Saturday, July 11, 2009

मतभेद ज्ञान का प्रतीक हैं जबकि मनभेद जलन का


मतभेद ज्ञान का प्रतीक हैं जबकि मनभेद जलन का


जीवन में बार बार हमे अपनों के मतभेद का सामना करना पड़ता है |क्योकि वे एक अलग दृष्टी से हमे देख रहे होतेहै जबकि हम अपनी द्रष्टि से अपने लिए दूसरा मार्ग चयन कर चुके होते है |ज्ञान परिवेश और परिस्थितियों केहिसाब से जीवन का आंकलन किया जाना उचित लगता है मगर बदलते समय की सोच परिवारों की दशा औरशिक्षा का प्रभाव भी हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है |साथ ही हमारी जरूरतें ,महत्वाकांक्षाएं हमे बराबरउलझाए रखती है |जबकि दूसरी और पुराने विचारों और सोच का सवाल उठ खड़ा होता है ,रिश्तों में छोटा बड़ा औरपालन करता और आश्रित जैसे भाव स्वयं खड़े हो जाते हैं |कहने कॉ आशय यह कि सोच, पीढियां , दायित्व ,समयऔर हमारी कामनाएं नए रूप में अपना अन्तराल बनाकर स्वयं मतभेद कि परिभाषा बनाने लगाती है मुख्यत: यही मतभेद के कारण होते है ,इनकानिराकरण करते करते आदमी का जीवन का बड़ा भाग ऐसे ही बीत जाता है|

मत भेद ज्ञान और तर्क शास्त्र कॉ विषय है जब हम ज्ञान और भविष्य या वर्तमान कि सोच को महत्व देते हुएकिसी भी विषय को अलग ढंग से सोचने का प्रयत्न करते है तो स्वयं एक अलग द्रष्टिकोण हमे नजर आने लगता हैक्योकि दूसरा व्यक्ति हमारे आत्म तत्त्व से पृथक हमसे अपने को जोड़ कर देख रहा है ,परिणाम उसकी द्रष्टि में वहीआंकलन अलग होगा जो हमने अलग ढंग से सोचा था परन्तु यह कहना मुश्किल है कि इस मतभेद में कों सा पक्षसही या ग़लत है यह सब समय परिस्थितियों और आदर्शों पर निर्भर करता है|

मतभेद होने काकरण ज्ञान .,शिक्षा या परिवेश कुछ भी हो मगर वह एक अलग ढंग कचिंतन है इस लिए उसे हमेशाप्रोत्साहित करें जब तक मंथन नहीं होगा तब तक सार तत्त्व कभी भी परिष्कृत रूप में आपके सामने नहीं आसकते हां यहाँ यह महत्व पूर्ण है कि मतभेद ज्ञान कॉ मायने हो सकता है मगर मन भेद नहीं होना चाहिए क्योकिबहुधा मतभेद से हम अज्ञान- के कारण मनभेद उत्पन्न कर बैठते है यह मन भेद वास्तव में स्वार्थ कॉ परियायहैऔर इसका उदय भी अज्ञान- के कारण होता है |

आवश्यकता इस बात कि है कि हम हर परिस्थिति और कर्म को अलग दृष्टी कोण से भी सोच कर देखें शायद यहींसे आपको अच्छे ख़राब कॉ असल भेद ज्ञात होगा, मगर किसी भी हाल में मतभेद के कारणों को मनभेद तक नाआने दे ,अन्यथा आपकी तमाम क्रिया शीलता एक स्वार्थ, जलन और हीन भावना का रूप ले बैठेगी और आपकाविकास मार्ग स्वयं अवरुद्ध होजायेगा |

शेष फिर

Thursday, July 9, 2009

क्रोध कमजोरी का परिचायक है

क्रोध कमजोरी का परिचायक है
प्राचीन से धर्म और साहित्य यह सिद्ध करते रहे है कि आदमी कॉ सबसे बड़ा शत्रु क्रोध है |दर्शन के विद्वान मानते है कि आदमी कि निरीह पन या कमजोरियां क्रोध पैदा करती है, क्योकि सर्व शक्तिमान को क्रोध आता ही नहीं है, क्योकि वह पूर्व नियोजित ढंग से सबकुछ शक्तियां अपने हाथ में ही रखता है|वैज्ञानिक मानते है कि क्रोध से शारीरिक मानसिक और बाह्य जगत पर पड़ने वाला प्रभाव ऋणात्मक ही होता है और वह उस के लिए ही घातक होता है जो यह क्रोध कर रहा है |पारिवारिक शान्ति सहजता और समाज के सुख कि विषयस्थितियां क्रोध से पर्याप्त रूप से प्रभावित होती रहती है ,एक स्वस्थ्य समाज ,परिवार और श्रेष्ठ परिकल्पना के लिए क्रोध रहित स्थिति की आवश्यकता है |शायद विश्व के धरातल पर इससे अधिक कुछ महत्व पूर्ण नहीं हैं |

