Sunday, May 28, 2017

सिकंदर -साधु, जीवन का महान विजयी सन्देश Sikandar -Sadhu, the great victorious message of life

 सिकंदर -साधु, जीवन का  महान  विजयी सन्देश 
Sikandar -Sadhu, the great victorious message of life

 आख़िरी समय था विश्वविजयी सिकंदर का, कुछ लम्हे बाकी थे फिर भी जीवन से गहरा असंतोष था , अनेक अधूरे स्वप्न थे बदहवासी थी और सबकुछ फिसलता चला जा रहा था , जंगल का वातावरण और हजारों सैनिकों के बीच एक साधु निरंतर अपनत्व और दया भाव से उसे दवा देकर अपना  प्रयास कररहा था ,अचानक  दर्द की पराकाष्ठा पर भी सिकंदर मुस्कुरा दिया और उसने कहना चालू किया, हे साधु मैं समझ गया हूँ कि मेरा  अंतिम समय निकट है और जिज्ञासाएं बहुत है ,और बहुत कुछ बाकी  रहा जाता देख रहा हूँ ,जो मै  करना चाहता था ,ऐसा क्यों हुआ तुम बता सकते हो मैंने अनायास ही तुम्हारे चेहरे में अपने गुरु अरस्तु की झलक देखि है ,साधुजोर से मुस्कुराया और पूरी सहानुभूति और आँखों के आंसुओं को पोंछता हुआ बोला -----  सम्राट तेरे जीवन की गलतियां क्या थी जो मैं देख रहा हूँ वो सुन 
  •  पुत्र तेरा गुरु अरस्तु मुझे परसो ही स्वप्न में कह गया कि  मैं तेरी सेवा करने पहुंचू ,क्योकि तुझे यह अंतिम ज्ञान अगले जन्म में भटकने नहीं देगा ,क्योकि तेरे गुरु को यही शिकायत थी कि तूने अपने दुष्कर्म और मनमर्जी से किये हुए गलत काम ,कभी उन्हें बताये ही नहीं और उन्होंने सब जानते हुए भी तुझसे पूछा भी नहीं, वह स्वछंदता तेरे दुःख का कारण रहीं
  • पहली कमी यह थी कि तुझे कोई रोकने टोकने वाला नहीं था , सब लोग तेरे अधीनस्थ थे और जो तुझे पसंद नहीं आया उसे तूने मृत्यु दंड देदिया ,परिणाम इससे तेरा आध्यात्मिक पथ शून्य होगया, फिर शांति कैसे पता तू|  | 
  • जीवन की शांति की खोज के लिए तुझे अपने मन की आवाज सुननी थी मगर तेरे आस पास इतना शोर था कि तू वो कभी सुन ही नहीं पाया |
  • हे सम्राट जीवन सम्पति ,धन, वैभव की आवश्यकता अवश्य चाहता है ,मगर उससे भी महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि उस धन का स्त्रोत यदि ख़राब हुआ, तो तेरी शांति स्वयं नष्ट हो जायेगी और वह धन ही तेरे पतन का कारण बन जाएगा , और एक समय वो होगा जब तेरी अफरात दौलत भी तुझे एक पल की प्रसन्नता नहीं दे पाएगी | 
  • हे वीर श्रेष्ठ तूने हजारों युद्ध जीते ,तेरे शौर्य के सामने अनेको सम्राटों सर कटे पड़े थे मगर तू मन से किसी को नहीं जीत पाया शायद यह भी तेरे दुःख का कारण है| 
  • तेरे साथ लाखों लोगो का समूह था मगर विडम्बना यह थी कि उनमे तेरा अपना कोई था ही नहीं सब लोग तेरे भय और स्वार्थों के कारण तेरे साथ थे मगर तू नितांत अकेला बेचारा और सहानुभूत्ति का पात्र था | 
  • हे समय को बांधने की इच्छा रखने वाले श्रेष्ठ योद्धा तू, निरंतर भागता रहा , कुछ पाने की चाह में या जीतने की दौड़ में तू एक भिखारीकी तरह कुछ न कुछ पाने की कोशिश करता रहा पुत्र यह एक  महीन भेद तुझे समझने की आवश्यकता थी | | 
  • , पुत्र तू अपने गुरु अरस्तू से यह शिक्षा नहीं लेपाया कि दुनियां का सबसे बड़ा शहंशाह वह है ,जिसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं है ,तुझे हर रोज नयी सेना के साथ नए आक्रमण करने थे जीतना था बहुत कुछ परिणाम तू खाली और अधूरा रह गया | और अनायास सब हार बैठा | 

हे पुरुष श्रेष्ठ मैं एक योगी हूँ यह जानता हूँ कि यदि तू रोगी होता तो मै तेरे रोग का इलाज करलेता मगर आज यह रोग तेरी मौत का बहाना बन कर आया है और इसका इलाज किसीके पास है ही नहीं ,तू समय के साथ बाद में करलूँगा के सिद्धांत पर चला ,जबकि संसार में पैदा होना ,मरना अवश्यम्भावी है मगर उसका समय कल ही तय करता है जिसका ज्ञान तुझे था ही नहीं | 



सिकदर के माथे की लकीरें शांत होने लगी थी और मन में एक शांत भाव प्रकट होने लगा उसने तुरंत साधु से प्रार्थना  कि  हे देव मेरी निम्न इच्छाएं  जरूर पूरी करना ,और मेरे गुरु को जरूर बता देना ,कि उनका शिष्य जीवन में न सही मृत्यु की बेला में उनका ज्ञान अवश्य धारण करके गया है ,साधु ने पूछा पुत्र कहो तो सिकंदर ने कहना चालू किया -------

  • हे साधु आप और आपके जैसे हजारों योग्य हकीमऔर जीवन को जान्ने वाले सब मेरी अर्थी के आगे आगे अंतिम विदा के वक्त चलना, जिससे लोग समझ सकें कि , योग्य से योग्य हकीम भी मनुष्य को जीवन दान नहीं दे सकते | आदमी को स्वयं जागृत और इस सत्य का स्मरण हर वक्त रहना चाहिए | 
  • मैंने अनंत दौलत के अम्बार लगाए वो भी सड़क के चारो और बिखेर देना ,क्योकि मै  यही चाहता हूँ कि, यह जीवन की सबसे शक्ति हीन ,व्यर्थ और बेईमानी का लालच भरा भाव है जो यह बता देता है की मै  कल किसी का था, आज तेरा हूँ ,और कल किसी और का होऊंगा | 
  • हे साधु मेरे हाथ अर्थी के बहार निकाल  कर यह जरूर बता देना, कि   जीवन की अनगिनत संपत्ति में मेरे पास वो दौलत है ही नहीं जिसे मै  ें इन हाथों में लेकर जा पाता | और जो दौलत मैंने कमाई है वो मेरे साथ जा नहीं सकती | 
  • हे ज्ञानी श्रेष्ठ मेरे साथ लाखो लोगो की भीड़ जरूर लेजाना जिससे लोग समझ पाए इन लाखों लोगो में मेरे को सही मायने में प्यार करने वाला कोई था ही नहीं , मै  एक आदमी भी पैदा नहीं कर सका ,जो मुझे प्यार करने वाला होता | 
  • हे द्विज श्रेष्ठ मै  जीवन के इस मर्म को समझ ही नहीं पाया, कि समय पर मेरा कोई वश नहीं है, मै  सोचता रहा थोड़ा और जीतूं तब करूँ ,  बस इसी दौड़ में मै सब हार बैठा | 
  •  और अंत में मैं  यही समझा कि जीवन का सच्चा संतोष अंतरात्मा की गहराइयों में मुझ में ही निहित था जबकि कभी मैंने उन्हें ंशारीरिक आपूर्तियों में ढूढ़ा तब और -और -और की व्याकुलता मिली ,धन में ढूढ़ा तो लालच ने शांति ख़त्म कर दी और जब संसार में ढूढ़ा तब केवल बनावटी  काल्पनिक और अर्थ हीन सम्बन्धो कासंसार दिखा जिसके शोषण का दुःख पाया मैंने |

Sunday, May 7, 2017

रिश्तों का चक्रव्हू labyrinth of relation


  रिश्तों का चक्रव्हू 
 labyrinth of relation

आदित्य का जन्म एक संभ्रांत परिवार में हुआ था ,एक बड़ी बहिन आरती थी ,माता- पिता- बाबा और दोनो भाई- बहिन , छोटा था  सा परिवार  था ,लम्बे समय के बाद परिवार में पुत्र का जन्म हुआ था अनेक प्रकार से बधाइयां मनाई जा रहीं थी और यही बधाइयां बनकर जीवन दिखने  भी लगा ,आदित्य को माता -पिता बहिन -बाबा असीमित प्यार के साथ रखते आये थे, कई बार उसकी गलत बात पर भी लड़ाइयां लड़ी  गई थी ,  शिकायतें आती थी कि  आज  इसको पीटा है ,कल उसका नंबर है,  आरती  कभी कहती समझाती , थी तो सारा घर उसपर चढ़ बैठता था एक भाई है जरा सा प्यार नहीं है ,इसे हमेशा पीछे पड़ी रहती है ,और अनेको उलाहने ,आरती  रोकर चुप होजाती थी और बार बार यही सोचती क्या मैं  उसे अच्छे भविष्य के लिए टोक भी नहीं सकती ,माता पिता जानते थे कि आरती  सही डांट  रही है मगर बहार की शिकायतों का गुस्सा सारा बेचारी आरती पर ही निकल जाता था ,पिता के प्रयासों से आठवीं पास होते ही उसे बहुत मंहगे स्कूल में भेजना   तय होगया , सारे घर में कोहराम मच गया, कहीं नहीं जाएगा लड़का , बाबा ने साफ कह दिया कि लड़के को वहां भेज कर क्या कलेक्टर बना लोगे , पिता ने  भी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए स्कूल में बात की थी मंत्री जी से कहलवाया था , बड़ा मंहगा स्कूल था चलो घर रहने दो ,इसी प्रकार कॉलेज जाने तक ३ बार ऐसे अवसर आये जहाँ आदित्य को बहार , अच्छी शिक्षा के अवसर मिले ,मगर कभी आदित्य जिद कर गया ,कभी उसकी माँ और कभी पिताजी , आरती की सुनता ही कौन था ,अब हमारा आदित्य कॉलेज में तीसरे वर्ष में   इंजीनियरिंग पढ़ रहा था  ५ विषयों में बैक मेँ  साथ , आज आदित्य आदित्य गुरु होगया था कॉलेज में शिक्षक , सहपाठी सब डरते थे उसका नाम ही आदित्य गुरु के नाम से प्रख्यात हो गया था , पिताजी माताजी हमेशा यही कहते थे टॉप किया है हमारे आदित्य ने ,अमेरिका वाले मामा ने कहा अच्छे से पढ़ाई करलो बेटा , फिर यहीं से एम्-एस  करा दूंगा , पिताजी और आदित्य ने हजारों गाली दी थीउन्हें , समझते क्या है , खुद भी तो यही पढ़े  थे ,जरा पैसा आगया तो लाड़साहब बन रहें है ,आरती अकेली थी जो यह जानती थी कि हर बात पर आदित्य का फेवर लेकर उसकी जिंदगी ख़राब करने में ये सब लोग बराबर के भागी दार है मगर आदित्य सबसे ज्यादा उससे ही चिडता था बोलना ही बंद कर दिया था उससे उसने बड़ा भारी दुःख था इस बात का आरती को |

आरती खुद इंजीनियरिंग करके जॉब में लग गई उसकी शशांक से शादी भी हो गई थी ,मगर यदाकदा भेंट होजाने पर भी आदित्य से उसकी कम ही बात होती थी ,परन्तु उसे उसकी गलती बताने वाला था ही कौन ,माँ बहुधा कहती थी की सारी संपत्ति तेरी ही तो है तुझे क्या करना ,चतुर्थ वर्ष इंजीनियरिंग के रिजल्ट में आदियत्य फेल होगया, देर रात में भारी नशे की हालत में ,उसके दोस्त छोड़ गए थे उसे ,वैसे भी उसे इन पार्टियों की तो पुरानी आदत थी ही  और ऐसे ही जीवन चलने लगा ,एक रात को पिता जी को लकवा लगा जबरदस्त  अटैक था अस्पताल लेजाया गया मगर फिर पिताजी बिस्तर से उठे ही नहीं ,आदित्य ने संभाला कारोबार नौकरों और कर्मचारियों के सहारे चलरहासारा कारोबार,कारोबार  का पैसा शेयर मार्किट  लगा कर एक बार में करोड़ पति बनने की चाह का शिकार होगयाथा हमारा ाआदित्य और एक ही रात में  कारोबार और संपत्ति सब ख़त्म हो गई ,रह गया एक आलीशान मकान ,कुछ जमीने जायदाद , सारे  रिश्ते दारों का जमावड़ा घर बन गया था , पिताजी ने जिस जिस के नाम पर सम्पत्तियाँ ली थी वो चाचा , मामा , फूफा सब मुकर गए थे वोसब रिश्तेदार जो घर पर डेरा जमाये रहते थे ,वो ये अवश्य कह रहे थे कि  बुरा समय है आपका ये मकान बेचो तो हमें दे देना घर का घर में रह जाएगा |

