Sunday, November 16, 2014

गलतियों की स्वीकारोक्ति(realization of mistakes)

  

हमीं सब क्या सभी मैं कुछ कमीं है , न धरती देवताओं से थमीं है 
गगन आंसूं न पोछेंगा तुम्हारे , सहारा आदमी का आदमी है 

आदमी गलतियों का पुतला है और उसे  गलतियां करने का अधिकार भी  है, उपरोक्त पक्तियों में किसी कवि की कल्पना यही दर्शाती है  कि  समय परिस्थितियों और सामाजिक मानसिक और समय की मांग के अनुरूप हम कई गलतियां करते रहते है ,परिणाम हमारा व्यक्तित्व कमजोर से कमजोर होता चला जाता है ,ईश्वर ने हमें बहुत सी कमियों के साथ बनाया है और हमारे व्यक्तित्व में कमियां होना  स्वाभाविक भी है यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं  कि हम  त्रुटियाँ करें ही नहीं वरन प्रश्न यह है की हम त्रुटियों को समझें , और  उनके कारण और परिणामों की व्याख्या अवश्य करें क्योकि  मनुष्य और पशु में यही भेद है कि  मनुष्य की वैचारिकता उसे यह सोचने केलिए प्रेरित अवश्य करती है  कि  वह त्रुटियों के कारण ,प्रभाव की व्याख्या अवश्य करे और भविष्य में उनकी पुनरावृति न  होने दें |

हम जिस समाज में रह रहे है वहां विभिन्न प्रकार के लोग, कार्य एवम परिस्थितियों का सामना करना पड रहा है हमें  यहाँ अधिकांश स्थिति में केवल एक नियम और मानसिकता दिखाई देती है कि  सामने वाला उसके किस काम का है और वह उससे क्या ले सकता है ,दोस्तों हम सामने वाले से आशा कररहे होते है वह हमसे आशा कररहा होता है ,और इस तरह अधिकांश सम्बन्ध सतही तौर पर अपना स्वभाव बता  देते है की वो विशुद्ध स्वार्थ का पर्याय है ,मूल रूप से यही से हमारी गलतियों का आरम्भ भी हो जाता है  हम उन संबंधों की तह तक पहुचने से पहले अपना पूर्ण विश्वास सामने वालों को  सौप  कर उनके शोषण का साधन बन जाते है | एक बार गलतियों के जाल में फंसने के बाद हम चारों और एक ऐसी दल दल बना लेते है जहाँ सारी सोच , कर्म और प्रयत्न सब शून्य हो जाते है | 
 
मनुष्य त्रुटियों  को तीन प्रकार से जीने वाला होता है 
प्रथम वह  मनुष्य जो अकस्मात् अनजाने में त्रुटि कर बैठता है 
द्वितीय वह जो पूर्ण नियोजित ढंग से त्रुटि इस लिए करता है कि  उसे मन चाँही  स्थिति प्राप्त हो जाए और
तृतीय वह जो समय परिस्थितियों  और दूसरों के दबाब में त्रुटि करने में शामिल हुआ है 
अब यहाँ प्रश्न उनका नहीं जो बार बार गलतियां कररहे है , दंड  पा रहे या बचे हुए है मगर हो पूर्व नियोजित है तो  इनके लिए केवल समय क़ानून और दंडात्मक व्यवस्था ही इनका सुधार करेगी , मगर जो लोग आकस्मिक , और समय परिस्थिति और दुष्ट लोगों के शिकार हुए है उनके लिए पुनर्चिन्तन का समय अवश्य है जो इन्हें नव पथ पर अवश्य ले जाएगा | एक उर्दू शायर ने लिखा -


" आदमी क्या करे खता के  सिवा , लोग नाहक़ ख़ुदा  से डरते है "

"जब आदमी को ईश्वर ने  बहुत सी कमियों के साथ बनाया है तो  गलती करना एक सामान्य सी प्रक्रिया है मगर महत्व पूर्ण यह है कि हम गलती करके स्वीकारते नहीं है और कभी मन में गलती का ख्याल आता भी है तो ,डरते है ईश्वर से ,जिस दिन गलतियों के बाद हम अपने आपसे डरने लगेंगे तो शायद मनुष्य को देवता बनने में समय नहीं लगेगा  देवता का आशय ही यही है जो त्रुटियों को दूर कर चुका है और वह परमार्थ के लिए जीवन जी रहा है ", 
संसार उन लोगों से भरा पड़ा है जिन्होने  अपने जीवन काल में असंख्यों त्रुटियाँ की और समाज में उन्हें लुटेरा कामी क्रोधी और जाने कितने असभ्य नामों से पुकारा  मगर समय की तीव्र धारण में इनमें से जो लोग भी अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने और उनपर चिंतन करने का सामर्थ्य कर पाएं उन्हें इतिहास ने युग पुरुष बना डाला 



