस    पत्नी   और पुत्री   का काम चल जाता था , पत्नी भी पास के  स्कूल   में शिक्षिका थी, बच्चे  उसके ही विद्यालय में पढ़ते  थे  , पैतृक घर से भी आवश्यक सहयोग समय समय पर मिलता रहता था , कहने का मतलब यह की परिवार संतोष जनक स्थिति में अपना काम चला रहा था , और यदाकदा पड़ने वाले कामों के लिए बचत भी खूब कर ली जाती थी, पैतृक मकान में निवास करते थे वे सब लोग , पैतृक मकान अब विकसित क्षेत्र में आने लगा था, बाजार माल और नए और बड़े  निर्माणों ने  घर  चारों और से घेर लिया था ,नयी बड़ी बड़ी गाड़ियों में अत्याधिक सजी धजी युवतियां लंबी लंबी गाड़ियों से निकलने लगी, और इन सबको देख कर प्रशांत  के मन में कुछ दिनों से मन में एक हीन भावना घर करनेलगी थीं ,अब हर घटना को वो गरीबी , अभावों , दुःख दर्द और तिरस्कार की नजर से देखने लगा ,अपना घर अपनी उपलब्धियां अपनी  आय उसे दुःख का कारण दिखाई देने  लगी,  सम्पूर्ण घर के परिवेश को आक्रोश अशांति और नकारात्मकता से भर कर खड़ा हो गया वह ,शान्ति सहयोग और सुख की पराकाष्ठा पर रहने वाला परिवार अचानक बिखरने के कगार पर आगया |
    एक दिन नैराश्य के महा सागर में डूबते हुए उसने पास बहती हुई नदी में छलांग लगा दी ,पेशन , और सारे लाभों का अधिकार पत्नी को देने को लिख भी गया था वह |२.६ वर्ष   बाद प्रशांत को जब कुछ याद आया तो उसने स्वयं को एक जंगली कबीले के रहवासियों के साथ खूब प्रसन्न पाया स्वयं को  वह   तंदुरुस्त दिखाई पड़ा, गौर वर्ण चिकनी मांसल देह और केवल एक लंगोटी पहने हुए ,  पूर्व की तुलना में लगभग २० किलो वजन बढ  गया था, उसे कबीले के सरदार ने बताया आपको गहरी बेहोशी की हालात में  हमने नदी से निकाला,  कबाइलियों ने चिकित्सा की , ओझाओं ने खून रस पेड़ पत्तियों के रस काढ़े और गोबर ,मिट्टी और लेपों से निरंतर इलाज किया गया ,मालिश ,लेप और दुआओं से आप जल्दी ही ठीक होगये ,ओझाओं ने बताया की आप भगवान् के भेजे हुए दूत है ,तब से आपको कबीले के मुखिया के यहाँ ही रखा गया, निरंतर सेवा में पूरा कबीला एक रहा है , इस २. वषों में आपको कोई नहीं हरा पाया ,आपने बड़े बड़े वीरों को हरा कर हमे बड़ी जीतें दिलाई है , आप बेहद खुश , प्रसन्न और ज़िंदा दिली से रहने वाले रहें है ,आज ऐसा लगता है की आपको याददाश्त याद  आने के साथ वो नैसर्गिक प्रसन्नता चिंता की लकीरों में बदलते देखा है हमने,
    प्रशांत ने स्वयं को कबीले का सरदार और एक बड़े साम्राज्य का सम्राट मान कर गौरवान्वित समझा ,आज पूरा कबीला उसके सामने नत  मस्तक खड़ा था , प्रशांत को सुख दुःख और उनके उद्भव बिंदु का सहज ही पता चल गया था वह जान गया था सुख और दुःख केवल कल्पनाओं के सहारे बढ़ने और घटने वाले सत्य है , घोर यातना और नाकारात्मकताएं यह बताने को पर्याप्त होती है कि  कहीं पास ही सहज सुरम्य और सुखद समय के आने की आहाट पास है है |

    दुःख और सुख तो हमारी चेतना की सकारात्मकता और नकारात्मकता की सोच का नाम है महान उपलब्धि को भी यदि आपने नकारात्मक परिवेश में सोचना आरम्भ किया तो वह अपना स्वाभाव बदलकर नकारात्मक प्रभाव देने लगती है और सकारात्मक चेतना में यद्ध की हार भी जीत की और एक सशक्त प्रायास मान लिया जाता है , शरीर मन बुद्धि के अनुसार दूसरों की तुक्ष्छ  उपलब्धियों को हम बड़ा मान बैठते है, औरस्वयं की बड़ी बड़ी सफलताओं को नकारात्मक भाव से असफल सिद्ध करने में लग जाते है ,फिर कैसे सुख पैदा हो पायेगा ,और कैसे जीवन की सुगंध तुम्हे सुवासित कर पायेगी

    भौतिक संसाधनों के ढेर पर बैठा आदमी स्वयं को इतनी बड़ी बड़ी आकांक्षाओं , कामनाओं औरसंसाधनों की लूट  में फंसा लेता है, जहां उसके हर प्रायास से प्राप्त उपलब्धियां छोटी दिखने लगती है, और और का भाव और प्रबल होकर खुद को ही तुच्छ साबित करने लगता है,  है और उसे ही हम दुःख मानने की भूल कर बैठते है ,  महत्व पूर्ण बात यह कि जो है ही नहीं ,उसकी कल्पना में वर्त्तमान के सुखों को छोटा बताने वाली पृवृत्ति, भी हमारे दुःख का एक बड़ा कारण है ,और इसे हम सुख और दुःख की परिभाषा में रखने का प्रयत्न  करते रहते है, जबकि इसका सुख और दुःख से कोई मतलब ही नहीं है|