 अकेला कमरे में बंद आदित्य ,सारे लोग उससे उधार माँगने में लगे हुए थे , और पहली बार अंदर से भयभीत

अचानक उसके सामने जीवन का हर  पल  गुजरने लगा, माता -पिता -बाबा का और उसके स्वार्थी दोस्तों का सत्यानाशी प्रेम जिसने आज एक सुहृद बच्चे को एक अपराधी में बदल डाला था -जीवनके हरेक पल में माँ पिता द्वारा हर गलत बात पर उसका पक्ष लेना, ऐशो आराम के लिए हर सुविधा दिलवा कर कभी न टोकना नहीं ,आज उसे तेज छुरी सा काट रहा था ,उसे  याद आया कई बार बहिन ने उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए पिटाई खाई ,यह सब सोचते सोचते मन ने लाख बार यही कहा की मेँ माँ पापा और बाबा के साथ सारे स्वार्थ दोस्तों को कभी माफ़ नहीं करूंगा ,

अचानक आरती ने कमरे की बत्ती जला दी सब्र  का बाँध टूट गया वह जोर जोर से रोने लगा क्योकि वह जानता था अकेली यही बहिन है जिसने मुझे बचाने का हर प्रयत्न किया  मगर ंपूरे घर ने इसे ही गलत ठहरा दिया ,आरती भी भाई की दशा पर रोती रही और उसे यह समझाती रही कि जीवन की यही वास्तविकता है उसका सामना हम सब साथ करेंगे ही | 

एक बहेलिये की तरह जीवन में रिश्ते अपना दाना बिछा कर  बैठे रहते है , उनको अपने सुख वैभव और जरूरतों की इतनी चिंता होती है कि, वे इसके बीच किसी को भी बर्दाश्त नहीं करपाते , शोषण , ब्लेकमेलिंग और बेतहाशा प्यार का पर्दा डाल कर , वो केवल अपने निहित स्वार्थ पूरे करने की फिराक में जाने कितनी प्रतीक्षा करना जानते है ,यहाँ न कोई भाव होता है, न कोई भावना बस मौका और स्वार्थ इनके सहारे चल पाता है ,इनका कारोबार, इनके हथियार इतने घातक होते है जिनसे केवल एक जीत ही नहीं ,वरन  जीवन की सारी गतिशीलता नष्ट भ्रष्ट होजाती है , तात्कालिक तौर  पर लगता है कि ,यह कोई ऐसा सत्य है जो झूठा साबित नहीं होगा, मगर समय की गति शीलता के साथ यह स्पष्ट  होजाता है कि ,यह भी एक जंगली क़ानून का हिस्सा है ,यहाँ सम्बन्ध के नाम पर धोखा फरेब और शोषण ही परोसा जाता रहा है ,और हम सब कमोवेश उसके शिकार भी हुए है, जिसके वर्णन का सामर्थ्य हम आज तक नहीं जुटा पाए है |

यदि जीवन में हम बोर हो रहे है ,और हर जगह हमे कमी लग रही है, तो हम एक भीड़ का  हिस्सा है ,यह वाक्यांश इतना सटीक और स्पष्ट है  कि हमारी ख़ुशी हमारा सकूंन भौतिक संसाधनों और लोगों के समूह पर टिका है ,क्योकि हमे उनके शोषण की आदत हो चुकी है ,झूठे किस्से कहानी  और झूठे परिवेश के आवरण ओढ़े हम सब एक नकली जिंदगी के किरदार निभा रहे है ,जहाँ हमारा हसना , रोना , प्रसन्नता दुःख और जश्न सब नकली ही है,जन्म दिन , मृत्यु दिन ,और तमाम ऐसे जश्न जो दिनों पर मनाये जाते है ,हमसे जुड़े नहीं है मगर हम अपनी दबी पीसी इच्छाओं को जाग्रत करने का माध्यम बना डालते है, उन्हें जबकि अंतिम रूप से हमे यह मालूम हो जाता है ये सब व्यर्थ है| और इन सुख- दुखों से हम स्वयं भी दिखावों के लिए ही प्रभावित है |




 रिश्तों के मृग जाल  के बंधनों का प्रश्न इतना जटिल और और कुटिल था ,जिसके हल के लिए महावतार कृष्ण को गीता का सृजन करना पड़ा , रिश्तों की वास्तविकताओं  बंधन इतने मजबूत होते है ,जहाँ से आज़ाद होना असंभव ही माना जाता है ,शत्रु की हर चाल को वीर पुरुष पूरी वीरता  जीत लेता है , मगर प्रेम के महा प्रशाद में विष समर्पित करने वाले  रिश्तों पर कभी प्रश्न वाचक नहीं बनना चाहता | रिश्तों के महा संग्राम में कृष्ण ने अर्जुन को यही समझाया  कि पुत्र अनीति , शोषण , अन्याय और डाकुओं की मानसिकता वाले रिश्ते, जब धर्म से विमुख होकर आपके शारीरिक मानसिक और भावनात्मक संहार के लिए जब खड़े होंगे, तो आपमें उनका प्रतिउत्तर देने का साहस भी नहीं होगा ,क्योकि उनका क्षद्म वेश इतना घातक है कि, वे तुम्हे अपने आपको समझने  ही नहीं देंगे , धर्म का एक मात्र सत्य यह है कि तुम्हे किसी भी सहारे की आवश्यकता न हो, गुरु उद्धत बुद्धि के सहारे तुम स्वयं के ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट करो और वहीँ से अपने जीवन के उद्देश्यों को पूर्ण करो | रिश्तों  चिंतन तुम्हे कमजोर और कायर बना देता है इसलिए सबके प्रति दया का भाव बनाते हुए स्वयं को जल में रहते हुए भी जल से निर्लिप्त रखों |



अति मोह और अँधा प्रेम केवल महा नाश की राह पर ही लेजा सकता है , जिसमे त्याग , वैराग्य और परमार्थ का भाव होता ही नहीं है, वह तो रिश्तों को केवल संसाधनों की तरह मांग और पूर्ती बना डालता है ,जबकि अध्यात्म , सफलता और जीवन की वास्तविकता जानती है कि जीवन में वाणिज्य का कोई मोल ही नहीं है , और रिश्तों को इस तराजू में तोलने वाला इंसान कैसे अपने गंतव्य तक पहुंचेगा यह प्रश्न चिन्ह है  , फिर रिश्तों के इस वाणिज्यिक व्यवहार को आप जीवन का प्रेम , समर्पण और निश्छल जैसे शब्दों से कैसे पुकार सकेंगे ,संसार में अकेला मानव ,जीवन की हर दौड़ में समय और संसार में अजेय रहा है, वही इतिहास पुरुष बना है ,जिनके साथ वाणिज्यिक रिश्तों के हुजूम चले है वे ,अपनी मंजिल तक कभी पहुँच है नहीं पाए, उन्हें बेमोल जीवन खोना पड़ा है



रिश्तों ने आदमी को केवल कमजोर दर कमजोर सिद्ध किया है, हम जिस समाज से कुछ लेने की कामना करते है वो पहले से ही हमारी ताक में बैठा हमारा शोषण कर लेता है ,हम अपने लक्ष्य से दूर केवल उन अनसुलझे संबंधों में लिपटे, अपना समय व्यर्थ ही निकाल देते है और जीवन हमे असफल सिद्ध करदेता है , जब भी हम सफलता के उत्कर्ष पर खड़े दिखे एक बड़ा हुजूम हमे दिखाई देने लगा किसीने कसमें दी किसी ने प्यार का वास्ता दिया किसीने अपने रिश्तों की दुहाई दी तो कोई रोकर क्रोधित होकर या आवेशित होकर अपने स्वार्थों के अनुरूप हमारा प्रयोग करने की कोशिश करता रहा जबकि उस्समय हम जरा सी भावनाओं में बहे बस वहीँ हमारा भविष्य , नष्ट हो जाता है और रिश्ते अपने उद्देश्य में सफल हो जाते है |


जीवन का एक मात्र सूत्र था एकला चलो रे ----सिकंदर -----अकबर ---- अशोक ------हिटलर  ------मुसोलनी  लाखों की फौजे लेकर चलते हुए जीवन को नापने की लाख कोशिशों के बाद, अपनी ऑटो बायोग्राफी में लिख गए  कि जीवन में वे कुछ कर नहीं पाए,  जबकि गांधी नेल्सन मंडेला और ऐसे ही हजारों युग प्रवर्तक अकेले चलते हुए भी श्रेष्ठ सिद्ध होकर इस दुनियां से विदा हुए ,लाखो की भीड़ में चलने वालों का दिमाग भी लाखो तरह के होते  है, परिणाम सफलताके लिए लक्ष्य की क्रियान्वयनता भी लाखो तरह के भय विषाद और वैमनस्यता लेकर चल रही होती है ,  आपके उद्देश्य की चिंता कोई कर ही नहीं रहा होता उनके अपने अपने स्वार्थ स्वयं आगे आने लगते है फिर जीवन में सफलता कैसी यही समझ से परे होजाता है , जीवन का एकमात्र यही सत्य है कि रिश्तों की मृग मरीचिका से बाहर आकर अपने शाश्वत स्वरूपको पहिचानिये यहाँ आपको एक अनंत कोटि शक्ति का पुंज स्वयं में ही दृष्टि गत होने लगेगा  यहाँ रिश्तों के भंवर नहीं होंगे और न ही  आप किसी भीड़ के छोटे से हिस्सेहोंगे  , यहीं से जीवन अपनी गति पहिचान कर आपको पूर्ण सफल सिद्ध करदेगा |


निम्न का प्रयोग अवश्य कीजिये


  • रिश्तों की आवश्यकता समाज को है, मगर अपने जीवन के विकास पथ पर उन्हें सहारा बनाकर चलने का प्रयत्न कभी न करें अन्यथा सफलता से पूर्व  ही आपका लक्ष्य भ्रमित हो जाएगा | 
  • जीवन में अपने उद्देश्य निश्चित करें उसके बाद बिना रुके उन्हें पूरा करने के लिए क्रिया शील हो जाए बीच में किसी भी कारण अपने क्रियान्वयन को न रोकें | 
  • घर परिवार समाज के रिश्तों के साथ सतर्कता बरतें ,एक सीमा का निर्माण करें और उन आदर्शों का पालन करें जो आपने अपने लिए बनाये है | 
  • जीवन में अपने अस्तित्व के क्रियान्वयन की चाभी आप किसी को नहीं सौपें , अन्यथा आपके जीवन से अधिक सामने वाला अपने स्वार्थों की आपूर्ति के लिए आपका उपयोग करने लगेगा | 
  • सबके साथ सामान सुखद एवं श्रेष्ठ व्यवहार करें परन्तु किसी भी स्थिति में अपने आदर्शों से समझौता नहीं करें अन्यथा आपके उद्देश्य और सफलता दोनों ही व्यर्थ हो जाएंगे | 
  •  अपनी गलती के लिए तुरंत माफ़ी मांगे एवं फिर गलती न करने का संकल्प लें क्योकि यदि आप गलतियां करके संकल्प नहीं कर पाए तो आपका और नकारात्मक जीवन होजायेगा | 
  • रिश्तों के बड़े संपर्कों से समय की बचत अवश्य  कीजिये अन्यथा आपको सफलता के लिए समय ही नहीं मिल पायेगा क्योकि जीवन में समय का नाम ही काल है | 
  • यह आवश्यक रूप में ध्यान रखें कि सामाजिक , पारवारिक और दूसरों की देखा देखी आप अपना प्रयोग न होने दे क्योकि आपको अपने आदर्शों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए | 
  • एकांत में अपने आपका चिंतन करना सीखें यहीं से आपको अपनी आतंरिक शक्तियों का बोध हो सकता जिन लोगो को आप शक्ति संपन्न  समझते है वे केवल अपने स्वार्थों के साथ ही वीर है , आप में अपरमित शक्ति है | 
  • बिना बात की प्रसंशा और  वालों से स्वयं को बचाकर  रखिये क्योकि ये आपकी चेतना शक्ति की सकारात्मकता नष्ट कर देते है |

Sunday, April 23, 2017

सफलता से एक कदम पहले one step before success

सफलता से एक कदम पहले 
one step before success 

बचपन से बाबा ने नितिन को यही समझाया था  कि  पुत्र पूरी ताकत से ब्रह्माण्ड से जो भी मांगोगे और उसके लिए खुद को क्रियान्वित करदोगे,  तो दुनिया की कोई मांग ऐसी नहीं है ,जो आप प्राप्त न करपायें ,आप जीवन के चरम लक्ष्य सफलताएं ,सहज ही प्राप्त कर सकते है ,आवश्यकता इस बात की है कि आप निरंतर सार्थक प्रयास करते रहे और सोते जागते अपने लक्ष्य को दोहराते रहें | 
गांव के एक छोटे स्कूल से पास होने के बाद शहर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था हमारा नितिन  अंतिम वर्ष था इंजीनियरिंग का बड़ी बेज्जती झेली थी हमारे नितिन ने विश्वविद्यालयों में बड़े दोस्तों के समूह रोज की पार्टियां और होटलबाजी ,आधे अधूरे नशे में लड़के लड़कियों की टोली ,क्या क्या नामों से बुलाते थे उसे , फूहड़ गंवार देहाती लल्ला , और मामू  ये सब सुनते सुनते क्षुब्ध होगया था मन ,यदाकदा भटकता रोता , और इन दोस्तों के बाह्य दिखावे से  प्रभावित जरूर होता था , ऐसा मेँ  क्यों नहीं हो पाया, बाबा हमेशा कहते बेटा तू क्यों करता है ,इनसे अपनी तुलना, एक दिन सबको मालूम पढ  जायेगा  कि , तू सबसे अच्छा है ,और थोड़ा बहुत बोलकर वह  बाबा की बात पर विशवास कर ही लेता था | 