जो अपनी त्रुटियों  को स्वीकार कर नया मार्ग बनाने के सक्षम हुआ वह स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर पायेगा अन्यथा बार बार जन्म मृत्यु जन्म सर्वोत्कृष्ट बनाने की चाह,  हर श्रेष्ठ वस्तु और व्यक्ति पर उसका अधिकार हो , समाज में यश कीर्ति वैभव और वंश की श्रेष्ठ कामना भी केवल उसे प्राप्त हो ,रूप सौंदर्य और कर्म क्षेत्रमे वह अद्वितीय हो , अर्थात यह की वह तुलनात्मक दृष्टी से वह सबसे श्रेष्ठ सिद्ध हो सके , ये सब कामनाएं स्वाभाविक है और इनकी प्राप्ति भी संभव है मगर केवल इतना ध्यान रहे की ये सब कामनाएं और आपकी जीवन की त्रुटियाँ साथ चलेंगी  मृत्यु के  क्रम में वह एक भीड़ होगा जिसकी कोई पहिचान ही नहीं होगी 



    •  त्रुटियों के कारण की जांच करें और यह प्रयत्न करें की वे परिस्थितियां निर्मित न हों जहाँ हमे गलत सिद्ध होना पड़े क्योकि बहुत सी स्थितियों पर हमारा अधिकार होता है |
    • जीवन  के हर कार्य पर पैनी दृष्टी बनाये रखिये ,क्योकि यह महत्व पूर्ण है यहां हर कार्य में या तो कुछ  नकारात्मकता मिलेगी या सकारात्मकता | 
    •  समय परिस्थितियों और अकस्मात् होने वाली त्रुटियों पर अपनी आत्मा के सामने उसकी स्ववकारोक्ति कीजिये और आगे का भविष्य तय कीजिये | 
       
    • अपनेकार्यों के पूर्व और  और कार्य के बाद  उसका चिंतन करना न भूलें ,और उसे कैसे प्रभावी और सर्वसाधारण के उपयोग का बना सकते है यह सिद्ध कीजिए | 
    • महान पुरुषों के त्याग , संघर्ष और परमार्थ की  गाथाएं पढ़िए और उनके आधारों में  वर्तमान प्रासंगिकता जोड़ते हुए प्रयोग कीजिए | 
    • समय समय पर नए प्रयोग अवश्य  करें और इनका प्रयोग ऐसे करें जो आपको यश  और समाज को वह लाभ दे सके जो अभी उसे प्राप्त नहीं हुआ है | 
    • अपनी कल्पना को परमार्थ से जोड़ कर बहुत ऊची  उड़ान भरिये और रोज उसके लिए थोड़ा प्रयास अवश्य करिये धीरे धीरे   लक्ष्य आपकी हद  में आने लगेगा | 
    • गलतियों के चिंतन के बाद उन्हें दोहराएं नहीं बल्कि उनसे एक सबक अवश्य लें और उस सकारात्मक सबक को याद रखते हुए नया मार्ग बनाएं |
    •  सत्य का जीवन  साश्वत और चिरंजीवी है | 
    • मनुष्य प्रकृति  का दास है और प्रकृति के न्याय में क्षमा नहीं होती वह तो बस यह जानती है कि यदि जीवन में कोई भी क्रिया गलत सिद्ध हुई तो परिणाम भी आपको ही भुगतना होगा ,अतः जीवन केप्रत्येक पल को पूरे चिंतन के साथ जियें | 
    •   आप जीवन के महत्व को जानते है और हर पल कुछ नया सीख रहें है ,जो विपरीत है वो कल अनुभव बनकर आपको  नई दिशा देगा | 
    •  सब के साथ बात, व्यवहार और सम्पूर्ण  संबंधों में आने वाले लोगों के साथ व्हवहार में सायं बरतें और यदि कोई त्रुटि हो तो बिना समय व्यर्थ गवाएं क्षमा मांगें | 
    • सरलता विनम्रता और सबको श्रेष्ठ व्यवहार देने वाला स्वयंम काल जाई हो जाता है |

      जीवन के प्रत्येक पल को इस प्रकार जियें  कि  हर आने  वाले समय  से  अधिक  उस समय को महत्व दें जो समय अभी निकल रहा है ,ऐसे में हर  क्रिया पर पूर्ण ध्यान दिया जाना चाहिए,क्योकि भविष्य पर कोई अधिकार नहीं है और यदि वर्तमान की क्रियान्वयनता पर ध्यान देते रहे तो भविष्य स्वयं सुखद हो जाएगा |

Saturday, November 15, 2014

हताशा को अपूर्व शक्ति में बदलो (convert your depression in a super power)



भारतीय धर्म में महाशिव को महांकाल कहा  गया है शिव और शक्ति का प्रणय विछोह और सम्पूर्ण जगत को एक   नई परिभाषा देने के लिए जो लीलाएं की गई वो आम आदमी को यह शिक्षा अवश्य देती  कि अपने सम्पूर्ण क्रोध और दुःख को ऐसे महा शक्ति बना डालिये कि  जिससे सम्पूर्ण संसार आपके सामने नत मस्तक हो जाए । शिव और शक्ति का विछोह का दुःख इतना प्रचंड कि  सम्पूर्ण ब्रह्मांड काँप उठा और इसी महाशक्ति  की तीव्रता से पैदा हुए ५२ शक्ति पीठ जो यह बताने में सक्षम है  कि घनघोर यातना और ,दुःख, और क्रोध से महाशक्तियों के निर्माण संभव है ।

