Sunday, May 1, 2016

ईश्वर सबसे महान है (God is the Greatest) आपकी सफलता की शक्ति भी है

ईश्वर सबसे महान है (God is the Greatest)
आपकी सफलता की शक्ति भी है

एक संत जी लाखों की भीड़  के सामने जोर जोर से ईश्वर की परिभाषा बता रहे थे अबोध जनता हतप्रभ सी सब सुन रही थी उनके भजन गीत और ईश्वर के प्रति जो भाव थे वे बड़े निराले  और अजीब तरह के थे कभी  यह बताने की भरसक कोशिश कररहे थे कि में दुनिया में आज तक जितने संत हुए वो उनसब में सर्वश्रेष्ठ है योग, तंत्र, मंत्र ,ज्ञान और भक्ति में उनसे बड़ा  नहीं जीवन में ईश्वर से कैसे मिला जा सकता है वो भली भांति जानते है , और क्रोध अपरिग्रह ,समर्पण ,सब उस परमात्मा के लिए आवश्यक है ,एक गरीब किसान उनके भाषण सुन कर इतना प्रभावित हुआ की वह सोचने लगा की महाराज रोज ईश्वर से मिलते होंगे   महाराज सही ही तो कहरहे होंगे कि ईश्वर को  कड़ी मेहनत ,और समर्पण   करके ही  पाया जा सकता है |
भाव कुछ ऐसा था की वह महाराज की सेवा में लग गया मालूम हुआ महाराज की ४ फैकटरियां चल रही है उनके लड़के सारी  सम्पत्तियां सम्भाल रहें है , महाराज फ़ोन पर बात करते करते  कभी कभी इतने क्रोधित होजाते थे कि भद्दी भद्दी गालियां बोलने लगते थे , दूसरों से तुलना करते ही उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता था और वे उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे ,।
एक बार एक बड़े त्यौहार में संत जी का सारा  परिवार प्रसन्न  था खुशियों का वातावरण था अचानक जोर का भूकम्प आया किसान जल्दीसे संतजी को कंधे पर बैठा कर  पलक झपकते ही सामने मैदान में छोड़ आया, और जैसे ही लौटने को हुआ पूरा भवन भरभरा कर ढह गया सारे पुत्र पत्नी बच्चे संत जी जोर जोर से रोने लगे किसान ने बोल महाराज धैर्य रखो भगवान सब ठीक करेंगे , महाराज ने तमाम गालियां देते हुए कहा क्या ठीक करेंगे वो तो जनता को कहने के लिए है तू जा फायर ब्रगेड बुला , और फिर वे जोर जोर से रोने लगे ,
किसान ने अनवरत ईश्वर को याद करते हुए पीछे के गटर के रास्ते से थोड़ी खुदाई की वह उसे थोड़ी आवाजे  आयी उसने और साथियों की मदद से उसमे एक बड़ा सूराख बना कर सबको सा कुशल निकाल लिया संत जी ने देखा की किसान उनके दी हुई भगवान की तस्वीर लिए बड़े ही समर्पण भाव से प्रभु को शुक्रिया बोलरहे है , संत जी किसान के पांवों में गिर पड़े बेटा वास्तव में मैंने ईश्वर को आज ही पहिचाना है , यह कहकर वे सबकुछ छोड़कर जंगल की और चलेगए साथ में किसान भी चल दिया |

भगवान , अल्लाह , जिसिस , क्राइस्ट ,गुरु , और अनेक नामों वाला भगवान अलग अलग माध्यमों से आपके द्वारा पूजा जाता है , वह केवल उनलोगो को अपना अस्तित्व बता पाता  है   जब आप सबकुछ आशा छोड़कर उसके सामने आर्त  भाव से खड़े होजाते है , यही कारण है जब आप महां  संकट में होते है और उससे छूटने का कोई रास्ता नहीं होता आपके पास ,तब आप पूर्ण मनोयोग और १००% आर्त  भाव से उसके समीप जाकर अपना भाव प्रकट करते है और आप सही मानिए की इनमें से ६०% सफलता भी प्राप्त होती है क्योकि यहाँ आपके प्रार्थना पूर्ण थी |

जब भी हम अपनी और समाज की और देखते है तो केवल यही चिंता सताने लगती है की इन सब में मैं  कहा हूँ मेरा अस्तित्व इनकी तुलना में कैसा है,बस यहीं से भगवान लुप्त होने लगता है और मैं  और मेरा अहंकार इतना बड़ा हो जाते है कि जिसमे भगवान का अस्तित्व तक नहीं रह जाता , फिर हर बात में मुझे दूसरों की चिंता ज्यादा सताने लगती है की कहीं कोई मुझसे ऊपर न चला जाए परिणाम व्यक्ति की सारी  शांति स्वयं नष्ट होजाती है |

तुलसी अपने भावों में कई बार लिखते रहे
अहंकार अति दुखद डमरुआ
प्रभुता पाहि कांहे  मद नाही
ओर अंकुरेहु गरब तरु भारी



जहाँ ईश्वर है वह अहंकार  हो ही नहीं सकता, हमारे व्यक्तित्व में ईश्वर जन्म से ही १००%प्रतिशत अस्तित्व में निवास करता था , जैसे जैसे हम बड़े होते है झूठ , बेईमानी , क्रोध स्वार्थ और अपना पराये के भाव से उस १००% में धीरे धीरे कमी आने लगती है परिणाम ईश्वर का भाव लुप्त हो जाता है । फिर हमारा मन अपने व्यक्तित्व के अनुसार एक झूठे और  काल्पनिक ईश्वर का सृजन करलेता है ,जो केवल हमारे स्वार्थों को पूरा करने के लिए ही निर्मित होता है परिणाम यह  कि हर आदमी अपना ईश्वर बनाए हुए है और उसे ही अपने स्वार्थों की आपूर्ति का साधन बनाये है तो ऐसे में आदर्शों की बात तो कोरी कल्पना ही होगी न| | आज ईश्वर के नाम पर धर्म के नाम पर जो विभेद दिख रहा है वह इसी स्वछंदता और अहंकार का परिणाम है |

हम जहाँ है जैसे है जिस कार्य में लगे है वहां पूरी निष्ठां से अपने आदर्शों और सत्य का प्रयोग करते हुए ईश्वर पर विश्वास रखे कि वह आपको एक दिन अवश्य सफल बनाएगा , सफलता के मार्ग का आनंद केवल ऐसी सफलता से  ही निर्मित होता है , कैसे भी प्राप्त की सफलता आपके जीवन को एक ऐसी यातना बना डालती है जहाँ आप कभी उस आनंद  तक नहीं पहुँच सकते, जहाँ आपकी वह आनंद यात्रा समाप्त हो सके , हम जीवन को जितनी जटिलताएं देंगे जीवन आपको उतना  ही उलझता चला जाएगा और स्वयं आप अपनी सारी उपलब्धियों के बाद भी स्वयं से अपने अस्तित्व से और अपने चेतन्य भाव से स्वयं को हरा हुआ ही मान बैठेंगे, क्योकि अंतर्मन की निर्णायक शक्ति आपको कभी श्रेष्ठ नहीं मान पायेगी |


  • ईश्वर एक सार्थक चेतन्यता  का भाव है उसकी अनुभूति करने का प्रयास अवश्य करे एक बार इस भाव के सामने स्वयं को खड़ा करके देखेंगे तो अनेक निर्णय स्वतः हो जाएंगे। 
  •  भगवान कोईभी धर्म के अवलम्बियों का हो वह आपकी अंतर चेतना  से निरन्तर जुड़ा रहता है  एक बार उसकी यथार्थता के बोध के साथ सबका सामान करना सीखें | 
  • सत्य उस ईश्वर की उपलब्धि की सबसे बड़ी शर्त है , जबतक आप सत्य  को मानने वाले नहीं बनेंगे तबतक आपका अस्तित्व झूठ का पुलंदा बना  खुद को नकारता रहेगा | 
  • सहजता का मार्ग आपको जीवन जीने की कला में एक नया स्थान दे सकता है क्योकि आपकी जटिलताएं ही आपको जीवन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनकर मिलती है |
  • कोई ईश्वर को कर्म मानता है , कोई उसे सेवा मानता है और कोई उसे प्रेम का स्वरुप दे सकता है मेरा मानना यह है कि  उसे कुछ भी मानो परन्तु उसको मानने के बाद स्वयं को याद दिलाते रहना आवश्यक है | 
  • जीवन  मे संकल्प सबसे बड़ा सिद्धांत है जीवन में यदि संकल्प की परिपक्वता को हम सार्थक न बना  सके तो जीवन व्यर्थ ही होगा | ध्यान रहे कि  हम स्वयं की अपवंचना करके बार बार जन्म  मृत्यु की  दौड़ से यातनाएं ही चुनते रहेंगे | 
  • जो सकारात्मक तथ्य आपके अंतः चित्त की पृवृत्तियों को स्वयं के लिए श्रेष्ठ साबित कर सकते है उनका सतत चिंतन अवश्य करते रहें , वही आपको एक दिन श्रेष्ठ सिद्ध कर देगा | 

 



 

धर्म और नैतिकता के नाम पर बाहुबल , सहजता के नाम पर जटिलताएं , और संत के नाम पर अहंकार की आँधियों में जूझता व्यक्ति कैसे  ईश्वर को समझता होगा , संन्यास के बाद ढेरों सुविधाओं की लड़ाई लड़ता आदमी , चीख चीख कर धर्म को अपने अनुसार समझाता हुआ इंसान कितना जान पाया है स्वयं को यह प्रश्न चिन्ह है| धर्म का वास्तविक अर्थ है -सहजता , अपरिग्रह ,सत्य और सबमे भगवान का भाव देखने वाला भाव ,जिसे हर समय यह ज्ञान है  कि मृत्यु अवश्यम्भावी और निकट है, फिर स्वयं की आत्मा से बार बार दुराव और छलावा किस लिए ,जो भाव सम्पूर्ण पृकृति को और जीव को ईश्वर  मय  देख सके वाही श्रेष्ठ है | 

एक बार बहुत छोटे बच्चे जैसे आँख बंद करके अपनी माँ की गोद  में छुपने का प्रयत्न करो यह मानकर कि  आप अपने ईश्वर  के हाथ में सुरक्षित है और यही आपकी असली खोज थी , सच मानिए पहली बार आपदुनिया के चार्म आनंद में ईश्वर के सबसे निकट होंगे | और यही से आपको आपका चरम  आनंद का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाएगा |

Sunday, April 3, 2016

आप सबकुछ जीत सकते है (You have to win everything)

 आप सबकुछ जीत सकते है (You have to win everything)