इंजीनियरिंग की अंतिम परीक्षा में नितिन के ८७%अंक आये, टॉप किया था उसने, परन्तु मन में यहीं  फाँस बनी रहती थी कि   मै स्मार्ट क्यों नहीं हूँ ,शायद मै ही ऐसा लगता होऊंगा, जैसा ये सब बोलते है, बाबा के निरंतर प्रयास प्रोत्साहन और प्रेरणाओं से नितिन ने  आई ए एस परीक्षा की आरभिक परीक्षा में संभाग भर में अकेला स्थान पाया , जो लोग कल तक नितिन को फूहड़ -देहाती- गंवार- मामू बोलते रहे थे ,उन्हें समझ नहीं आरहा था वो कैसा व्यवहार करें ,कई तथाकथित सहपाठियों ने एक पार्टी रखी ,लड़के -लड़कियां मना  कर नितिन को  भी ले  गए पार्टी में , नितिन गौरवान्वित सा उन लोगो को देख रहा था ,जो कल तक उपहास बना रहे थे,आज कुछ ज्यादा  लिपट चिपट रहे है , आज उसे बड़ा सकूं मिला, उन स्मार्ट लड़के लड़कियों द्वारा स्वागत पाते हुए ,सबको यह वादा करता हुआ कि  समय समय पर  आपको सहयोग करता रहूँगा ,पार्टी ख़त्म हुई | नितिन को बाबा की बातया याद अवश्य आई ,एक दिन तुम ही श्रेष्ठ साबित होंगे | बाबा ने ठीक  ही तो कहा था | 


आगे की परीक्षा की तैयारी बहुत जोरो शोरो से आरम्भ हो चुकी थी, अब क्या था एक बार और हिम्मत दिखाई और पार हो जाऊँगा मै,  परन्तु एक बड़ा परिवर्तन नितिन में आया था कि ,उसे यदा कदा  उन   कक्षा के सह पाठियों का ध्यान आ जाता था और मन कहता था,   तू ही सर्व श्रेष्ठ है, कैसा मजाक उड़ाया था मेरा, अब सब ठीक होगये  ,बधाई देने वालों का ताँता लगा रहता था ,दोस्त भी उसकी प्रसंशा  करने आते रहते थे ,बाबा कभी दबे स्वर में कहते बेटा समय का ध्यान रखो, वो बड़ी उपहास भरी नजर से देख कर बाबा को कह्देता ,देखूँगा मालूम है मुझे क्या करना है ,घरवालों पर यदाकदा चिल्ला देता था ,कि  दिखता नहीं है ,कि  मुझे काम है ,मन कहता मै सर्वश्रेष्ठ हूँ ,इन्हे नहीं मालूम की कितना काम करना होता है ,श्रेष्ठ बनने के लिए ,बाबा उसके इस व्यवहार को देख कर कुछ कहते नहीं थे मगर दुखी हो जाते थे मन ही मन | 

 परिवर्तन का समय इतना आहिस्ता ,धीरे- धीरे निकलता है ,वह मालूम ही नहीं पड़ने देता कि  आपपर उसका प्रभाव नकारात्मक हो रहा है, या सकारात्मक ,वह तो आपके जरा से लापरवाह होने पर, सबकुछ छीनने का साहस रखता है|  नितिन पूर्ण आश्वस्त था ,कि अब  आगे के लिए उसे क्या क्या करना है ,बहुत उत्साहित -प्रसन्न और लापरवाह सा| 

रिजल्ट शीट में कहीं भी नितिन का नाम  नहीं था ,कई साइड्स पर जा कर देखा कहीं नहींथा नाम , बदहवासी और बेहाल सा नितिन सब जगह खोज खोज कर थक गया था ,फोन पर फोन की घंटियां----- नितिन ने फोन बंद किया ,और एक अँधेरे कमरे में जाकर लेट गया ,जोर से चक्कर  आरहे थे उसे , यह समझ नहीं आरहा था क्या हुआ यह ,हाल में गुजरा हुआ एक एक पल उसके सामने सिनेमा की भांति गुजरने लगा , सारा का सारा अव्यवस्थित , लुटा हुआ , और अस्त व्यस्त सा लग रहा था उसे, हाल में बिताया हुआ अतीत ,दोस्तों के स्वार्थी व्यवहार -समय की बर्बादी ,घरवालों से उसका बेरुखा व्यवहार , सब  घूम गया था उसके सामने ,बाबा के द्वारा बड़ी हिम्मत करके बोले गए शब्द आज भी घूम रहे थे उसके कानों में , में  बेटा  समय का ध्यान रखो और उसका रूखा सा जबाब और बाबा का मायूस चेहरा ,न जाने कब तक रोता  रहा था वो ,अचानक बाबा ने कमरे की लाइट जलाई, भीगा चेहरा भारी व्यग्रता देख कर वे धीरे धीरे उसके सिर पर हाथ फेरने लगे और उन्होंने कहना आरम्भ किया -----

पुत्र जीवन का यह अध्याय बहुत आवश्यक  ही था, बेटा जिसतरह ठंडी ,भारी वायु  की तरफ, खाली और गर्म हवा पूरी तीव्रता से उसपर एक ही क्षण में आक्रमण  करके उससे सारी नमी और गरिमा या भारी पन ख़त्म करके उसे पल भर में उसे रिक्त बना कर अस्तित्व हीं कर देती है ,वैसे ही जब समाज को आपके भारीपन का एहसास होने लगता है, तो उसकी प्राकृतिक क्रियान्वयनता आपके विचारों एकाग्रता और उद्देश्य को नष्ट भ्रष्ट करने हेतु क्रिया शील होजाती है, आपको मालूम ही नहीं पड़ पाता तबतक, आप में शारीरिक मानसिक विकृतियां पैदा हो गई होती है ,आपके अहंकार के सहारे समाज की नकारात्मकता आप में प्रवेश कर जाती है ,परिणाम हम अपने उद्देश्य से पथ भ्रष्ट होकर अपने आपसे ही मति भ्रम की स्थिति पैदा कर बैठते है ,सार यह कि हमारा लक्ष्य और हमारी सफलता के उच्च शिखर हमे प्राप्त होते होते ओझल होजातेहै , हमारी  स्थिति उस राजा की तरह होती है ,जिसका भव्य राज तिलक होरहा होता है ,सारे शहर में उत्सव का माहौल था और मुकट  पहनकर राज तिलक होते ही यह  अहंकार में भर गया ,मुझसे बड़ा संसार में कोई है ही कहा ,और नींद खुल गई  सर्वत्र  शून्य था उसके अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं था | जीवन इसी तरह एक लम्हे में सबकुछ दे सकता है और एक पल में सबकुछ छीन लेता है | पुत्र यह सब नव जीवन की शुरुआत है तुम्हारी ,एक बार उठो और फिर जुट जाओ देखो सफलता तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कररही है  | 

नितिन की समझ में आगया था कि  उसने  अतीत में क्या गलतियां की थी, क्यों उसने अपने दोस्तों से अपनी तुलना की थी ,क्यों बाबा सहज और समय के अनुसार स्वयं को एकाग्र करने को कह रहे थे , और क्यों उसे अपनी आधी अधूरी जीत का इतना उन्माद या अहंकार हुआ ,उसने एक बार परमपिता परमात्मा से मन ही मन क्षमा मांगी और बाबा के पाँव छूकर अपनी टेबल पर पंहुचा और अपना स्टडी लेम्प जला दिया, बाबा पूर्ण आश्वस्त होकर प्रसन्न मुद्रा में अपने कमरे की और बढ़ गए उन्हें मालूम था की अब जीवन नितिन को कभी हरा नहीं पायेगा | 

सफलता के पूर्व का छण इतना शक्तिशाली और सूक्ष्मानिवेशी होता है ,जिसमे शरीर- मन -बुद्धि की तीव्रता कई गुनी अधिक हो जाती है , वही प्रसंशा का अतिरेक , अहंकार का प्रस्फुटन , स्वयं का गलत आकलन , और दूसरों से स्वयं की तुलना जैसे नकारात्मक भाव स्वतः पैदा होजाते है, ऐसे में लक्ष्य सिद्धि हेतु अडिग एकाग्रता की आवश्यकता होती है ,जबकि उसको भ्रमित करने वाले कारक बहुत अधिक होते है ,दूसरी और सर्वश्रेष्ठ होने का भ्रम विष बन कर समाज परिवार की उपेक्षा करने लगता है ,शारीरिक -मानसिक और आंतरिक उद्वेग लक्ष्य से भटकाने लगते है ,वे नकारात्मक मांग बन जाते है, फिर सबकुछ शांत लक्ष्य उद्देश्य और सफलता सब अदृश्य उस पानी - साबुन के बुलबुले की तरह जिससे अभी कोई अबोध खेलरहथा अचानक वो गायब होगया, बालक हतप्रभ है कहा गया मेरा रंग बिरंगा गेंद | 


आप यही समझिये कि बहुत बड़े काले  केनवास पर, एक छोटा सा सफ़ेद बिंदु। यही लक्ष्य था और अनंत तक फैली कालिमा या नकारात्मकता का साम्राज्य था ,अब यदि पूर्ण एकाग्र भाव से स्वांसों को स्तब्ध कर अपना लक्ष्य देखा पाए ,तब ही आप सफल हो सकते है ,अन्यथा नैपथ्य में फैला विशाल अंधकार ही, नकारात्मकता बनकर खड़ा हो जाता है, एक मार्ग यह भी है की लक्ष्य के साथ पूरे केनवास को ही पूरा नाप डालो ,वहां की हर असफलता नैराश्य और न उम्मीदी को पूरा समझ कर ,उसपर नजरें गड़ा दो, अंधकार की कालिमा सकारात्मकता के सहारे अचानक ही सूर्य के प्रचंड वेग की रोशनी की तरह सफलता विजय और उत्साह बन करखड़ी हो जायेगी, ये १००%सफलता होगी जहाँ तुलना- नकारात्मकता के भाव होंगे ही नहीं | 

अर्ध सफलता के साथ सफलता के पहले वाला समय बहुत ही चिनौती पूर्ण होता है ,यह समय अति शक्ति शाली  संवेदनशील और निर्णायक होता है,यह आपको अधिकाँश सफलता मन बुद्धि और बाह्य वातावरण से प्राप्त हो चुकी होती है ,परिणाम जीत  काउन्माद ,आप में एक खोखला अहंकार पैदा कर देता है ,मन बुद्धि का भाव अपनी जीत से अधिक दूसरों की जीत के भाव की तुलना करने लगता है ,समाज -परिवार और वातावरण का आकलन प्रभाव सब नकारात्मक होने लगता है ,अंतिम जीत के लिए जो  मानसिकता होनी चाहिए होती है, वह तीव्र वेग ,शक्ति ,लगन सब गतिहीन होने लगती है ,क्योकि एक मात्र स्वयं का विजय उद्देश्य अपने लक्ष्य से भटकजाता है | 


बहुत बारीक अंतर होता है गर्व और घमंड में,  दोनों का उद्भव केंद्र मन ही पैदा करता है, मन मष्तिष्क में दबी पिसी भावनाएं सदैव अपनी आपूर्तियों की मांग करती है और कुछ हम समाज कोदेख कर समझ कर झूठी प्रसशा के लिए अपने में पैदा कर लेते है ,परिणाम वे नकारात्मक होते हुए भी ,हमे उस समय थोड़ा संतोष अवश्य देसकते है , मगर उसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक ही होते है | 
लक्ष्य और जीवन के सच्चे उद्देश्यों के साथ कुछ चल ही कहा पाता है ,आत्मबल जब स्वयं पर गर्व के रूप में चिंतन शील होता है ,तब उसमे दूसरों से तुलना का भाव होता ही नहीं है ,उसमें आकाश की ऊंचाइयां ,सूर्य का तीव्र प्रकाश, सन्निहित होता है ,जबकि घमंड का उद्भव नकारात्मक भाव से उत्पन्न होता है ,जिसमें स्वयं का सर्वांगीण विनाश स्वयं पनपने लगता है ,गर्व पोषण करता है और घमंड स्वयं को समूल नष्ट कर देता है | 