हर धर्म हर सम्रदाय और हर सभ्यता  ने यही   समझाया कि  दुःख तिरस्कार और यातना की पीड़ा को अपना  बनाकर उसे महाशक्ति केरूप में प्रदर्शित कीजिए आप स्वयम्  कालजित  होजाएंगे ,आज अधिकाँश  आदमी अपनी उपलब्धियों अपनीसमस्याओं  और सामाजिक तौर पर अपनी मानसिक दशा में  अपने आपको दुखी   महसूस  कर रहा है ,कोई एक अधूरा प्रण उसका व्यक्तित्व निगल जाना चाहता है ,और वह एक निरीह इंसान की तरह अपने आपको वह बार बार टूटा सा महसूस करता है ,परिणाम स्वयं अनेक नकारत्मकताएं उसमे स्वयं पैदा होने लगती है ।

२६  जनवरी २००१ को भुज गुजरात में एक बड़ा भूकम्प आया बड़ी बड़ी मल्टी स्टोरीज    धराशाही  हो गई कई दिनों उनका मलबा हटता रहा लोग अपने अपने अनुसार सहायता कार्य करते रहे उन्हीं भवनों में जे सी बी  मशीन्स काम कर रहीं थी अचानक कुछ कपडे दिखाई दिए सुरक्षा कर्मियों ने सावधानी से कामकरना आरम्भ किया एक अधेड़ का शव था वह , उसे निकालने के बाद दो महिलाओं ,एक युवक का शव जिसकी उम्र  २५-२६  वर्ष  होगी  प्राप्त हुआ अंत में उस भवन में एक १७ वर्ष की बच्ची मिली जो बेहोश थी कुछ प्रयास के पश्चात उसे होश आया तो  उसने बताया  क़ि  मरने से
पूर्व  मेरे पिता  और मेरी बातें बहुत देर तक होती रही पिता बोल रहे थे  बेटा  है सब हमें छोड़कर चले गए है   तेरी  माँ  तेरा
भाई बहिन शायद सब गए  और हम भी जा रहे  है  ,हाँ  बेटा हम   में से कोई बच जाता तो हमें क्रिया कर्म के बाद मुक्ति
जरूर मिल जाती  ,सोचता था की तुझे पढ़ा कर बहुत बड़ा ऑफिसर बनाऊंगा मगर अब क्या करसकता हूँ   औरपिता की भी आवाज आनी  बंद हो गई  ,२४ घंटे बाद  अब वही बच्ची  अपने पिता,माता  ,भाई बहिन के शवों को एक हाथ ठेले में रख कर श्मशान ले जारहीथी ।  पिता के आदर्शों  और उनकी आख़िरी चाह  ने चोटिल और निर्जीव शरीर में भी हजारों वोल्ट  का करेंट भर दिया था , बाद में यही बच्ची भारतीय बैंकिग सेर्विसेज में बहुत बड़े स्थान पर पहुंचीं ---- सलाम है भारत की ऐसी नारी.  शक्ति को ।

जीवन में यह सबसे बड़ा  अकाट्य  सत्य है  कि  सामान्य जीवन जीने वाला आदमी अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को हजारों  लक्ष्यों और उप लक्ष्यों में बाँध कर जीवन निकालता रहता है वह सुख के हर समय में अपने मन के १०%या  २० %  तक ही स्वयं को शामिल कर  पाता  है  क्योकि  , सुख के बहुत से  स्त्रोत  है और वह सबमे विजय चाहता है ,तो उसका तमाम  मानस यह आंकलन  करता रहता है   कि  कैसे हर सुख  के बिंदु को सकारात्मक बनाया जावे परन्तु यहाँ हम यह भूल क्यू जाते है  कि  जीवन  में  मानवीय चिंतन सदैव चलता रहताहै और सुख  दुःख  दुःख दुःख  सुख  फिर यही क्रम जीवन भरबना रहता है अर्थात में सुख कम संघर्ष   अधिक है  और सुख में आदमी की तमाम शक्तियां  है जबकि दुःख आदमी  सम्पूर्ण शक्तियों को  एकत्रित  करके  उसके मन मष्तिष्क को एकाग्र कर देता है ।

दुःख  , यातना ,क्रोध ,और निराशा तथा हताशा आदमी  की सम्पूर्ण शक्ति को एकत्रित कर देती  है यह शक्ति इतनी प्रचंड होती है  कि आदमी कुछ भी करने को  तैयार हो  है  यंहां तक  कि वह आत्म हत्या जैसे पाप के चिंतन के लिए भी    पीछे नहीं हटता आप सोच सकते है कि  यह कितनी प्रचंड शक्ति है ,मित्रों बस इसी शक्ति को कृष्ण के गीता दर्शन ,और भारतीय दर्शन का वह सहारा चाहिए जिससे उसे यह भरोसा हो जाए  कि  मनुष्य अकेला जन्म लेता है उसे जीवन के हरभाग में स्वयं संघर्ष करना  होता है और अधिकांश  रिश्ते  उससे अपनी कीमत चाहते है ,  संसार के रिश्ते , कर्म और हर दुःख के मूल में शोषण , लूट खसोट और मीठे रिश्तों की आड़ में किसी के साथ किये अन्याय की कहानियां है , यही  दुनियां है जहाँ अधिकाँश रिश्ते ,समाज ,परिवार और परिवेश ही आदमी से वो कीमत  वसूल करने की चेष्टा कर  रहे होते है जिनको आदर्श   जाता है  ऐसा शोषण करते है, जिससे उसमे जीवन की  चाह  जल कर अग्नि  परवर्तित होजाए ।और इसी प्रचंड शक्ति कीअग्नि  से आरम्भ होता है एक संकल्प एक विस्वास और एक ऐसी बाजी जो हर हाल में स्वयं कोजिता कर श्रेष्ठ  सिद्ध करने में  सक्षम होती है ।