    अंतर्मुखी भाव जबतक आत्मा को अपने स्वरुप में जानकार प्राप्त उपलब्धियों में संतुष्ट प्रसन्न रहता है ,तब तक उसकी चेतना  शांत शून्य और परम आनंद के भाव को बनाये रखने में सफल रहती है ,और जैसे ही वह बाह्य जगत के भौतिक संसाधनों से अपनी तुलना और कामनाएं करने लगता है ,वैसे ही उसके तमाम सुख संतोष और आनंद का क्षय स्वतः हो जाता है |

    तुलना का आधार दुःख का सबसे बड़ा कारण  है वह एक और अपनी उपलब्धियों को नगण्य साबित करने लगता है ,वही दूसरी और दूसरों की उपलब्धियों का आंकलन स्वयं के द्वेष जलन और तमाम नकारात्मकताओं के साथ करने लगता है, परिणाम फिर जैसे जैसे दूसरों का विकास विस्तार और वैभव की वृद्धि होती है, वैसे वैसे आत्मा का असंतोष और अधिक बढ़ने लगता है  ,और इसप्रकार धीरे धीरे उसके पास केवल इतनी नकारात्मकता शेष रहजाती है जिसमे उसका तमाम अस्तित्व केवल  तुलना -नकारात्मकता -और कभी न ख़त्म होने वाली हार का मायने बना बैठा रहजाता है , उसका दूसरों पर ही नहीं स्वयं पर  भी विश्वास  नहीं रह पाता ,वह स्वयं  नकारात्मक भाव बन कर रहजाता है |

    आदमी बड़ा विचित्र प्राणी है वह स्वयं को प्रमाणित करने के लिए तमाम काल्पनिक स्थितियों का निर्माण स्वयं करलेता है है एवं समयानुसार स्वयं को सहानुभूति का पात्र बना लेता है , वह सामान्य जीवन में ही स्वयं को बेचारा निरीह और आश्रय हीन  बताकर सबसे ढेरों सहानुभूति अर्जित करता रहता है , धीरे धीरे उसकी सम्पूर्ण गतिशीलता ख़त्म होने लगती है , जीवन उसे निरीह बेचारा बेबस और नाकारा सिद्ध करने लगता है  , हम अपने बल पौरुष और सम्पूर्ण शक्तियों को भूल कर स्वयं को बेचारा और निरीह बना बैठते है ,परिणाम हमारा अस्तित्व दया का पात्र बना एक भिखारी की तरह हो जाता है ,जिसमे संतोष और परम आनंद की शांति  कहाँ  है , आप झूठ फरेब  शोषण और नाकारा  होकर कैसे स्वयंम को श्रेष्ठ साबित कर सकेंगे यह प्रश्न चिन्ह है | यहाँ यह और महत्व पूर्ण है  जबतक आप समाज से स्वयं को बेचारा नाकारा और कमतर सिद्ध करेंगे, वह आपके साथ सहानुभूति दिखायेगा, और जैसे ही आप  अपनी शक्ति से उसके बराबर खड़े हो जाएंगे, वह प्रतिद्वंदी होकर आपको हराने और मिटाने में लग जाएगा |

      दुःख तो चिंतन के आयाम ही है न ,भिखारी के पास आया १००० का नोट  या एक सोने का टुकड़ा बहुत बड़ी खुशी का विषय है, धनवान के लिए वह तनिक सुख हो सकता है ,तुम अपने किसी मित्रके साथ समय गुजारों उसे सुख मानते हो , अपनी मनमर्जी से स्वछंदता से किये कार्यों को सुख मानते हो ,या आपका अस्तित्व झूठ फरेब और अपनी मर्जी के ऐशो आराम तथा अनियंत्रित स्वच्छन्दता को सुख मानते हो , जबकि वह किसी और की नकारात्मकता का कारण हो सकता है ,परंतु आपतो उसे सुख और अधिकार मानते है ,  भिखारी  का दुःख है उसके पास कुछ नहीं है उसे वो मिलजाए ,धनवान चिंतित है कही उसका धन चला न जाए,यानि कि सुख और दुःख गुजरते समय के वो आंकलन है जिसको समय ही सिद्ध कर सकता है, परन्तु समय ये डोर किसी एक को देने कोतैयार नहीं रहता समय काल और परिस्तिथि के साथ आज ये आपका है कल वह और किसी का   होगा |

    मित्रों हम शरीर, मन , और बाह्य संसाधनों में जो  बुद्धि से चाहते है उसे सुख और जो नहीं चाहते उसे दुःख कहते  है , , एक पुत्र अपने पिता की मृत्यु को दुःख मानता है ,दूसरा उसकी संपत्ति पर अधिकार के लिएमृत्यु को सुख मान बैठता है ,,एक संपत्ति  क्षय को दुःख  मानता  है दूसरा उसे लुटाते हुए सुख का अनुभव करता है ,एक सबके लिए जीकर  खुद को सुखी समझता है दूसरा  स्वार्थों के सहारे सुख बटोरना चाहता है ,एक  मान दंड पर परीक्षा दे  कर सुखी होता है ,दूसरा उसकी अवहेलना कर यह कहकर सुखी  कि  वो इतना  महान नहीं है ,कहने का आशय यह कि  हम बाह्य तत्वों की उपलब्धि, झूठे संबंधों की  प्राप्तियों को ही सुख मान बैठे है बैठे है ,जिसका सुख और दुःख से कोई सम्बन्ध ही  नहीं है |