काशी  में  एक गरीब ब्राह्मण निवास  करता था ,ब्राह्मण बहुत विवेकी और हरी भक्त था, वो जानता था  कि संसार पूर्णतः नश्वर और  ब्रह्मांड का  नगण्य भाग है ,और एक मह शक्तिशाली सत्ता उसे संचालित करती है और वही  संसार के उद्भव और नाश का कारक भी है , वह राजा के महल के  बाहर जाता और केवल ऐसे ही संसार के गीत गाता , राजा और उसके पुत्रों को यह सब अच्छा नहीं लगता था,  वे उनको  कई बार प्रताड़ित कर चुके थे , ब्राह्मण सदैव  हंस कर टाल देतेथे कि ये अज्ञानी है ईश्वर इन्हें माफ़ करें ,| 
 एक बार ब्राह्मण की तबियत ज्यादा खराब हुई उन्होंने अपने  पुत्रों से भिक्षा लाने कहा ,जैसे तैसे सबसे छोटा पुत्र  सुवर्ण इस काम को तैयार हुआ  ,उस दिन उसने देखा कितने अपमान और असम्मान साथ उसे भिक्षा प्राप्त हुई , राजा दुर्मुख और उसके पुत्रों को लोगो पर अत्याचार  करने में बड़ा आनंद आता था ,राजा के पुत्रों ने उस दिन उस से कहा कि तीन कोडे खाओ तब दूंगा भिक्षा ,और उसने ऐसे ही भिक्षा प्राप्त भी करली ,पिता ने भिक्षा में राजसी वस्त्र और उसमें बंधे हुए अनाज को देखा तो अनायास उसका हाथ बेटे की पीठ सहलाने लगा आंसू आँखों में भर गए ,पुत्र ने पिता की पीठ देखी और एक कठोर निर्णय उसके संकल्पों में घूम गया ,| 

सुवर्ण ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा के लिए सुदूर  एक जंगल में गया ,वहां किसी  भी गुरुकुल ने उसे शिक्षा नहीं दी बल्कि कई स्थानों से ,भगा दिया गया  वह,७ वें दिन घने जंगल में उस ने एक तेजस्वी तपस्वी को  देखा ,तपस्वी ध्यान में था आश्रम के बहार जहाँ तहाँ  गन्दगी के अम्बार लगे थे ,परन्तु परम शांति और निस्तब्धता थी , सुवर्ण ने धीरे धीरे सारे आश्रम को साफ किया ,नदी से पानी भर कर लाया और आश्रम को साफ़ किया थोड़े फल बीन लाया ,साथ ही साधू की बुझ रही अग्नि को पुनः प्रज्ज्वलित करदिया  ,साधु के लिए गहरे ध्यान में उतरने के लिए सारी  व्यवस्थाएं भी करदी ,दिन बीत गया भूख के मारे सुवर्ण का बुरा हाल था ,मगर उसने तय किया जब तक साधु  नहीं उठेंगे ,वह  कुछ भी नहीं लेंगा, साधु ने देर रात्रि आँखें खोली सम्पूर्ण आश्रम को साफ सु व्यवस्थित देखकर उसे आश्चर्य हुआ , फिर उन्होंने  एक छोटे बच्चे को आश्रम के कोने में गठरी जैसे पड़े देखा, दया और प्रेम भाव में उन्होंने एक चादर बच्चे  पर डाल दिया | सुबह साधु ने बच्चे की पूरी कहानी सुनी और उसे शिक्षा देना आरम्भ कर दिया , कुछ समय बाद ही  सुवर्ण ने सारी शिक्षा ग्रहण की और साधु को अपने अपमान और पिता के अपमान की कहानी सुनाई साधु ने बताया पुत्र आप सक्षम हो मेरी शिक्षा के प्रभाव से तुम अजेय हो गए हो | 

सुवर्ण ने साधु के पास आने वाले छोटे राजा से अपनी इच्छा व्यक्त की  राजा ने साधु की इच्छा और सुवर्ण की शक्ति से प्रभावित हो कर उस दूसरे राज्य  पर आक्रमण कर दिया  और पलक झपकते ही राजा दुर्मुख और उसके पुत्रों को बंदी बना  लिया गया ,  राजा ने सुवर्ण  के पिता के पाँव पकड़ लिए और स्वयं को क्षमा करदेने को कहा , पिता ने सुवर्ण की और देखा तो सुवर्ण ने उनके चरण छूकर आश्वस्त किया कि  मेरा लक्ष्य राज्य नहीं है |



सुवर्ण ने कहा राजा मुझे न तो राज्य का लोभ है और न ही सत्ता का , मैं तो केवल उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़ा हूँ, जहाँ लोग अपनी मर्यादाएं भूल कर स्वयं को सर्व शक्तिमान मान बैठते है ,जबकि उन्हें स्वयं को यह भली भांति मालूम होता है कि  कोई  भी घड़ी  उनके जीवन की अंतिम घड़ी हो सकती है ,उसके बाद उनका कमाया हुआ सत्कर्म ,धर्म , नैतिकता और उच्च व्यक्तिगत प्रतिमानों के अलावा कोई भौतिक संपत्ति शेष नहीं होगी , फिर आदर्शों की  अवहेलना कर कमाया हुआ हर साधन तुम्हें और गरीब से गरीब सिद्ध करदेगा , यह कहकर सुवर्ण ने राजा  को राज्य वापिस लौटा दिया ,राजा ने  सत्य और नैतिकता की शपथ लेकर सुवर्ण के पिता को अपना महामंत्री और पुरोहित बन कर काम आरभ कर दिया और सुवर्ण बिना किसी भाव  अपने साधु गुरु के आश्रम लौट गया | 

जीवन में हर कार्य संभव है शर्त  कि उसके लिए संकल्प की शक्ति इतनी प्रबल हो ,जिसके  सामने जीवन की हर इच्छा छोटी हो जाए , सोते जागते स्वयंको मन और मष्तिष्क यही कहता रहे की जीवन की पूर्णता उस लक्ष्य के बिना अधूरी है ,  दर्द और भविष्य की स्वर्णिम कामनाएं  केवल लक्ष्य में सिमट जाए , हजारों इच्छाओं का मुख्य केंद्र बिंदु स्वयं का लक्ष्य हो जाए और जीवन में अपना ही लक्ष्य ईश्वर की  इच्छा को सिद्ध करने का आधार बन जाए , मेरे दोस्त इसके बाद आपके प्रयास और आपका संकल्प आपको वो सब भी दे सकता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | 


 आम आदमी का यही प्रश्न रहता है कि , कोशिश तो बहुत की मगर सफलता हमें नहीं मिल सकी, शायद हमारा भाग्य ख़राब था या हमें ये मिलना ही नहीं था ,मित्रों हम जीवन में अपने लक्ष्य के साथ हजारों कामनाएं लिए खड़े रहते है , हम अच्छा लगने और बुरा  लगने की मृग मारीचिका में खड़े हर कार्य में सफलता का सुख लेना चाहते है , हमारी शारीरिक एवम  मानसिक  आपूर्तियों को पूर्ण करने वाला मानस हर कार्य करके भी स्वयं को हारा हुआ सा मान लेता है , फिर लक्ष्यों की पूर्णता के लिए हमारी प्राथमिकताएँ स्वयं भ्रमित होजाती है, जीवन सफलता के आयाम चाहता है , शरीर स्वयं की बार बार संतुष्टि , और मन केवल ठगा सा खड़ा रहता है ,अपने आपको जीवन से हारता हुआ देख कर और इनसबके जिम्मेदार आप स्वयं होते है क्योकि आप स्वयं की नियंत्रण शक्ति खो बैठे है | जबकि आपके पूर्ण नियंत्रण और पूर्ण एकाग्र भाव से किये गए  प्रयास आपको हर लक्ष्य में विजय दे  सकते थे | 


जीत का भाव पूर्णता का भाव है ,अर्थात जीत उसी को हासिल होती है जो वास्तव में पूर्णता का प्रतीक हो सके , प्रश्न यह है कि वह पूर्ण भाव कैसे पैदा हो , हम जिस समाज  परिवेश में खड़े है , स्वयं की पूर्णता आरम्भ करें , परिवार और समाज को अपने व्यवहार से जीतने का प्रयत्न करें , लक्ष्य को कठिन परिश्रम से बिना सफल असफलता का भाव लाये अकथ परिश्रम से जीतें , शरीर और मन को आत्म नियंत्रण से  जीतने का संकल्प करें , और अपनी आत्मा को उस परम शक्तिमान प्रभु की सर्वोत्तम कृति मान कर स्वयं को जीतने का प्रयत्न करें , वर्त्तमान को लक्ष्य की प्राप्ति और उसके प्रयासों में झोंक दे , साधनों की चिंता को भविष्य की सफलता के लिए नगण्य करदें , बस सोते जागते केवल यही भाव रहे की वह सफलता का लक्ष्य आपका है और वह आपको ही हासिल होना है | 

कृपया इनका भी प्रयोग करें 
  • लक्ष्य की स्पष्टता आपकी सफलता के मार्ग को आधे से ज्यादा सहज कर देती है क्योकि आपका लक्ष्य  जितना स्पष्ट होगा आपकी गति उतनी ही तेज होगी। 
  •  सफलता के लिए किये जाने वाले प्रयास सार्थक एवं सकारात्मक भाव के लिए किये जाने चाहिए जिससे आपके साथ समाज को भी अधिकतम लाभ प्राप्त हो सकें | 
  • लक्ष्य की प्राथमिकताएँ  बिलकुल स्पष्ट होनी चाहिए जीवन में आपके सामने एक लक्ष्यके साथ शारीरिक मानसिक , अपनी श्रेष्ठता को साबित करने और कई कार्य होंगे आपको अपनी प्राथमिकताएँ स्पष्ट रखनी है| 
  • जबतक आपका आत्म नियंत्रण पूर्ण नहीं होगा तबतक आप स्वयं को सफल साबित नहीं कर सकेंगे , जीवन में हर आवश्यकता आवश्यक है मगर लक्ष्य से पहले किसी आवश्यकता की जरूरत न हो | 
  • विनम्रता ,त्याग, बलिदान , एक शक्ति संपन्न व्यक्ति का आभूषण होते है ,सफलता के लिए ये सब बेहद जरूरी है नहीं तो इनके बिना सारी  सफलता अधिक विनाश कारी हो जायेगी
  • पूर्ण स्वतंत्रता सफलता के मार्ग में बाधक है क्योकि सफलता का मार्ग अपने अनुसाशन  नियमों और आदर्शों के मार्ग से बंधा , स्वयं से समाज के पूर्ण कल्याण का भाव लिए होता है अतः कुछ आदर्श जरूर बनाये रखें | 
  • अपने स्वयं पर अडिग विश्वास रखें कि आप ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है और आपको आपके द्वारा चयनित लक्ष्य के लिए ही ईश्वर ने चुना है , और आज या कल सफलता आपको ही मिलने है | 