यदि जीत के अंतिम पलों में हम लापरवाह हुए तो हमारे क्रियान्वयन में भटकन के हजारों आयाम खड़े होने लगते है, हम क्या अच्छा लग रहा है ,क्या नहीं ,इसकी फिक्र करने लगते है ,हमारे पास बहानों की लिस्ट आजाती है , आधी अधूरी जीत के अहंकार से उपजी शारीरिक मानसिक नकारत्मकताये समय विशेष में हमे अच्छी लगने लगती है , पूर्व के लक्ष्य मानदंड हमें धूमिल होते दिखते है ,जीवन अपने अनुसार परिभाषाएं गढ़ने लगता है ,वे सारी  बातें जो जीवन के उत्कर्ष के लिए जरूरी थी महत्व हीन दिखाई देने लगती है ,अपने ही लक्ष्यों  में हम हजारों कमियां निकालकर खड़े होजाते है, उन सब लोगो का सामना करने से हम बचने लगते है ,जो हमे अपने लक्ष्य के सामने खड़ा करें ,फिर सफलता संतोष और जीवन की उपलब्धियां अपने अर्थ खोने लगती है, और  बचता है उपलब्धियों से समायोजन समय से समायोजन और कल से समायोजन जो हमारा लक्ष्य नहीं था | 


निम्न का  प्रयोग  ध्यान रखिये
  • जीवन के क्रियान्वयन का सूत्र केवल यही रहे कि, सफलता से  पूर्व  कुछ नहीं , यही से जीवन के लक्ष्य की स्पष्टता सिद्ध हो सकती है | 
  • समय के साथ आरहे परिवर्तनों को बहुत बारीकी से अध्ययन करें क्योकि कई परिवर्तन आज सही  हो सकते है मगर उन्ही  अपनाये जो दीर्घकालीन एवं आपके  अनुकूल हों | 
  • नकारात्मक  विचारों पर  ध्यान न दें ,क्योकि ये  विचार आपको अपने सफलता के लक्ष्य से दूर लेजा सकते है ,और यह सत्य है की आपकी वैचारिकता से ही आप में सकारात्मकता और नकारात्मकता का जन्म होता है | 
  • नकारात्मक विचारो और सकारात्मक विचारों पर पैनी नजर बनाये रखे और उनपर विजय हेतु एक कार्यकारी योजना अवश्य बनायें | 
  • निरंतर अपनी कमियों और गुणों के सम्बन्ध में अपने आदर्श लोगो से सलाह लेते रहे ,क्योकि परिवर्तनों का मार्ग सकारात्मक रहना ही आपकी विजय का प्रथम प्रतीक है | 
  •  अधूरी विजय पर आपमें पैदा होने वाला अहंकार , प्रमाद और व्यवहार में नकारात्मकता न आजाये नहीं तो सफलता स्वयं व्यर्थ सिद्ध हो जायेगी | 
  • झूठ फरेब अहंकार और अपने आपसे छलावा न करें सत्य हमेशा शक्तिशाली ही रहेगा ,जबकि झूठ बार बार आपको कमजोर और कमजोर बनता जाएगा | 
  • जिन लोगो के बारे में आपको झूठ फरेब और असत्य का सहारा लेना पड़े, उन्हें तुरंत छोड़ने में आपका हित होता है, अन्यथा आप अपने जीवन के चरम तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे | 
  • क्रियान्वयन की निरंतरता आपको लक्ष्य के प्रति जागरूक रखती है, यदि आप पूर्ण गतिशील भाव से क्रिया को निरंतरता देते रहे तो, आप निश्चिततः सफल सिद्ध  होंगे | 
  • व्यक्ति वातावरण परिस्थिति स्थिर नहीं हो सकती, परन्तु आपका लक्ष्य क्रियान्वयन और एकाग्रता वैसी ही बनी रहनी चाहिए, जो आपकी विजय के लिए जरूरी हो | 
  • सफलता के लिए निरंतर बढ़ते हुए क्रम में प्रयास किये जाने चाहिए ,प्राथमिक स्तर पर सामान्य ,दूसरे स्तर पर तीव्र और अंतिम स्तर पर पूरी तीव्रता से प्रयास करें ,जितना आगे बढ़ें लक्ष्य के प्रति उतनी सावधानी और लेलें यहीं से आपको निश्चित सफलता मिलेगी |

Tuesday, March 14, 2017

सर्वोत्कृष्ट एवं निकृष्ट (superior and inferior )

सर्वोत्कृष्ट एवं निकृष्ट  (superior and inferior )

हितेश  के जन्म पर हजारों डिब्बे मिठाई बाँट  दियेगये थे ,सारे नगर से बधाई  आने लगी थी ,सारे  घर हर्षोउल्लास से भर गया था ,गोरा चिट्टा गोल मटोल सुन्दर बच्चा हुआ था सेठ हजारी लाल के ,यह दूसरा पुत्र था उनके ,नगर सेठ  की पदवी थी उन पर और फिर इन के  परिवारों में लड़का  पैदा होने की ठसक ही बहुत थी | उसके ४ वर्ष बाद हुई थी हिमानी घर में  कोई ज्यादा उत्साह था नहीं था , बस एक रस्म अदायगी और कहना यह कि  अब भाई को राखी बांधने वाला भी तो होना चाहिए ,  समय की गति और चक्र का पहिया तेजी से  घूम रहा था , हिमानी  अब स्कूल पास करके कालेज में पहुँच गयी थी बड़े भाइयों में एक तो हायर सेकेंडरी के बाद पढ़ ही नहीं पाया , दूसरे ने जैसे तैसे  डॉक्टर बनने के चक्कर में बीएससी थर्ड क्लास से पास अवश्य कर ली थी | माता पिता और सारा परिवार बस यही समझाता था हिमानी को  कि पराये घर जाना है चौका चूल्हा सीख ले , छोटी हिमानी  ने गजब का  सब्र  पाया था वो जानती थी कि घर के नए कपडे भाइयों के लिए होते है , अच्छा खाना, तफरीह , और ऐशो-आराम पर बेतहाशा पैसे उड़ाना भाइयों का ही काम है ,उसे तो केवल जो मिलजाए उसमे सब्र करना चाहिए या रोकर अपने आपको समझा लेना चाहिए , महा पुरषों की जीवनी और जीवन में सत्य की खोज ने उसे एक सूत्र जरूर दे दिया था कि कठिन परिश्रम और सकारात्मक  विचार उसे उस गंतव्य तक अवश्य लेजा सकते है जिसकी चाह आदमी करता है |

पिता भाइयों को अपने स्टैण्डर्ड बनाये रखने के लिए १०-१५-हजार रु प्रति माह देते थे ,फिर भी  वो कम ही पड़जाते थे, कई बार क्लेश हुआ था इस बात पर, घर में माँ और हिमानी सहमे से बैठे रहते थे , भाई पिताजी से खूब लड़ते थे और पिता जी बहुत कुछ चिल्ला कर , रोकर उनकी जिद पूरी कर देते थे ,बड़े पुत्र ने एक बार तिजोरी से १० लाख रु निकाले और वह घर से भाग गया , पूरे घर ने क्रोध किया  चिल्लाये और २० दिन बाद माँ के खाना  न खाने और रोते  रहने के कारण उसकी खोज चालू की गई और ३ माह बाद वो लुटापिटा सा घर लौट आया , पूरे घर में कोहराम था बंटवारा करों नहीं तो कल यह और रु चुरा लेजायेगा १माह  चला था  वो क्लेश और अंततः पिता ने बंटवारा करदिया था दौनों  को दूकान का आधा आधा  भाग देदिया गया,  सारे माल के भी हिस्से करदिये गए ,घर के दरवाजे रसोई सब अलग होगये ,हिमानी पिताजी और माँ अपनी दुर्दशा में अकेली बेसहारा रह गए  ,दौनो भाइयों ने पिताजी से सम्बन्ध ख़त्म करलिए थे, उनका कहना था उन्होंने अन्याय किया है बंटवारे में , माँ रोती रहती थी समस्या यह थी कि अब बेटी की पढ़ाई और शादी कैसे होगी ,सारे रिश्तेदारों  ने सम्बन्ध तोड़ लिए थे कही हम उनसे पैसे न मांगने लगें |पिताजी बिलकुल गुमसुम और मनोरोग के शिकार हो गए थे, मानो किसी जागृत नरक का निरीक्षण कररहे हो जिसका निर्माण खुद उनसे ही होगया था, उसके पश्चाताप और निराकरण की असफल खोज में | 

सबसे ज्यादा  बोझ ,छोटा ,  हीन  और तुच्छ समझी जाने वाली हिमानी के कन्धों पर उन पितामाता का दायित्व आगया था, जिन्होंने अपने बेटों के लिए जीवन भर उसे न केवल हेय  दृष्टी से देखा, बल्कि समय समय पर उसकी न्यायोचित जिद पर भी जानवरों जैसे  पीटा था ,भाइयो के बराबर हक की जिद में वो सबसे ज्यादा पीटी  गई थी ,आज हिमानी समझ गई थी , वास्तव में जो भाई स्वयं को सुपीरियर बताते रहे  वो थे नहीं और उसपर केवल एक दायित्व है कि,  उसे अपने मातापिता को सम्मान दिलाना है | ,, एम् ए इंग्लिश केबाद एक आई. ए.एस. कोचिंग में पढ़ा रही थी हिमानी ,जैसे तैसे घर का खर्च चल ही जाता था २० हजार रु मिलते थे ८ घंटे में ५ व्याख्यान होते थे और बाकी समय हिमानी खुद क्लास अटेंड करती थी ,  रात दिन की पढ़ाई मेहनत और लगन ने उसे केवल एक लक्ष्य दे दिया था की उसे स्वयं को सिद्ध करना है ,उसने विवेकानंद, आइन्टीन , सुकरात , और हजारों विचारकों के दर्शन से यह पाया कि जीवन का आशय यही है कि  आप अपने आदर्शों के चरम  पर पहुँच कर जीवन समाज और संस्कृति को नया आयाम दे जाएँ ,उस कठिन डगर में आप बोर होना  बुरा लगना ,मन नहीं लगना आदि की अनावश्यक स्थितियों से दूर एक लक्ष्य के लिए संकल्पित  रहजाते है  जिसमे आपका लक्ष्य भर होता है |

आज फिर आने वाला था आई ए एस  परीक्षा का रिजल्ट एक मित्र ने पूछा हिमानी रिजल्ट आने वाला है क्या सोचती हो आप, हिमानी ने गम्भीर स्वर में कहा, देवेश मैंने तो परीक्षा देकर अगली परीक्षा की तैयारी फिर चालू कर दी है, क्योकि मुझपर समय और विकल्प दौनो ही नहीं है, मित्रने कहा दोस्त आप मेरिट में फर्स्ट आयी हो ,आपकी साधना को ईश्वर ने स्वीकार कर लिया है ,धन्यवाद ज्ञापित कर हिमानी उठी और उसने अपने माता पिता के पाँव छुएं और रोती  रोती अपने कन्हैय्या के कमरे में भगवान् के सामने आकर   बिखर गयी ,भगवान् की मुस्कुराती मुद्रा मानो यह कह रही  हो अरे पागल तू ही तो है सुपीरियर , और हर पल मैंने तुझे जो सकारात्मक भाव ,जो तेरे मन को मैंने दिए , वही तो मैं था , बेटा ये एक कर्म छेत्र की सफलता है ,अभी आगे विराट तक जाना है ,तुझे और हर नकारात्मक भाव में जब तू मुझे सहारा बनाकर पुकारेगी ,तब मैं साहित्य ,परामर्श ,स्वप्न के रूप में तुझे रास्ता अवश्य दिखाऊंगा ,पुत्री मेरे लिए एक अर्जुन ही क्या, मुझे हर रोज उस भक्त की खोज  करनी होती है जो पूरी निष्ठां  से अर्जुन की भाँति , मुझसे प्रश्न पूछता है ,मैं  किसी को भी साधन बनाकर, उसको उत्तर देता हूँ और कार्य की प्रेरणा बनता हूँ ,माँ, पिता ,और एक भीड़ उसके कमरे में आगई जोर जोर से बधाइयाँ दीजाने लगी |


जीवन  ऐसा ही विचित्र है, यहाँ हम जिसपर गर्व करते है ,वह हमारा नहीं होता, हम जिसे अपना समझने की भूल करते है ,वह स्वप्न सा जान पड़ता है, हर सम्बंध, हर रिश्ता ,केवल अपने अपने लालच से हमसे जुड़ा होता है ,जिनके लिए हम सर्वस्व दांव  पर लगाए रखते है, वे भी एक पल में अपना रुख बदलकर खड़े होजाते है, क्योकि उन्हें यही डर  रहता है ,कही ये हमसे कुछ मांग न ले या उन्हें यह विश्वास होजाता है कि अब इनपर लूटने के लिए कुछ बांकी रह  ही नहीं गया है, वस्तुतः संसार का यही नियम है, कि  शक्ति के संचालन के  केवल एक शक्ति ही कार्य करती है , समाज राष्ट्र और संस्कृतियों को दिशा देने वाली शक्ति भी एक ही होती है और उसे समझना ही जीवन को प्राप्त करना है |