    तुमने लाखों कपडे पहने उतारे और फेंक दिए , वस्तुएं तो वस्तुएं तुमने इंसानों को भी वस्तु की तरह प्रयोग कर फेक दिया और तुम जीवन भर यही सोचते रहे ,दूसरों से बटोरे सुख से तुम परम आनंद तक पहुँच जाओगे ,मगर तुम जिसे लूटकर आगे बढे ,वह भी तुमसे तुम्हारा चरित्र , व्यक्तित्व सत्य और उसकी पूर्ण चेतना छीन ले गया, परिणाम तुम्हारी दशा उस महान  सम्राट जैसी हुई ,जिसने अनगिनत खाजाने लूटने के बाद भी रेगिस्तान की आंधी में एक लावारिस की तरह जान देदी , जिसे सामान्य आदमी जैसा कफ़न भी नसीब नहीं हुआ अआप अधिक सुख की खोज में अपने को अँधेरे गड्ढे में दफ़न करने की साजिश कररहे है आप ।
    जो सुख दूसरों पर आधारित हुआ उससे तुम्हे केवल दुःख ही मिल सकता है हम समाज में खड़े एक दुसरे से प्रेम सुख और समृद्धि मांग रहे है मगर हमपर किसी पर भी वह है ही नहीं ,हम भिखारियों की तरह स्वयं को बादशाह बताने की चेष्टा कररहे है,जिसपर सुख है ही नहीं वो ,आपको क्या दे सकता है ,जो एक बार परम चेतना से सुख का मायने समझ जाता है तो ,सुख की मांग ही ख़त्म  होजाती है ,  फिर उस महासागर से आप कितना भी सुख प्राप्त करो उससे उसकी स्थिति में कोई अंतर ही नहीं पड़ता ,अतः  सुख सत्य और पवित्र चेतना का आधार बनाओ  खुद को, जो दूसरों को भी प्रकाशित कर सके |


    भारतीय दर्शन कहता है की एक पूर्ण चेतना हमारे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है और उसी परम शक्तिशाली चेतना का सूक्ष्म बिंदु हमारी चेतना में भी व्याप्त है , हम बाह्य सुखों के भ्रमजाल में उस चेतना का ध्यान ही नहीं कर पाते परिणाम जीवन स्वयं नष्ट भ्रष्ट होकर कई जन्मों तक अपनी शान्ति और परम आनंद की खोज में भटकता रहता है ,स्वयं की परम चेतना के साथ जिसने ब्रह्मांडीय चेतना को एक कर कर लिया ,वही मुक्त होकर परम आनंद का मायने बन पाया है ,जिसे सहजता , अंतर्मन की जिज्ञासाएं और सत्य का अनुभव है ,वही सबकी सुख की कामनाओं में स्वयं  को एकाग्र कर के जीवन की चेतना आनंद और परम रहस्य को पा सकता है, और वही मानव जीवन का लक्ष्य भी है

    निम्न का प्रयोग आपको अपने सत्य तक ले जाएगा

    • सुख का सच्चा अर्थ शारीरिक मानसिक आपूर्तियों का मायने नहीं अपितु मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य की प्राप्ति आपको वास्तविक सुख तक लेजा सकती है | 
    • निश्चित और अवश्यम्भावी घटनाये दुःख का कारण नहीं वरन परिवर्तन है , और यह दुःख का कारण न होकर नयी सृष्टि के लिए आवश्यक भी है | 
    • जीवन मृत्यु विवाह जन्म ये सब कुछ संस्कार है इनके बाद और भी संस्कार अस्तित्व में आने वाले है तो ये सब सुख दुःख के कारक नहीं हो सकते | 
    • सच्चा दुःख है अशिक्षित विद्यार्थी , कंजूस और लालची धनवान , योगी में ज्ञान की अल्पता , अपने जीवन में लक्ष्य तक न पहुँच पाना , और दूसरो का शोषण जो आपके भाग्य का निर्माण करेगा |  
    • विषयों और  भूख को और अपनी बेलगाम स्वच्छंदता को सुख न समझे, क्योकि यह बार बार अपनी अगली मांग के साथ यह आपको कमजोर और बीमार बनाता जाएगा | 
    • अत्याधिक सुख की कामनाएं करने का स्वाभाव भी एक बड़ी बीमारी है, जिसका इलाज आपको ही करना होगा क्योकि यहीं से आपको असंतोष पैदा  होता है | 
    • वे सम्पूर्ण आपूर्तियां जो थोड़े ही समय में फिर आपूर्ति चाहने लगती है वे सब बंधन है, उनकी सीमा तय करके प्रयोग करने से ही आप स्वयं को जीत सकते है | 
    • हम जिसे सुख कहरहे है उसका सुख से कोई लेना देना ही नहीं है क्षणिक सुख और हम जो चाहते है हम केवल उसे सुख मानते है जबकि स्वयं की एकाग्रता का भाव जिसमे स्वयं को विराट में एकाग्र कर सके वही परम सुख है | 
    • स्वयं के चिंतन और शरीर को साधने के लिए स्वयं को एकाग्र करें और उसे अपने आनंद एवम भविष्य के प्रयासों में लगादे परिणाम अधिक सफलता देंगे | 
    • मन बुद्धि आत्मा के साक्षात्कार के बाद अपनी चेतना को परम चेतना में शामिल होते देखने का स्वप्न देखे फिर संकल्प करें की चेतना को परम चेतना का द्वार मिल गया है आपकी सुख की यही सीढ़ी आपको अपना लक्ष्य देदेगी | 

    जीवन तो  एक ऐसा अथाह सागर था जिसमे भिखारी की भांति भटकते हुए अनायास ही मुझे बड़ा खाजाना मिलगया क्योकि मेरे लाख प्रयत्न के बाद भी मेरी गरीबी ख़त्म हुई नहीं अंत में मैंने अपने कर्तव्यों के साथ स्वयं को उस परमात्मा के सहारे छोड़ दिया , सत्य सहजता और कर्म के बदले सहजता में परमात्मा ने मुझे अथाह खजाना दे डाला जबकि मेरे सुख को अब उस खजाने की भी जरूरत नहीं थी