  • सकारात्मक संकल्प का दीपक सदैव जलाए रखे  उसमे नित्य नयी बाती और संकल्पों का तेल डालते रहें आप निश्चित समझ ले कि जीवन आपको सफलताएं अवश्य देगा | 
  • असफलता का मायने यही था कि आपकी सफलता में थोड़ा समय है लेकिन वह सफलता इतनी प्रचण्ड होगी कि वह पूर्वकी असफलता के हर कदम को भविष्य की सशक्तता  में बदल देगी | 

 

 शरीर का धर्म है दुःख-सुख का अनुभव करना , ,भीख मांगना ,और और और करते हुए , हर समय असंतुष्ट रहना , जबकि आत्मा और उसकी महा  चेतना का कार्य है आपको पूर्ण शांति और लक्ष्य में सफल सिद्ध करना ,यहाँ आप यदि आत्मा की चेतना  से जुड़े रहे ,तो हर सफलता आपकी ही होगी, और यदि आप आज मन नहीं लगरहा , आज तबियत ख़राब है , आज अच्छा नहीं लग रहा , में लगे रहे तो आपकी सफलता भी आपसे दूर हो जायेगी, शरीर और मन की विषय वस्तुओं को सफलता का माध्यम बना डालें , संकल्प की शक्ति को पतवार  बनादे जो हर तूफ़ान को बौना साबित कर देगी

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Sunday, February 14, 2016

शांति का द्वार है भारत ( India is the door to peace)

शांति का द्वार है  भारत ( India is the door to peace)


एक दिव्य पुरुष तेजी से एक सुनसान  रास्ते पर चला जा रहा था रास्ता सूना था, और मार्ग कठिन भी था , एक राहगीर ने उसे देखा और सोचा मै भी इसके साथ  हो लेता हूँ  शायद भय और रास्ते के अकेले पन  से तो मुक्ति मिलेगी-यही  सोच कर उसने उस दिव्य पुरुष को प्रणाम किया और उसके साथ चल दिया ,आगे जा कर  दोनों  देखा कि एक आदमी जोर जोर से रो रहा है, पूछने पर मालूम हुआ कि उसकी संपत्ति चोरों ने लूट ली है -दिव्य पुरुष ने उससे कहा क्या तुम्हारा रोना  उचित है ,देखो मैं आपको  ईश्वर की कृपा दिखता हूँ, उसने आँख बंद  करने को  कहा और जब आँखे खोली तो वह मनुष्य उस दिव्य पुरुष के पैरों में गिरकर माफ़ी मांगने लगा ,दिव्य पुरुष ने कहा नाचो, गाओ भाग्यशाली हो तुम ------और मैं और वो फिर आगे बढ़ गए ,आगे जाकर उसने देखा सुनसान में एक आदमी फिर जोर जोर से रो  रहा है ,  दिव्य पुरुष ने कारण पूछा तो उसने बताया कि उसकी प्रेमिका ने उसे प्रताड़ित किया है, दिव्य पुरुष ने फिर उससे कहा , अपनी आँखे बंद करो थोड़ी देर में वह डरा हुआ उठा दिव्य पुरुष  ने कहा  पुत्र बहुत भाग्य शाली हो आप ,नाचो गाओ वह  नाचने गाने लगा और हम फिर आगे चल दिए ,आगे जाकर देखा कि एक राज पुरुष बहुत जोर जोर से रो रहा है दिव्य पुरुष ने  पूछा क्या हुआ तो, उसने बताया मैं  अपना राजपाट  सब हार गया हूँ, और मेरे सारे सम्बन्धी वही रह गए है ,उनके बिना मैं  कैसे जियूंगा  समझ नहीं आरहा ,सोचता हूँ आत्महत्या करलूं | दिव्य पुरुष ने उसे भी कहा आँख बन्द करके ध्यान से देखो ---------फिर थोड़ी देर में उसने  कहा उठो राजा यह सब सच है ,जाओ नाचो गाओ, राजा नाचने गाने लगा और हम आगे चल दिए ,अब मुझसे रहा नहीं गया ,मेरा घर आने को था, मैंने उसके पाँव पकड़ लिए और विनती की हे महाबाहो मुझे इन सबका अर्थ बताओ  मैं परेशान   हो गया हूँ | 

दिव्य पुरुष  मुस्कुराते हुए बोला  पुत्र मैं एक बहुत बड़े साम्राज्य का सम्राट था मेरे  पास सारी विलासिताएं  थी  मेरे राज्य का कोई अंत  नहीं  था, मैं हर रोज जीवन की  उन विलासताओं  को नए नए तरीकों से उपयोगित करके बहुत खुश   होता था ,और इस तरह मैं स्वयं को भगवान से भी बड़ा  समझने लगा, एक दिन अचानक एक सांप ने  मेरे इकलौते पुत्र को काट  तत्क्षण उसकी मृत्यु होगई ,अब तो सारी विलासताएं हमे खाने दौड़ने लगी ,सारे खजानों से भी हमारे बेटे की एक स्वांस वापिस नही आ सकी , हम बुरीतरह रो रहे थे तब एक दयालु साधु ने उसे  जीवित कर दिया मैंने ईनाम को कहा  तो उसने मुझे आँख बंद करने को कहा ,आँख बंद करते ही मैंने देखा कि मेरे जैसे करोडो राज्य उस सत्ता के सामने नगण्य थे ,  मैं  जिसे सुख और अन्नंत साधन समझ रहा था वो मेरा ही प्रयोग कररहे थे , मैं भिखारी , क्रोधी , असहनशील और एक डाकू की भाँती स्वयं को सराहता  देख  रहा था जबकि मेरे बराबर कोई दया का पात्र नहीं था ,और उस दिन मै भी साधु के साथ चलने लगा | 

प्रथम राहगीर ने आँख बंद करते ही देखा कि चोरो का एक साथी बोला इसे हम मार देंगे  दूसरा कहने लगा छोड़ो  बेचारा  कमा लेगा मगर उसे भगवान की प्रेरणा से जीवन दान देदो आगे  हत्या  लेंगे ,उस व्यक्ति ने सोचा ईश्वर ने मेरी रक्षा की ,और वह रोते रोते नाचने लगा | 

दूसरे राहगीर ने देखा उसकी प्रेमिका  अपने  दो   मित्रों के साथ यह बात कररही थी कि अब उसका पैसा ख़त्म हो गया है ,और वो मुझे बहुत रोक टोकी   कर रहा है उसे रास्ते से हटाओ  मित्र बोला उसका बहुत पैसा खाया है उसे छोड़ दे |और दूसरे आदमी ने फिर अपने प्राण रक्षा के लिए ईश्वर को धन्यवाद कहा और नाचने लगा | 


 तीसरे राजा की  आँखे बंद होते ही उसने देखा उसके सारे घरवाले दुश्मन की सेना से मिलगये है और उन्हीने षड़यंत्र के अंतर्गत राजा को उसके महल में ही क़त्ल करने की शाजिश रची थी राजा को अचानक मन घबराना और गुप्त मार्ग से जंगल आना और राज द्रोह और राज्य हारने की  सूचना मिलाना और आगे राज्य प्राप्त होने का मार्ग दिखना उसके सारे उत्तर प्राप्त करने को काफी था |और वह भी रोते  रोते नाचने लगा |   

 

 

दिव्य  पुरुष कहने लगा कि पुत्र जीवन को प्रभावित करने वाली आपकी  इच्छाएं  प्रतिदिन बढ़ती रहती है और यौवन , धन और चल अचल सम्पत्तियों की हवस बढ़ती चली जाती है , और हर श्रेष्ठ व्यक्ति और वस्तु  पर केवल उसका ही हक़ होना चाहिए ,यही भावना उसे सुख और दुःख का एहसास कराती रहती है ,शांति -सौहार्द एक प्रतियोगिता होजाता है ,राज्यों को बढ़ाने की होड़ एक हिंसक खेल की भांति  खूंखार  पशुओं की लड़ाई जैसा  मैदान हो  जाता है , हमारी  संवेदनाएं मर जाती है ,  जीवन केवल अपने स्वार्थों से लिपटकर हर जुल्म और शोषण को जायज ठहराने लगता है , फिर हम  ईश्वर की इच्छा से अनभिज्ञ केवल रोते पीटते रहते है बिना यह जाने कि यह हमारे भविष्य की सुरक्षा -सुख और स्थिरता के लिए क्या  आवश्यक था | 



भारतीय परम्परा के अनुसार जिन आश्रमों की बात की गई है उनमे प्रथम आश्रम में शिक्षा , सेवा , आज्ञा , और सीखने की तथा संस्कारों के परिष्करण के अध्याय पढ़े और पढ़ाये जाते है जिससे मानवीय सद्भाव सबके प्रति सेवा , ,  सहष्णुता का भाव बनाये रखना प्राथमिक आवश्यकता बताया गया है यही से उसमे सत्य -अहिंसा -त्याग - संतोष की भावना पैदा होती है , यम  नियम  आसान  प्रत्याहार प्राणायाम धारणा ध्यान समाधि के अष्टांग योग में सम्पूर्ण मानवीयता को मनुष्य से देवता रूप में होने की शिक्षा थी | 

द्वतीय आश्रम में समाज को समझने राष्ट्र निर्माण और स्वयं के निर्माण का एक आदर्श चित्रण है , जीवन को सबके हितार्थ समर्पित करने की  पहल है  ,शिक्षा   कल्याण और समाज को सहायता देने वाले हर कार्य को यही से समझाया जाता है और यही से मानवीय जीवन के वो मूल्य जीवन में विकसित होते है जिनसे किसी राष्ट्र के नागरिको को महान बनाने की प्रक्रिया पूर्ण की जाते है , आचार विचार क्रिया और क्रियान्वयन  यहीं से आरम्भ होते है | 

तृतीय आश्रम में व्यक्ति को एक स्वस्थ्य समाज की परिकल्पना करते हुए गृहस्थ आश्रम की बारीकियां सिखाईं जाती है वह पति पत्नी , घर परिवार , राष्ट्र और उसका विकास जैसे  अध्ययन के विषयों से सम्बद्ध  होता है ,   यहीं से समाज  में चरित्र के  आयाम पूर्ण होते है , यहाँ से मनुष्य ,  निष्ठ चरित्र को सिद्ध करते हुए राष्ट्र की उस नई पीढ़ी   का निर्माण करता है जो  जाकर समाज को नई  दिशा दे  सके | 