यातना ,दुःख , और शोषण के दर्द और क्रोध को ईश्वर  विश्वास  और संस्कारो की भट्टी  पर और पकाओ , कृष्ण के कुरुक्षेत्र के प्रवचनों को दोहराते हुए एक बार फिर याद करो कि  तुम्हारा जन्म इस अन्याय को उखाड़ फेंकनें के लिए  ही हुआ है यदि आज तुमने इस अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाई   तो  कल तुम्हारे अस्तित्व पर इतने प्रश्न दाग  देगा  जिसके प्रतिउत्तर  मे  आपके भविष्य के पास कोई उत्तर  नहीं होगा|

जीवन ,कुरुक्षेत्र में अन्याय और अधर्म के सहारे अभिमन्यु जैसे वीर की ह्त्या की कोई कहानी ही है एक ऐसी नृशंस हत्याजिसमे बड़े बड़े धर्माचार्य  अपना धर्म और सत्य छोड़कर अन्याय के लिए एक जुट हो गए है और अकेला रह गया है सत्य ,आदर्श और उसके मानदंड,  उसका निर्मम अंत करते हुए समाज परिवार और हमारे अपने ,बस यही सत्य है इसी सत्य की  परिणिति  केबाद  महा भारत का सम्पूर्ण युद्ध बिना किसी भाव के निर्दयता से लड़ा गया जिसमे केवल भाव यह था कि हम न्याय पर नहीं तो  हमे भी दंड भुगतना ही होगा और युद्ध  जीत लिया गया आज मेरा युवा अभिमन्यु की तरह खड़ा है और अतीत    की  गलती न दोहराते हुए कृष्ण उसे चक्रव्हू  तोडना सिखा चुके है  बस अब उसके संघर्ष करने की आवश्यकता भर है विजय श्री उसकी ही प्रतीक्षा कर रही है ।

 इन बिन्दुओं का जीवन में प्रयोग अवश्य करें

  • जीवन का सम्पूर्ण  स्वरुप अकेला चलो  रे का कोई सिद्धांत है ,यहाँ जो भी सुख और काम दूसरों परआधारित हुआ उसमे हमें दुःख ही उठाना पडेगा क्योकि यहाँ हमारा विशवास कम होता दिखताहै  । 
  • अन्याय के रास्तों पर चलने वाले भविष्य के गर्त में अपना फल अवश्य भोगेंगे , मगर यह अवश्य ध्यान रखे कि अन्याय  सहने वाला अन्याय करने वालेसे अधिक दोषी माना गया है । 
  • शोषण का प्रतिकार न करना प्रेम नहीं कायरता का प्रतीक है ,शोषण का प्रतिकार करके आप जिस सत्य को पैदा करेंगे  तो    एक दिन आपका संघर्ष दूसरे निसहाय लोगो को अन्याय से अवश्य बचाएगा । 
  •  आप ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है ,और आपको यही  सिद्ध भी करना है ,आपमें अपरमित  शक्ति है आपस्वयम् को पहिचाने और अपनी गुप्त ऊर्जा के स्त्रोत को चिंतन एवं ध्यान से जगाइएं । 
  • सबका सम्मान कीजिए एवं दूसरों की आलोचना से बचने का प्रयास अवश्य कीजिए ,इससे आपका मन मष्तिष्क एक सकारात्मक ऊर्जा उत्सर्ग करने लगेगा । 
  • दर्द, दुःख , यातना को एकत्रित करके उसे संकल्प स्वरुप में संचित कीजिए और उसके कठिन पालन में लग जाइए एक दिन सारी विजय आपकी ही होंगी । 
  • आत्म हत्या जघन्य पाप है और अन्यायी के विरुद्ध चुप हो  जाना उससे भी बड़ा अपराध है ,आपको अन्याय के विरोध में दंडात्मक संकल्प लेना है जिससे फिर कोई अन्याय का शिकार न  हो सके । 
  • अपने आपको ईश्वर के सामने रख कर चिंतन करें और हर अन्याय का प्रतिरोध करना सीखें आपका सकारात्मक प्रति कार समाज को नई  दिशा अवश्य देगा । 
  • दूसरों का चिंतन  उनका उपहास और उनके व्यक्तित्व से  अपनी तुलना कभी न   कभी न करें क्योकि जो गुण आप में है वे  लोगों में नहीं है वेलोग अपने छोटे गुणों को बड़ा दिखाने  की कला  जानते है  आप अपने गुणों को अभी समझे नहीं है उन्हें समझें और संकल्प को शक्ति दें । 
  • हर हाल में सकारात्मक चिंतन करें और कोशिश यह करें  कि  आपके विचारों की तीव्रता से सारे सकारात्मक चिंतन आपकी और आकृष्ट  ही रहे है और समस्त ऋणात्मकताएं आपसे दूर जारही है। 
  •  जीवन बहुमूल्य है किसी भी दुःख ,यत्न ,धोखे  फरेब  बाद आपकी सम्पूर्ण क्रियान्वयनता जबरदस्त शक्ति उत्पन्न  करतीहै   विपरीत काल में  सकारात्मक संकल्प  पर स्वयं को  स्थिर रखें  आपको दुनियां कीहर विजय हासिल अवश्य होगी ।  