    Saturday, June 18, 2016

    सफलता बनाम समय बद्ध क्रियान्वयन Success vs time bound implementation

    सफलता बनाम समय बद्ध  क्रियान्वयन
    Success vs time bound implementation

    राजा शिवसेन के राज्य में  सुख शांति की कोई कमी नहीं थी , पूर्वजों की बेशुमार दौलत और विद्वान प्रजा प्रिय पिता का आशीर्वाद भी प्राप्त था ,उन्होंने ही अवस्था धर्म का पालन करते हुए शिव सेन को राज्य में गद्दी पर बैठाया था, पिता हमेशा शिव सेन को कहता, पुत्र जीवन बहुत छोटा है ,जो काम करना है शीघ्रता के साथ करो, समय सबसे बहुमूल्य है और वह लौट कर नहीं आना है ,इसलिए प्रजा के कल्याण के लिए अस्पताल ,शिक्षा , श्रम की व्यवस्था और सुरक्षा के साथ कल्याण कारी योजनाएं चलाओ ,जिससे तुम भी विश्वके  श्रेष्ठ  सम्राटों में से  एक बन सको , शिवसेन हमेशा उन्हें हाँ ,हूँ, करके अपनी विलासिता भरे जीवन में लिप्त रहता था ,आलस्य प्रमाद और विलासताओं का गुलाम बन हमेशा यही कहता रहता था, अरे अभी कौन मररहा हूँ मैं , ये सब काम बाद में करलूंगा और यही क्रम उसका जीवन भी बन गया था | 


    एक रात शिवसेन सो रहाथा कि अचानक उसने देखा कि चार काले कलूटे भारीबदन के पहलवान नुमा आदमी उसके पलंग के चारों और  खड़े है राजा ने पूछा कौन हो तुम वो बोले यम दूत है, शिव सेन तुम्हारा समय ख़त्म होगया है ,२० मिनट बाद चलना है  तुम्हें, राजा घबराया, चिल्लाया , अनुनय विनय किया , गिड़गिड़ाया बोल छोड़ दो मुझे मैंने अभी कुछ किया ही कहां है, पिता द्वारा बताए  बहुत से काम करने है, एक बार छोड़ दो ,यम दूतों ने कहा, अरे मूर्ख तेरे जैसे पापी बार बारईश्वर के यहाँ यह कहकर आते है कि ,हम अपने लक्ष्य पूरे करके परमार्थ में लगाएंगे जीवन और हर जन्म में यही पाप  दुष्कर्मों   में   लगे रहते  हो और  जन्म लेकर यातनाएं भोगते हो  , राजा दूतों से कहने लगा मैं  आपको बेशुमार दौलत दूंगा छोड़ दो मुझे ,यह सुनकर यमदूत मुस्कुराए , अरे पूरा खजाना देदूंगा , मुझे एक माह का समय देदो यमदूत हंसे, फिर राजा बोल अच्छा मेरे पूरा राज्य लेलो मुझे बस एक दिन का समय देदो, यमदूतों ने ठहाका लगाया  और एक ही पल में राजा  की आत्मा को लेकर यमलोक पहुँच गए | 


    वहां पहुँचते ही एक गम्भीर गुस्से वाली आवाज आयी ये किसे ले आये है आप, ये वो शिवसेन नहीं है ,राजा कुछ समझ पाता  उससे पहले उसे एक बड़े धक्के का अनुभव हुआ, आँख खुलने पर उसने देखा की सारे महल राज्य के निवासी रोरहे है ,या शोकाकुल खड़े है ,राजा का सारा बदन काँप रहा था ,मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी ,मगर वह समझ चुका था कि  धर्म ग्रन्थ ,पिता ,गुरु जिस समय के सद उपयोग की बात करते है ,वो क्या है ,राजा सोच रहा था कि जिन कार्यों को वह बाद में करने की बात करता था , कब आएगा वह समय किसी को नहीं मालूम ,आँखों से निरन्तर आँसूबह रहे थे ,वह यह भी सोचने लगा कि  कितना बहुमूल्य है समय का एक एक पल जिसके एक पल की कीमत मेरे जैसे  हजारों राज्यों से भी अधिक है ,अचानक वह उठा और पिता के चरण छूकर उनसे कहने लगा चलिए मुझे इसी पल से  परमार्थ के कार्यों में लगा दीजिये मैं एक पल भी व्यर्थ नहीं गवाना चाहता और अपने राजा  पिता और अपने लाव  लश्कर के साथ  अपने परमार्थ के वास्तविक लक्ष्य की और बढ़ गया था  | 


    आप जीवन  की एक स्वांस में १/१५ मिनट का जीवन जीते है ,इसप्रकार एक दिन में २१६०० स्वांस लेकर १०८ वर्ष तक जी सकते  है , यही वह गहन राज है ,जिसे समझना आवश्यक है ,कुत्ता एक मिनट में १३५ स्वास लेता है उसका जीवन १२  पूर्ण  हो जाता है ,इसी प्रकार कम स्वांस लेकर सर्प , कछुआ , पेड़ पौधे अपने स्वांस क्रम के हिसाब से हजारों वर्षों का जीवन पाते है , यही स्वांस एक छोटी इकाई है ,जीवन के समय के निर्धारण की और यहीं से जीवन के प्रत्येक लक्ष्य को सहज ही बाँधा जा सकता है शर्त यह है कि एक बार चिंतन कर यह निर्धारित अवश्य करें कि आपको हर पल का सकारात्मक एवं अधिकतम प्रयोग करना है | 


