Sunday, May 25, 2014

संकल्प की साधना ही सफलता है (worship of aim)


जीवन बहुत सरल और अत्यधिक कठिन हो  सकता है ,यहां हर आदमी बहुत जल्दी में  है, और भागता जा रहा है| उसकी इच्छाएं बढ़तीजारही है ,जीवन के आंकलन धुंधलें होते जारहे है ,और बार बार की निराशाओं से तंग आकर वह स्वयं को दोषारोपित करने लगा है ,परिणाम यह है की उसने स्वयं अपनी जटिलताएं इस रूप में बढ़। ली है जहाँ  वह स्वयं अपने हीबनाये  चक्रव्ह्यू में फंस गया है | परिवार ,समाज , मित्रों ,और सम्पूर्ण दुनियां में उसका स्थान कहाँ है यह देखने के चक्कर में उसने तमाम तरह की नकारात्मकताएं पैदा कर ली है ,जो उसके भविष्य  की उन्नति के लिए अधिक बाधक बनी रहती है | 

दोस्तों  प्रकृति का एक सिद्धांत है की वह हर काम सब्र से समय ,मर्यादा और कार्यके समाप्त होने के समय का  निर्धारण करके करती है ,उसे उसके कार्यों की तीव्रता और उसके  सामायिक महत्व के बारे में पूर्ण ज्ञानहोता है , धूप।, हवा ,पानी, हिमस्खलन , उर्वरक मिट्टी एवं शून्यता  का सामंजस्य बना कर ही चलती है ,उसका सामंजस्य टूटते ही भयानक आपदाएं आजाती है , चद्रमा की पूर्णता (पूर्णिमा )सूर्य का जल शोषण और बहुत सी स्थितियां समुद्र को ज्वार भाटे  ,शांति और गरूत्वाकर्षण को प्रभावत करती रहती है , ध्यान रहे की इंसान में भी नमक ,और जल का अनुपात कमोवेश वैसा  है जैसा समुद्र का ,तो स्वाभाविक है इंसान का  मन मष्तिष्क भी इन परिवर्तनों से अछुता नही रह सकता | उसमे भीउसी प्रकार परिवर्तन उत्साह निराशा और शून्यता का अनुभव होता ही रहता है । 

समस्याएँ ,समय और  नई  नई चिनौतियां आदमी को हर पल उठानी ही होती है और इन्हीं से संघर्ष कर आदमी संसार में स्वयं को स्थापित करपाता है ,जब हर स्थिति समय और प्रकृति ही सशक्त  है तो हमारे पास क्या है ?दोस्तों हमारे पास है संकल्प कर्त्तव्य और कठिन परिश्रम एवं  सोच और ये ही ऐसी शक्तियां है जिनसे इतिहास लिखे है मनुष्यों ने ,विवेकानन्द का रामकृष्ण , सुकरात  ,ईसा ,मोहोम्मद और नानक  को देवता बनाने वाले और कोई नहीं उनके संकल्प ही थे , मित्रों संकल्प की साधना ही वस्तुतः सफलता का नाम है ,जब हम अपनी संकल्प शक्ति को छोड़ देते है तो हम केवल तात्कालिक विषय वस्तुओं से संतुष्ट दुखी और अकर्मण्य बने बैठे रहते है ,और इस समय हमारी सोच केवल यह 
रहती है  कि हमे क्या अच्छा लग रहा है ,
इसमे एक तथ्य यह भी है कि हमारी शारीरिक कमजोरियां हमारे मन मष्तिष्क पर हावी हो बैठती है और  मन मष्तिष्क से अति आवश्यक कार्य भी हमे कार्य  प्रेरणा नहीं दे पाते अर्थात मन और मष्तिष्क पर शारीरिक कमजोरियों का साम्राज्य हो जाता है और यहीं से पैदा होती  सारी समस्याएं , आलस्य और अकर्मण्यता । 

सारतः यह  कि   जीवन में आगे बढ़ते हुए मनुष्य के के लिए आवश्यक है की वह अपनी नकारत्मकताओं पर अंकुश 
लगाना सीखें , जिसके लिए निम्नांकित को जरूर अपनाएँ । 

  • स्वयं को एक निश्चित योजना में बांधें और उसके पूर्ण करने हेतु क्या क्या कदम उठाने है यह निश्चित करें तथा उन्हें क्रियान्वित करने का तरीका तय करें । 
  • मन और मष्तिष्क के सामंजस्य से यह तय करें कि आपक्या करना चाहते है और उसमें शारीरिक अक्षमताएं पैदा न होने दें ,ध्यान रहे  की शरीर एवं मन को नियंत्रित और बंधन में रखें । 
  • स्वयं अपने संकल्प बनाएं और पूर्ण निष्ठां से उसे वैचारिकता का आधार बनाये उसे छोटे छोटे भागोंमें बाँट कर उन्हें पूर्ण करने का निश्चय करें । 
  • संकल्पों को नियत समय के आधार पर पूर्ण करने का प्रयत्न करें यदि समयके आधार पर आपके संकल्प सही  नहीं हो पाये तो निश्चिततः आपको लाभ नहीं मिल पायेगा । 
  •  शरीर को मन और मष्तिष्क के आधीन ही रखना चाहिए ,   क्योकि  शरीर की आपूर्तियाँ और पोषण तो अति आवश्यक है मगर केवल शारीरिक सुख के लिए हर कार्य छोड़ देना यह पतन का मार्ग है । 
  • कार्य और संकल्प की  पूर्ती के समय यदि कोई  बाधा उत्पन्न होती है तो उसे धैर्य से पूर्ण करने का प्रयत्न करें क्योकि अति आवेश और नैराश्य में सामान्य हल भी समझ नहीं आपाता है । 
  • अपने संकल्प को उस परमशक्तिमान को सौंप  कर कार्य करें  साथ ही  यह प्रार्थना करें कि  मै  आपके दिए हुए मार्ग  में आपकी क्रियान्वयता से कार्य में लगा हूँ आप  इसका निरीक्षण  करते रहिये ,आपका कार्य सफल ही होगा यह विचार करते  रहिये। 
  • संकल्प की साधना या उसके चिंतन और क्रियान्वयन में आपको सामंजस्य की आवश्यकता है आपको यह चाहिए की आप समय कार्य और निरंतरता का मन बना कर कार्य करते रहिये । 
  • अपने संकल्प पर दोनो समय पूर्ण मनोयोग से चिंतन करे और यह भी विचार करें की मैने उसके लिए आज क्या कर सका हूँऔर कल क्या नया और अच्छा कर सकता हूँ । 