अंतिम रूप में व अपने चौथे आश्रम में आकर जीवन के हर भाग में  उसने  क्या किया  है और  उसे आगे क्या करना चाहिए समाज जीवन और उसकी परम्पराओं से हमने क्या सीखा है उसे अपना योगदान देकर हम कैसे लौटा सकते है यह सब विषय इस आश्रम की क्रियान्वयनता है यही से आगामी पीढ़ी के वो सशक्त मार्ग तैयार होते है जो आगे जाती , धर्म , मजहब से पहले इंसान पैदा करती और उन्हें मनुष्य बनाती भी है | 

भारतीय ज्ञान पद्धतियां यही मानती है कि सम्पूर्ण  में एक परमसत्ता या  यूँ कहें कि कोई कोई अदृश्य वैज्ञानिक शक्ति व्याप्त है और वही  सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को दिशा निर्देशित करती रहती  है वही कर्म और और अकर्म का कारक है   वाही जड़ चेतन और परिवर्तन का  मूल  है , और  वैज्ञानिक शक्ति के एकाग्र और एकात्माक ध्यान मंत्र पद्ध्तियों से उसे बहुत अंश तक  प्राप्त किया जा सकता है | ध्यान योग और जटिल प्रक्रियाओं से  दूर एक  अडिग विश्वास का विषय है और शर्त यह की उसका  स्वयं के लिए न होकर दूसरों के हितार्थ ही होना  चाहिए शायद वहीँ से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कल्याण संभव होगा और यहीं से शान्ति सौहार्द और एकात्मकता का भाव पूर्ण  हो पायेगा  |  

 

भारतीय  ज्ञान  और जीवन शैली को आत्मसात  इनका  करें 

  • जीवन की  सहजता को समझने के लिए अपने व्यक्तित्व से सम्पूर्ण जटिलताओं क समाप्त करने का प्रयत्न करें जबतक आप स्वयं की जटिलताओं को ख़त्म नहीं करेंगे तबतक जीवन आपको शांति नहीं देगा | 

     

     जीवन को सच्ची दिशा देने के लिए उसके चारों और सीमा रेखाएं अवश्य  बनाइये इन्हे आदर्श या ethicsमाने  जो आपको   सुगम और ऊँचें मार्ग प्रदान करेंगे | 

     

    स्वयं को एकाग्र करें अपने आपमें निहित होते जाइए  में खोते जाइए और एक बिंदु वह आएगा जहाँ आपको कुछ भी ध्यान नहीं रहेगा बस यही बिंदु आपको  सबसे बड़ी सकारात्मकता पर ले जाएगा | 

     

    स्वांसों पर नियंत्रण रखिये गहरी और  स्वासें आपको  सकूँ दे सकती है , बहुत क्रोध के समय गहरी स्वास मुंह और नाक दोनो से ले सकते है | कुछ समय आँख  स्वांसों पर  लगाएं | 

     

     स्वांसों के साथ अपने इष्ट का नाम  मन ही मन दोहराते रहें आपको १००%  सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होगी यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि आप  अनुसार ही इष्ट इष्ट का ध्यान करें क्योकि आधार भूत वह मालिक एक ही है | 

     

     शरीर मन और शक्ति की एक सीमा है ,और सोच आत्मा का विषय है उसे सकारात्मक और परमार्थ के साथ जब तक बनाये रखेंगे आपको स्वयं की महत्वता का ज्ञान अवश्य  होता रहेगा | 

     

    नकारात्मक लोगो और विषयों का चिंतन दीर्घ काल में आपको भी नकारात्मक बना देगा अतैव जहाँ तक संभव हो नकारात्मक लोगो और विषयों का  चिंतन न करें | 

     

    स्वयं के शरीर और  मन पर अंकुश -नियंत्रण बनाये रखिये ,क्योकि यहीं से आपको हार दुःख और क्रोध जैसी परिस्तिथियों का सामना करना पड़ता है | 

     

     

    "आपका और हर मनुष्य का जन्म किसी   नियत कार्य के लिए हुआ है , हमारी तरह उनके भी मूल्य , आदर्श और देवता सर्वोपरि है फिर मतभेद का कारण कोख , देश ,और जातियां कैसे हो सकती है , सर्वधर्म समभाव का मूल्य केवल वह समझ पाता  है जो वास्तव में अपने धर्म को सूक्ष्म रूप से जानता है ,  शायद यही से धर्म का प्रादुर्भाव भी हुआ होगा ,यदि  शांति - मोक्ष और स्वर्ग और जन्नत की कल्पना आपके दिमाग कही कभी उठी हो तो स्वयं को एक बार एकाग्र कर उस परमपिता में अवश्य लगाइये जिसने बिना धर्म जाति  मजहब और पंथ देख कर हर गरीब मजबूर बेसहारा की मदद की है और वाही इस ब्रह्माण्ड का आधार है और यदि आप उसकी ही संतानें है तो यह सिद्ध करने का दायित्व आपका ही है"

     

 

 

Monday, December 28, 2015

आत्म बोध जीवन का अन्तिम लक्ष्य है(The ultimate goal of life is self-realisation (

हजारों वर्ष की साधना  के बाद एक  साधु महाराज को सारे  देवताओं ने सबसे बड़ा मान लिया और यही कहा कि आप सबसे बड़े है और आपका वैभव , सम्मान और तपश्चर्यया तक कोई पहुंचा  ही नही आज तक , ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति आप ही है ,साधु महाराज स्वयं में इतने गौरवान्वित हुए की उन्हें सारी दुनिया तुच्छ जान पड़ने लगी , अहंकार और घोर घमंड के साथ वो चिल्ला कर बोले क्या मुझसे अधिक और कोई  धर्म त्याग और संन्यास की परिभाषा समझ पाया है ,सब लोगो ने कहा नहीं महाराज कोई नहीं हुआ  ऐसा ,तब  फिर विष्णु ने कहा , महाराज आपके मुकाबले की तो बात क्या करूँ  मैं , मगर मिथला के राजा जनक को लोग बड़ा मानते जरूर है ,आप लोगो का यह भ्रम भी दूर कर दीजिये , अहंकार में साधू महाराज गालियां देते हुए सीधे मिथला पहुँच गए , राजा ने देखते ही अपना आसान छोड़ कर उन्हें बैठाया , पाँव धोये और अपने महल में आथित्य दिया , साधु ने कहा राजा मैं  शास्त्रार्थ करने आया हूँ तेरे साथ,राजा ने पाँव   पकड़ते हुए  कहा ,महाराज मै  अज्ञानी क्या कर सकता हूँ शास्त्रार्थ ,हाँ  मगर आपके प्रवचन अवश्य सुनूंगा , अभी प्रजा पर संकट आया है उसके लिए थोड़ा समय  दें ,तबतक एक बार अपने  धर्म का अध्ययन और करलें आप , मेरी सारी रानियां प्रजा आपकी दास  सेवामे रहेगी आपमुझे अनुमति दे , साधु बोले जा जल्दी आना , कर साधु से राजा ने विदा ली ,फिर राजा लौटा तो देश पर आक्रमण ,  अकाल, भूकम्प ,न्याय, और धर्म सभा जैसे कार्यों के लिए साधु से आज्ञा लेकर जाता रहा परन्तु हर बार जाते समय यह अवश्य कह जाता था महाराज आप अपने धर्म का एक बार और अध्ययन करलें ,इस प्रकार २ वर्ष का समय कब बीत गया मालूम ही नहीं पड़ा ,जब ११ वीं बार राजा लौटा तो देखा साधु गायब थे , राजा ने अपने योग से जाना कि साधु कहाँ है, तो सीधा उनके पास घने  जंगल में जहां साधु  थें ,वहां पहुंचा और रो रो कर बोला महाराज मैंने आपको बड़ा दुःख पहुंचाया है ,क्षमा करें मुझे अब आप ,अपना धर्म उपदेश दें  और मेरा परिवार आपको अपना सब कुछ मान चुका है ,आप दया करें , साधु ने धीरे से  आँखें खोली और पूर्ण प्रेम  भाव से कहना  आरम्भ किया ,हे राजा वास्तव तू  बहुत बदमाश है, तेरे कहने के कारण जब मै ११ वीं बार अपने धर्म का अध्ययन कररहा था ,तब मुझे यह ज्ञान प्रत्यक्ष दिखने लगा कि हर कण में जब वो ही समाया है तो मैं  बड़ा कैसे और कोई छोटा कैसे , मैं तेरी ब्रह्माण्ड  की सेवा और हर प्राणी के प्रति तेरे दया के भाव से भी नत मस्तक हूँ और आज मैं  ब्रह्म को जान गया हूँ ,यह कहकर साधु गहन ध्यान में उतर गये ,राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी राजधानी लौट गया  |

हम आज जिस समाज में खड़े है वहां हम केवल इस बात के लिए सदैव   चिंतित रहते है कि , समाज का हर व्यक्ति श्रेष्ठता की तुलना में हमसे अधिक श्रेष्ठ न हो जाए , हमारी तमाम कोशिशें यही रहती है कि कैसे  भीस्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कुछ भीकिया जाए ,मगर  स्वयं को इस   रूप  स्थापित  किया जाए  कि दूसरे उसकी तुलना नहीं कर सकें | इसी उधेड़ बुन में जीवन कब निकल जाता है यह अहसास ही नहीं हो पाता  हमें , हमारे सारे जीवन का सार  यही रह पाता है कि एक समूह जो हमारी प्रसंशा करता रहे , एक बनावटी परिवेश जिसमे हम स्वयं को श्रेष्ठ समझते रहे, और चाटुकारों से भरा छोटा सा हमारा दड़बा ,जिसमे हम स्वयं को सम्राट की तरह पाते है ,जीवन शनैः शनैःबीतता जाता है और हम अपने ही नशे मे चूर भ्रम पाले दुनियां से चले जाते है ,शायद यही जीवन का सत्य भी है |

मैं और मेरी उपलब्धिया बड़े अलग विषय है ,इस  समाज में रहता हुआ व्यक्ति अपनी पहचान के लिए अपनी उपलब्धियों को दर्शाने की कोशिश करता रहता है , उसकी पहिचान के लिए बहुत बड़ी  संपत्ति बड़े बड़े मकान बड़ी बड़ी गाड़ियां और ऐशो आराम का हर साधन होना आवश्यक होना चाहिए , उसकी पहिचान उसकी सम्पत्तियों के नाम से होती है , यह फार्म हाउस किसका है ओ हाँ बहुत बड़े आदमी है वो ,इसी प्रकार ३०० माले की बिल्डिंग , चार्टर प्लेन और हजारों साधनों की भीड़ ,आपकी पहिचान बनी रहती है ता उम्र ,
राजाओं महाराजाओं के विलास महल , नाट्य घर और राज सभाओं में कलाकारों और नृत्यकियों की हर रात चलने वाली प्रतियोगिताएँ ,बड़े बड़े राज्य प्रासादों में २४ घंटे जागते हरम और हजारों सेवादार , कहने का आशय यह कि धनबल , वैभव बल , रूपबल साधन और साधना बल ये सब उस व्यक्ति की पहिचान बने रहते है जबकि उसके आत्म चिंतन का यहाँ कही सवाल ही नहीं उठ पाता  है |