    महावीर नानक  मोहोम्मद ईसा सबने समय को  बाँध दिया और जिसका समय गुलाम हो बैठे ,वो तो काल जई हुआ ही   न , इन सबकी मान्यताएं समय को लेकर ही बनी रहीं ,महा वीर का स्पस्ट मानना था कि समय का दूसरा नाम काल है और जो समय  सकारात्मक  हुआ  था   वह सामयिकी हुआ ,और जिस समय के भाग को हमने व्यर्थ छोड़दिया है  , वही महां विष की   तरह  मृत्यु को प्राप्त  हो जाता है ,इसका ही भोग्य  हमें कालांतर में भुगतना  होता है , और जिस थोड़े समय का उपयोग हम सत्कार्यों और लक्ष्य कव अनुरुप करपाते है वही  अमृत्वको प्राप्त हो पाता है फिर तो आपको ही जीवन के अंत में यह निर्णय करना होगा कि , जीवन का कितना भाग आपने अमरत्व केरूप  में गुजारा  और कितना भाग मृत प्रायः हुआ  इसका  निर्णय   करना  ही होगा | 


    समय के बारे में भारतीय साहित्य ने बहुत कुछ लिखा है 
    •  मनुष  बड़ो नहीं  होत  है ,समय होत बलबान , भिल्लनि  लूटी गोपिका, वहि  अर्जुन वहि बाण
    • देखो समय बड़ा बलवान ,धनवानों को निर्धन करदे ,निर्धन को धनवान ,जंगलमे वो शहर बसा दे ,शहर करे वीरान 
    •  आदमी से ये कहो  कि वक्त से डरकर रहे , कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज़ 
    • देश काल अवसर अनुसारी , बोले राम भगत भय हारी 
    • छन सुख लाग जन्म सत  खोटी 
    मनुष्य ही नहीं देवताओं को भी समय की कसौटी पर खरा उतरना होता है और यह सिद्ध करना होता है की वो समय का सबसे श्रेष्ठ प्रयोग करने के कारण ही श्रेष्ठ साबित हुए है | यह समय वो है जो गांडीव धारी अर्जुन को वैभव और बलहीन कर देता है ,जिसका ध्यान भगवान राम भी रखकर कार्य करते है, यही समय कृष्ण  की जीवन शैली भी है ,अर्थात समय की आबद्धता के बगैर ब्रह्मांड का कोई कार्य सफल और सिद्ध नहीं हो सकता | 

    मनुष्य देह को सदैव से  नश्वर माना  गया है उसका नाश अवश्यम्भावी है, परन्तु  इसमें  ही अमृत्व घट छुपा है, शरीर नश्वर- चेतना --अनश्वर जो कार्य व्यर्थ हुआ वो मृत और जो सकारात्मक हुआ वो अमृत्व प्राप्त किया मना गया | इसी , प्रकार  धन संपत्ति भौतिक और अभौतिक वस्तुओं का संग्रह समय के साथ किया जा सकता है मगर सारी उपलब्धियां यह बताने में अक्षम है की आपके पास कितना समय बाकी है | जो कल गया वो मृत  जो  है  वह आंकलन है  जो आने वाला   है ,यदि वर्तमान की चेतना  को समय बद्ध करके सकारात्मक कर्मों में लगा दिया गया, तो सारी सफलताएं आपके सामने नत मस्तक हो जाएंगी | 

    मनुष्य जन्म के साथ आपके ऊपर कर्म  बंद्ध और स्वयं को सिद्ध करने का दायित्व स्वतः  आजाता है ,वह प्रारब्ध, क्रियमाण ,संचित  के फेर में अपने कर्त्तव्य को समय बद्ध  रूप में निभा पाया तो ,वह मुक्ति पथ पर पाया गया, और यदि यह समय का प्रयोग सही नहीं हो पाया तो, बार बार अपने अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक उसे ही भटकना होगा , क्योकि यहाँ आप नियत उद्देश्य से अपने कर्मों का हिसाब करने आये थे ,या लाभ कमाने --वहां आप तमाम सारा ऋण लेकर लौटे है ,तो यह ऋण आपको ही चुकाना है, इसका एक मात्र हल यही है कि हर पल को अपने उद्देश्य की आपूर्ति और सकारात्मक लक्ष्य में झोंक दे ,सारे लक्ष्य आपके सामने झुक कर आपको विजयी घोषित कर देंगे | 



     लगभग  25550  दिन जीने वाला इंसान ,लक्ष्य  विहीन ,व्यर्थ के कार्यों और काम क्रोध लोभ मोह  को साधने में ,जीवन के बहुमूल्य समय को निकालकर ,गहरे काँटों  के वन में उलझता चलाजाता है ,तब लक्ष्य का छूटता सफर अधिक कष्ट कारक होने लगता है ,वासनाओं और भौतिक लिप्साओं की आपूर्ति में संतोष प्राप्ति से पहले ही जीवन अपना उत्तरार्ध लेकर खड़ा होजाता है ,जो एक गहरा पश्चाताप और घबराहट नैराश्य छोड़ने लगता है ,जो अधिक कष्टकर होजाता है, आवश्यकता इस वात की थी कि  समय के एक छोटे भाग को भी यदि जीवन के सार्थक लक्ष्य के लिए जाग्रत करलिया जाए तो जीवन अपनी क्रियांवयन्ता पर प्रसन्न हो सकता है | 