मनुष्य नितांत खोखला ,अधूरा और अपूर्ण ही है जन्म से वह अबोध ,बेसहारा और अप्रिय ही होता है मगर समय समाज और प्रकृति की शक्तियां उसका सकारात्मक निर्माण आरम्भ करती है , वह अपने अबोध काल में हर परिस्थिति से लड़ना , संघर्ष करना , रोरोकर अपनी परिस्थिति को व्यक्त करना सब सीख़ लेता है मगर इस समय उसमे बोर होना , अच्छा न लगना ,नैराश्य , ग़म ,धोखा ,और झूठ फरेब कुटिलता जैसे व्यवहार होते ही नहीं है ,हम बड़े होने के साथ जो हम पर है नहीं उसे अपने में आरोपित करने में लग जाते है ,मतलब यह कि आवरण पर आवरण और अपने को सुपीरियर बनाते बनाते स्वयं ही ख़त्म होजाते है ,अपने व्यक्तित्व से अपने कृतित्व से अपने संस्कारों और आदर्शों से स्वयं शून्य होजाते है , फिर सुपीरियोरिटी के लिए किये प्रयास जीवन भर उसे कॉम्प्लेक्स ही बनाये रखते है और जीवन से सकारात्मक  ऊर्जा स्वतः ख़त्म होजाती है |



लक्ष्य तो जीवन का मनोबल है आप जब भी जीवन के हर आते हुए समय को लक्ष्य से नहीं बांधेगे तो जीवन आपको अपनी नकारात्मकताओं  सामने खड़ा करदेगा ,हर रोज आप एक नया विकल्प ढूढेंगे और हर बार आपके पास कोई ठोस योजना होगी नहीं ,समय के महत्व और भविष्य की कल्पनाएं आपकी अकर्मण्यता के सामने समस्या बनी रहेंगी और आप समस्या , मन , बोरियत , अभाव और अन्याय का रोना रोते रहेंगे ,मगर इसके मूल में केवल यही सत्य रहा कि आपके पास भविष्य के लिए कोई सकारात्मक विचार , योजना ,लक्ष्य नहीं था और आप यह सत्य जानिये कि बिनालक्ष्य का जीवन उस मृतप्रायः जीव की तरह है ,जिसका शव तक विषाक्त होगया है ,और जो किसी को जीवन देने के योग्य नहीं रहगया है |


लक्ष्य के साथ प्रयत्न का संकल्प  अवश्य करें , मित्रों समय सबसे बहुमूल्य और कीमती चीज है जीवन में  और उसे यदि जीवन के हित  सार्थक उपयोग में लाना है ,तो आपको लक्ष्य और सार्थक प्रयत्न के संकल्पों का सहारा अवश्य लेना होगा ,क्योकि ध्यान रहे की आप जिस जीवन की नाव को लेकर चल रहे है ,उसकी पतवार किसी और के हाथ है, आपके पास केवल एक विचार है कि  आप उसका सकारात्मक उपयोग कर सके तो सफल ,अन्यथा आपभी ९९%जन सैलाब की   तरह   रहजायेंगे जिसके पास केवल भौतिक वादी सोच रही ,उसका आंकलन केवल धन ,बिल्डिंग , जमीन जायदाद से सम्बंधित रहा, वह यह भूल ही गया कि इन सबके प्रयोग के बाद जीवन फैसला करेगा कि यह तमाम समय आपने केवल व्यर्थ के कामों में व्यतीत किया है ,इससे मन के संतोष आत्मा की शान्ति से कोई मतलब ही नहीं है और जीवन आपको असफल सिद्ध कर देगा |



निम्न  का प्रयोग अवश्य करें

  • सुपीरियर ,इन्फीरियर दौनो ऋणात्मक  विचार है और दौनो को अपनाने वाला अपने आपमें खोखला पन लेकर जीवन को झुठलाने का प्रयत्न करता रहता है मगर एक दिन वहीजीवन  उसे नाकारा सिद्ध कर देता है | 
  •  स्वयं को और  कुछ बताना छोड़ दें ,जबतक आप स्वयं अपना साक्षत्कार   करके अपने आपको स्वीकार नहीं कर पाएंगे ,तबतक आप अपने आपको कभी कुछ कभी कुछ बताते ही रहेंगे | 
  • स्वयं से और अपने गुरु से जो असत्य और झूठ बोलने की प्रक्रिया में लगने लगते है उन्हें बार बार स्वयं के कार्यों के लिए ही पछताना होता है ,अतः स्वयं से और गुरु से अपनी हर त्रुटि को बताते रहे | 
  • जीवन को बिनालक्ष्य के छोड़ने का मतलब यह है  कि , आपको पतन के उस रास्ते पर लेजायेगा जहाँ से आपको सफलता के लिए शून्य से प्रयत्न करने होंगे | 
  • भविष्य और वर्तमान को खराब मत बताओ कठिनाई , धोखा , हादसा इसलिए आपके सामने है कि आप एक नए मनोयोग से स्वयं को सिद्ध करने का प्रयत्न करें , सफलता आपको ही मिलेगी | 
  • बोर , बेमन ,टेंशन ,नैराश्य , भय और ग़म  इस बात का प्रतीक है की आपके सामने लक्ष्य पूरी निष्ठां से नहीं बना पाए है या उसके क्रियान्वयन में आपने कोई कार्य नही किया है और आप ईश्वर पर कोई विशवास नहीं करते है यदि आप स्वयं को इन सकारात्मकताओं से सजा लें तो ये नाकारात्मकताएं स्वयं ख़त्म हो जाएंगी | 
  • न्याय के लिए स्वयं अपने परिश्रम और लक्ष्य पर निर्भर रहें यहाँ सांसारिक लोग आपसे लाभ उठाना , अपने को बड़ा बताने के लिए आपका प्रयोग और आपके शोषण से जुड़े है आपको अकेले ही मान दंड स्थापित करने है || 
  • सहारों की जरूरत गिरते हुओं को होती है आप स्वयं अपनी सकारात्मकताओं और उस सर्वशक्तिमान से स्वयं को जोड़कर अपने लक्ष्य बनाये और पूरी ताकत से उसे क्रियान्वित करें सारी  सफलताएं आपको ही मिलेंगी | 
  • स्वयं को कभी भी शक्ति हीन , अभावों में और समस्या में मत महसूस करें यही विचारकारें कि जीवन की हर समस्या में आपने अच्छे निर्णय और प्रयत्न करके जीत हासिल की है और यहाँ भी हम जीत हासिल करेंगे | 
  • जो त्रुटियां जीवन ने हमे बताई  है उन्हें दुबारा न करें , हर गलती से सबक लेकर आगे बढ़ने का संकल्प अवश्य करें जीवन की हर विजय आपकी ही होगी | 
  • नकारात्मक , नैराश्य और क्लेषकारी व्यक्तित्व को अपने विचारों से निकाल दें अन्यथा आपकी हर विकास की सोच में आपकी क्रियान्वयन्ता को ये नष्ट भृष्ट कर देंगे ,वर्तमान , लक्ष्य , और सफलता आपकी यही सोच हो |




Sunday, November 6, 2016

Success will be yours one day एक दिन सफलता तुम्हारी ही होगी

Success will be yours one day
एक दिन सफलता तुम्हारी ही होगी
एक सत्य घटना
श्रेय का परिवार मध्यम ही था, दो बहिनें बड़ी थी शादी हो चुकी थी, तीन  भाई और थे, उनकी अपनी अपनी दुनिया थी, पिता रिटायर ,माँ घर में ही काम काज करती थी और वह बहुत आधुनिकता के साथ समाज में उन्हें उनके काम के लिए काफी सराहना मिलती थी ,कम्प्यूटर का एक  डिप्लोमा  करने के बाद  श्रेय  और पढने का अवसर ही नहीं मिला ,शादी जबरन करदी गई ,दो बच्चों  के साथ वह एक संघर्ष भरी दुनियां में अकेला था ,सबके साथ होते हुए भी, श्रेय ने एक कम्प्यूट घर में ही लगाकर कुछ कुछ काम चालू किया , परिवार की  आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी  भी नहीं थी ,बस गुजारा चल  जाता था । पूरे परिवार में सारे भाई अपने अपने कामों में लगे ,अपना अपना खर्च खुद उठा रहे थे पिता को जब तब जिसकी सहायता करनी होती थी करते ही रहते थे , कुल मिला कर सब एक साथ रहते हुए भी अपने अपने परिवारों के साथ सीमित आय में  गुजारा कररहे थे |

श्रेय की उम्र भी ३० -३२ के करीब थी एक बच्ची और बच्चा था उसके पास आय के स्त्रोत दिन ब दिन  खर्चों के सामने काम होते जा रहे थे परिवार के सदस्योंकी सहानुभूति भी अब ख़त्म हो गई थी खर्चा जीवन को उदासीन और नैराश्य के उच्चतम शिखर पर पहुँचा  गया था , माता पिता को छोड़कर सब लोग उसे तिरस्कृत दृष्टी से देखते थे एक अन बोला अपमान सहा था श्रेय ने  परिवारके सदस्यों  तक से ,अकेले कम्प्यूटर से आने वाली आय बहुत कम  पड़ने लगी थी ,, अनेकों उपाय और व्यवसाय किये उसने ,मगर सारे उपाय व्यर्थ हुए , साधन हीनता ने उसे  अवश्य सिखा  दियाथा कि अपने कम्प्यूटर के ख़राब होजाने पर उसकी  मरम्मत खुद कैसे करे ,कैसे डाटा सेव  करे, कैसे नष्ट डाटा को पुनः प्राप्त करे, और कैसे अपना काम बिना ज्यादा खर्च किये पूरा करें ,कैसे प्रोग्रेममिंग ,साइट्स बनाना और नया कार्यक्रम बनाने की प्रक्रिया पूरी की जाए ,और कैसे हार्डवेयर का काम घर में ही करके कम्प्युटर को दुरस्त किया जाए , ये सब उसे उसकी साधन हीनता ने हीसिखाया और समझाया था ।

एक बार श्रेय परेशान होकर अपने गुरु के पास पंहुचा , बहुत परेशान और हारा हुआ सा ,उसने कहा अब मैं  सब कुछ छोड़कर   व्यवसाय करना चाहता हूँ , कोई  कच्चा उत्पाद दिल्ली से  लाया जाएगा और उसे पैक्ड करके घर घर बेचने का प्रयत्न करूंगा , वैसे पहले भी मैं  कई व्यवसायों में असफल होता रहा हूँ ,गुरुने कहना आरंभ किया पुत्र आप अपनी समस्याओं से इतना  प्रभावित हो कि  आप अपनी  कार्यकारी शक्ति का भी प्रयोग नहीं कर पा रहे है परिणाम  सफलता भी प्रश्न वाचक होगी है , अब आप यह समझलो कि आप जिस कार्य में पारंगत हो उसमे ही काम चालूकरें आपको जो थोड़ा बहुत कम्प्युटर आता है ,आप उसकी ही कोई छोटी नॉकरी करो और स्वयंको सकारात्मक व्यक्तित्व में बदलो , हर आदमी आपसे बड़ा विद्वान और कुछ सीखने योग्य है ,इसे ध्यान रखना एक नया जीवन तुम्हारा इंतज़ार कररहा है |


ईश्वर का इतना शुक्र था कि श्रेय को दिल्ली में एक कप्यूटर कंपनी में ८००० रूपए माह पर नॉकरी मिलगई , कुछ समय बाद गुरुने कहा पुत्र आप अपने प्रयास जारी रखे इस प्रकार नई  नोकरियों मेजाते हुए वह १२०००,१८०००,
२४००० , ४००००  ७०००० रुपयों के वेतन पर काम करता रहा और आज वह एक कंपनी का प्रमुख विश्लेषक है जिसका काम जटिलतम , नष्ट  प्रायः कम्यूटर से डाटा निकालने का है, आज अनेक देशों की यात्रा करके स्वयं को सिद्ध कर चुका  है हमारा श्रेय , परिवार समाज में उसका एक अलग और ऊँचा स्थान है

 मनुष्य का उत्थान और पतन उसकी ही सोच का एक साश्वत परिणाम  है, वह स्वयं को जैसा बनाना चाहता है उसमें उसकी सोच ,क्रियान्वयन ,एवम  भविष्य और अतीतके विचार उसे प्रभावित करते रहते है , हर कार्य नियोजित और निश्चित प्रक्रिया में होना चाहिए ऐसा मानने वाले यह नहीं जानते कि , जब भविष्य की घटनाएं , उम्र , परिस्थितियां और भविष्य का हर पल अनिश्चित है और उसमे धनात्मक और ऋणात्मक चिंतन के दो द्वार है ,तो हर बार हम ऋणात्मकता के द्वार खोलकर कही स्वयं को नाकारा सिद्ध तो नहीं कररहे है ,यदि समय की मान्यता के साथ आपने स्वयं को धनात्मक आधारों पर सिद्ध  नहीं किया तो आप सफलताको केवल एक स्वप्न मानकर व्यवहार करते रहेंगे और हर बार जब  का ध्यान आएगा वह हमें मुंह चिढ़ाती दिखेगी, क्योकि हम अपनी सफलता के उद्देश्य से अधिक अपनी समस्याओं को महत्व देते रहे |