Sunday, May 18, 2014

गुणवत्ता पूर्ण जीवन और लक्ष्य (क्वालिटी लाइफ एंड ऑब्जेक्ट )

हम सब जीवन से बहुत कुछ चाहते है --  सफलता  ,नाम , पैसा , अधिकार , सत्ता , प्रेम , सौहार्द , और भी बहुत कुछ कहने का आशय यह की हर सबसे ऊँचे बिंदु पर पहुचने की कल्पना हमारे मन मष्तिष्क में  बनी  रहती  है और यदि कही हम ये सब प्राप्त नहीं कर पाते तो हमे अपने आपसे कष्ट निराशा और क्षोभ होने लगता है , हर बात में अपने आपको दोष देना, अपने को तिरस्कृत समझना , और अपने कर्म को अति श्रेष्ठ समझ कर उसमे परिवर्तन के सारे रा स्ते बंद कर देना यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है, और हम भी सामान्य आदमी बने खुश , दुखी और सामान्य सोच के साथ पैदा  होने और मरने के  क्रम में अपनी बारी का इन्तजार कर रहे होते  है ,एक कर्त्तव्यहीन ,पराश्रित , और कृतघ्न की तरह जिसे यह भी ध्यान नहीं है की उस ईश्वर, गॉड , मालिक , या अल्लाह ने  अपनी श्रेष्ठ कृति के रूप में पैदा किया है और हम सबको यही सिद्ध करना है की हम उस सर्वशक्ति मान की श्रेष्ठतम कृति है |

दोस्तों जीवन गुणात्मक आधार वाला होना चाहिए और हर व्यक्ति में उस सर्वशक्तिमान में वह शक्ति दी है  जिससे वह अपने आपको सिद्ध कर सकता है ,जीवन का  उद्भव स्वयं एक परीक्षा है जिसमे आपको अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध  करनी है , आपके पास बहुत से शॉर्टकट (कैसे भी सफल होने के मार्ग)है और जीवन  में झूठ , मक्कारी, धोखा , बेईमानी , लालच , और कैसे भी अपना काम निकलने के नकारात्मक उपाय और किसी भी नीचता तक जाने के बाद काम में सफल होने की कला हो सकती है ,मगर ध्यान रहे  आप जिस जीवन के लिए ऐसी सफलता के लिए चुन बैठे है वो जीवन आपको एक दिन तिरस्कृत कर डालेगा और इस सफलता के लिए आपको दोष देता रहेगा  क्योकि आदमी स्वयं से झूठ बोल ही नही पाता  है ,लाख कोशिशों के बाद भी अपने दुष्कर्मों से वह स्वयं मुक्त नहीं हो पाता | इसके विपरीत आपका जन्म एक निश्चित उद्देश्य के लिए हुआ है और उसकी प्राप्ति में आपको अनगिनत स्थानों पर आपको सर्वश्रेष्ठ साबित करना है वह भी सत्य ,दया कठिन परिश्रम ,परमार्थ ,और पूर्ण निष्ठां के साथ आपका भाव वही होना चाहिए कि  आप प्रकृति की भांति , ईश्वरीय गुणों की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित है , एक दिन आप अपने उस महा लक्ष्य पर जरूर पहुँच कर स्वयं को सिद्ध कर पाएंगे |

हम जो कुछ भी पैदा कररहे है वह हमारे जीवन का अंग बनकर हमारे साथ रहने वाला है और उसमे सबसे अधिक
महत्व पूर्ण सत्य यह है की हम जिस तरीके से अपना लक्ष्य प्राप्त कररहे है उसका गहरा प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ने वाला है गुणवत्ता पूर्ण जीवन का अंतिम लक्ष्य संसार को सुख शांति और सौहार्द के उपहारों के लिए अंतिम छण  तक संघर्ष करना और मानवता को सुखी करने का प्रयत्न करना  रहा हैं ,दूसरी और संसारके महान कहलाने वाले बर्बर शासकों  की उपलब्धियां और इतिहास देखें आपको मालूम पड़  जाएगा की आप जीवन  गुणात्मकता की बात कर रहे है बस वाही नहीं थी इन शासकों में और इतिहास उनके जीवन को एक  बदनुमां  धब्बा मान कर याद करता है ,जबकि
हजारों लाखों वैज्ञानिक ,नेताओं  सामाजिक ,धार्मिक प्रवर्तकों ने अपना जीवन अपने निहित  लक्ष्यों के साथ पूर्ण किया उन्हें आज का इतिहास मानवीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ मानव के रूप में याद करता है , दोस्तों हमे  उस गुणात्मक जीवन  आवश्यकता है जो हमारे कार्यों पर हमारे देश , समाज और सम्पूर्ण विश्वको गर्व का अनुभव करा सके |