    निम्न का प्रयोग करें 
    • जीवन को स्वासों ,दिन ,माहों और वर्षों का आंकलन दें और यह विचार करें उस आकलन में आप कहाँ खड़े है और क्या आप आज सकारात्मक रहें | 
    • सकारात्मक दृष्टिकोण के के साथ ही आपको जीवन की सफलता का मार्ग तय  करना है  क्योकि सकारात्मक जीवन शैली आपको आधी सफलता दे देती है | 
    • समय के केवल तीन प्रयोग होसकते है आवश्यक कार्य सकारात्मक कार्य और सामान्य कार्य सामान्य कार्य आपको कर्म बंधन में बांधेंगे ,सकारात्मक और लक्ष्य के प्रति जागरूकता आपको सफल सिद्ध करेगी | 
    • समय के महत्व को सदैव याद करतेरहे ,यह अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है इसमें अपनेलक्ष्य को सदैव याद रखना महत्वपूर्ण है | 
    • जाता हुआ समय  वास्तविक प्रसन्नता देकर जाएगा तो उसकी सार्थकता सिद्ध होगी और यदि वह आपको चिंता पश्चाताप और नकारात्मकता देकर जा रहा है तो सधार की आवश्यकता है | 
    • जीवन का प्रत्येक कार्य जरूरी है,  मगर आसक्ति , शोषण , शोषित होने की लत नकारात्मकता है उससे बच कर स्वयं की चेतना  में लौटकर ध्यान करें | 
    • समय का सदुपयोग -सकारात्मकता और उसकी सुरति ही का एक मार्ग है  लक्ष्य को साधने   के लिए यही   उद्देश्य है जिसे नित्य ध्यान देना आवश्यक है । 
    • समय को सामयिकी बनाकर अपने कल को सुधारने की चेष्टा करो ,उसे काल बनाकर व्यर्थ मत गवाओं  अन्यथा बार बार आपको अधिक भटकना होगा | 
    • बार बार समय को अपने लक्ष्य की सफलता के रूप में देखना सीखें ,धीरे धीरे ये सफलता आपके वास्तविक जीवन में कब उतर आएगी मालूम भी नहीं पड़ेगा | 

     जीवन तो अपने लक्ष्य की और जाती हुई कोई बड़ी रथ  यात्रा ही है न यहाँ पूर्ण चेतन से अपने उद्देश्य का ध्यान रख कर उतरना ,पहुँचाना महत्व पूर्ण जिम्मेदारी है ,वरना  कब यह रथ तेजी से आपके लक्ष्य को विस्मृत करा देगा, आप समझ भी नहीं पाएंगे ,आपको सकारात्मक भाव से लक्ष्य के प्रति पूर्ण चेतन्य भावसे केंद्रित रहना है, तब आप जीवन चक्र के सिद्धांत में मोक्ष का  रूप को जान सकेंगे 

    Tuesday, June 14, 2016

    स्वयं को दोष न दें (Do not blame yourself)


          स्वयं को दोष न दें
      (Do not blame yourself)
    सुकेत नालंदा का सबसे योग्य विद्यार्थी था पठन -पठान में उसे कोई मात नहीं दे पाया था , गुरुओं ने  उसकी बुद्धि का लोहा कई बार माना था ,दर्शन ,सेवा , संस्कारों और परीक्षा में उसे अव्वल आना ही होता था ,  अच्छे , सम्भ्रान्त परिवार का इकलौता पुत्र था हमारा सुकेत , बस  एक ही बड़ी कमी उसने अपने पापा से सीख ली थी , असंतोष और स्वयं को कोसते  रहने का दुर्गुण -----मैं  कुछ नहीं कर सकता, बड़ी बड़ी परीक्षाएं चुटकियों में पास करने वाला खुद अपने आपको संतुलित नहीं रख पाता था ,परिणाम यह कि  उसको सारी सफलताएं मिलने के बाद भी कोई संतोष आनंद मन में पैदा ही नहीं हो पाता था, समय निकलता गया और पूर्ण शिक्षा ग्रहण करने के बाद सुकेत  अपने घर पहुँच गया , और जीवन की ताल में ताल मिलाने लगा , परिणाम - पिता के व्यवसाय में उत्तरोत्तर वृद्धि के बाद भी घर में कोई शान्ति सुख की परिकल्पनाथी ही नहीं|

    घर का हर सदस्य कुशंकाओं  से घिरा  एक दुसरे पर अपने अपने असंतोष का ठीकरा फोड़ता ,अवश्य दिखाई देता था , माँ कह रही  होती  थी ,पूरा जीवन खपा दिया घर के लिए और सब लोग मेरी परवाह ही नहीं करते और अब तो शरीर भी साथ नहीं दे रहा ,किसको कहूं अपनी , बेकार है जीवन ,क्या मतलब इसका, और पिता कहरहे होते की पूरा दिन खट खट किसके लिए कररहा हूँ सब तुम लोगो के लिए , सुकेत अपने आपमें कुंठित अनमना सा कहता रहता था  काहे को पढ़ाया इतना जब दूकान ही करानी थी तो -----और हर रोज किसी न किसी बात पर  खौफ   और दुःख का माहौल बना रहता था |

    अचानक बाज़ार की  मन्दी  और व्यापार की  हानि  ने सुकेत के पिता को भारी क्षति दी थी , सारी सम्पत्तियां एक एक कर बिक गई और परिवार पर जीवन यापन का भी संकट खड़ा होगया  परिवार के सदस्यों ने झूठे कागजों से रही बची संपत्ति भी ठग ली ,पिता को एक रात लकवे का दौरा पड़गया , धन की कमी और समस्या का स्वरुप इतना बड़ा था कि  कोई किरण दिख ही   नहीं रही थी , सुकेत ने माँ को काम पर जाते हुए देखा , बड़ी ग्लानि हुई मन को , दूसरे ही दिन वो अपने गुरु ने यहाँ नालंदा पहुंचा वहां सब हालत जानकर गुरु ने सुकेत की मदद भी की और आश्रम के एक कोने में जगह भी दी ,और काम भी दे दिया , सुकेत बहुत ज्यादा अनुग्रह प्राप्त कर रोने लगा घर आये गुरु से उसने अनायास ही पूछा देव आप सब जानते हो  हमारी ऐसी स्थिति क्यों हुई |