आदमी अपने बारे में सोच ही कहां पाता  है ,उसके सामने समाज परिवार और परम्पराओं के अनुसार काम लाद  दिए जाते है बस वह उन्हीं आपूर्तियों में उलझा अपना जीवन ढ़ोता रहता है बाल्य अवस्था में उसका मानस तैयार किया जाने लगता है कि ,बड़ा आदमी बनेगा , कलेक्टर बनेगा ,डॉ बनेगा , या और कुछ, कोई माता पिता बच्चे को सत्य , अहिंसा, त्याग और संस्कार का पाठ पढ़ाता नहीं दिखाई दिया, न ही कोई अपने बच्चे को गीता का निष्कामप्रेम समझाता मिला, न ही जीवन की नश्वरता , और मोह में बंधे सारे नकली रिश्तों की व्याख्या करता मिला कोई , शायद परम्पराओं के हिसाब से उनके बड़ों ने भी यह तथ्य उन्हें नहीं बताये होंगें , अर्थात उन्होंने जो कुछ भी बताया वह संसार और जगत का बोध तो अवश्य था मगर वह स्वयं के बोध और आत्म चिंतन से कोसों दूर था |
 
मैं क्यों पैदा हुआ हूँ ?मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है , आत्मा का सम्बन्ध किस हद तक सांसारिक उपलब्धियों से जुड़ा है ?ये तमाम प्रश्न सामान्यतः तब हमारे दिलो दिमाग में आते है जब हमारे पास जीवन के लिए समय ही नहीं होता ,मित्रो साधन और उपलब्धियां आपके लिये एक हद तक महत्वपूर्ण अवश्य है ,मगर जब वे आपके जीवन और मूल्यों से अधिक अपना महत्व निर्मित करने लगें ,तो आप निश्चित समझ लें कि वे ही आपके जीवन में अशांति , पाप और नाश का कारक बन कर आपको नष्ट कर देंगे ,
स्वयं का चिंतन और स्वयं की शक्तियों को जाग्रत करके जिन लोगो ने  संसार में जीवन जिया है वे लोग सदियों से अमरत्व पा  चुके है  उन्हें समय की परिधि ने भी मुक्त कर दिया है ,शांति , सुख , आनंद और परमानंद का सम्बन्ध साधनों के ढेर से अधिक आत्म बोध और आत्मानुभूति में निहित है , आपका लक्ष्य , आपका क्रियान्वयन और आपका सोच जैसे जैसे धनात्मक और बड़ा होता जाएगा, वैसे वैसे संसार की हर उपलब्धि आपको छोटी लगने लगेगी और एक दिन आप स्वयं को उस शिखर पर पाएंगे जहाँ केवल आप आपका नैसर्गिक आनंद होगा और शायद आपके पास इस समय कुछ पाने को शेष ही नहीं होगा |

निम्न विचारों को अवश्य चिंतन में लाये


  • समय की सीमितता पर पैनी नजर बनाये रखें और प्रयास यह हो कि ,जाता हुआ प्रत्येक पल जाते हुए आपको अपनी सार्थकता का परिचय अवश्य देता जाए , अन्यथा समय से पश्चाताप पैदा होने लगेगा | 
  • प्रतिदिन अपने बारे में अवश्य सोंचें ,साधन , शक्ति और बाह्य आवरण की रक्षा के लिए संसाधनों का एकत्रीकरण तो हो मगर उसके साथ उसके प्रयोग और उसके त्याग के लिए भी तैयारी बनाये रखनी चाहिए | 
  • मैं कोन हूँ ?मेरा उद्देश्य क्या है? मैकितना सफल हूँ? मुझे वास्तव में क्या करना चाहिए ?ये सब प्रश्न आप रोज अपने मन मष्तिष्क में दोहराते रहिये इससे आपके क्रियान्वयन में परिवर्तन आने लगेंगे | 
  • साधन उपभोग और  एकत्रीकरण एक अबाध चलने वाला क्रम है , उससे समाज और बाह्य वातावरण में आपका कद अवश्य बढ़ सकता है, मगर यह अवश्य तय समझे कि उनके उपभोग के बाद आपकी आत्मा को ही यह निर्णय करना है की यह व्यर्थ रहा या सार्थक | 
  • संसाधनों के एकत्रीकरण का अभिमान आप से सम्पूर्ण शांति छीन सकता है क्योकि जो संपत्ति कल किसी और की थी वो आज आपकी है और कल किसी और की होनी है तो इसका अभिमान क्यों | 
  • धन , बल , साधन , सौंदर्य, और शक्ति  सब शाश्वत है और इंसानी जीवन नश्वर है तो इन शक्तियों से इंसान का हारना तय ही तो है ऐसे में इनका अभिमान और एकत्रीकरण पूर्ण सोच के साथ होना चाहिए | 
  • सार्वभौमिक सत्य और ब्रह्माण्ड में पैदा होने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी कारण से श्रेष्ठता सिद्ध करता रहता है आप उसकी श्रेष्ठता अनदेखी और अपनी श्रेष्ठता का बखान  न करें | 
  • त्याग , समभाव और दूसरों के प्रति प्रेम का भाव आपको सहज शांति दे सकता है क्योकि जैसे जैसे आप दूसरों को सुख देने को तत्पर होजाएंगे आपको स्वयं की अात्मा से सुख का अनुभव होने लगेगा | 


Sunday, December 13, 2015

हजारों ख्वाहिशे इंसान की है (people have thousands of desires)

हजारों ख्वाहिशे इंसान की है

एक साधु महाराज का अंतिम समय था और वो जीवन के इस समय को पूर्ण शांति के साथ व्यतीत करके स्वर्गारोहण करना चाहते थे , स्वर्ग के देवता उनका इन्तजार कररहे थे और साधु महाराज काफी समय के बाद भी वहां नहीं पहुंचे थे देवताओं ने कहा जाओ मालूम करों की संत बाबा कहां  रह गए है ,दूतों ने वहां जाकर देखा तो मालूम हुआ साधु महाराज की आत्मा शरीर छोड़ चुकी है, परन्तु वह कहां रह गयी ,यह  किसी को नहीं पता ,दूतों ने जब सूक्ष्म निरीक्षण किया तो मालूम हुआ की साधु महाराज का शरीर जहाँ पड़ा था ,उसके ऊपर एक बड़ा आम का वृक्ष लगा था और बहुत  ऊपर एक पके हुए आम के इर्द गिर्द उनकी आत्मा घूम रही थी, सोच यह थी की इस आम के वृक्ष को मैंने लगाया और फल नहीं खा सका , दूत ने तुरंत उस आम को तोड़ कर साधु बाबा को मुक्त किया और यह सोचने लगा की इंसान देवता  या यों कहें कि  प्रत्येक  जड़ और  चेतन अपनी अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं के चक्रव्हियू  में फंसा परम संतोष की कामना कररहा है जबकि उसकी सम्पूर्ण शांति को उसकी ही आकांक्षाएं और वासनाएं प्रति पल नष्ट भ्रष्ट कररही है |


जीवन प्रतिपल बढ़ता जाता है इच्छाओं का चक्र और अधिक गहरा और जटिल होता जाता है और हम स्वयं के बनाये जाल में इतना अधिक फँस जाते है  की  हमारी सम्पूर्ण क्रियाएँ ही हमारे जीवन को अस्थिर अशांत और प्यासा सिद्ध कर देती है , हमारी हालत रेगिस्तान में भटकते हुए उस इंसान की तरह होजाती है जो रेतीली चमक को पानी के भ्रम में पकड़ने का अथक प्रयास करता है मगर बार बार उसके हाथ निराशा ही लगती है और अपने अंतिम पल तक वह यही विचार करपाता है की शायद उसे यह और मिल जाता तो ज्यादा अच्छा हो जाता | यही हमारी आपकी जीवन शैली का कोई चित्र है जिसमे केवल भ्रम , प्यास और खालीपन ही ज्यादा है |


हजारो इच्छाओं आकांक्षाओं के बीच फंसे आदमी की दशा बड़ी विचित्र और दयनीय दिखाई देती है हमारी एक इच्छा पूर्ण करने के लिए, हम बड़ी मेहनत से एक उपलब्धि हासिल कर पाते है, उसकी पूर्ती से पहले ही फिर नई इच्छाए हमे परेशान करने लगती है और फिर से एकबार हम अपने प्रयत्न में लगजाते है , जीवन भर यही क्रम हमारा पीछा करता रहता है और हम जीतने हारने और जीतने के भ्रम पाले आगे बढ़ते जाते है , आकांक्षाओं का चक्र समय या काल की तरह अजेय और अमर है और इंसान एक नश्वर प्राणी है, तो उसे इन इच्छाओं और कामनाओं से हारना ही होता है ,जो उसके जीवन की सफलता और उसे श्रेष्ठ सिद्ध करने में बाधक ही बनी  रहती  है |

यहाँ इंसानी इच्छाएं बड़ी अजीबो गरीब है --किसीको अकूत धन वैभव की आवश्यकता है, तो किसीको बड़ेबड़े राज प्रासादों की ,किसीको पेट भरने की इच्छा है तो किसीको हजारों पीढ़ियों तक धन सम्पदा की आवश्यकता है, किसीको तन की इतनी अधिक भूख़  है  कि वह दुनिया के हर सुन्दर व्यक्ति का दोहन करना चाहता है और किसीको भूख  है स्वयं को सर्व श्रेष्ठ साबित करने की ,कहने का आशय यह  कि  तन ,मन, धन और संसार की हर श्रेष्ठ वस्तु और व्यक्ति पर अधिकार जाताना चाहता है हमारा यह इंसान ,  और इन सबकी उपलब्धता से वह यह  गलत फहमी भी पालने लगता है  कि शायद इन सबकी प्राप्ति उसे अमर और काल जई बना सकें ,मगर जीवन अपनी नश्वरता से बंधा यही सिद्ध करता रहता है ,कि जीवन का वास्तविक आशय इच्छाओं की आपूर्ति में नहीं अपितु उनके त्याग में निहित है |