जीवन की गुणवत्ता के लिए निम्न का प्रयोग करके अवश्य देखें |

  • स्वयं को एकाग्र चित्त करना सीखें जबतक आप पूर्ण एकाग्र चित्त  नहीं हो पाएंगे तब तक आप अपने मुख्या लक्ष्य  तक नहीं पहुँच पाएंगे , बार बार लक्ष्य बदलने होंगें | 
  • मन और शरीर को एक नियत सीमा तक ही खुला छोड़े ,मन और शरीर की स्वतंत्रता आपके दैनिक संकल्पों का अतिकृमण नहीं करें अन्यथा आपका  सफलता का  मार्ग  प्रशस्त  नहीं हो पायेगा | 
  • जीवन को अपने दैनिक प्राप्त समय के हिसाब से बाँध कर रखें ,ध्यान रखे की समय बद्ध योजना के आभाव में आप दिशा भ्रमित हो जावेंगे | 
  • अपने जीवन को गुणात्मक आधारों पर बनाये रखें , सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह , प्रेम , सौहार्द , धैर्य , अक्रोध ,और सबको दया करुणा और सर्वहिताय का चिंतन अपने कार्यों में अवश्य करें | 
  • एक सर्व  शक्ति मान  आपके हर धनात्मक कार्य और व्यवहार में सहयोग कररहा है ,अपने कर्त्तव्य निर्वहन के साथ उसका भी कुछ समय ध्यान करें सोच यह रहे की वह हमे सफलता अवश्य देगा | 
  • अपने जीवन मूल्यों और आदर्शों से कभी समझोता न करे क्योकि जीवन पल पल बदलता जाता है  मगर मूल्य और आदर्श  आपके जीवन को आधार देते रहते है | 
  • समय की गति के साथ हो रहे परिवर्तनों ज्ञान ,विज्ञान , और तकनीकी बदलावों को अपनाते हुए अपने लक्ष्य को सरल बनाया जा सकता है मगर ध्यान रहे की आप उनमे ुलघ कर अपना लक्ष्य न खो दें | 
  • आपको क्या अच्छा लगता है और क्या वह आपके लिए वास्तव में सही है इसका ध्यान अवश्य रखे हमारा लक्ष्य एक है मगर यदि असावधानी और अच्छा लगने के भ्रम में हम समय गावं देंगे तो सफलता भी दूर होने लगेगी | 
  • अपने लक्ष्य और संकल्पों को सदैव और दैनिक प्रक्रिया में दोहराते रहें और उस सर्वशक्तिमान सी रास्ता मांगते रहे मेरा दावा है की आपका लक्ष्य आपको अवश्य मिलेगा | 
  • अपने लक्ष्य और उसके लिए किये गए आज के कार्यों का मूल्यांकन करते रहें यह ध्यान रखें की कर्त्तव्य लक्ष्य की प्रथम सीढ़ी है और वह आपको अपने उच्च बिंदु पर अवश्य पहुंचा देगी यह विशवास रखें | 
  • अंतिम विकल्प यह की लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आज क्या और किया जा सकता है और क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु मेरे प्रयास संतोष जनक है इसका मूल्यांकन अवश्य करते रहें एवं अपने प्रयासों को और सबल और तीव्र करें | 






Sunday, April 20, 2014

सफलता की सीढ़ी है समस्याएं ,घबराएं नहीं

महाभारत के युद्ध के बाद कृष्ण ने सबको यथोचित आशीर्वाद दिए और जब अंत में वे कुंती से यह कहने लगे की बुआ अब आप भी जो चाहो वो मांग सकती हो ,कुंती ने विनम्र भाव से यही कहा केशव मुझे दुःख दो समस्याएं दो और ऐसी यातनाएं दो जिनसे मै प्रति पल आपसे जुडी रहूँ और आपके ध्यान में बनी रहूँ ,केशव सुख ,साधन सम्पन्नता और अधिक सत्ता का केंद्रीयकरण स्वयं अहंकार को जन्म देता है और केवल यही कारण है जिनसे  मनुष्य अपने मूल उद्देश्य और जीवन का अर्थ खो डालता है केशव मुझे ऐसा सुख नहीं चाहिए | धन्य है भारत की संस्कृति जो मनुष्य को एक बार में ही  पूरी संस्कृति के दर्शन करा डालती है | 

दोस्तों जीवन में जिन लोगो ने समस्या अभाव और कठिन परिथितियों  का सामना नहीं किया हैं वे सब किसी न किसी रूप में पूर्णता नहीं पा सके है ,विवेकानंद, सुकरात, बुद्ध,, टॉलस्टाय ,गांधी और हर बड़े व्यक्तित्व ने उन समस्याओं और कठिन परिस्थितियों का सामना किया है जो सामान्य इंसान की सोच से भी परे  है | सहजता स्वयं सारे द्वार बंद कर देती है वहां इस बात का सोच नहीं होता की हम अपने लिए या समाज के लिए कुछ कर रहे है या नहीं वहां केवल एक आलस्य,प्रमाद और सुख के अतिरेक की स्थिति होती है  जो और अधिक और अधिक सुख की कामना करते करते स्वयं क्षुब्ध हो बैठती है वहीँ से जीवन के मूल्यों का पराभव होने लगता है | 

यहाँ मेरे कहने का आशय यह नहीं  है की हम बेकार ही समस्याओं को बुलाते रहें बल्कि जब जीवन के विपरीत समय में हम खड़े हो तब उन परिस्थितियों से घबरा कर भागे नहीं अपितु उनका सामना धैर्य और निर्भीकता से करें ,जिससे समयोचित उत्तर देकर उन परिस्थितियों को संभाला जा सके | एक छोटे बच्चे को मान बाप रोज डरते रहते थे की दूध पी ले नहीं तो बाबा आजायेगा , ये काम करले नहीं तो बाबा आजायेगा ,स्कूल जा नहीं तो बाबा आजायेगा परन्तु समय और परिस्थिति ने उसे बताया बाबा का भय केवल समस्या और उसके आने पर आपके द्वारा उठाये गए  क़दमों की सफलता की कहानी हैं | 

मित्रों जीवन जिस बड़े सफर का नाम है वहां अच्छा ख़राब ,ऊबड़ खाबड़ , और अनेक कंटकों भरी डगर मिलाना अवश्यम्भावी है और चाहते न चाहते आपको उनका सामना करना ही होगा अब सामना करने के दो मार्ग है एक अपने आपको बेचारा बना कर रो रो कर काम करना और दूसरा पूर्ण धैर्य और शक्ति के साथ समस्या का सामना करना और जीत की प्रबल ज्योति को मन में जलाये रखना बस यहीं से सरे सफलता के रास्ते आपके लिए अति आसान होकर जीवन का पथ प्रदर्शन करने लगेंगे फिर यहीं क्रम जीवन को सफलता की नई नई  दिशाएं प्रदान करता रहेगा और वास्तव में जीवन पूर्ण सफल हो पायेगा | जीवन में इनका प्रयोग अवश्य करके देखें | 