हम सब अपने वातावरण ,समाज परिवार ,और अपनों से यह आशा करते रहते है की वे हमारे अनुसार कार्य करें और हम उन्हें अपने नियमों और विधान के अनुसार ही चलने की उम्मीद करते रहें यदि यह ज़रा भी परिवर्तित हुआ तो क्रोध स्वतः हमें प्रभावित करने लगता हैं |प्रत्येक आदमी की अपनी अपनी कार्य शैली होती है और सबका अपना अपना अलग चिंतन मगर हर आदमी आपसे अपने अनुसार चलने कीआकांक्षा रखता है, यहाँ यह बात और महत्वपूर्ण है की हर आदमी अपने विचारों को सर्वोपरि सिद्ध करने की कोशिश भी करता रहता है ,फिर तो सामंजस्य की समस्या खड़ी होनी ही है | आज हम परिवारों और समाज में एक ऐसा ही द्वंद झेल रहे है ,हमारी तमाम कोशिश यही रहती है कि हम जो भी कर रहे है वह सबको हमारी तरह ही अच्छा लगे ,और यदि अच्छा नहीं लगे तो भी हमारे लिए कोई कुछ ना कहे ,ये सब बातें ही पैदा करती है द्वंद का वातावरण |

एक बच्चे ने स्कूल से लौट कर अपनी माँ से शिकायत की कि जब बस आयल ले रही होती है तो सब बच्चे बहार निकलकरपन्द्रह मिनट के लिए वहां खेलने लगते है, परन्तु एक बुड्ढा बाबा मुझे बहुत रोकता टोकता है अच्छे से खेलने नहीं देता डांटता भी है ,और केवल मुझे देखता है| , माँ को यह बात बहुत बुरी लगी उसनेपिता
कहा कि वो बुड्ढा मेरे बच्चे को डाँटता फटकारता मरता रहता है तुम जाकर एक बार उसे ठीक करदो ,पिटा गहन सोच में डूब गया ,उसने बच्चे से पूछा कि वह क्यो डाँटता है, तो बच्चे ने कहा वहां से गाडियां मोटर निकलती है वो मेरा गुन कर रास्ता पर कराता है मुझे दौड़ने नहीं देता ,और बच्चो के साथ स्वछंदता से खेलने नहीं देता| एक दिन तो मुझे रोकते में एक बस ने उसका पाँव तोड़ दिया अच्छा रहा ,पिता ने पत्नी को और बेटे को बताया कि बेटा तुम जिससे सबसे ज्यादा नफरत करते हो वो तुम्हारे बाबा है वे मेरे पिटा है और हमारे परिवार के विघटन के बाद भी उन्हें तुम्हारी सबसे ज्यादा चिंता है|इस कहानी को पढ़ कर मुझे यह लगा कि यह क्रोध के परिवेश को स्वतः प्रमाणित कर देगी |लेखक के भाव से मुझे स्पष्ट होगया कि जो आपका जितना अधिक प्रेम करने वाला होगा वह उतना ही नफरत कॉ मायने भी बन जाएगा ,बस हमारी कमी यह होती है हम असीमित प्रेम और अपनत्व से बंधे यह चाहते रहते है कि हमारे अपने को कोई तकलीफ नहो उस्का भविष्य सुरक्षित हो|

कामोवेशकी हम सबका भी यही हाल है ,हमे यह ज्ञान ही नहीं है कि हमे कौन निस्वार्थ और सबसे अधिक प्रेम करता है ,हम अपनी शारीरिक मानसिक और तमाम समय से जुडी स्थितियों की मांग के हिसाब से प्रेम कॉ एक नकली और बनावटी भाव दे बैठते है और उसके ही भ्रम में जीवन के महत्वपूर्ण पल गुजार देते है ,ऐसे समय में हर वो बात जो हमारे इस कर्म में आदे आती है उसे हम झुठला देते है और वे लोग जो हमारे परम हितैषी होते है हमे शत्रु समान लगाने लगते है |मित्रों यह आज की यही त्रासदी है हम वर्तमान कॉ सुख प्राप्त करने की चेष्टा में भविष्य दांव पर लगा बैठते है |

आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने आप में निम्न पैदा करें

  • जीवन में स्वयं सत्य पर चले और सबसे उम्मीद भी यही करें ,सत्य कॉ सामना करने के लिए आप भयाक्रांत न हो क्योकि यही आपको बाद में ताकत देगा |
  • वर्तमान को अपनी कठिन मेहनत से जीतने कॉ संकल्प करें ,उसके लिए धीरज और विनम्रता से काम ले,कार्य स्थल को अनवरत क्रियाशीलता प्रदान करें |
  • अपने आदर्शों का निर्माण करें और उनपर चलने कि कोशिश करें
  • अपना जीवन कॉ मूलभूत उद्देश्य निश्चित करें और उसमे आपकी इच्छाएं ,मित्र और आपका परिवार और समाज भी आदे आए तो उनका सामना करें
  • ध्यान रहें कि जीवन कॉ उद्देश्य उम्र ,सोंदर्य ,शारीरिक और सामायिक उपलब्धियां ना, हो उसमे व्यक्ति और क्रिया से प्राप्त संतोष की बजाय जीवन सार के रूप में उपलब्धियां हो |जीवन का अन्तिम उद्देश्य आपके जीवन की सफलता कॉ आयना है |जो उद्देश्य व्यक्ति ,समय ,क्रिया,और केवल सामायिक सुख से बंधा होता है वह जीवन को पतन के मार्ग पर ले जाता है ,और एक लंबा ना ख़त्म होने वाला अपराध बोध बन जाता है |
    • जीवन की गलतियों से घबराए नही ,असफलता आपको और अधिक परिश्रम और संकल्प से जीवन जीतनेकॉ निमंत्रण देती है ,आप जरूर सफल इसके अतिरिक्त होंगे
    इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे तथ्य है जिनमे अपना आंकलन , गर्व,वभाव ,धन ,सोंदर्य,का अहम् ,और अपने आप को सर्वज्ञ समझ कर सबको मूर्ख मान लेना भी आपके क्रोध कॉ कारण हो सकता है |आप स्वयम को सदैव एक प्रशिक्षु की तरह रखें और नया नया सीखने की ललक बनाए रखें ,सबसे सहज प्रेम और मित्रता कॉ व्यवहार बनाए रखें |अपने मूल उद्देश्य के लिए सतत प्रयत्न शील बने रहें ,किसीसे भी अपनी तुलना करके आप अपने गुणों और महत्वता को कम कर रहे है जबकि आप आत्मा और अपने गुणों से कहीं अधिक महत्व रखते हैं |

    |शेष फिर |

Wednesday, July 8, 2009

इंसान

इंसान जाल मे फंसा एक जीव है

जो मुक्ति की चाह में तडफडाता है

अपनत्व रूठ जाने पर घबराता है

जीवन भर संजो कर रखा था जो अपनत्व घट

जब अपनी ही ठोकर से फूट जाता है

तो फिर टूट जाता है

Monday, July 6, 2009

गुरु जीवन की धनात्मकता है

गुरु जीवन की धनात्मकता है
गुरु एक तत्त्व है जिसका उदय जीवन के साथ ही होता है |वह आदमी के मष्तिष्क में सेल्स के स्वरुप में ही जन्म लेता है क्योकि हिंदू रीति के अनुसार इंसान को बार बार जन्म लेना होता है और गुरु भी वही रीति निभाने के लिए
आपके साथ ही रहता है |मष्तिष्क के दौनों भाग विभिन्न भावनाओं के प्रवर्तक माने गए है जिस भाग से आत्मा कॉनिर्णय ,परमार्थ की भावना ,और पर सेवा जुडी होती है ,उसी भाग का गुरु द्वारा प्रतिनिधित्व करता है |गुरु एक ऑरआपको धनात्मक भाव ,प्रसंशा ,ऑर प्रोत्साहन देता है वहीं वह हर ग़लत कार्य के लिए आप में बड़ा अपराध बोधखडा कर देता है, ये बात ओर है की आप उसकी क्या बात सुने या किसपर अमल करें |हम जबभी कुछ ऋणात्मककरते है या सोचते है तो यही तत्त्व हममे बडा प्रतिद्वंद खडा कर देता है ,वह बताता है की यह बाद में कष्ट कॉ कारणबनेगा ,मगर हम शारीरिक मानसिक ऑर सामायिक उत्तेजना के कारण उसे अन सुना कर देते है, फिर तो परदे परपरदा डालते हुए हम उन त्रुटियों के गुलाम बन बैठते है यही से आदमी का पराभव आरम्भ हो जाता है ,ऐसे मेंआवश्यकता होती है एक ऐसे इंसान की जो आपकी हर समस्या को समझे ऑर उसे समूल नष्ट करे |वह आपके गुरुके अलावा कोई और नहीं हो सकता |