एक दार्शनिक ने अपने दर्शन में लिखा 

आपकी मृत्यु के बाद बची अकूत संपत्ति , राजप्रासाद और दूर नजरतक फैली जमीन जायदाद यह सिद्ध करती है कि  आपने इस बची हुई संपत्ति के मूल्य के बराबर अतिरिक्त श्रम किया जिसका प्रयोग आप अपने आत्म विकास के लिए भी कर सकते थे जिससे आपको जीवन का अंतिम सत्य ,मोक्ष या यों  कहिये आपको परम संतोष का बिंदु अवश्य प्राप्त हो सकता था ,जो आप हासिल नहीं कर सके 

हम आपसी संबंधों के मामले में भी अत्यंत गलत धारणा लिए हुए है , हर इंसान अपने हर सम्बन्ध पर एकाधिकार चाहता है और स्वयं को पूर्णतः स्वतंत्र रखना चाहता है , उसकी धरणा  यही रहती  है  कि  वह सर्वश्रेष्ठ बना रहते हुए भी हर अच्छी विषय वस्तु , इंसान और श्रेष्ठता का स्वामी रहे , और हर इंसान उसकी प्रसंशा करता रहे , वह एक शहंशाह की तरह हर व्यक्ति और वस्तु का प्रयोग करने हेतु स्वतंत्र हो ,परन्तु वास्तविक जीवन में यह चाहना उसे स्वयं भविष्य के विकास से काफी दूर खीच ले जाती है परिणाम यह जीवन केवल पश्चताप का मायने होकर रहजाता है जिसमें लाखों कमियां परलक्षित होने लगती है | 

 अंतरात्मा और जीवन की सबसे बड़ी चाहना है परम शांति ,  एक असीम  शीतलता , एक  असीम  आत्म चेतना का  भाव या यूँ कहिये स्वयं और ब्रह्माण्ड के  विकास की सोच जिसमे स्वयं से समाज तक  कल्याण की भावना   छुपी हो 
 एक  बड़े हवन कुण्ड पर बैठा कोई इंसान जलते  हवन में मुट्ठी भर भर कर आहुति और घी डाल रहा है और यह भी चाहता है की इस अग्नि के प्रचंड वेग से वह स्वयं न जले , जब तन की वासनाएं उठी तो उसका बेतहाशा दोहन किया जब धन सम्पदा और श्रेष्ठ बनने की चाह हुई तो पूरा जीवन झोंक डाला आपूर्ति के लिए , और अब जब कुछ शेष ही नहीं बचा पश्चताप के सिवा ,तब हमे आवश्यकता हुई परम शांति की जो आपसे काफी दूर है ,जिसपर आपका कोई अधिकार है ही नहीं , हवन कुण्ड की ज्वालाओं को शांत करने हेतु आपको आहुति डालनी बंद करनी थी, तन , धन और श्रेष्ठता की इच्छाओं को त्याग कर स्वयं को भविष्य को और जीवन की नश्वरता को पहचानने की आवश्यकता  थी , जो आपको जीवन से और मृत्यु से जीतने का मार्ग  सहज कर सकती थी | 


निम्न को जीवन के आधारों में शामिल कीजिए 
  • जीवन का वास्तविक आशय यह है  कि आप उसे किस हद तक समझ पाये इसका अर्थ यह है  कि जीवन केवल मेरे लिए नहीं है वरन दूसरों के कल्याण के लिए भी है , अतैव वह सही अर्थो में स्वयं को सिद्ध करता रहे | 
  • कामनाओं , इच्छाओं और आवश्यकताओं का सही अर्थों में आकलन किया जाता रहना चाहिए क्योकि एक सीमा के बाद यही कामनाएं आपको पतन के द्वार तक ले जा सकती है | 
  • जीवन में सोच और चिंतन से मुक्त कामनाएं आपको वासना के रूप में प्राप्त होती है इनका भेद आपको मालूम होना चाहिए , आवेश और जल्दी में आपूर्ति का हर प्रयास आपको संतोष से दूर ले जाता है | 
  • ईश्वर ने हर इंसान को कुछ खूबियों और कुछ कमियों के साथ बनाया है आपको उसे उसी स्वरुप में स्वीकार करना चाहिए इससे आपकी नजर में दूसरों का सम्मान बढ़ेगा और आपका व्यक्तित्व निखरेगा | 
  • परस्पर विश्वास  होना चाहिए मगर इस विश्वास को समय समय पर  परीक्षित अवश्य करते रहें क्योकि केवल बोलने , सहानुभूति और भविष्य में कुछ करने के सब्ज बाग़ आपको सत्य से दूर लेजाते  है| 
  • कामनाओं और वासनाओं के अतिरेक का त्याग ही हमें हमारे भविष्य के लक्ष्य की तरफ लेजा सकता है अन्यथा प्रयत्न की हर दिशा इतनी भ्रमित और दिशा हीं होगी जो हमें पश्चाताप दे ने लगेगी | 
  • नाकारात्मक स्वप्नों  से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करें , क्योकि इन नकारात्मक भावों का  पूरे व्यक्तित्व पर इतना गहरा प्रभाव होता है की जीवन का हर विकास अवरुद्ध हो जाता है | 
  • आपका हर कार्य आपका भविष्य का भोग्य बनने वाला है इसलिए हर कार्य से पूर्व आप यह चिंतन अवश्य करें की इससे आपको  बाद में पश्चताप तो नहीं होगा | 
  • शरीर और आत्मा दोनो अलग है, बहुत सारे कार्य शरीर करता है और सबके बाद आत्मा सिद्ध कर देती है कि यह कार्य सही  था की नहीं , अतैव आत्मा की आवाज सुनने का प्रयत्न करें | 
  • जो तुम्हारा  नहीं है ,उसका शोक कैसा और जो तुम्हारा था उसका अभिमान क्यों , यह तो नियति है दुःख और सुख पर केवल ईश्वर का अधिकार है आप स्वयं उसके नियंता न बनें | 
  • क्रोध ,झूठ ,फरेब , का सहारा लेकर जो होगा सो देखा जाएगा वाली शैली से जीवन केवल पश्चाताप दुःख निराशा ही दे सकेगा अतः  स्वयं को सत्य और त्याग का मायने बनाएं |





Sunday, October 25, 2015

The meaning of life is not to complain and cry जीवन का अर्थ शिकायत और रोना नहीं है


The meaning of life is not to complain and cry
जीवन का अर्थ शिकायत और रोना नहीं है

जीवन था तो सुख था जीवन था तो दुःख भी साथ था , परिस्थितियां  बदलती गई, समस्याएं नए नए स्वरुप में आती गई और हर व्यक्ति  अपने अपने स्वभाव के अनुसार जीवन की परिभाषा गढ़ता चला गया और उसका संतोष इन्हीं के इर्द गिर्द अपना डेरा डाले रहा |
एक गुरु  अपने तीन शिष्यों  को लकड़ी काटने   घने जंगल में भेजा तीनों अलग अलग दिशाओं में चल पड़े और दूसरे दिन दोपहर में गुरु के आश्रम पहुंचे इनमे केवल एक शिष्य लकड़ी का गट्ठर लिए था बाँकी शिष्यों के कपडे फट चुके थे जगह जगह खरोचें लगी थी एक शिष्य की पाँव की कोई हड्डी टूट गई थी , और दोनो कराह रहे थे , गुरु ने  जानकारी ली तो  शिष्यों ने जिन्हें चोट लगी थी और हड्डी टूट गई थी उन्होंने रोते हुए बताया कि इस सफल शिष्य ने जो लकड़ी का गठ्ठा लेकर आया है उसने हम दोनों को खराब दिशा में भेजा, इसे  मालूम था की वहां खतरनाक जीव जंतु रहते है ,हम दोनो गुरुदेव मरते मरते बचे है , हड्डी टूटे शिष्य की और इशारा करके वोशिष्य बोला की  इसे हाथियों ने घेर लिया ,भागते हाथियों  के साथ भागते भागते यह एक गहरे गड्ढे में गिर गया, जब हाथी  चले गए तो ये निकल पाया , मेरे पीछे एक रीछ   पड़  गया उससे भागते भागते मेरे सारे कपडे फट गए अचानक मै पहाड़ से फिसल कर बहुत नीचे गिरा फिर भागने लगा तब कही जाकर एक झोपड़ी में रह रहे आदिवासी परिवार  ने मेरी जान बचाई | गुरु ने तीसरे शिष्य से पूछा पुत्र आपको कोई कठिनाई नहीं हुई  क्या , उसने गुरु को प्रणाम किया  और  बताया कि  मैं जब लकड़ियाँ चुनने का विचार ही बना रहा था अचानक मुझे शेर की दहाड़ने की आवाज सुनाई पहाड़ से नीचे देखा तो एक शेर का परिवार तीन बच्चों के साथ मेरी और ही आ रहा था मैंने मन ही मन आपको प्रणाम किया और पास के विशाल वृक्ष पर चढ़ गया ,पहले तो मै दो घंटों  तक  शांत और स्तब्ध रहा, शेर बार बार पेड़ पर चढ़ते गुर्राते और गिरते रहे फिर वो पेड़ के नीचे ही बैठ गए , मुझे ख्याल आया कि  मै  लकड़ी  एकत्रित करने आया हूँ , तो मैंने उसी वृक्ष की सूखी लकड़ियाँ  इकठ्ठा करके नीचे फेकना चालू करदी पता नहीं कब शेर भाग गए , फिर रात भर मैं खुद को वृक्ष से बाँध कर वहीँ पड़ा रहा सुबह जब  कुछ लोग   आते दिखे तब मैं  उतरा और ये लकडियां  लेकर आपतक आ पाया हूँ , गुरु ने देखा सारी लकडिया एक वृक्ष की ही थी उन्होंने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और दोनो शिष्यों से कहा  पुत्र  आप इनसे कुछ सीखों |