    गुरु ने लम्बी सांस लेकर कहना चालू किया पुत्र आपके पूरे परिवार में  विस्वास , पराक्रम और सकारात्मक सोच की कमी है ,   आप पूर्ण शिक्षित होकर भी उस परमात्मा  की अनुकम्पा को नकारते रहे , आप स्वयं में परमात्मा का वास देखने में अक्षम, सदैव इस बात परअडिग रहे की आपसे ज्यादा कोई दुखी दीन हीन और निरीह नहीं है , परिणाम आपका  सब पर स्वयं पर विश्वास  कभी बन ही नहीं पाया ,ब्रह्मांड केवल आपकी नकारात्मकता सुनते सुनते यही समझ पाया कि आप उससे यही मांग रहे है तो उसने आपको वहीँ खड़ा कर दिया ,आप एक बार पुनः परमात्माकी अनुकम्पा और पूर्ण विशवास को मन में जगह दो ,आपका यह समय भी आपको बहुत बड़ी सौगात देकर जाएगा , गुरु की वाणी सुनकर तीनों लोगो की अश्रुधारा बह चली , कुछ ही समय में पिता पुनः ठीक होगये , अदालत ने पिता की सारी संपत्ति पुनः लौटा दी , माँ को लगा शायद जीवन ने जो यह सौगात दी है वह अमूल्य है और सुकेत जान गया था की अपनी अंतरात्मा के सत्य , आदर्शों और उसकी चेतना को अनसुना करके कोई भी संसार में आनंद पैदा कर  नहीं सकता , और गुरुवाणी की गहनता में डूब कर सुकेत अपने आनंद  में डूबने लगाउसे लगा कि हममे वह शक्ति विद्यमान थी जो हमें अपने सर्वोच्च सफलता के शिखर पर ले जा सकती थी| ,



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     हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम अपने आपको निरीह बेचारा नाकारा और  भोंदू बना कर रखना चाहते है हर परिस्थिति में हर काम में अपने को कार्य से पहले ही अपने आपको हतोत्साहित कर करते हुए दोषारोपित करते रहते है परिणाम यह कि एक दिन हम वैसे ही होजाते है   नाकारा, अकर्मण्य , और निराश्रित से
    हमेशा यह मेरे साथ ही क्यों होता है ? मैंने किसीके साथ ख़राब नहीं किया ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ ?मै  जो चाहता हूँ वो तो  कभी हो ही नहीं सकता ,मेरा समय खराब चल  रहा है , और भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों करता है ? ये सब प्रश्न एकसाथ  हम हर परिस्थिति में दागने के  आदी हो गए है ,जब भी हमारे सामने वो परिस्थितियां आईं  जो हमारे मन और रूचि  के विरुद्ध हुई या यो कहिये कि जो नकारात्मकताऐं  हमारी कमजोरी बन गई है उन्हें त्यागने के लिए भी हम इन्ही वाक्यांशों का प्रयोग करते रहते है  शायद हमे इनसबके बाद कुछ शान्ति मिल पाये ,नही मित्र इसके बाद और अधिक नकारात्मकता हमें घेर लेती है और हम उस नैराश्य का ढेर होजाते है जिसमे केवल   विनाश के रस्ते रहजाते है जबकि हमारे पास वो अदम्य शक्ति थी जो कुछ भी पैदा कर सकती थी |


    सुख --संतोष --- और लक्ष्य ये अलग अलग विषय है लक्ष्य विहीन सुख संतोष वैसा ही होगा जैसे  सुंदर खाने के बाद फ़ूड पोइज़निंग जबकि लक्ष्य के साथ ही सुख संतोष की पूर्णता माना  जा सकती है | मनुष्य का मन मष्तिष्क हमेशा कुछ न कुछ मांग करता रहा है ,कभी वह शरीर के सुख सम्बन्धों को अपनी कमजोरी बना बैठता है , औरकभी विलासताओं भरे जीवन में भौतिक संसाधनों के इर्द गिर्द घूमता रहता है , पूरा जीवन इसमें ही स्वाहा होजाता है कि,  मैंने जीवन में कमाया क्या , और हर समय केवल स्वार्थों की खोज में घूमते घूमते हर  कदम पर अपने आपको बड़ा दिखाने की चाह बनाये रहे ,  कहने का आशय यह कि हमारी सारी खोज केवल यही तक सीमित रह गई कि हम भौतिक सुख साधनों के आधीन होकर रहगये है, और उनसे हटकर हमे शान्ति मिल ही नहीं सकती , हमारा तमाम चिंतन इन विषय वस्तुओं पर निर्भर हो जाता है कि , हम समाज और सम्बन्धों का कितना विदोहन ---शोषण ----- और लूट कर लें जिससे हमारा अहम शांत होजाये  , मगर एक बार फंस कर हम कभी उससे निकल ही  नहीं सके और खुद को लाचार , गरीब और निस्सहाय सिद्ध करने में जुटे रहे और एक दिन वैसे ही दीन   हीन  बने बैठे अशांत अस्थिर और निराश्रित से |