वर्तमान में गुरु की छवि पर ही प्रश्न चिह्न खडा हो गया है ,वे लोग जो स्वयं अपनी कमियों से नहीं उबर सके वे बड़ेबड़े मंचो से यह घोषणा करते है कि गुरु प्रदर्शनी में आप भी गुरु बनाइये ,परिणाम यह रहा कि नातो गुरू मुक्त होपाया नही शिष्य का कुछ भला कर सका |गुरु के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया यह सब गुरु का चयनऑरउसके गुण आदमी के उत्थान में महत्वपूर्ण हैं |जो गुरु आपके व्यक्तिगत जीवन की परेशानियों ,स्वभाव औरआपको समयानुसार मार्ग दर्शन न देने की स्थ में हो वह सर्वथा अयोग्य है होगा | अवं शिष्य के सम्बन्ध मेंसाहित्य ने बहुत कुछ लिखा है जो दौनों के लिए मार्ग दर्शन भी है |

लोभी गुरु लालची चेला ,पडा नरक में ठेलम ठेला

हरही शिष्य धन शोक न हरही ते गुरु घोर नरक में पड़ही

गुरु सन कपट मित्र सन चोरी ,या हो अंधा या हो कोडी

पानी पीवे छान के ,गुरु बनाए जान के

कहने का अभिप्राय यह कि गुरु किसी भी परिस्थिति में बिना विचार ऑर बिना सोचे नहीं बनाना चाहिए के उसकेलिए केवल समय का इन्तजार कीजिये गुरु आपको स्वयं ढूढ़ लेगा ,आप केवल यह ललक रखिये कि आपकोउसकी जरूरत है|

गुरु अपने शिष्य से अनगिनत सम्बन्ध बनाए रखता है वह हर सम्बन्ध में आपका अन्तः जान कर आपकोविकास के मार्ग पर लेजाने में सक्षम है |शिष्य कॉ कर्तव्य है कि वह गुरु की भावनाओं के अनुरूप मार्ग काअनुशरण पूर्ण निष्ठां से करे ,इसमे अपनी वैचारिकता को आडे न आने दे |सब्र ,संतोष शान्ति ऑर पूर्णता यदि गुरुमें नहो तो उसका त्याग करना त्याग उचित है |

जीवन को वास्तविक गति शान्ति ऑर पूर्णता देना गुरु कॉ दायित्व है आवश्यकता यह है की आप स्वयं को गुरु केपास अपनी सारी अच्छाइयों बुराइयों के साथ पूर्ण समर्पित करदें ,इसमे दुराव छुपाव आपके लिए दीर्घ कालिकदुःख कॉ कारण बन सकता है ,आपको पूर्ण विशवास ऑर श्रद्घा के साथ गुरु समर्पण को तैयार होना है मेरा माननाहै की एक बार आपने गुरु को समर्पण दिया तो फिर तो गुरु आपके मार्ग का स्वयं पथ प्रदर्शक बन जायेगा
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गुरु शरणम्

Sunday, July 5, 2009

बदलते रिश्ते परिक्षा की घड़ी है

"जो आप पर था और जो मुझ पर नहीं था इसका कारक घमंड नहीं, ईश्वर था "
आप केवल उस कुत्ते की तरह गाडी के नीचे चलते हुए भरम पाले रहे कि गाडी आप से चल रही है