  • यदि बहुत अच्छा समय है तो विपरीत समय भी निश्चित रूप से आने को है और विपरीत समय और अच्छे समय में यही समानता रखना आवश्यक है की दोनों में हम अपनी  आदर्श सोच बनाये रखें | 
  • धैर्य की आवश्यकता केवल विपरीत समय में ही होती है अतैव यह ध्यान रखे की विपरीत समय के निर्णय समय परिस्थितियों और काल के अनुरूप हों क्योंकि प्रेम साश्वत है वैर का अस्तित्व छोटा होता है | 
  • किसी भी परिस्थिति में अपने ,तन  मन और व्यवहार पर पूर्ण नियंत्रण बनाये  रखें क्योकि यदि घबराहट , जल्दबाजी और नैराश्य का आधार बनाया तो हम आधी जंग संघर्ष से पहले ही हर जाते है | 
  • समस्याएँ आने पर यह अवश्य समझे की अब कोई नई उपलब्धि आपके आस पास है और आपको उनका डटकर और पूरी ताकत से निराकरण करना है | 
  • समस्याएं अपना हल स्वयं लेकर आती है एक दार्शनिक ने यह कहा की समस्याएं आपको जीत का बड़ा सुख देने आती है उनके बिना कभी आप स्वयं को जीता हुआ नहीं समझ पाते । 
  • समस्याओं के निराकरण में सकल्प और निरंतर कड़े परिश्रम की आवश्यकता होती है आपको समस्या के समाधान के लिए तुरंत एक कार्य रूप रेखा बना कर कार्य करने की आवश्यकता है । 
  • समस्याओं के समय केवल उनका सोच या दुःख मनाएं जिसमे आप समय रहते कुछ कर सकते थे मगर आप नहीं कर पाये ,उन समस्याओं  जिनपर आपका वश  नहीं है उनका दुःख नही मनाएं | 
  • समस्याओं में कोशिश यह करें की आप अपने शक्ति प्रयत्न और प्रयासों से उन पर विजय प्राप्त करें ज्यादा लोगों को उसमे सह भागी न बनाये अन्यथा वे आपको और हतोत्साहित  कर देंगें | 
  • समस्या के  समय आप अपने कर्त्तव्य और नियत कार्य योजना पर बने रहें और यह विशवास बनाये रहें की ये सब कुछ समय में पूर्णतः ठीक हो जावेगा | 




Sunday, March 16, 2014

शक्ति ,ज्ञान ,और संतोष अनेक कामनाएं है पूर्णता के लिए

हमसब एक शक्ति शाली प्रकृति और ब्रह्माण्ड के अंश है और हमारी उत्पत्ति ,विकास और गति शीलता उस अपरमित शक्तिशाली तत्व का ही क्रियान्वयन है | सामान्यतः हम जब भी अपना आकलन और कल्पना करते है है तोसदैव यह विचार मन में रहता है कि हम बुद्धि , बल ,ज्ञान धन संपत्ति और शक्ति के बिंदुओं पर सबसे ज्यादा बड़े हों, हमारा जीवन ,सुख संतोष और परहित में दिखाई दे हम जीवन के हर भाग में स्वयं को सशक्त ,और श्रेष्ठ सिद्ध कर सकें ,इन्ही सब वैचारिक्ताओं के मध्य जीवन चलता रहता है और हम अपने अस्तित्व की सम्पूर्ण शक्तियों और बल के साथ प्रयत्न रत रहते है जीवन मांगता रहता है कि वह श्रेष्ठ साबित हो पाये|

जिसने  भी संसार में जन्म लिया है उनमे जो प्रमुख  कामनाएं है उनमे धन ,वैभव ,सम्पन्नता , ज्ञान , बुद्धि ,बल ,यश श्रेष्ठता और पुत्र की कामनाएं प्रमुख है कहने का अर्थ यह कि व्यक्ति में सदैव यह कामना बनी रहती है कि वह संसार में सर्व श्रेष्ठ  हो सके वह यही चिंता में रहा कि कैसे भी वह अपने आपको  इस स्वरुप में सिद्ध कर सके कि संसार उसका लोहा मानता रहे ,मित्रों यही सब मांग राष्ट्र , और विश्व के सम्पूर्ण संगठनों की भी है हम चाहे  व्यक्ति हों या सगठन हम चाहे संस्था हो या राष्ट्र हम सम्पूर्ण विश्व के रूप में सबसे श्रेष्ठ  सिद्ध होना चाहते है

मित्रों हम सर्व श्रेष्ठ तो बनाना चाहते है मगर उस महा संकल्प के लिए हमने क्या किया और हमे क्या करना चाहिए इस पर भी विचार करना अधिक महत्वपूर्ण है ,बहुधा  हम बहुत ऊंचा नहीं सोच कर  केवल वर्त्तमान की आपूर्तियों और वर्त्तमान सुख के बारे में ही सोच पाते है परिणाम  यह कि भविष्य के  लिए  सोचे  गए हर स्वप्न को हम मूर्त रूप नहीं दे पाते परिणाम सम्पूर्ण  चिंतन जीवन को संतोष का अर्थ नहीं दे पाता  है  और शिकायतें ,शकायते, और सबसे शिकायते केवल यही क्रम और नकारात्मकताएं हमारे  जीवन का अर्थ हो जाता है फिर हमारा विकास कैसा होगा आप स्वयं  समझ  सकते है |