सम्पूर्ण परिस्थितियां सामान्य  होने पर ही आप अपनी सफलता के उद्देश्य के लिए  प्रयास रत होंगे, या सम्पूर्ण समाज कार्य क्षेत्र परिस्थिति सामान्य होजाने पर ही जीवन की विकास यात्रा चालू कीजाएगी, ये सारे विचार  और जीवन को  धोखा देने  वाले है क्योकि जीवन कभी  भी सहज और  शांत होता ही नहीं है, हर रोज एक नया अध्याय  अधिक प्रबल होकर अपनी परिस्थिति समस्या को पूर्ण करने की मांग करेगा और जीवन का आधार भूत उद्देश्य फिर हारने लगेगा, आपकी आवश्यकता यह हो कि  आप पूरी कठोरता के साथ अपने आपको  नियोजन के नियमों में बांधें ,साथ ही हर उद्देश्य के लिए विकल्प जरूर रखें, जिसने भी  विपरीत स्थितियों में  स्वयं को सिद्ध किया है ,उसे  जीवन का पूर्ण संतोष अवश्य प्राप्त होगा, क्योकि अपने कार्य  से  मूल्यांकन में यदि सहज संतोष  प्राप्त होना और किसी से  शिकायत न  होना ,ही इस बात का प्रतीक है कि ,  आप जीवन को भी सफल सिद्ध कर चुके है चुके है|

हजारों रुकावटें , अनिश्चितताएं ,  अज्ञात भविष्य ,और  अपने ऋणात्मक आकलन के शिकार हम बहुधा अपने  लक्ष्य के लिये ही बहुत सारी  समस्याएं पैदा कर  लेते है ,अपने आपको  यह समझने का प्रयत्न अवश्य करें कि जीवन में जिन समस्याओं से हम स्वयं की क्रियान्वयनता ख़त्म करके खड़े होने को है ,वह स्वयं एक  हार की निशानी है ,किसीभी हालात में अपने आपको दोषारोपित किये बगैर स्वयं को सिद्ध करना ही जीवन का सही मायने है ,अपनेआपको कृतसंकल्पित रखें ,एवं लक्ष्य की और बढ़ने का प्रयत्न अवश्य करें ,जिससे बाह्य ऋणात्मकता  अधिक प्रभावित नहीं कर सकेगी |

 लक्ष्य के साथ समाज अपने परिवेश से सामंजस्य बनाना भी अति आवश्यक है यदि आप अपने आस पास के लोगों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना जानते तो निश्चिततः उनकी  नकारात्मकता हम पर असर करने लगेगी रामतीर्थ से एक शिष्य ने पूछा  कि  एक मित्र मुझ पर थूकता है, गुरु ने कहा दूर हट  जाओ ,वो फिर भी थूके तो ,और दूर हट  जाओ वो और आगे आके थूके तो गुरु बोले पुत्र आपके पास आपका लक्ष्य है ,और वह मशक से तो थूक नहीं रहा है ,अपना सब्र  बनाये रखो, उसकी गति विधि आपको अपने मन बुद्धि से हटा न पायी तो आपका सफल होना तय है ,अपने लक्ष्य का ध्यान और एक बड़े सब्र के साथ आपको अपना लक्ष्य अवश्य मिल सकता है |



निम्न पर भी ध्यान रखने का प्रयत्न करें

  • स्वयं को सकारात्मक रखने का प्रयत्न करें , किसी भी परिस्थिति में स्वयं को नकारात्मक न होने दें अन्यथा आने वाला समय भी उस नकारात्मकता का शिकार हो जाएगा | 
  • जीवन में जिस लक्ष्य के प्रति हम संकल्पित है उसे हर परिस्थिति में पूर्ण करने का भाव रखे यह आपको अपने संकल्प में जीत अवश्य देगा | 
  • स्वयं के लिए एक निर्धारित योजना अवश्य रखें और हर हाल में उसे पूर्ण करने का प्रयत्न अवश्य करें क्योकि यही योजना आपके समयबद्ध विकास को गति देगी | 
  • लक्ष्य के क्रियान्वयन के लिए एक विकल्प अवश्य रखें जो अपरिहार्य स्थिति में आपको सिद्ध करने में अधिक महत्व पूर्ण सिद्ध होगा 
  •  सकारात्मक चिंतन करते समय दूसरों से स्वयं को छोटा सिद्ध करने का प्रयत्न न करें अन्यथा आपअपने लक्ष्य से भटक कर अपनी नकारात्मकता पर पहुँच जाएंगे | 
  • अपनी सुविधा और अपनी रूचि के लिए अपने लक्ष्य से समायोजन नहीं करे ,आपयह जान लें की जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं के लक्ष्य को पूर्ण करना ही है | 
  • क्रोध एवं दूसरों का आंकलन बिलकुल नहीं करें क्योकि दौनों ही से आप अपने लक्ष्य से दूर  होकर वैसी ही नाकारात्मकताएं पैदा करलेंगे जो सामने वाले में है | 
  • नकारात्मकता और सकारात्मकता का भेद समय समय पर अपने जीवन मूल्यों के साथ परखते रहें जो हमे बहुत अच्छा लगता है वो हमेशा ठीक नहीं होता है | 
  • गरीबी ,अभावहीनता , परिवार एवं जाति  की निम्नता ,आपके मार्ग में बाधक नहीं हो सकती ,बशर्ते आप स्वयं का चिंतन सकारात्मक रूप में करसकें | 
  • दूसरों की कमियां को दर्शाने का प्रयत्न न करें स्वयं उनकी आलोचनाओं से बचकर रहें इससे आपके व्यक्तित्व में सकारात्मकता स्वयं आने लगेगी | 
  • आप दूसरों की दृष्टी में क्या है यदि यह सकारात्मक है तो आपके लक्ष्यों और उपलब्धियों में स्वयं सकारात्मकता आजायेगी |




Sunday, September 4, 2016

सफलता का मूल मंत्र है स्वयं का साक्षी भाव self witness is basic mantra of success


 सफलता का मूल मंत्र है स्वयं का साक्षी  भाव

self witness is basic mantra of success

मेरा जन्म राजिस्थान के बहुत बड़े राज घराने में हुआ था हजारों नॉकर चाकर दास -दासियाँ और बड़े बड़े राज प्रासाद थे मुझ पर ,रोज बहुत बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था , सुन्दर अति योग्य नृत्यकियॉं अपनी  अपनी कला को ऐसे जीती थी जैसे भगवान् ने उनको सीधा कला के सारे मानदंड देकर पैदा कर दिया हो , युद्ध , वीरता , पुरूस्कार सजा और आक्रमण तथा बंदी बनाकर फांसी क़त्ल और खजाने लूटते लूटते हम सब अपनी आधार भूत दया ,करुणा और अपरिग्रह जैसे शब्दों से काफी दूर निकल आये थे| 

 हर अच्छी लगने वाली चीज लूट ली जाए , हर ख़ूबसूरत वस्तु उनकी अपनी हो और न्याय का आशय वो हो जो हमे अच्छा लगे , इन्ही संस्कारों में पला बढा मैं एक निरंकुश ,विलासी बाद दिमाग और खुद को सर्व शक्तिमान मानने वाला था ,मैं राजा का एक मात्र पुत्र था, एक बार एक युद्ध में मुझे भी जाना पड़ा ,बड़ी वीरता और शौर्य से लड़ी मैंने अपनी लड़ाई और युद्ध जीत कर घर लौटा , सारे राज्य में बड़ी खुशियां मनाई गई और शराब के नशे में  मैं अचानक एक हाथी से फिसल गया  और जबतक संभल पाता कि  एक हाथी के पाँव से चोटिल होगया ,पूरा बदन दर्द से भर गया, मालूम यह हुआ की मेरा कमर से नीचे का बदन सुन्न हो गया है , वैद्य  हकीम दुआ करने वाले पूजा करने वाले सब लगे थे , कही से तो कुछ अंतर आजाये ,मगर सब बेकार हुआ ,मैं  एक अपाहिज की तरह महल के एक कौन में डाल दिया गया , पिता को सलाह दी गई की आप दूसरी शादी करके वंश बढ़ाये काफी कुछ  ना हां करके वो तैयार होगये | समय बढ़ता गया अब तो दो वर्ष भी होगये थे मुझे अपनी हालात पर रोते रोते , बेहद कमजोर ,लाचार और अपनी मौत को पल पल जीता  हुआ मैं | 

अपने अकेले कमरेमे अलग अलग भाव, मेरे दुश्मन बन गए थे, कभी मुझे लगता की मुझे खुश करने में असमर्थ एक ख़ूबसूरत दासी को पिता ने दंड स्वरुप हाथी के पैर  से कुचलवा दिया ,हजारों दास - दासियों को अपनी हवस में हमने फांसी चढ़ावा दीथी  ,अनेक वीरों को बहुत अच्छा प्रदर्शन करता देख मैंने अपने हाथों मौत के घात उतार दिया था ,क्योकि वे मुझसे अधिक वीर थे , हर अच्छी चीज का उपयोग मैं  ही करूँ ,इस हविश ने मुझे एक क़ातिल ,दुरा चारी  और सिरफिरे राजकुमार की तरह पेश कर दिया था ,और मैं  इससे भी अधिक आतातायी की शक़्ल  में नजर आने लगा था खुद को | 

डॉक्टर वैद्य हकीमों ने सारी आशाएं छोड़ दी थी ,दासियाँ दास सेवक सेवा में लगे थे, मगर कोई ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था ,   एक परिवर्तन था  कि खाना प्रतिबंधित था , शराब मांस ,गरिष्ट भोजन बंद हो गया था और दुनिया के सारे भगवान् मुझे अपनी और आकृष्ट कररहे थे ,आत्मा का साक्षी भाव  अंतिम समय देख कर पूर्ण रूपेण जाग चूका था , हर कर्म की सजा जीवन के इस रूप में देखते देखते मैं थक गया था , मैं  अपने दुष्कर्मों का एक मात्र गवाह  बना ,अपने दुष्कर्मों का प्रायश्चित कररहा था ,दिन ब दिन  अपने कर्मों से घृणा और अपने कर्मों की सीढ़ी पर चढ़ कर देखने पर अगला भविष्य मुझे बड़ा अन्धकार मय  दिखाई दे रहा था ,अब  मैं स्वयंका हर कर्त्तव्य पर आंकलन कररहा था ,कि अब कोई भूल न हो हर वक्त अपना मूल्यांकन करते   हुए मन बार बार अपने किये  पर रुआंसा हो जाता था, कई कसमें खाता था क्षमा मांगता था,मगर अब क्या॥ 

एक दिन एक फ़क़ीर राजा से आज्ञा मांग कर  मेरे पास पहुंचा ,वह मुझसे बोला  कि 
 पुत्र ईश्वर क्या है  --- मैंने कहा सत्कर्म और आदर्श ,
 वो बोला दुष्कर्म क्या है मैंने कहा वो तो अकाट्य भोग्य है  ,जिसे सबको भुगतना है ,
 उसने कहा जीवनक्या है ,मैंने  कहा  स्वयं को सिद्ध करने का माध्यम है , 
उसने कहा फिर भ्रम क्या था ,मैंने कहा लालच , जीवन को न समझ पाना और खुद को अमर समझना ही भ्रम था , उसने कहा कि सर्व शक्तिमान कौन है मैंने कहा  ईश्वर , खुदा ,और प्रकृति,और  आत्मा तथा  सकारात्मक भाव ,
 उसने  पूछा मैं ईश्वर को नहीं मानता, तो किसको मानूँ सबसे शक्तिशाली ,मैंने कहा हे देव आप अपने कर्म सकारात्मक भाव , और अपने उस साक्षी भाव को  ईश्वर मानते है और हर पल उसमे ही विद्यमान है वही ईश्वर है और उसके लिए सब कुछ संभव है , 
साधु हंसा और बोला पिछले२ वर्षों   में तुमने जीवन का क्या अनुभव सीखा ,मैंने कहा  देव ऐसा लगा कि मैं  एक राक्षस योनि से निकालकर ,देव योनि में आगया हूँ ,और अपने दुष्कर्मों के साथ मारने जा रहा हूँ 
 साधु में स्वयं को कैसे और किस विधि से जागृत किया जा सकता है , मैंने कहा वह  साक्षी भाव है  ,जिसके निरंतर चिंतन से मैं इस सोच तक आया हूँ ,
साधु ने कहा  पुत्र ठीक है मैं  भी तुम्हारे साक्षी भाव में तुम्हे बचाने की आर्त नाद सुनकर आयाहूं , यह कहकर साधु ने मुझे एक पाउडर दिया कड़वा ,मेरे पूरे शरीर में कपकपाहट पैदा हो गई ,साधु ने चिल्लाकर कहा उठो और दरवाजा खोलो , मैं  कापते हुए उठा और दरवाजा खोल दिया, साधु ने कहाअब तुम ठीक हो गए हो पुत्र, इस साक्षी भाव के साथ ही जीना ,कि  परमात्मा हर पल तुम्हारे साथ तुम्हारा आंकलन कररहा है ,यह कहकर साधू चला गया ,और मैं  एक कुशल शासक बना जीवन की हर स्थिति भाव से अपने साक्षी भाव के साथ जीवित हूँ, हर पल की सजगता के साथ, कि कहीं कोई कर्म मुझे असफल  सिद्ध न कर दे || 