Sunday, November 9, 2014

कैसे करें व्यवहार स्वयं से और दूसरों से (how to behave with others and ourself)


 टीम वर्क आधुनिक मेनेजमेंट का आधार भूत  स्लोगन है और यह माना जाता है  कि उसके बगैर कोई श्रेष्ठ मैनेजर नहीं बन सकता , वैज्ञानिक प्रबंध में टेलर , फियोल सब ने माना   कि  एक  चैन की तरह हमें एक दूसरे से जुड़ कर कार्य करने की प्रक्रिया से श्रेष्ठ परिणाम मिल सकते है । बड़ा कठिन विषय है यह , एक और एकला चलो रे का दर्शन शास्त्र , दूसरी और धर्म का यह कहना की आदमी केवल अपने आपके लिए सबसे अच्छा सोच सकता है , इन सबके बीच हमें एक ऐसा रास्ता निकालना हैंजो हमें श्रेष्ठ सिद्ध कर सकें साथ  ही हमे अपना उत्तर भी प्राप्त करना है कि अपने प्रति और दूसरों के प्रति कैसे  व्यवहार करें जिससे स्वयं की सकारात्मकता बनाये रखी  जा |

मनुष्य का स्वाभाव और मन बड़ा चंचल होता है उसकी सहज प्रवृति यही रही है कि  संसार में जो कुछ भी अच्छा हो  उसपर केवल उसका ही अधिकार हो सारे लोग उसे सबसे अधिक प्यार करें , सम्मान दें और सारे यश ,कीर्ति, और उच्च स्थितियों में केवल वही श्रेष्ठ हो | यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि  हर आदमी यही विचार लिए जीवन में आगे बढ़ने का प्रयत्न कररहा है ,फिर तो यह प्रश्न अधिक जरूरी हो जाता है की ऐसे समय में हम अपने आपको और अपने अस्तित्व को किस प्रकार बचाये   जिससे हमारे की सकारात्मकता और अधिक  प्रदर्शित की जा सके

एक गुरु ने अपने तीन  शिष्यों को लकड़ी काटने जंगल भेजा घनघोर जंगल में सूखी लकड़ी ढूढ़ते हुए एक ऊँचे पेड़ और उसके नीचे बने कुँए को देख  बड़े शिष्य घबरा गए उन्होंने सबसे छोटे शिष्य से कहा चढ़ जा पेड़ पर और तोड़ तोड़ कर फेंकता जा लकड़ियों को दोनों बड़े शिष्यों ने आँखों ही आँखों में बात की और मुस्कुराने लगे , छोटा शिष्य गुरु आदेश मानकर चढ़गया और पर्याप्त लकड़ी तोड़ कर फेकने के बाद   पेड़ से उतरते में नीचे स्थित कुँए में गिर कर बेहोश होगया ,शिष्यों ने आवाज दी और कुछ देर बाद वे आश्रम लौट आये बताया कैसे कैसे उन्होंने लकड़ियां तोड़ी और बहुत मना करने के बाद भी छोटा शिष्य पेड़ पर चढ़ कर गिर गया ,गुरुने वहां जाकर गाँव वालों की मदद से बेहोश शिष्य को निकाला होश आने पर छोटे शिष्य ने बतायामेरी ही गलती थी सब और कहा  कि अभी वो अल्हड़ है काम में ,उसे कुछ अच्छे से आता नहीं है, बस गुरु सेवा के लिए प्रयास किया था, उसमे भी वो असफल हो गया ,उसे क्षमा किया जाए ,गुरुने अपनी दिव्य दृष्टि से सब जान लिया और उनके आंसूं निकल आये बड़े शिष्यों की दुष्टता और छोटे शिष्य की साधुवादिता से गुरु स्वयं समझ गए थे  कि जीवन में
टीम वर्क में काम करना बहुत आसान है मगर अपने अहंकार , क्रोध ,और वैमनस्यता को जीतना सबसे अधिक कठिन विषय है ,सबकुछ करके   भी यश की कामना का त्याग करने वाला  ही महान हो सकता है ,अचानक गुरु को अपने दादा गुरु सा नजर आने लगा छोटा शिष्य |

मन और मष्तिष्क से मनुष्य इतना शक्तिशाली है कि  उसे किसी भी रूप में नहीं जीता जा सकता ,असंख्यों मील दूर बैठे आदमी की ऋणात्मकताएं उसे प्रभावित करसकती है ,जो सकारात्मकता उसके जीवन का हिस्सा नहीं है वो उन्हें  भी अपने जीवन में प्रस्फुटित कर सकता है ,अपने समाज ,समूह , और अच्छा बुरा सोचने वालों की मानसिकता को भी वह उसी प्रकार बदल सकता है जैसे कोई कलाकार अपनी नई पेटिग पर फैले हुए किसी अन्य रंगको दूसरे रंगों से भर कर और खूबसूरत बनादे |