जीवन का आधार चिंतन , क्रियान्वयन और निरंतर क्रिया शील  रहने में  ही है जब तक हम सब जीवन के इस दर्शन को नही समझ पाएंगे तब तक हम स्वयं को संतोष की  सीमा पर नहीं ले जा सकते ,धर्म कहता हैं कि जीवन का चरम लक्ष्य है मोक्ष प्राप्त करना जबकि मोक्ष ऐसा विषय है जो केवल विश्वास का विषय है जबकि पूर्ण संतोष को भी अनेक विद्वान मोक्ष   के अर्थ में लेते  है  , जीवन में श्रेष्ठ की कामना करना ही  पर्याप्त  नहीं है अपितु उसके लिए कर्म नहीं करने वाले बहुत अधिक यातना का  जीवन जीता  है क्योकि जिसने स्वप्न ही नहीं देखाऔर कर्म नहीं किया  उसने कल्पना ही नहीं की सुख समृद्धि  और प्रसन्नता की मगर जिसने स्वप्न भी देखे मगर उसके लिए प्रयत्न नहीं किये तो उसे बहुत अधिक यातना  झेलनी पड़ेगी क्योकि  वह  अपने स्वप्नों को कर्तव्यों से नहीं जीत पाया है  उसकी कल्पनाये ही उसके जीवन में  कर देती है |
जीवन को सही अर्थों में स्वीकार करने का आशय है स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना और उसके लिए निम्न विचार महत्व पूर्ण होसकते है |
  • जीवन के किसी भी गुण के कारण आप अपना  संतोष का स्तर बनाये रखा सकते है शर्त यह है कि आप स्वयं को एकाग्र कर के  अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण भाव से क्रिया शील हों |
  •  बहुत से गुणों में से एक में श्रेष्ठ  सिद्ध होने के बाद भी जीवन के मूल सिद्धांतों का सामंजस्य बनाये रखिये क्योकि एक गुण आपका विकास करेगा मगर समन्वय आपको आदर्श रूप में बनाये रखने में सहायता अवश्य करेगा 
  • यदि आपको लक्ष्य के अतिरिक्त  स्वयं को शक्ति देने केलिए बहुत सी स्थितियों की आवश्यकता प्रतीत होती है तो आप स्पष्ट समझ लें कि आभी आप सफलता या आदर्श स्थिति से बहुत दूर है | 
  • जीवन का अंतिम लक्ष्य एक ऐसी स्थिति पैदा कर लेना है जहाँ आपको संतोष का स्तर प्राप्त हो आप को किसी से भी शिकायत न हो आप जीवन में क्रिया शील रहते हुए धनात्मक व्यवहार बनाये रखें | 
  • आप आचार विचाऱ एवं क्रियाशीलता और चिंतन से धनात्मक व्यवहार बनाये रखें तथा समयानुसार चिंतन शीलता में अपने लक्ष्य को दोहराते रहें | 
  • सफलता संघर्ष  जय , पराजय आपको एक नया सन्देश देकर  नए उत्साह के साथ जीवन के हर पल अपना संयोग प्रदान करते रहें बस यही संकल्प रखें नकारात्मक विचार न आनें दें | 
  • जहां तक सम्भव हो वहाँ तक सामाजिक , मनोरंजन , पारिवारिक और सांस्कृतिक ,धार्मिक कार्यों में भी एक सीमा तक स्वयं जोड़े रखें परन्तु अपना आधारभूत उद्देश्य नहीं भूलें | 
  • स्वयं के कर्त्तव्य और मेहनत  से  जीवन को जीतने का प्रयास करें , आस पास के लोगों से बहुत सारी अपेक्षाएं नहीं रखें नहीं तो जीत के बाद भी आत्म संतोष नहीं मिल पायेगा | 
  • जीवन को सहजता सरलता और विश्वास के साथ जीने का प्रयत्न करें अपने आप पर अपरमित विश्वास  रखें और अपने आपको धनात्मक क्रियान्वयनता से जोड़े रखें | 
  • अपनी पराजय पर  आप क्रोधित और नैराश्य  पैदा करके स्वयं को और आस पास के लोगो को दोषारोपित न करें बल्कि पूरी चिंतन शीलता से और अधिक संकल्पित होकर चलने का प्रयत्न करें | 

Monday, March 10, 2014

सफलता एवं जीवन को जीतने का एक मार्ग

 एक शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया कि देव मैं  जानना चाहता हूँ कि जीवन की सफलता का क्या राज है और  कैसे आदमी जीवन को जीत सकता है गुरु ने उत्तर दिया पुत्र आप प्रातः बेला में मुझे नदी के किनारे मिलें ,प्रातः गुरुशिष्य नदी पर  पहुंचे और स्नान आरम्भ किया अचानक शिष्य गहरे गड्ढे में डूबने लगा पानी उसके ऊपर हावी होता रहा और वह बेहोशी की हालत में पहुंच गया अचानक गुरु ने उसे जोर का धक्का देकर किनारे पर फेंक दिया शिष्य को सामान्य होने में काफी देर लगी वो ईश्वर और गुरु को धन्यवाद ज्ञापित करने लगा अचानक गुरु ने गम्भीर स्वर में कहा बेटा जबतुम पानी में थे तब क्या चाहते थे गुरूजी स्वांस  चाहता था  और कुछ दिखाई नहीं पड़  रहा था  दम  घुट रहा था और सब कुछ भूल चूका था गुरु ने  कहा  पुत्र सफलता के लिए भी  लक्ष्य की आवश्यकता भी जब इस स्वांस की जरुरत की तरह हो जायेगी तब सारी दुनियां की सफलता तेरे क़दमों में होगी ,पुत्र सफलता की सोच को इतना स्पष्ट कर   कि जीवन में उसके अतिरिक्त कुछ न रहजावें  [
 

जीवनको  जीतने के प्रश्न पर  गुरु ने कहा पुत्र वैसे तो जुएं और जीवन में यह समानता है कि दोनों में अधिकाँश लोगों को हारना ही पड़ता है क्योकि संसार में इन लोगों की ही भीड़ है जो जीवन में  भोग और हार के लिए ही पैदा हुए है मगर  कई बार  अपने कर्तव्यों निश्चय और सामर्थ्य से  आदमी  समय को हरा देता है ,कठिन परिश्रम ,गहरी लगन  ,और हर स्वांस  में कर्त्तव्य का बोध यही उसके लक्ष्य की दिशा बन जाती है ,जिसने गुरु, माता पिता समाज और राष्ट्र के धर्म को बखूबी से निभाया हो जिसकी क्रिया शीलता से जीवन के उद्देश्य पूर्ण हुए हों ,जिसे जीवन में सुखों की चाह से अधिक उद्देश्य की पूर्ती की चिंता रही हो वही जीवन में अपनी जीत हासिल कर सका है ,उसने अपने कर्त्तव्य बोध के सामने किसीको भी छोटा नहीं बताया किसीकी आलोचना नहीं की और न ही किसी से तुलना की  उसने किसी से अपेक्षा ही नही की कि उसे कोई सहारा दे बस यहीं से शायद  वह जीवन जीत सका है ,सिकंदर और सम्राटों के मृत मुख मंडल पर जो भय था वह इन लोगो के मुख मंडल पर नहीं था क्योकि उन्हें जीवन भर कुछ खोने का भय ही कहाँ था वो तो केवल लुटाना जानते थे और यही उनकी  झलकती  शांती का कारण भी था |
 