जीवन को जीकर राम, कृष्ण  ने यह सिद्ध कर दिया, की यदि आदर्शों के  शिखर पर अपने मानदंड बनादिये जाए तो इंसान भी स्वयं ईश्वर बन सकता है , यहाँ जीवन का वह भाव काम करता है ,जिसे परमार्थ की तराजू ने सबसे ऊपर तौला है, वह तो यही सीखा पाया कि, आप जितना सुखी और प्रसन्न रहना चाहते हो, आप दूसरों को उतना ही प्रसन्नकरना सीखिये ,अन्यथा आप स्वयं की स्वयं से दौड़ में भी हार जायेगे, क्योकि आपकी आत्मा ही सिद्ध कर देगी कि आप यह रेस हार चुके है | क्योकि जब भी मैं  कुछ करता हूँ ,मेरा साक्षी भाव निर्णायक होकर मुझ पर अपना फैसला सुना देता है ,हो सकता है कि तात्कालिक स्थिति में वह फैसला  मुझे सुनाई न दे, मगर एक दिन वह अपनी सत्यता के साथ मेरा ही भोग्य बन कर मुझे मिल जाता है | 



 जीने का तरीका ही हमे सुख दुःख जय पराजय और दुःख और तमाम नकारात्मकताओं के द्वार पर लेजाकर खड़ा करदेता है हमारे सामने सफलताएं  खड़ी हमारा इंतज़ार कररही होती है और हम  उनका ध्यान ही नहीं रखपाते क्योकि जीवन की प्राथमिकताएं  ही हम ध्यान में नहीं रख पाते , जीवन के बाह्य तत्वों पर ही उलझ कर सत्य को पूर्णतः भुला देते है हमारे सामने झूठे संबंद्ध , शारीरिक आपूर्तियां , भौतिक संसाधन , और कैसे भी जो अच्छा लगा वो छीनने की पृवृत्ति इतनी प्रबल होती है की हम केवल स्वयं तक सीमित होकर रह जाते है , हमारा अपना मन आत्मा और आदर्शों का यहाँ तो सवाल ही नहीं उठता , कालांतर में जब , जीवन अपने उत्तरार्ध को जाने को होता है तब हर कर्म आपसे  अपना औचित्य प्रश्न दागता है , परन्तु जीवन पर कुछ होता ही नहीं है उत्तर के रूप में , क्योकि वह अगले जन्म में भी अपने साक्षी भाव से दूर जन्म लेता ररहेगा  रहेगा किन्तु कभी उस सत्य तक नहीं पहुँच पायेगा जिसके लिए उसने जन्म लिया था ,यदा -कदा जीवन आप्टे कठोर ठोकरों से इस भाव को अवश्य समझा देता है | 


जीवन के समक्ष बहुत सारी  उपलब्धियां है ,कुछ बेस्वाद , बेरंग,  भाव शून्य सत्य है ,जो बताते है कि यही जीवन का वास्तविक सत्य है ,जिसमें आपको ही रंग भरने है मगर दूसरी ओर  रंग ,मस्ती,  वासनाएं , राग ,द्वेष, और विलासिताओंका साम्राज्य है नशीली भाव भंगिमाएं है रूप ,सौंदर्य ,  काम- क्रोध -लोभ- मोह  मत्सर और अनगिनत विमोहित करने वाले विषय बिखरे पड़े है तो ऐसे में सत्य आदर्श और शून्य ता का प्रश्न ही कहा है, यहाँ तो संसार को पूर्ण भाव से जानने का भाव का मतलब है संसार का जितना उपयोग हो करलें , जीवन पर उसका ही अधिकार है और यही उसका चिरंजीवी भविष्य है , जबकि इसमें कुछ भी सत्य है ही नहीं ,जब वासनाओं , काम क्रोध मोह लोभ के तूफ़ान उतार पर होते है तब जीवन शेष ही कहाँ होता है  वहां तो जाता हुआ समय सबकुछ में एक ऐसी आग लगा कर जाता है जिसका पश्चाताप का धुंआ देर तक धधकता रहता है , और जीवन अपनी गलतियों को अपने साक्षी भाव से देखता रहता है | 


 भाव का आशय है अपने  हर कर्त्तव्य  क्रियान्वयन और जीवन की गति पर पैनी नजर बनाये रखें , हर पल हर घड़ी एक नए क्रियान्वयन की मांग करता है मन अपनी आपूर्तियों  की और सोचता है और आत्मा अपने सत्य और उसके परिणामों का भय दिखाती है , भावा वेश में कभी मन जीतता है तो आत्मा बिना समय गवाये उसे आरोपी सिद्ध कर देती है और
  जैसे ही वह आदर्श कार्यों में आती है वह उसे प्रोत्साहित करती है इतना प्रोत्साहन जिसे दुनिया की किसी चीज से नही खरीद जा सकेगा , इसी लिए  नानक, महावीर , रामतीर्थ विवेक नन्द अरस्तु , टालस्टाय ,ईसा मोहम्मद , साईं और अनगिनत ऐसे संत फ़कीर हुए जिन्होंने स्वयं को साक्षी भाव के बंधन से इतना अच्छीतरह बाँध लिया था कि  वे स्वयं ईश्वर होगये ,क्योकि उनका साक्षी भाव उन्हें जिस दिशा में कर्त्तव्य के लिए प्रेरित करता रहा जिस ओर कोई भूला भटक ही जा पाता है, और यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी थी | 


         इन सबका भी प्रयोग करके देखें 


  • कर्म के दो भाग है प्रथम शरीर के लिए और दूसरा आत्मा के लिए ,ध्यान रहे कि   आप  न तो शरीर है, न ही आप मन है, जो आपको देख रहा है, निरंतर आपका आंकलन कररहा है, वह  अलग है ,जो आपको जन्मते मरते और उसके बाद भी देखता रहता है उसकी उपस्थिति को महसूस कीजिये ,की वह आपके हर कर्त्तव्य में साथ है | 
  •  आपको स्वयम को सिद्ध करने के लिए भेजा गया है न कि  खो जाने के लिए आप यदि अपना लक्ष्य भूल कर दुनियां की रंग बिरंगी मृग मरीचिकाओं में उलझे रह गए तो निसंदेह आपको पश्चाताप करना होगा 
  • सुबह से शाम तक अपने किये हर कार्य का आंकलन करें , सांसारिक भोग्य का प्रयोग उतना ही हो जितना आवश्यक है , उसके बाद अपने पूर्ण लक्ष्य के लिए स्वयं पर नजर रखें।
  • संकल्प की साधना में आपका साक्षी भाव एकमात्र साधन है जो उसे पूर्ण या अपूर्ण कर सकता है क्योकि वही आपको स्वयं के बंधन में बांधने में सक्षम है | 
  • साधना एकाग्रता और संकल्प आपके साक्षी भाव का ही नाम है आप जब संकल्प को अपनी अंतरात्मा के सामने रखकर समय  बद्ध  आकलन करने लगते है तब साक्षी भाव अपना थोड़ा सा सहारा देता अवश्य है | 
  • ध्यान रहे साक्षी भाव  में न तो दुःख होता है न सुख होता है वह तो एक अडिग न्यायाधीश की तरह  स्थिर अडिग निष्प्रभावी भाव से हर पहलू का निर्णय करता रहता है यह बिना जाने की वह आपको अच्छा लगा या बुरा | 
  • आप सतत स्वयं के साक्षी भाव की निगरानी में है जो आपके  सी सी  टीवी कैमरा से हजारों गुना परिष्कृत है जो आगे के भाव और सोच की सकारात्मकता और नकारात्मकता का भी बखूबी से आंकलन कर देता है | 
  • स्वयं के साक्षी भाव को इतना प्रबल बनाएं कि आपके व्यक्तित्व की सारी नाकारात्मकताएं उसके सामने अपना अस्तित्व खोने लगें ध्यान रहे यही अभ्यास आपको एक दिन उच्च शिखर पर लेजायेगा | 
  • आपको केवल अपने साक्षी भाव पर नजर रखने की आवश्यकता है जैसे कोई हर पल आपकी निगरानी कररहा है अच्छा बुरा  जैसा भी कुछ है वो देख रहा है निर्णय अवश्य देगा बिना प्रभावित हुए | 
  • आपका साक्षी भाव आपको प्रसंशा दे ने लगे तो आप निश्चित समझिये की आपको दुनियां की सबसे अनमोल  सौगात प्राप्त हो गई है क्योंकि जीवन का परम संतोष साक्षी भाव के सकारात्मक होने में ही है| 

 मनुष्य के जन्म से पहले और मृत्यु केबाद तक उसका साक्षी भाव जागृत रहता है वह आपके सीसीटीवी कैमरों से लाखोंगुना परिष्कृत है जो आपके अतीत की हर कर्म की सजा और भविष्य की चेतना को कर्म से पूर्व ही चेतावनी देने लगती है , एक बार आपने इसकी उपस्थिति को पहिचान लिया तो सच मानिये आपको समय ऐसा ही सिद्ध करदेगा जैसे सफलता के हर मान दंड भगवान् ने आपके लिए ही बनाये हों

    Sunday, August 28, 2016

    सुख और दुःख क्या है what is pleasure and pain

    सुख और दुःख क्या है  what is pleasure and pain

    प्रशांत बहुत बड़ा वैज्ञानिक था अन्वेषण खोज और मानवीय सेवा के लिए कृत संकल्पित , वेतन बहुत ज्यादा नहीं था,  बस    पत्नी   और पुत्री   का काम चल जाता था , पत्नी भी पास के  स्कूल   में शिक्षिका थी, बच्चे  उसके ही विद्यालय में पढ़ते  थे  , पैतृक घर से भी आवश्यक सहयोग समय समय पर मिलता रहता था , कहने का मतलब यह की परिवार संतोष जनक स्थिति में अपना काम चला रहा था , और यदाकदा पड़ने वाले कामों के लिए बचत भी खूब कर ली जाती थी, पैतृक मकान में निवास करते थे वे सब लोग , पैतृक मकान अब विकसित क्षेत्र में आने लगा था, बाजार माल और नए और बड़े  निर्माणों ने  घर  चारों और से घेर लिया था ,नयी बड़ी बड़ी गाड़ियों में अत्याधिक सजी धजी युवतियां लंबी लंबी गाड़ियों से निकलने लगी, और इन सबको देख कर प्रशांत  के मन में कुछ दिनों से मन में एक हीन भावना घर करनेलगी थीं ,अब हर घटना को वो गरीबी , अभावों , दुःख दर्द और तिरस्कार की नजर से देखने लगा ,अपना घर अपनी उपलब्धियां अपनी  आय उसे दुःख का कारण दिखाई देने  लगी,  सम्पूर्ण घर के परिवेश को आक्रोश अशांति और नकारात्मकता से भर कर खड़ा हो गया वह ,शान्ति सहयोग और सुख की पराकाष्ठा पर रहने वाला परिवार अचानक बिखरने के कगार पर आगया |
    एक दिन नैराश्य के महा सागर में डूबते हुए उसने पास बहती हुई नदी में छलांग लगा दी ,पेशन , और सारे लाभों का अधिकार पत्नी को देने को लिख भी गया था वह |२.६ वर्ष   बाद प्रशांत को जब कुछ याद आया तो उसने स्वयं को एक जंगली कबीले के रहवासियों के साथ खूब प्रसन्न पाया स्वयं को  वह   तंदुरुस्त दिखाई पड़ा, गौर वर्ण चिकनी मांसल देह और केवल एक लंगोटी पहने हुए ,  पूर्व की तुलना में लगभग २० किलो वजन बढ  गया था, उसे कबीले के सरदार ने बताया आपको गहरी बेहोशी की हालात में  हमने नदी से निकाला,  कबाइलियों ने चिकित्सा की , ओझाओं ने खून रस पेड़ पत्तियों के रस काढ़े और गोबर ,मिट्टी और लेपों से निरंतर इलाज किया गया ,मालिश ,लेप और दुआओं से आप जल्दी ही ठीक होगये ,ओझाओं ने बताया की आप भगवान् के भेजे हुए दूत है ,तब से आपको कबीले के मुखिया के यहाँ ही रखा गया, निरंतर सेवा में पूरा कबीला एक रहा है , इस २. वषों में आपको कोई नहीं हरा पाया ,आपने बड़े बड़े वीरों को हरा कर हमे बड़ी जीतें दिलाई है , आप बेहद खुश , प्रसन्न और ज़िंदा दिली से रहने वाले रहें है ,आज ऐसा लगता है की आपको याददाश्त याद  आने के साथ वो नैसर्गिक प्रसन्नता चिंता की लकीरों में बदलते देखा है हमने,
    प्रशांत ने स्वयं को कबीले का सरदार और एक बड़े साम्राज्य का सम्राट मान कर गौरवान्वित समझा ,आज पूरा कबीला उसके सामने नत  मस्तक खड़ा था , प्रशांत को सुख दुःख और उनके उद्भव बिंदु का सहज ही पता चल गया था वह जान गया था सुख और दुःख केवल कल्पनाओं के सहारे बढ़ने और घटने वाले सत्य है , घोर यातना और नाकारात्मकताएं यह बताने को पर्याप्त होती है कि  कहीं पास ही सहज सुरम्य और सुखद समय के आने की आहाट पास है है |