समय
परिस्थिति और कालके अनुसार सब कुछ ही तो बदलता है तो हमारे अपने क्यों नहीं बदलते, रिश्ते परिवार अपने सब ही तो समय, उसकी प्राप्तियों और स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते है उन्हें अपनी उपलब्धियों कॉ घमंड और भविष्य के लिए नई योजनाओं से धन वैभव और संपत्ति की बड़ी कामना होती है और इसके लिए उनका दूषित मन किसी भी स्तर कॉ प्रयोग करने से नहीं हिचकता भले ही वो आगामी पीदियों को यही सिखाते सिखाते स्वयं उसका ही शिकार क्यो ना हो बैठे |
जब उपलब्धियों की बात चले तो यह भी बताना उचित होगा की ये उपलब्धियां जिस अतीत के सहारे है ,उसे हमने तिरस्कार और घ्रणा कॉ विषय बना डाला ,हमने क्या क्या दायित्व और अपनत्व पूरा किया उसके लिए, यह उनकी आत्मा ही जानती है ,परिवार का सहारा ,प्रेम ,अपनत्व ,और स्वतंत्रता ने हमसे वो भाव भी छीन लिए जो परिवार के किसी मुखिया को जीने कॉ संबल देते है ,जब हम किसी ऐसे आदमी को केवल अपने संसाधनों का ,आय और स्तर का अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए उपयोग करने लगे और सबसे निकटतम् लोगों से भीउसे परायापन ,आशान्ती और तिरस्कार मिलने लगे तो आप ही बताइये ऐसा इंसान क्या करेगा ?
जो कल बचपन में थे वो आज बड़े है और कल और भी बड़े होंगे और वे जो मूल्य अपने बच्चों को सिखा रहे है वेही मूल्य उनपर फिर लागू होंगे ,सम्पति ,धन, बल, और आयु किसी कॉ साथ नहीं देती, तो वो आपके साथ कैसे रह पाती, यदि आपने किसी का चैन सुख ,संतोष और शान्ति छीनी है तो आपको सजग होजाना चाहिए क्योकिं उस ईश्वर ने आपके भाग्य की रेखा में भी ऐसे विधानों को पैदा करना शुरू करदिया है जो आपको आपकी हर मानसिक वाचिक और कर्म के अनुसार दंड देगा| आपको हिसाब देना होगा हर रिश्तों की दरार के कारण में केवल आप ही तो थे ,और वो फ़र्ज़ आपने दुश्मनों की तरह निभाया है |प्रकृति का न्याय बहुत बेरहम होता है उसमे क्षमा होती ही कहाँ है ,आप यदि कुछ अच्छा करे तो एक शक्कर मिलाये यदि ख़राब करें तो एक चमच्च मिर्च मिलाये ध्यान रखें की यह आपको ही पीना है |यदि आपने कुछ अच्छा किया ही नहीं है तो आप कैसी शान्ति और सुख की उम्मीदकैसे कर सकते है |
समय धर्म और विरासत बहुत बड़ा जबाब है इन सबका हमे यही चाहिए कि धन वैभव ,संपत्ति ,और अपनी स्वतंत्रता के लिए उतना ही विचार करे जितना आवश्यक हो ,बहुत से लोग करोड़ों की जायदाद पर बैठ कर भी और, और, चिल्लाते रहते है उमकी तृष्णा एक रेतीले कुँए जैसी हो जाती है जिसमे जितना पानी डाले वह सूखा का सूखा ही रहता है ,समय का निरतर प्रवाह बहता रहता है ,प्यास और बढने लगती है रूप, योवन , उनके अपने भी यही सीख कर वैसे ही होने लगते है, और प्रयाण कॉ समय आजाता है |सब कुछ रह जाता है यहीं जिस जिस के लिए हम घमंड कर रहे होते है वह सब हमारा होता ही नहीं है, ये बात हम बहुत देर से समझ पाते है |जिस धन वैभव और संपत्ति ने आपके अपने छीन लिए हो, जो आपकी अशांति कॉ कारण बनी हो, जिसके लिए आप अपने सबसे बड़े दायित्व को भूल गए, जिसके कारण आप आपने आदर्श खो बैठे , जिसने आपसे विशवास, सब्र और संतोष सब छीन लिया, और जो आपका दुर्भाग्य बन गया, ध्यान रहे इन सब का उत्तर आपको ही देना है, एक जन्म में नही, बहुत से जन्म भी आपके इन कर्मों को पूरा नही कर सकते, शायद कर्ता आप नहीं वो परमेश्वर था जिसने ब्रह्माण्ड बनाए थे |