अब प्रश्न यह उठता है कि आजके परिवेश में जब  अनेक परिवर्तनों में फसां  आम आदमी अपनी सफलता के मार्ग को कैसे प्रशस्त करे ,कैसे स्वयं को सामायिक बनाये और कैसे अपने आपको सिद्ध  करे ,प्रश्न के उत्तर में यह जान लेना अति आवश्यक है कि सफलता और जीत के मायने क्या है ,जीवन में प्रत्येक कार्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उद्देश्य के लिए है पृकृति का हर परिवर्तन सा उद्देश्य ही होता है और सफलता का आशय भी यही से आरम्भ होता है जीवन के लक्ष्य  उद्देश्य और उनके लिए किये जाने वाले प्रयत्न अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पूरे हो पाये कि नहीं बस यहीं से जीवन कीसफलता असफलता का भाव परिणाम रूप में हमे मिलाता है |
आज केवल यहीं आधार महत्व पूर्ण है कि हम किस प्रकार जीवन के मूल प्रश्न के उत्तर को अपने लिए प्रासंगिक बनाएँ जिससे जीवन अपनी सफलता और जीत के लिए हमसे भविष्य में शिकायत नहीं कर सके |
  • सफलता का प्रथम आयाम यह है कि हमे अपने उद्देश्य को सुस्पष्ट रूप से तय करें   और उद्देश्य को हम अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार ही तय करें | 
  • अपने उद्देश्य का निरंतर चिंतन करें साथ ही यह ध्यान रहे कि आपके जीवन में इस उद्देश्य का महत्व सर्वाधिक है और आपको उसको शीघ्र पूर्ण करना है | 
  • उद्देश्यों को प्राथमिकताओं के आधार पर बांटना आवश्यक है जीवन का मूल उद्देश्य एक ही होगा मगर समय परिस्थिति और बड़े उद्देश्य की पूर्ती के लिए छोटे उद्देश्य भी बनाये जाना आवश्यक है | 
  • उद्देश्य व्यक्ति , संसाधनों और प्रतिशोध के आधार पर नहीं बनाये जाना चाहिए अन्यथा पूर्ती के बाद भी जीवन में अतृप्तता असंतोष और विद्रोह के कर्क पैदा हो सकते है 
  • जब आप अपने उद्देश्य के लिए सघन प्रयत्न कररहे हो तब सामाजिक प्रताड़ना ,बधायें और अनेक कठिनाइयां आपका मार्ग रोकने को आएंगी मगर यदि आपने इन सब को महत्व न देकर अपने उद्देश्य को महत्व दिया तो शायद आप अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुंचेंगे | 
  • उद्देश्य के हर भाग को निश्चित समयाविधि में पूरा किया जाना चाहिए और समयानुसार उसका मूल्यांकन भी किया जाता रहे क्योकि उससे जीवन की कमियां स्पष्ट हो जावेंगी | 
  • असफलता ,और आलोचना का उत्तर अपने कर्त्तव्य से दिया जाना चाहिए था यहीं समझना अधिक सही होगा कि असफलता और आलोचनाएं आपको परिष्कृत करने का एक मार्ग है | 
  • क्रोध , लालच ,और मन नहीं लगने के भाव यह बताते है कि आप अपने उद्देश्य से भटक गए है और आप पर उद्देश्य से अधिक अपने आपको व्यस्त करने  की समस्या है | 
  • कठिन परिश्रम ,नियत रूप रेखा , और अनवरत प्रयत्न और आकलन आपको जीवन के हर उद्देश्य में जिताने का सामर्थ्य रखता है शर्त केवल यह है कि आप पूर्ण विश्वास के साथ कर्त्तव्य पथ पर चलते रहें | 
  • झूठ , धोखा , असत्य ,और बार बार अपने उद्देश्यों को बदलने के कारण सफलता में संदेह उत्पन्न ही जाता है और ये दुर्गुण आपसे सफलता  और उससे उत्पन्न संतोष का सुख कभी प्राप्त नहीं होने देंगे | 

सफलता एवं जीवन को जीतने का एक मार्ग 

जीवन की बहुमूल्यता का मोल केवल यही था कि आप उसे जीतकर  ही निकलें आपके उद्देश्य इतने बड़े और प्रभावी हो कि वे समाज को वह दिशा दिखा सकें जिसका इतिहास सदियों तक इंतज़ार करता है ,दोस्तो आपकी शक्ति से ही नए समाज को दिशा मिलेगी और जीवन सफलता का मायने बन पायेगा एक बार पूरी ताकत से इसे क्रियान्वित करने का संकल्प अवश्य करें 



Saturday, March 8, 2014

किससे है  शिकायत यहाँ चहरे नकाब में है 

आदमी सामाजिक प्राणी है और  बड़े से बडे समाज बनाकर वह  अपने आपको बहुत बड़ा मान बैठता है और जिनके साथ समाज दोस्त और बड़े समूह नहीं होते वो अपने को हीन  मान बैठते है और तमाम सारी नकारात्मकताओं को अपने आप पर थोप डालते है परिणाम यह कि उनकी सकारात्मक ऊर्जा नकारात्मक होने लगती है और खुद अपने आप से शिकायतों के समूह जीवन को और अधिक कठिन बनाने लगते है कहने का आशय यह कि हम स्वयं ही अपनी नकारात्मकताओं के लिए जिम्मेदार बन जाते है | हम मानते है कि आदमी को अपने समाज, मित्र  और एक परिवार समूह की आवश्यकता अवश्य होती है और वह अपना सुख दुःख सब कुछ उनसे जोड़ कर देखने लगता है और सम्पूर्ण अस्तित्व का उत्थान पतन इनसे ही बंधा दिखाई देने लगता है शायद यह एक बड़ा कारण है युवा के नैराश्य ( डिप्रेशन ) का जो आज एक बहुत बड़ा कारण बन गया है युवा समस्याओं के लिए | 


अब इसका दूसरा पक्ष देखिएआदमी  सबसे अधिक अपने आपको प्यारकरता है और हर सम्बन्ध को अपनी कमियों को पूरा करने के लिए बनाना चाहता है और अब यहाँ एक और अंतः द्वन्द खड़ा हो जाता है कि हर आदमी एक दूसरे से बहुत सारी कामनाएं कर बैठता है और यह सम्बन्ध एक फ्रीस्टाइल कुश्ती जैसा माहौल बना देता है हर आदमी अपनी बुद्धि और शक्ति  के अनुसार सामने वाले का शोषण करने लगता है यहाँ यह खेल इस तरह चलता है कि किसीका भी किसी भी स्तर तक शोषण किया जा सकता है , सहानुभूति की चाशनी अपनत्व की कसमें और अनंत ईश्वर के श्रेष्ठ गुणों का वास्ता देकर आदमी को धोखे पर धोखा दिया जाता है और अधिकाँश युवा इस बड़े दल दल में उन नकाबी मगरमच्छों के शिकार हो बैठते है जिन्हे वे अपना सबसे करीबी और जीवन का आधार मान बैठे थे | यहाँ बनावटी व्यवहार के कारण हमारा शोषण करने वाले हमारा उपयोग करते रहते है ,हमे जब मालूम होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | 