व्यवहार की कसौटी पर अपने मन को बहुत कुछ चाहिए होता है और वह त्याग करने को तैयार ही नहीं होता ऐसे में उसकी स्थिति उस लुटेरे जैसी होती है जो अपनी सम्पूर्ण शक्ति के अनुसार दूसरोंके  हक  पर डकैती डालने की होड़ में लगा है , जिसमे जितनी शक्ति है वो दूसरो के किये गए प्रयासों के यश को  अपनी झोली में डालने का प्रयत्न  यह जाने बगैर  कि  जीवन में  समय , बुद्धि , और अन्याय का काल बहुतसीमित  होता है और सत्य की शाश्वतता के सामने यह नकारात्मकता वैसे ही क्षण भर में लुप्त हो  जैसे सूर्य के प्रकाश में जुगनुओं की बड़ी फौज |


अंत में बस यही सार है की दूसरों का सम्मान  और उनसे कुछ सीखने की ललक बनाये रखें जीवन में हम जो दूसरों को दे रहें है वाही हमारे पास लौट कर आना होता है ,  मनुष्य  ईश्वर की अनमोल कृति है और उसके गुण  धर्म भी आदर्शों के साथ चलने चाहिए ,आप अपने काम से सम्बन्ध रखिये परिणाम के प्रति अति उत्सुकता के कारण आपको दुःख हो सकता है ,आप एक तटस्थ भाव से अपने व्यवहार से दूसरों को जीतने का प्रयास अवश्य कीजिए ,आपको सफलता अवश्य मिलेगी ,अपना आकलन करते समय सदैव सकारात्मक सोच का सहारा ले , वर्त्तमान की समस्याएं आपको यह बता सकती है  कि आपके पास कोई  विकल्प नहीं है मगर ध्यान रखे की जिसका विकल्प नहीं होता वो समस्या ही नहीं बना सकता ईश्वर और आपमें वो शक्ति है की आप सारी समस्याओं को हल कर सकते है |

निम्न  का प्रयोग करके देखें
  • एक सीमा से ज्यादा किसी प्रतिद्वंदी का चिंतन न करें क्योकि अधिक चिंतन से आपका अपने पर से ध्यान बंट सकता है जिससे आप अपने साथ समुचित सोच नहीं रख पाएंगे |
  • अपने काम पर विश्वास रखें सीमा से अधिक परिंणाम वादी नहीं बनें अन्यथा आप परिणाम आने से पूर्व ही अपनी  लिए सशंकित हो जाएंगे और यह जीवन की नकारात्मकता को पैदा करेगी | 
  • यहाँ सब अपने को श्रेष्ठ बताने की होड़ में कुछ  करने को तैयार खड़े है आप अपने आदर्श बनाइये और ज़ीरो पर ही यात्रा आरम्भ कीजिए इक दिन ये ज़ीरो आपको हीरो अवश्य बना देगा | 
  • प्रकृति ईश्वर और या अपनी सकारात्मक चेतना शक्ति को बार बार सोचिये और तय कीजिए कि   मैं  अपने अनुरूप बना रहा हूँ और संसार आपके अनुरूप बनेगा  यह विश्वास रखिये | 
  • दूसरो को छोटा बताने , उनके हक़ पर आधिपत्य ,और दूसरों के किये कार्य का श्रेय स्वयं लेने की भावना आपका अस्तित्व नष्ट कर डालेगी अतैव आपको उन्हें प्रोत्साहित करते रहना चाहिए | 
  • सम्मान एवं तिरस्कार का केवल एक नियम है कि वह तुरंत ब्याज सहित वापिस होता है ,आप अपने से ऊपर एवम अधीनस्थ  व्यक्तियों को पम्मन और प्रेम देते रहिये आपको आंतरिक शांति मिलेगी | 
  • बड़ों को सम्मान और छोटों को नाम लेकर पूछा जाए कैसे है आप , मित्रों यह जादू आरंभ कीजिये और एक सप्ताह में उसका परिणाम देखिये आपके मन को अच्छा लगेगा | 
  • दूसरों की आलोचना के सामूहिक आनंद में आप हिस्सा न बने क्योकि आलोचना से केवल नकारात्मकता उत्पन्न होती है  आपकी सकारात्मकता को हानि पहुंचा सकती है | 
  • अपने बारे में एवम अपने किये हुए व्यवहार के लिए चिंतन अवश्य बनाये रखें जो त्रुटियाँ हो उन्हें तुरंत मान कर उसमे परिवर्तन करें | 
  • विनम्रता , लोच ,और सरलता ये सब जीवंतता की निशानी है जबकि अकड़ना ,लोच ख़त्म होजाना और बेहद कड़ा हो जाना ये सब मृत्यु की निशानी है ,बहुधा लाशें कड़ी हो जाती है ,आप अपने को विनम्र बनाये रखें |

Thursday, November 6, 2014

गुणात्मकजीवन का मूल है चिंतन की स्थिरता (qualitylife vs stability of thought)