    दुःख और सुख तो हमारी चेतना की सकारात्मकता और नकारात्मकता की सोच का नाम है महान उपलब्धि को भी यदि आपने नकारात्मक परिवेश में सोचना आरम्भ किया तो वह अपना स्वाभाव बदलकर नकारात्मक प्रभाव देने लगती है और सकारात्मक चेतना में यद्ध की हार भी जीत की और एक सशक्त प्रायास मान लिया जाता है , शरीर मन बुद्धि के अनुसार दूसरों की तुक्ष्छ  उपलब्धियों को हम बड़ा मान बैठते है, औरस्वयं की बड़ी बड़ी सफलताओं को नकारात्मक भाव से असफल सिद्ध करने में लग जाते है ,फिर कैसे सुख पैदा हो पायेगा ,और कैसे जीवन की सुगंध तुम्हे सुवासित कर पायेगी

    भौतिक संसाधनों के ढेर पर बैठा आदमी स्वयं को इतनी बड़ी बड़ी आकांक्षाओं , कामनाओं औरसंसाधनों की लूट  में फंसा लेता है, जहां उसके हर प्रायास से प्राप्त उपलब्धियां छोटी दिखने लगती है, और और का भाव और प्रबल होकर खुद को ही तुच्छ साबित करने लगता है,  है और उसे ही हम दुःख मानने की भूल कर बैठते है ,  महत्व पूर्ण बात यह कि जो है ही नहीं ,उसकी कल्पना में वर्त्तमान के सुखों को छोटा बताने वाली पृवृत्ति, भी हमारे दुःख का एक बड़ा कारण है ,और इसे हम सुख और दुःख की परिभाषा में रखने का प्रयत्न  करते रहते है, जबकि इसका सुख और दुःख से कोई मतलब ही नहीं है|

    अंतर्मुखी भाव जबतक आत्मा को अपने स्वरुप में जानकार प्राप्त उपलब्धियों में संतुष्ट प्रसन्न रहता है ,तब तक उसकी चेतना  शांत शून्य और परम आनंद के भाव को बनाये रखने में सफल रहती है ,और जैसे ही वह बाह्य जगत के भौतिक संसाधनों से अपनी तुलना और कामनाएं करने लगता है ,वैसे ही उसके तमाम सुख संतोष और आनंद का क्षय स्वतः हो जाता है |

    तुलना का आधार दुःख का सबसे बड़ा कारण  है वह एक और अपनी उपलब्धियों को नगण्य साबित करने लगता है ,वही दूसरी और दूसरों की उपलब्धियों का आंकलन स्वयं के द्वेष जलन और तमाम नकारात्मकताओं के साथ करने लगता है, परिणाम फिर जैसे जैसे दूसरों का विकास विस्तार और वैभव की वृद्धि होती है, वैसे वैसे आत्मा का असंतोष और अधिक बढ़ने लगता है  ,और इसप्रकार धीरे धीरे उसके पास केवल इतनी नकारात्मकता शेष रहजाती है जिसमे उसका तमाम अस्तित्व केवल  तुलना -नकारात्मकता -और कभी न ख़त्म होने वाली हार का मायने बना बैठा रहजाता है , उसका दूसरों पर ही नहीं स्वयं पर  भी विश्वास  नहीं रह पाता ,वह स्वयं  नकारात्मक भाव बन कर रहजाता है |

    आदमी बड़ा विचित्र प्राणी है वह स्वयं को प्रमाणित करने के लिए तमाम काल्पनिक स्थितियों का निर्माण स्वयं करलेता है है एवं समयानुसार स्वयं को सहानुभूति का पात्र बना लेता है , वह सामान्य जीवन में ही स्वयं को बेचारा निरीह और आश्रय हीन  बताकर सबसे ढेरों सहानुभूति अर्जित करता रहता है , धीरे धीरे उसकी सम्पूर्ण गतिशीलता ख़त्म होने लगती है , जीवन उसे निरीह बेचारा बेबस और नाकारा सिद्ध करने लगता है  , हम अपने बल पौरुष और सम्पूर्ण शक्तियों को भूल कर स्वयं को बेचारा और निरीह बना बैठते है ,परिणाम हमारा अस्तित्व दया का पात्र बना एक भिखारी की तरह हो जाता है ,जिसमे संतोष और परम आनंद की शांति  कहाँ  है , आप झूठ फरेब  शोषण और नाकारा  होकर कैसे स्वयंम को श्रेष्ठ साबित कर सकेंगे यह प्रश्न चिन्ह है | यहाँ यह और महत्व पूर्ण है  जबतक आप समाज से स्वयं को बेचारा नाकारा और कमतर सिद्ध करेंगे, वह आपके साथ सहानुभूति दिखायेगा, और जैसे ही आप  अपनी शक्ति से उसके बराबर खड़े हो जाएंगे, वह प्रतिद्वंदी होकर आपको हराने और मिटाने में लग जाएगा |

      दुःख तो चिंतन के आयाम ही है न ,भिखारी के पास आया १००० का नोट  या एक सोने का टुकड़ा बहुत बड़ी खुशी का विषय है, धनवान के लिए वह तनिक सुख हो सकता है ,तुम अपने किसी मित्रके साथ समय गुजारों उसे सुख मानते हो , अपनी मनमर्जी से स्वछंदता से किये कार्यों को सुख मानते हो ,या आपका अस्तित्व झूठ फरेब और अपनी मर्जी के ऐशो आराम तथा अनियंत्रित स्वच्छन्दता को सुख मानते हो , जबकि वह किसी और की नकारात्मकता का कारण हो सकता है ,परंतु आपतो उसे सुख और अधिकार मानते है ,  भिखारी  का दुःख है उसके पास कुछ नहीं है उसे वो मिलजाए ,धनवान चिंतित है कही उसका धन चला न जाए,यानि कि सुख और दुःख गुजरते समय के वो आंकलन है जिसको समय ही सिद्ध कर सकता है, परन्तु समय ये डोर किसी एक को देने कोतैयार नहीं रहता समय काल और परिस्तिथि के साथ आज ये आपका है कल वह और किसी का   होगा |

    मित्रों हम शरीर, मन , और बाह्य संसाधनों में जो  बुद्धि से चाहते है उसे सुख और जो नहीं चाहते उसे दुःख कहते  है , , एक पुत्र अपने पिता की मृत्यु को दुःख मानता है ,दूसरा उसकी संपत्ति पर अधिकार के लिएमृत्यु को सुख मान बैठता है ,,एक संपत्ति  क्षय को दुःख  मानता  है दूसरा उसे लुटाते हुए सुख का अनुभव करता है ,एक सबके लिए जीकर  खुद को सुखी समझता है दूसरा  स्वार्थों के सहारे सुख बटोरना चाहता है ,एक  मान दंड पर परीक्षा दे  कर सुखी होता है ,दूसरा उसकी अवहेलना कर यह कहकर सुखी  कि  वो इतना  महान नहीं है ,कहने का आशय यह कि  हम बाह्य तत्वों की उपलब्धि, झूठे संबंधों की  प्राप्तियों को ही सुख मान बैठे है बैठे है ,जिसका सुख और दुःख से कोई सम्बन्ध ही  नहीं है |

    तुमने लाखों कपडे पहने उतारे और फेंक दिए , वस्तुएं तो वस्तुएं तुमने इंसानों को भी वस्तु की तरह प्रयोग कर फेक दिया और तुम जीवन भर यही सोचते रहे ,दूसरों से बटोरे सुख से तुम परम आनंद तक पहुँच जाओगे ,मगर तुम जिसे लूटकर आगे बढे ,वह भी तुमसे तुम्हारा चरित्र , व्यक्तित्व सत्य और उसकी पूर्ण चेतना छीन ले गया, परिणाम तुम्हारी दशा उस महान  सम्राट जैसी हुई ,जिसने अनगिनत खाजाने लूटने के बाद भी रेगिस्तान की आंधी में एक लावारिस की तरह जान देदी , जिसे सामान्य आदमी जैसा कफ़न भी नसीब नहीं हुआ अआप अधिक सुख की खोज में अपने को अँधेरे गड्ढे में दफ़न करने की साजिश कररहे है आप ।
    जो सुख दूसरों पर आधारित हुआ उससे तुम्हे केवल दुःख ही मिल सकता है हम समाज में खड़े एक दुसरे से प्रेम सुख और समृद्धि मांग रहे है मगर हमपर किसी पर भी वह है ही नहीं ,हम भिखारियों की तरह स्वयं को बादशाह बताने की चेष्टा कररहे है,जिसपर सुख है ही नहीं वो ,आपको क्या दे सकता है ,जो एक बार परम चेतना से सुख का मायने समझ जाता है तो ,सुख की मांग ही ख़त्म  होजाती है ,  फिर उस महासागर से आप कितना भी सुख प्राप्त करो उससे उसकी स्थिति में कोई अंतर ही नहीं पड़ता ,अतः  सुख सत्य और पवित्र चेतना का आधार बनाओ  खुद को, जो दूसरों को भी प्रकाशित कर सके |


    भारतीय दर्शन कहता है की एक पूर्ण चेतना हमारे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है और उसी परम शक्तिशाली चेतना का सूक्ष्म बिंदु हमारी चेतना में भी व्याप्त है , हम बाह्य सुखों के भ्रमजाल में उस चेतना का ध्यान ही नहीं कर पाते परिणाम जीवन स्वयं नष्ट भ्रष्ट होकर कई जन्मों तक अपनी शान्ति और परम आनंद की खोज में भटकता रहता है ,स्वयं की परम चेतना के साथ जिसने ब्रह्मांडीय चेतना को एक कर कर लिया ,वही मुक्त होकर परम आनंद का मायने बन पाया है ,जिसे सहजता , अंतर्मन की जिज्ञासाएं और सत्य का अनुभव है ,वही सबकी सुख की कामनाओं में स्वयं  को एकाग्र कर के जीवन की चेतना आनंद और परम रहस्य को पा सकता है, और वही मानव जीवन का लक्ष्य भी है

    निम्न का प्रयोग आपको अपने सत्य तक ले जाएगा

    • सुख का सच्चा अर्थ शारीरिक मानसिक आपूर्तियों का मायने नहीं अपितु मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य की प्राप्ति आपको वास्तविक सुख तक लेजा सकती है | 
    • निश्चित और अवश्यम्भावी घटनाये दुःख का कारण नहीं वरन परिवर्तन है , और यह दुःख का कारण न होकर नयी सृष्टि के लिए आवश्यक भी है | 
    • जीवन मृत्यु विवाह जन्म ये सब कुछ संस्कार है इनके बाद और भी संस्कार अस्तित्व में आने वाले है तो ये सब सुख दुःख के कारक नहीं हो सकते | 
    • सच्चा दुःख है अशिक्षित विद्यार्थी , कंजूस और लालची धनवान , योगी में ज्ञान की अल्पता , अपने जीवन में लक्ष्य तक न पहुँच पाना , और दूसरो का शोषण जो आपके भाग्य का निर्माण करेगा |  
    • विषयों और  भूख को और अपनी बेलगाम स्वच्छंदता को सुख न समझे, क्योकि यह बार बार अपनी अगली मांग के साथ यह आपको कमजोर और बीमार बनाता जाएगा | 
    • अत्याधिक सुख की कामनाएं करने का स्वाभाव भी एक बड़ी बीमारी है, जिसका इलाज आपको ही करना होगा क्योकि यहीं से आपको असंतोष पैदा  होता है | 
    • वे सम्पूर्ण आपूर्तियां जो थोड़े ही समय में फिर आपूर्ति चाहने लगती है वे सब बंधन है, उनकी सीमा तय करके प्रयोग करने से ही आप स्वयं को जीत सकते है | 
    • हम जिसे सुख कहरहे है उसका सुख से कोई लेना देना ही नहीं है क्षणिक सुख और हम जो चाहते है हम केवल उसे सुख मानते है जबकि स्वयं की एकाग्रता का भाव जिसमे स्वयं को विराट में एकाग्र कर सके वही परम सुख है | 
    • स्वयं के चिंतन और शरीर को साधने के लिए स्वयं को एकाग्र करें और उसे अपने आनंद एवम भविष्य के प्रयासों में लगादे परिणाम अधिक सफलता देंगे | 
    • मन बुद्धि आत्मा के साक्षात्कार के बाद अपनी चेतना को परम चेतना में शामिल होते देखने का स्वप्न देखे फिर संकल्प करें की चेतना को परम चेतना का द्वार मिल गया है आपकी सुख की यही सीढ़ी आपको अपना लक्ष्य देदेगी | 

    जीवन तो  एक ऐसा अथाह सागर था जिसमे भिखारी की भांति भटकते हुए अनायास ही मुझे बड़ा खाजाना मिलगया क्योकि मेरे लाख प्रयत्न के बाद भी मेरी गरीबी ख़त्म हुई नहीं अंत में मैंने अपने कर्तव्यों के साथ स्वयं को उस परमात्मा के सहारे छोड़ दिया , सत्य सहजता और कर्म के बदले सहजता में परमात्मा ने मुझे अथाह खजाना दे डाला जबकि मेरे सुख को अब उस खजाने की भी जरूरत नहीं थी


    अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

      अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...