यहाँ एक तीसरा पक्ष भी जुड़ जाता है कि हमें हरेक से शिकायतें रहती है क्योकि हम स्वयं को  बहुत  प्यार करते है और सबसे यही उम्मीद करते है कि वो हमे सर्वाधिक  महत्व दे परन्तु यह तो केवल स्वप्न ही है न क्योकि हर आदमी आपके सम्बन्धों में आने से पहले यह तय कर लेता है कि वह आपमें से क्या लूट सकता है अर्थात आप उसकेकिस काम के हो ,कैसा प्रोफेशनल युग है कैसा प्यार है कैसा सम्बन्ध है जिसमे सबकुछ तय है , और सम्बन्ध के मायने केवल एक दूसरे को धोखा देकर अपने आपको आदर्श साबित करना होता है ,क्या इसे सम्बन्ध ,प्यार अपनापन या समाज कहते है क्या ये सब मेरे स्टैट्स सिम्बोल (बड़ा बताने कि इच्छा ) के लिए जरूरीहै यह मन पर एक बड़ा प्रश्न चिंह् बन कर खड़ा हो जाता है |   

बड़ा ही सहज एवं  बड़ा पेचीदगियों से भरा है जीवन का यह सफ़र ,मगर एक बार इसकी बारीकियों को यदि समझ लिया जाए तो शायद आपको जीवन दुःख नहीं दे पायेगा ,हर आदमी अलग अलग चेहरे लगाये खड़ा होता है अपने अपने उद्देश्यों को लिए ,बड़े  बड़े आदर्शों का सहारा लेकर निहित स्वार्थों की आपूर्ति के लिए संघर्षरत तमाम रिश्ते हमारे सामने केवल इस लिए खड़े होते है कि वे आपकी तुलना में स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर पाएं , रिश्तें ,मित्र।,समाज ,अपने ,और हमसफ़र की इतनी वीभत्स परिभाषा हो सकती है यह स्वयं समय पर ही निर्भर होता है ,दोस्तों केवल कुछ एक लोग ही इस दल दल से विकास शिखर की दौड़ में  ऊपर पहुँच पाते है अन्यथा  अनेक युवा अपनी हताशा की पराकाष्ठा पर अनुचित निर्णय ले बैठते है | 

स्वयं के मूल्याकन के समय यदि आप ने निम्न मान दडों का ध्यान रखा तो निश्चित ही आपको समय श्रेष्ठ साबित कर सकता है 

  • जीवन में अपने , रिश्ते , सम्बन्ध केवल आधार भूत रिश्तों में ही निहित समझे माता , पिता भाई बहिन गुरु शायद यही आधार भूत रिश्तों के मायने है इनके आलावा हर रिश्ते को परखते रहें | 
  • आधारित जो सुख दूसरों पर आधारित हुआ वह अंततोगत्वा  हमारे दुःख का कारण अवश्य बनेगा क्योकि आदमी का स्वाभाव है कि वह सबसे पहले अपने को सुख देता है | 
  • जीवन एक दिन उन रिश्तों की असलियत आपको जरूर बताता है मगर एक नशे के आदी व्यक्ति की तरह हम  अपने मन को मनदिलासा देकर सत्य को असत्य साबित करते रहते है | 
  • दूसरे के मूल्याकन और अपनी स्वयं की त्रुटियों को दूसरों पर दोषारोपित करने से आपके व्यक्तित्व में नकारात्मकता ही बढ़ेगी 
  • कैसा अजीब स्वभाव है इस आदमी का वह उस व्यक्ति से सबसेअधिक नफ़रत !घृणा और विद्वेष मान बैठता है जो उसके जीवन की अधिक चिंता करते है क्योकि उन्हें ही बार बार टोकना रोकना अच्छा बुरा बताना होता है और बार बार यह नियंत्रण क्रोध का कारण न बनकर विचार का कारण बनना चाहिए 
  • अपने जीवन में किसीको आदर्श मान कर उनका अनुशरण अवश्य करें जीवन की क्रिया शीलता में जब व्यवधान आये वहाँ परामर्श लिए जाए सकते है |   
  • स्वयं की तुलना किसीसे न करें क्योकि आप ईश्वर की स्वतंत्र और श्रेष्ठ इकाई है और आपको किसी निश्चित कार्य के लिए पैदा किया गया है आपको उसे पूर्ण करना है | 
  • जीवन अनमोल है उसकी कीमत समझकर चलें और आप कहाँ जा रहें है यह स्पष्ट तय  समझे  यद् रहे जीवन के किसी भी भाग में सॉरी नहीं होती अतैव जीवन के  हर क्रियान्वयन को धैर्य और चिंतन के बाद क्रिया स्वरुप में परणित  करें | 
  • शिकायत का बार बार खड़ा होनाआपकी कमजोरियों को बताता है और यहीं  से आपका व्यक्तित्व नकारात्मकता  की दिशा में मुड़ने लगता है | 
  • आनंद संतोष और श्रेष्ठ लगने के लिए आदमी हजारों उपाय करता है मगर ध्यान रहें कि आनंद का स्त्रोत्र आत्मा का विषय है जहाँ आपको भौतिक सुख सुविधाओं एवं शरीर और मन के बहुत अधिक प्रयोग और अच्छी वस्तुओं स्थान  और हजारों भौतिक सुविधाओं केंद्र बन कर स्वयं को प्रसन्न मानते है तो आपको केवल यातनाएं ही सहनी होंगी क्योकि इसका कोई अंतिम छोर है ही नहीं 