गुरु ने कहा  पुत्र जीवन जब आरम्भ होता है तब से ही उसे संघर्ष , समस्याओं और उनके प्रति किये कर्त्तव्य का बोध सीखना होता है हमे चाहते न चाहते वो सब कार्य , मार्ग  तय करने होते है जो समय हमको देता जाता है यहाँ यह समस्या नहीं है कि आपपर समस्या आई क्यों वह तो स्वभाव है प्रकृति का , यहाँ प्रश्न यह था की हम बार बार अपनी अकर्मण्यता और अपने स्वभाव के कारण दूसरों को दोषारोपित करते रहे , हमने बचपन में भाई बहिनों  को दोषारोपित किया , बड़े होने पर अपने मित्रों को दोष दिया और बड़े होने पर समाज को दोष दिया और जहाँ पर भी हमारी कमियां अकर्माण्यता और बुरी आदतें हमे समस्या सी दिखने लगी हमने अपने भाग्य और विधाता को दोष देना आरम्भ कर दिया और जीवन इसी तरह निकल गया ,पुत्र यहाँ पर प्रश्न यह नहीं कि आप दोषी थे या नहीं यहाँ केवल प्रश्न यही था  कि बाल्यावस्था से माँ बाप भाई बहिन मित्र सब पर हम दोष मढ़ते रहे , परन्तु कभी भी हमने अपने अंतर में झांक कर स्वयं को पहिचानने की कोशिश नहीं की यहीं से हमारा पराभव आरम्भ हो जाता है ,यह कहकर गुरु मौन हो गए दोनो शिष्यों ने क्षमा प्रार्थना की और लकड़ी लाने  वाला शिष्य उनके घाव साफ करने लगा |

हर दिन हमे जीवन उस मोड़ पर खड़ा  कर देता है जहाँ हम अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दूसरों पर आरोप लगाने लगते है  यह हमे विरासत में ही प्राप्त होता है ,फिर तो अपनी कमियां अपने सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार और जीवन की तमाम नकारत्मकताएं केवल दूसरों पर थोप दी जाती है , परिणाम जीवन और गहरे और गहरे गर्त में डूबता चला जाता है , और हम स्व मूल्यांकन और स्वयं के दोषों के अवलोकन से दूर अपनी झूठी शान और अति महत्वाकांक्षी स्वाभाव के कारण अपनी गलतियों को दूर कर ही नहीं पाते , शायद जीवन इसी हवस , महत्वाकांक्षा और  उन जरूरतों का नाम हो जिन्हें कभी पूरा होना ही नहीं होता है , जैसे ही एक आवश्यकता पूरी हो वैसे ही दूसरी आवश्यकता आपको परेशान करने लगती है जीवन यही कार्य बार बार दोहराता रहता है |



हमारी दशा उस शराबी की तरह हो गई है जिसने  शराब के नशे मे बीती रात बहुत से अपराध किये  ,समाज और  प्रसाशन ने उसे खूब दण्डित किया और उसने समाज और प्रसाशन के सामने १००० बार कसमें खाई  कि  वह कभी शराब नहीं पियेगा और न ही कभी कोई अपराध करेगा , मगर रात होते ही वह फिर एक शराब की दूकान पर खड़ा अपनी बारी की प्रतीक्षा कररहा है , क्योकि हमने जीवन में अपने आत्मावलोकन का प्रयास ही नहीं किया ,हम सबकी शिकायत पर ऊपरी भाव से यह कहने  के आदि होगये कि, छोडो हम कभी फिर गलती नहीं करेंगे ,लेकिन हमारी अंतरात्मा हमारा ज़मीर  हमारे आदर्श सब कुछ अपनी हवस के कारण छोटे थे ,अंतिम रूप में कल जब  डॉ ने पेट की परेशानी में यह स्पष्ट कर दिया यह लिवर सिरॉसिस है अब हम फिर कसमें खा  रहे है , परिणाम हम जीवन भर उन्हीं  इच्छाओं के ही गुलाम बने रहे ,जबकि हमारे पास कई मार्ग थे स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के |

जीवन स्वयं इतना स्वाार्थी है जिसे दूसरे की परवाह ही कहाँ  होती है, एक बंदरिया को बच्चे के साथ पानी के टब में डालने पर केवल सीमा तक उसने बच्चे को बचाने का प्रयत्न किया ,जबपानी उसकी नाक पर आया तो उसने बच्चे को टब में पटका और कूद कर वह बाहर खड़ी हो गई,  यह बहुत बड़े दार्शनिक का मत रहा है और यहीं जीवन का एक मात्र सत्य भी है ,जब भी हम अपनी कल्पना करते है  आस पास के सारे लोग हमे प्रतिद्वंदी से दिखाई देने लगते है , हमारे पास एक ही लक्ष्य होता है कि कैसे भी हमे जो ठीक लगता है उसे पूरा किया जाए ,रोना ,पीटना , झूठ ,सच ,सहानुभूति और स्वयं को बड़ा बनाते हुए वही सब करना है जो हमे ठीक लगे , और सबसे बड़ी बात यह की सब लोग उसे अच्छा ही कहें ,जबकि समाज , समय और सारा ब्रह्माण्ड भी यदि साथ हो जाए तो भी आदर्शों  उपेक्षित नहीं किया जा सकता | अर्थात ख़राब को अच्छा और अच्छे को ख़राब नहीं बनाया जा सकता |


 जीवन के इस  प्रश्न पर इनको भी अपनाइये

  • स्वयं  का आंकलन हमेशा करते रहिये क्योकि मनुष्य स्वभाव में नित्य प्रति त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है ,उन्हें बिना समय गवाये सुधारना आवश्यक है , दीवार में उगा छोटा पौधा तुरंत उखड जाता है नहीं तो वह दीवार उखाड़ देता है | 
  • अपनी कमियों और शक्तियों का आंकलन करते रहिये क्योकि बड़े बड़े शक्तिशाली वृक्ष भी कमजोर और नन्हीं दीमक के सामने धराशाही हो जाते है | 
  • हर  परिस्थिति  में संघर्ष का भाव बनाये रखिये  समस्या हो तो उसके समाधान का और यदि समस्या न हो तो अपने विकास के लिए निरंतर प्रयास किये जाए | 
  • प्रत्येक व्यक्ति में कमियां और अच्छाइयां है  उन्हें कमियों के साथ स्वीकार करना आरम्भ करें यदि हम बहुत सारी अच्छाइयों का भ्रम पाले है तो उसमे सुधार करलें | 
  • आत्मा और शरीर दोनो ही विपरीत स्थिति और स्वभाव रखते है आत्मा के उत्थान के लिए हठ योग एकाग्रता और बहुत से प्रयास करने होते है शरीर अस्थाई छड़ भंगुर संतोष का कारक  है ,जो नकारात्मकता  भी देता है | 
  • अच्छे और बुरे का भेद स्वयं के हिसाब से न करें उसका भेद वास्तविक आदर्शों के हिसाब से किया जाना चाहिए क्योकि हम अपने दुष्कर्मों को भी  पूर्णतः समझ ही नहीं पाते है | 
  • जीवन में उन लोगो का सम्मान करें जो आपको हर कदम पर रोकने टोकने की प्रवृत्ति रखते है , ध्यान रहे जीवन यह सौगात हरेक इंसान को नहीं देता | 
  • जीवन है तो  गलतियां होंगी और स्वाभाव गत गलतियां  निरंतर यह मांग करती रहती है उनकी स्वीकारोक्ति तुरंत की जाए नहीं तो अहंकार और कमियों की खरपतवार आपके व्यक्तित्व को पूर्णतः नष्ट कर देगी | 
  • संघर्ष के लिए उत्तेजना , क्रोध और अनियमित वार्तालाप के स्थान पर पूर्ण गंभीर और चेतना के भाव का आश्रय लेना चाहिए क्योकि सबसे ज्यादा श्रेष्ठ निर्णय ऐसे समय ही लेने होते  है | 
  • जीवन में अपने दुष्कर्मों की स्वीकारोक्ति बड़ा ही कठिन विषय है जो हमारी अंतरात्मा को भी घायल , निस्तेज और कमजोर बना डालता है , परिणाम उन कार्योंका छुपाव , झूठ आपको शक्तिहीन कर देगा अतैव स्वयं को परिष्कृत करने हेतु क्षमा और स्वीकारोक्ति का प्रयोग करते रहें | 




Friday, September 25, 2015

basic management of life and your thought जीवन का बुनियादी प्रबंधन और आपके विचार


 basic management of life and your thought
      जीवन का बुनियादी प्रबंधन और  आपके विचार

new management funda  ( story of success)



बहुत बड़ा कद था एस. के. एस का वह एक बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी में चीफ था अमरीका बेस कंपनी का अलग अलग देशों में बड़ा अनुभव था उसके पास उसने कंपनी की  प्रगति रिपोर्ट देखा और यह पाया कि दो राष्ट्रों में कंपनी का कार्य बड़ा ही खराब और बंद होने के कगार पर खड़ा है ,एस के ने तुरंत निश्चय किया कि वह स्वयं जाकर वहां की  व्यवस्थाएं देखेगा, जिससे कंपनी  के लाभ और प्रगति में अंतर आ सके, यह सोच कर उसने एक समस्या गत देश को  स्वयं के सघन निरीक्षण में लिया और सुधार कार्यक्रम आरम्भ किया , यहाँ आकर  उसने देखा कि हर कर्मचारी हर व्यक्ति उससे मिलने और स्वयं को श्रेष्ठ बताने की होड़ में लगा है, हर आदमी की रूचि अपने कार्य से अधिक दूसरे के कार्य में है,
एस  के  ने अपने मुख्य सचिव को बुलाया और कम्पनी के बारे में पूछा सचिव ने ढेरों बातें बताई, उसमे हर आदमी का वर्णन बुराई और उसपर ही कंपनी की अव्यवस्था का ठीकरा फोड़ता रहा, चीफ  , एस. के. का सिर घूमने लगा , अलग अलग लोगो से बात करने पर उसने देखा  कि हर इंसान अपने से ज्यादा दूसरों की चर्चा में लगा हुआ है , कार्य स्थल के अलग अलग लोगो को बुला कर उसने जानकारी ली ,फिर दूसरों के  खिलाफ कार्यवाही की गई,फिर उनके पक्ष सुनकर दूसरों के  फिलाफ फिर कार्यवाही हुई ,और सारी कम्पनी का वातावरण  अस्थिर होगया था ,  सघन सी सी टी वी कैमरो के लगाए जाने पर यह स्पष्ट होगया कि, यह ऑफिस कम  एक रूढ़िवादी क्लेशी परिवार का  चित्रण ज्यादा है , हर आदमी अपने काम का रुतबा जमाने के लिए ,काम कम और दूसरों का चरित्र चित्रण अधिक कररहा है , कहीं आशिकी चल रही है  नई  युवतियां अधिक बातों और चेष्टाओं से अकारण ध्यान खीच रहीं थी , कहीं गोष्ठियां , और कहीं कैसे भी काम से बचने का कोई उपक्रम , जैसे ही किसीके फिलाफ कोई निर्णय लिया जाता दुसरे ग्रुप में जश्न मनाया जाने लगता था ,  और दुसरे ग्रुप को नीचे दिखाने के लिए पहला ग्रुप अलग तैयारी करने लगता था ,पुराने ढर्रे पर पुरानी रूढ़िवादी रीतियों में नए काम करने वाले , पढ़े लिखे लोगों को हतोत्साहित भी कर रहे थे ,बार बार यही कहा जाता था तुम दो दिन के बच्चे क्या जानो यह सब , एस के   बहुत अधिक परेशान होकर अपनी सारी योग्यता विहीन सा होने लगाथा  ,विकास के स्थान पर उसमें भी नकारत्मकताएं आने लगी ,और पूरा जीवन का सफल क्रम उसे मुंह चिढ़ाने लगा ,उसने  अपने ध्यान रूम में स्वयं को एकाग्र  किया , अचानक विडिओ काल पर उसके गुरु का फोन अाया वे बोले बेटा आप बहुत परेशान हो ,पूरी घटना सुनने के बाद गुरु बोले  बेटा अब मै  जैसा कह रहा हूँ आप वैसा ही करें कर्त्तव्य को एक कर्ता  के रूप में देखें, और कर्म स्थल को युद्ध के मैदान की तरह ,जंहाँ आदर्शों के साथ आपको सब कुछ जीतना है ,गुरु ने बताया कि