सम्पूर्ण जीवन आदमी का यह प्रयास रहता है की वह पूर्ण शांति और संसाधनो की बहुतायत में अति विलासी जीवन का उपभोग करे ,उसके पास असीम संपत्ति , शक्ति , प्रभुत्व , यश और अनुयायी समाज हो , उसके वैभव को मानने वाले उसे सदैव बहुत ऊँचा मान कर प्रसंशा देते रहें |  जो भी समाज राष्ट्र में श्रेष्ठ हो उसपर केवल उसका ही अधिकार हो ,वह अपना भविष्य तो सुरक्षित रख पाये साथ ही उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी किसीप्रकार की तकलीफ न होपाये ,वह स्वयं सुरक्षित हो और आने वाली तमाम नस्लों का आज ही इंतजाम करदे ,बस इसी उधेड़ बन में उसका तमाम जीवन गुजर जाता है |  बार बार उसे केवल पश्चाताप क्षोभ और निराशा ही मिलती रहती है जबकि उसका चिंतन यह जानता है की जीवन नश्वर है एक नियत सीमा के बाद हर आदमी को  दुनियां से जाना ही होता है बिना किसी संपत्ति और साथ के | 

भगवान  बुध अपनी ध्यान दीक्षा में थे और उनके तीन शिष्य उनकी सेवा में हाथ बांधें बैठे थे अचानक बुध की आँखे खुली और उन्होंने प्रश्न किया  तुम्हे जीवन में सबसे बड़ी परेशानी क्या लगती है पहले  बताया गुरुदेव मेरे ३ पुत्र है उनमे से एक बहुत बदमाश आतातायी और  दुष्ट स्वभाव का है वह रोज लड़ाई झगड़ा करता है और मुझे अपमानित होना पड़ता है यही दुःख है मेरा दूसरे ने कहा प्रभु आपके आशीर्वाद से  हमपर सब कुछ है मगर सोचता हूँमेरी सम्पत्ति केवल पांच पीढ़ियों तक चल पायेगी आगे की पीढ़ियां भूखी मर जाएंगी इससे बड़ा क्या दुःख होगा ,तीसरे ने कहा गुरुवर मैंने सबके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया मगर मेरे सारे घरवाले और आसपास के लोग ऐसे पापों में लगे है उनसे  मै बहुत दुखी हूँ ,बुध ने हंस कर कहा इशारा करते हुए कहा  उस चिड़िया को दाना खिलाते हुए देख रहे हो कितने खुश है वो सब ,यह चिड़िया जैसे ही ये बच्चे उड़ने लायक हुए इन्हें उड़ा कर मोह त्याग देगी पुत्र इसके बच्चों पर खाना इकट्ठे करने का स्थान भी नहीं है ,और तीसरी बात यह कि  यह अपने कर्म मार्ग में दूसरों का चिंतन नहीं करती इसे  शाम तक की चिंता नहीं है उसे मालूम है ईश्वर शाम को फिर कुछ देगा इसलिए ये सबकुछ विपरीत परिस्थितियों के बाद भी बहुत प्रसन्न है 
,पुत्र ईश्वर को अपना काम करने दो वही सब कुछ कर रहा है , आप स्वयम् अपने चिंतन की गहराइयों में किसीको मत आने दो ,और मोह त्याग कर अपने कर्म में जुट जाएँ आपका अधिकार वर्तमान के कर्म से बँधा  है और उसे पूरी ताकत से सम्पादित करो , सारे  लोग चाहे वो परिवार के हो या आपके आसपास के अपने कर्म से बंधे सुख -दुःख का निर्माण कर रहे है ये आपका विषय नहीं है की कोइन क्या और कैसे कर रहा है , आप स्वयं सकारात्मक होकर अपने जीवन का चिंतन करें इस से आप जीवन को जीत लेंगें | 

मेरे अंतर की शांति का अकेला  मै  ही तो रखवाला था एक गैर  जिम्मेदार चौकी दार की तरह मैंने अपने विचारों में अपने सम्बन्धियों का , समाज और मित्रों का  चिंतन आरम्भ कर दिया , भविष्य की और अतीत की कहानियों को मूर्त रूप देने में और उनके दर्शन में मैंने वर्तमान को दांव पर लगा दिया ,सबको आदर्श मार्ग बताते बताते  मै  स्वयं अशांत हो गया परिणाम यह कि  मुझ में केवल अशांति , असुरक्षा और खोखला पन रहगया है क्योकि मैंने ही अपने चिन्तन का अतिकृमण किया है मै  उन विषयों में अपने आपको परेशान पारहा हूँ जिनपर मेरा वश  ही नहीं था | 

हम कितने श्रेष्ठ कला कार है  कि जीवन भर एक असहाय ,बेचारे और दुखी व्यक्ति का रोल ऐसे करते रहते है जैसे इस सदी का कोई महानायक अपनी कला के उच्चतम शिखर पर खड़ा अपनी कला का प्रदर्शन कररहा हो ,हमपर जो दुःख क्लेश अवसाद नहीं है उन्हें भी अपने अस्तित्व पर लाद  कर हम चले जारहे है लाचार ,बेचारे ,निरीह से तर्क यह  मैंने सबसे अच्छा किया ,कल का क्या होगा ,सब मेरी सोच के अनुसार क्यों नहीं हो रहा ,ये सब चिंतन आपके व्यक्तित्व को कितना आगे ले जा पाएंगे , जीवन को आप कैसे जीत पाएंगे इस कल्पना को साकार रूप देते हुए आप एक सशक्त भूमिका के कलाकार को  जीवित कीजिए जो आपको अपने सकारात्मक कर्म ,भविष्य और विका स की परिभाषा बता सके 