मन  विचार और कर्म का  प्रयोग सदैव धैर्य और कर्त्तव्य से जुड़ा है ,संसार में अकेला आया व्यक्ति अकेले ही जीवन में  अविराम गति से अपने लक्ष्य की और अग्रसर है यहाँ केवल स्वयं के बल और आत्मा की  दिशा में चलने वाले को वो दुर्लभ आनंद अनुभूति प्राप्त हो पाती है जो समय बहुत कम लोगो को प्रदान करता है अन्यथा यहाँ केवल भीड़ की तरह आदमी भागता रहता है और आनंद आगे आगे भगता रहता है एवं जीवन प्यासा का प्यासा ही रह जाता है | 


भीड़ सा निर्मूल्य मत बनाओ जीवन को  dont make yourself useless crowd

कब तक महा पुरुषों के पद चिन्हों पर चलने का प्रयत्न किया जाए कब तक समय परिवर्तन और आधुनिकता के लिए  समय के साथ भागने का प्रयत्न करें ,शायद हमारी मौलिकता ख़त्म हो चुकी है हम बहुत सारी नावों पर एक साथ भागने के चक्कर में अपनी आत्मानुभूति ,आदर्शों  और हर जगह अस्थिर हो गए है शायद पुराने  मान दंड इस तरह से बदल दिए गए जिनका कोई महत्व ही नहीं रहा एक आधुनिकता प्यासी आधुनिकता जिसमे केवल अतृप्तता ,बेइंतहा खालीपन और नैराश्य है अच्छा बुरा सोचने का मायने केवल यह कि वह  उस समय अच्छा लग रहा है या नहीं ,यही दौड़ है ,यही विकास है, यही सांकृतिक प्रतिमान है तो भविष्य  का क्या ईश्वर जाने ।भीड़ सा निर्मूल्य मत बनाओ 


 जीवन  उन मान दडों का नाम है जहाँ अधिकाँश लोग एक भीड़ में जीने  का प्रयत्न करते है उनमे साहस नहीं  होता कि वो समाज को कोई आदर्श, सन्देश ,और सीख दे सके वे एक सामान्य भीड़ की तरह बिना नाम के ही होते   है  अपनी उपलब्धियों के लिए सजग और क्या चीज उन्हें सुख देगी यह आकलन, बस पूरा जीवन छोटी छोटी सी चीजों को बटोरने में लगा रहता है, केवल अपनी आपूर्तियाँ अपना स्वार्थ और अपने खोखली धारणाये लिए हम चलते रहते है यह भूलकर कि यह जीवन केवल इसका नाम ही नहीं कुछ पाने , बनाने और जीवन के अंत में  एक सुस्पष्ट  मार्ग छोड़ जाना जिसेसमय ,इतिहास औरभविष्य   हजारों साल तक नमन करता रहे |
 विवेकानन्द ,भगतसिह,सुखदेव,अरस्तु, आयस्टीन  गांधी मंडेला ,रामतीर्थ राम रहीम और ईसा ये सब आज हमारे मन में सर्वोपरि लगते है देश की  रक्षा में लगा नौजवान अपने सारे रिश्ते ,सुख ,सुविधाएं प्रेम और परिवार छोड़कर एक लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है ,अपने सारे जीवन को बलिदानी जत्थों में बदले हुए देश की  सुरक्षा में लगे सैनिक बर्फ में अपने गलते हुए अंगों  की वेदना से अनभिज्ञ एक लक्ष्य की और संकल्पित दिखाई देते है और हम युवा यदि केवल अपने स्वार्थों , उपलब्धियों  को प्राप्त करने में लगे है तो शायद चयन आपको ही करना होगा ,|

दोस्त जीवन इसका नाम नहीं है कि आप कितने प्रसन्न और अमीर हुए न ही उसका मायने यह है कि आपने शारीरिक और मानसिक  तौर पर कितना सुख  भोगा ,या आप समाज में कितने प्रसंशित हुए बल्कि सही अर्थों में जीवन का मायने यह था कि आपने अपने समाज राष्ट्र ,परिवार और लोगों के प्रति क्या किया क्या जीवन पाने का नाम है नहीं , बल्कि त्याग ,अपरिगृह और सबकुछलुटा देने का संकल्प है जीवन का नाम ,हम धन वैभव योवन ,सुख ,रूप रंग और आधुनिकता की दौड़ में केवल यदि अपने स्वार्थों और अपनी उपलब्धियों को ही याद रखरख  सके तो भीड़ की ही तरह समय हमें शीघ्र  मिटा   देगा 

  • समय न मेरा हुआ न तुम्हारा होगा उसे बांधने के लिए आपपर लक्ष्य होने चाहिए अन्यथा आपका जीवन रथ वैसे ही भटक जावेगा जैसे तिनके आन्धी  के प्रचंड वेग में भटक जातेहै। 
  • लक्ष्य कीप्राप्ति और चिंतन! तथा उसके लिए प्रयत्न का एक अनवरत  क्रम चलता रहना चाहिए जैसे ही आप इस गति को भूले तुरंत आपका लक्ष्य आपसेआपसे  दूर होने लगता है | 
  • प्रेम गली अति  साँकरी  जा में दो न समायें ,अर्थात  एक समय में एक से ही प्रेम हो सकताहै ,हम या तो अपनी उपलब्धियों स्वार्थ और सुख की बात करलें या फिर अपने लक्य की सफलता 
  •  सफलता जीत ,का शॉर्टकट हो सकता है मगर ध्यान रहे कि जीवन में उद्देश्य तक पहुँचाना और उसके सम्पादन के बाद संतोष  का स्तर बनाना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है | 
  • सुख दुःख और मन अपमान कि कामनाएं मन को कमजोर और लक्ष्य से भटकाने का प्रयत्न करती है बार बार यह प्रयत्न क्यों कि सब हमारी प्रसंशा करें सुख दुःख में सम भाव  बनाये रखें 
  • जीवन में समाज के   हर निर्णय से आप खुश हो यह जरूरी तो नहीं है ना ,मगर  यह ध्यान रखें कि अपने लक्ष्य के मार्गों से समझौता नहीं करें | 
  •  आदर्शों को बहुत अडिग बनाइये और उनसे समझौता न किया जाए आदर्शों के लिए सम्बन्धों की बलि चढाने में भी संकोच नहीं करें क्योकि यह आवश्यक नहीं कि आप व्यक्ति समय और परिवेश के साथ अपने आदर्श बदलते रहें 
  • जो कार्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए किये जाएँ उनके लिए दूसरों कि सहमति की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए क्योकि ये आपके भविष्यभके स्वरुप को भी तय करेंगे | 

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...