जिसका अतीत श्रेष्ठ था उसका वर्त्तमान अच्छा हुआ, जिसने वर्त्तमान को तिरस्कृत और अपमानित किया उसका
भविष्य शांत कैसे हो यह प्रश्न चिह्न है |धर्म कहता है कि आप दूसरे के बारे में कभी स्वप्न में भी ऋणात्मक सोचे ,अपने बच्चों को द्वेष और अनादार्शों कॉ पाठ पढाये, आप भी उस परमेश्वर के नीचे है जो सब का निर्माणक है ,आपकी हर क्रिया की १०० गुनी प्रतिक्रया परमात्मा लिख रहा है ,आपके पास जो कुछ भी अपने घमंड के लिए है वो परमात्मा ने ही दिया था और जो जिसपर नहीं है वो परमात्मा के कारण ही नही है व्यर्थ गर्व करके आप उसकी कृति को कलाकित कर रहे हैं | आप अपने कर्मों से ही अपना परलोक बना रहे है जिसका हिसाब आपको यहीं देना होगा |
शेष फिर

नारी को अबला मत कहो

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ____________ आँचल मैं है दूध और आंखों में पानी
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता________ नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः


नारी जीवन की आद्धा शक्ति रही है समाज संस्कृति और वैचारिक विभेद के बाद भी यह सत्य हमेशा अकाट्य रहा है कि नारी ने इतिहास के पन्नो में नए नए आयाम जोड़े है |विश्व परिद्रश्य में यदि हम बात करे तो वह अनेक भूमिका में स्वयं को सिद्ध करने में माहिर रही है |माँ के रूप में उसने आसमान जितना वात्सल्य दिया तो कभी पिता बनकर भरन पोषण का दायित्व भी संभाला ,बहिन के रूप में उसने अपने से ज्यादा चिंता की ,तो वही पुत्री बनकर वह स्वयं पिता को महादान करने सौभाग्य देने वाली बन गई |वह जब पत्नी बनी तो ये सारे सम्बन्ध उसने एक साथ निभाए साथ ही वह पति के लिए अर्द्धाग्नी बनकर जीवन की साँसों में समाहित हो गई|अर्थात वह जहाँ भी रही उसने अपने पूर्ण स्वरुप को जीवित रखा फिर वह अबला कैसे हुई ?यदि उसका आपको जीवन देना अपराध था तो वह अबला होसकती है ,यदि उसका वात्सल्य प्रेम और चिंता करना सब व्यर्थ था तो वह अबला हो सकती थी मगर यदि उसने इन परीक्षाओं में स्वयं को सिद्ध किया है तो वह अबला हो ही नहीं सकती, और यदि इसके बाद भी उसे अबला कहा गया तो धिक्कार है उन सब लोगों पर जिनकी परिवरिश सेवा और प्रेम के बाद भी उसे अबला रह जाना पडा |

प्रकृति,आत्मा, मेधा,शक्ति,स्फूर्ति ,कुण्डलिनी ,नाद ,साधना ,ये सब भी तो स्त्री या नारी कॉ पर्याय है ,आप बताइये की इसमे से कौन कमजोर और शक्ति हीन है|यदि ब्रह्म की कल्पना पुरूष की है तो उसकी सकती तो नारी है थी ,यदि जीवन पुरूष था तो उसकी वृद्धि,आयु ,परवरिश ,और शान्ति तो नारी ही थी |

कहने कॉ अभी प्राय यह की नारी अनादी से महान और शान्ति विकास और खुशहाली कॉ प्रतीक रही है उसे छोटा बताना स्वयं अपने को गाली देने के बराबर है|सृष्टि का स्त्रोत ,वही हिरण्यगर्भ की गहनता और वही प्रलय काल की नव स्रष्टि कॉ विधान भी है ,वही आदि और अंत कॉ कारक और कारण भी है उसपर सारे रिश्ते स्वयं को सिद्ध कराने के लिए ही है और वह उसमे सफल भी रही है |

यत्र पूज्यते नारी रमन्ते तत्र देवता
नारी कॉ सम्मान सुख शान्ति एश्वर्य और चिरंतन अभाव रहित स्थितियां देता है इसके विपरीत जीवन संघर्ष ,आशांति और अभी शाप बन जाता है अब आपके हाथ में निर्णय है की आप उसे सबला सिद्ध करते है या अबला

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...