हर काम करने वाले आदमी को एक नए सिरे से प्रशिक्षण दिया जाए |
हर कर्मचारी का दायित्व उसे पूर्ण करना है ,वह कृष्ण के कर्म योग का मेंबर है उसकी जीवन की सफलता भी ,काम की सफलता पर है | 
 साथ ही विकास के कार्यों हेतु  एक नई युवाओं की टीम बनाई जाए |
ऑफिस के क्षेत्र को पीस एरिया घोषित करें, जहाँ जोर से बात करना , अप्रासंगिक बातें करना प्रतिबंधित हों |
सामान्य बातों के लिए अलग रूम और व्यवस्था की जाए |
समयानुसार मूल्यांकन किया जाए , और माह में एक बार उनसे दिन के अनुसार रिपोर्ट और समस्याएं जरूर पूछे |
सबकी कमियों के स्थान पर उनकी स्ट्रेंथ पर ध्यान लगाए |
किसीको भी किसी के बारे में बोलने का हक ना दें| 
स्वयं अपने तकनीकी स्त्रोतों से व्यक्ति के बारे में जानकारीलें  और सम्बंधित से बात करें |
हर बातके निर्णय को अपने ऊपर न लेकर सबकी  जबाब देही  स्पष्ट करें
७ - ७ डेज के सजा के प्रावधान किये जाए जिसमे वेतन न काट कर केवल उसे आराम वाले कमरों में बैठाया जावे
कोई काम न दिया जावे ,
व्यक्ति  को धर्म से जोड़े तथा उसका प्रेक्टिकल भी कराते रहें |
जो लोग कंपनी के लिए स्वयं को नहीं बदल सकें उन्हें दुगना पैसा देकर कंपनी से अलग किया जाए |
                             
 एस  के ने जैसे ही नियमों के तहत काम आरभ किया कंपनी का वातावरण बदलने लगा कुछ विरोध के बाद  योजना सफल होने लगी , कार्य स्थल पर बात न करना और सेंट्रल रूम का सघन चेकिंग में देखते हुए लोगो का व्यवहार बदलने लगा , प्रशिक्षण और विकास के के कार्यों से जुड़कर आज यह कम्पनी विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों  में से एक है , और एस  के एक सफल और श्रेष्ठ डायरेक्टर भी है |

आज का जीवन समाज और वातावरण इतना जटिल होगया है कि आदमी अपनी  चिरंतन शान्ति और जन्म से मिला  गुण या यूँ कहिये अपना स्वयं का संतोष स्वयं खो बैठा है , उसके चारो ओर  अपर्याप्तता , असंतोष , अस्थिरता , और अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देता  है , उसे अपने ही अंदर हजारों  कमियाँ दिखाई देती   है ,और बार बार जब उसकी  आत्मा उसका आंकलन नहीं कर पाती तो  स्वतः उसमे नैराश्य पैदा होने लगता है , फिर जहां का उत्पादन ही नकारात्मकता के वातावरण से आरम्भ  हो वहां कैसे आनंद का उद्भव हो पायेगा ,अतः सफलता के लिए प्रयास अवश्य  किये जाने चाहिए |
तुलना
आज की सबसे बड़ी समस्या है तुलना हम जिन परिवारों में पले  बढ़े  है उनसे हमने यही सीख पाया है कि किसके यहाँ क्या है हमारे पास क्या नहीं है  यूं कहिये   उसकी कमीज मेंरी कमीज  सफ़ेद क्यों , हमारे समाज, परिवार ,और मित्र मंडली के पास क्या क्या सुविधाएं  कौन कितना पढ़ा है कौन कितना बड़ा है और हम पर क्या नहीं है इसका विचार हम केवल  और ,मित्रों में ही  अपितु    आदि हो जाते है , परिणाम  यह कि  हमारा तमाम जीवन  दुःख और  परिभाषाएं ही नहीं तय करपाता , हम अपने से अधिक किसी पर  देखने को ही तैयार नहीं हैं |
 basic management of life and your thought  जीवन का बुनियादी प्रबंधन और  आपके विचार
भाव शून्यता
पास के  घर से एक बड़े  शोर और रोने   आयी रोने के सामूहिक स्वर  बहुत तेज थे बड़ी चीत्कार थी  एक निरीह सी रोने की  रट बैठ सी गई थी बहुत गहरा दर्द था उसमे , लोगो की भीड़ इकट्ठी  लगी थी समाज परिवार भी इकठ्ठा होने लगा मालूम यह पड़ा  कि  गुप्ता जी के बड़े लड़के की एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई है , बड़ा  नेक और आई आई टी पास करके गूगल में सर्विस कररहा था बच्चा ,  मैंने भी खा बहुत बुरा हुआ ,  मन  भीड़  में  विचार करने लगा अपने बच्चे के साथ का ही तो था , बड़ा घमंड था बाप को होगया न सब खत्म , हमारे लड़के को  कभी सपोर्ट नहीं किया , बाप को बहुत घमंड था , बहुत उड़  रहा था साला , ये तो होना ही था अचानक अपने बच्चों के साथ यही हादसा न हो जाए   सोचकर झटका लगा  और ईश्वर की और देख कर सच्चे   बहुत बुरा हुआ ------ यही समाज यही परिवार यही है आपके वो अपने जिनकी आप अपने सपोर्ट के लिए परिकल्पना करते है शायद आप सब कुछ जानकर भी अनजान बने अंधों की   तो ठोकर तो लग्न लाजिमी है |

सकारात्मकता 
 मित्रो  आज यदि आपको अपने जीवन को सकारात्मक देकर स्वयं को सफलता देनी है तो सर्वप्रथम  अधिकार दायित्व कर्त्तव्य , संसाधन और अपनी कार्य करने की शक्ति का  आवश्य होना चाहिए , क्योकि यह ध्यान रखें यदि आपने अपनी शक्तियों और कमजोरियों का नहीं रखा तो  जीवन के मूल उद्देश्य  अपनी सफलता तक ही नहीं पहुँच पायेगा ,हम अपनी शक्तियों के साथ नितांत अकेले है

स्वयं का चिंतन
जीवनके अधिकाँश भाग व्यर्थ  गंवाते रहते है, हम  अपने लिए   कुछ करते ही  नहीं  है , हमारा चिंतन , कार्य और सोच सब दूसरों के इर्द  घूमती रहती है , नौकरी इसलिए करनी है की सबका पेट पलना है , पढ़ाई इसलिए करनी है कि नौकरी मिल जाए ,  शादी  करनी है क्योकि घरवाले अपने दायित्व निभा पाएं ,बच्चे इसलिए  कि  वे हमारी सेवा करते रहें भले ही हमने जीवन में अपने बड़ों  की सेवा की हो या न की हो ,यानि की हर , चीज हम वही  करने की  कररहे है जिससे हमे थोड़ा शारीरिक सुख मिल जाए, जबकि सुख का सम्बन्ध आत्मा से है जिसके  पर  कुछ है ही नहीं | जीवन के  बुनियादी प्रबंधन में इनका प्रयोग अवश्य करें


  • दूसरो को सम्मान देना सीखिये क्योकि आप समाज को जो भी दे रहे है आपको वही वापिसी में मय  ब्याज के मिलने वाला  है , इससे आपका सम्मान बढ़ेगा | 
  • गलतियों पर तुरंत प्रतिक्रिया न  दें थोड़ा प्रतीक्षा करें , और सामने वाले को यह अवश्य मालूम हो जाए कि आपने उसकी गलती जान ली है मगर उसे जलील न करें | 
  • आअप ईश्वर , अल्लाह , ईसा और आप जिसे भी पूरे ब्रह्माण्ड की परम सत्ता मानते हों स्वयं को उससे जुड़ा हुआ महसूस करें और हर कर्त्तव्य के समय सही गलत पर विचार अवश्य करें | 
  • दिन में एक समय ऐसा भी निकालें जिसमे यह विचार अवश्य करें मई अपने और अपनी अंतरात्मा के आदर्शों के निर्माण हेतु क्या कर रहा हूँ | 
  • जीवन का मूल सिद्धांत है कि  वह   केवल उन्हें इतिहास रूप में याद कर पाता  है जो अपने आदर्शों से समाज और राष्ट्र के लिए मिसाल बन सकें वैसे तो इतिहास असंख्य खजानों के स्वामियों को भी याद नहीं करने देता | 
  • दूसरों के दुःख में अवश्य शामिल हों उर यही विचार करें की ये हादसा यदि उनके घर में होता तो उन्हें कितना दुःख होता , भविष्य अनिश्चित है और प्रकृति से सबको दर कर रहना चाहिए | 
  • जिन विषय स्थितियों पर आपका वश  नहीं है उनके बारे में सकारात्मक रुख बनाये रखिये क्योंकि आपके साारात्मक रुख रखने से परिस्थितियों का सामना करने की ताकत आपको सहज मिल जायेगी | 
  • हर समस्या का कोई नियत हल अवश्य है वह केवल ढूढने से एवं  प्रयत्न से ही  आपको प्राप्त होगा ये  विश्वास अपने मन में बनाये रखिये | 
  • स्वयं के कार्यों और सोच पर कड़ी नजर बनाये रखिये और समयानुसार उसमे परिवर्तन करने का प्रयत्न करते रहिये क्योकि निरंतर प्रयत्न से जीवन सहज हो जाएगा | 
  • शरीर सुख आपमें थोड़े समय बाद वितृष्णा , चिड़चिड़ापन , अपश्चाताप और वैराग्य का भाव देगा जबकि मानसिक ऊचाइयों पर पहुँच कर आपको सत् चित आनंद की प्राप्ति होगी |

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...