    आपके अपने , सम्बन्ध , समाज ,केवल आपके बाह्य स्वरुप से जुड़े एक शोषण की मांग करते रहते है, इन सबके एक ही धर्म रहे कि   वे अपने  अपने सामर्थ्य के अनुसार आपकी लूट  खसोट करते रहे , उस हिंसक पशु की तरह जिसने   ताजे हरे पत्तों के बगीचों का आश्रय लिया था ,तब अभी हाल ही में एक मृग मारा  था,भर पेट अपनी  भूख मिटाने के बाद उसने  उसे उसी हाल में छोड़ दिया ,  वह चला गया, शायद फिर भूख लगी तो फिर आजायेगा खाने ,तबतक दूसरे जानवर नोचा खसोटी करते रहे ,क्योकि , जीवन ने  उन्हें यही  दिया है |   आदमी की हालत भी कमोवेश  ऐसी ही है , अपनी  शारीरिक और मानसिक कमजोरियों के हरे  बगीचों को देख कर वो हमेशा  शिकार बनता रहा है ,  फिर बार बार जीवन पर प्रश्न चिन्ह क्यों ?क्योकि इसके  एकमात्र जिम्मेदार हम ही रहे है ,बार बार हमारा झूठे , निराश्रित और नकारात्मक सम्बन्धों और  शारीरिक मानसिक  संसाधनों का लालच ,स्वयं पर अविश्वास और  दिशा हीनता  हमे उस कगार  खड़ा कर देती है जहां केवल हमारे पास  रह जातीहै  कुछ  शिकायतें कुछ आलोचनाएं  और ढेर सारी  नकारात्मकता क्योकि ये ही हमने पैदा किया है




    मनुष्य के पास  हर समस्या के निराकरण के लिए और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ  सिद्ध करने के लिए एक अ जेय ब्रह्मास्त्र भी है जो जीवन के हर दुश्मन को पलक झपकते ही ख़त्म कर सकता है , इसका नाम है संकल्प और यही वह शक्ति है जो ईसा नानक  मोहम्मद और बुद्ध को महान बना देती है , जीवन के लक्ष्य को साध कर , जिसने भी अपना पथ तय करना आरम्भ किया ,आप सच मानिए ब्रह्मांड की समस्त शक्तियों ने अपना सर वही पर झुका दिया है , जैसे ही आप अपना लक्ष्य बन कर चलना आरम्भ करेंगे तो दुनिया  की सारी बाधाएं आपके सामने खड़ी हो जाएंगी ,  समाज आपको लक्ष्य के साथ अलग जाता देखेगा ,तो अपने सारे अस्त्र शस्त्र लेकर आपपर हमला बोल देगा , कोई कहेगा  बस एकबार और बात  मानलो , कोई कहेगा आप एकबार और रुक जाओ , इस तरह की बहुत सी बातें ----बस यही परीक्षा है आपकी जहां आपको अपने संकल्प को और अधिक मजबूती देनी है  और यही से आपकी वह विजय यात्रा आरम्भ होनी है जिसके बाद जीवन से नकारात्मकता का अध्याय समाप्त होकर आपको सकारात्मक जीवन का नया उपहार मिलना है |



      निम्न विषयों पर भी विचार कीजिये


    • सबसे पहले अपने इर्द गिर्द  लोगो का आंकलन करे और बारीकी से यह देखे की वे यदि आपके लक्ष्य में बाधक है तो उनसे धीरे से किनारा अवश्य करलें , | 
    • अपनी कमजोरियों को अपने विकास पर हावी  मत होने दें  ,क्योकि यदि आप अपनी कमजोरियों पर अंकुश नहीं लगा पाये तो आपका लक्ष्य तक पहुंचना  अत्यन्त कठिन है | 
    •  स्वयं को हर कार्य और शक्ति में  पारंगत  मानते हुए, उसे जागृत करने का स्वप्न  देखते रहने का प्रयत्न करें जिससे वह आपके अंतर स्थल की सबसे बड़ी मांग के रूप में आपको  लक्ष्यरूप में दिखाई देने लगे | 
    • श्रेष्ठ जीवन मनुष्य की अपनी  सोच संकल्प और उसपर क्रियान्वयन करने की शक्तियों को  जगाने का नाम है क्योकि जोलोग अपनी  शक्ति को  जागृत कर उसे मूर्त रूप देने में  समर्थ होते है वही  स्वयं सिद्ध हो पाते है | 
    • आत्मा की परमशक्ति का ध्यान किये बगैर आप अपनी  आतंरिक शक्ति को जागृत नहीं कर सकते ,क्योकि जब तक आप बाह्य जगत की तुच्छ उपलब्धियों में लगे रहे ,तब तक आप उस शक्ति से परिचित न हो सकेंगे | 
    • स्वयं को सकारात्मक विचारों का आधार बना  दीजिये, उसके लिए केवल यह करना है की  लक्ष्य से पहले कुछ नहीं इसे रोज बार बार दोहराएँ | 
    • समस्याएँ केवल वीर मनुष्यों के समक्ष आती है और वे अपना उत्तर साथ लिए होती है ,बिना क्रोध घबराहट , और जल्दबाजी किये उनका उत्तर खोजने का प्रयत्न करे | 
    • सुख , लक्ष्य , सम्बन्ध , और समाज  आपकिसी एक को ही चुन सकते है यदि आप दो और तीनों के साथ चलने की कोशिश करेंगे तो आपका सफल होना कठिन है | 
    •  निरन्तर अपने लक्ष्य का ध्यान और नित्य उसकी प्राप्तिके लिए प्रयत्न करने वाला ही एक दिन लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है अन्यथा सफलता प्रश्न वाचक बन जायेगी | 
    • जो लोग आपको ख़राब , कमजोर और कमियों वाला मानते है वो आपको अभी तक जानते नहीं है ,एक दिन आप का विकास और उपलब्धियां  उन्हें आपका कद दिखा देगा  | 

      आप ईश्वर की अनमोल कृति है और आपको ईश्वर ने किसी ख़ास उद्देश्य के लिए पैदा किया है आपको उसी लक्ष्य की खोज करके सफलता प्राप्त करनी है , यही विचआर तेजी से अपने मन मो समझाते रहें | 

      आदमी तुम क्या आदम के सिर मौर हो - वक्त -ए -ताकत तुम्ही  रब का तुम शौर्य हो 

    अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

      अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...