कृपया निम्न को और अपनाएँ 



  • हर रिश्ता ,सम्बन्ध और आपके अपने एक सीमा तक ही आपके चिंतन के आधार में होने चाहिए एक सीमा के बाद  उनकी सोच आपको ऋणात्मक करने लगेगी |
  • सब अपने कर्म ,सोच और क्रियान्वयन के हिसाब से अपना भविष्य पथ निर्मित कर रहे है उसमे आपकेवल परामर्श  दे सकते है यह आपका विषय नहीं है आप अधिक बदलाव की चेष्टा न करें | 
  • संसाधनों का उचित प्रयोग आना आवश्यक है एक को केवल संसाधन  एकत्रित करने आते है , और दूसरे को बहुत अधिक खर्च करना आता है ये दोनो आपका भविष्य ख़राब करदेंगे क्योकि महत्वपूर्ण है खर्च करने की कला
  • जिन स्थितियों  पर आपका वश नहीं है वह आप चिंतन का अतिकृमण नहीं करें ,इससे आपको अपनी शक्ति का ह्रास  होता जान पड़ेगा और स्वयं नकारात्मक भाव उत्पन्न हो जाएंगे | 
  • अति शक्ति, धन, संपन्नता ,आपको अनेक दुर्गुण  देती है अतैव जब कभी आपमें इन गुणों की प्राप्ति हो आपको तुरंत उसके श्रेष्ठ प्रयोग का मार्ग सोचना होगा , ये तीनो शक्तियां  सद्प्रयोग न होने पर स्वयं को नष्ट करदेती है
  • अति मोह चाहे व्यक्ति से हो या वस्तु से आपको केवल दुःख ही देगा क्योकि वहां केवल यह महत्वपूर्ण दिखाई देता है कि  इसपर मेरा पूर्णाधिकार है जबकि मनुष्य का स्वयं पर भी पूर्णाधिकार नहीं है | 
  •  हर व्यक्ति , वस्तु और सम्बन्ध में परिवर्तन का विचार परामर्श के जैसा ही हो उस पर आप यदि पूरी ताकत से अमल  कराने का प्रयत्न करेंगें तो आपको केवल क्लेश उत्पन्न होगा | 
  • आपकी आपके परिवेश की एक सीमा है और भविष्य की कोई सीमा नहीं है अतैव आप केवल यह विचार करें की आज जो मै  कार्य कररहा हूँ उसे और कैसे श्रेष्ठ बनाया जा सकता है | 
  • जीवन की नश्वरता , की जीत परमार्थ  में निहित है   कौन सा सम्राट कितने राज्य जीता या किसने कितने महल और किले बनाये ये महत्व पूर्ण नहीं है बल्कि वह कितना सहज और परमार्थ  का उपासक रहा यह उसको महान बना देता है |
  • अपनाने  का भाव सर्वश्रेष्ठ है मगर ध्यान रखना जो त्याग के भाव में सर्वश्रेष्ठ हुआ   वही  जीवन को  जीतने में सक्षम हो पाता है , क्षण में अपनाने के भाव के साथ त्याग सर्वोपरि है |







Tuesday, November 4, 2014

सम्पूर्णता बनाम स्वयं की कमियों पर नियंत्रण (mr.perfect means self control)

भारतीय दर्शन में स्वयं का विकास सबसे बड़ी चिनौती माना गया है और हर इंसान जीवन में उन ऊंचाइयों  तक पहुँचाना ही चाहता है ,जबकि सब मे वही शक्ति ,सोच और पाने की ललक बनी रहती है ,परन्तु बिरले लोग ही उस ऊंचाई तक पहुँच पाते है जिन्हें जीवन  सफल सिद्ध कर पाता है , बड़ी दिलचस्प कहानी है यह जहाँ सबकुछ उस ईश्वर ने हर आदमी को दिया है मगर वह अपने आपको बेहद गरीब ,नाकारा , और गलत मान बैठता है , दोस्तों यहीं कहीं से जीवन के उत्कर्ष का रास्ता निकला है जिसपर हमें विचार करना है | 

बड़ा विचित्र है इंसान और उसकी मानसिकता, सपूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने पैरों के नीचें  रौंद डालने की इच्छा रखने वाले इस इंसान की स्वयं की जिंदगी के 1|३ भाग से कम भाग पर ही उसका नियंत्रण है जबकि वह यह भी नही जानता कि  उसकी सम्पूर्णता पाने की दौड़ में नहीं वरन अपनी कमियों पर नियंत्रण करने में थी

घनघोर तपश्चर्या में लगे हुए एक तपस्वी ने एक भक्त की पुकार पर उसकी पुत्री का भविष्य देखा उन्हें लगा की इसका पति विश्व विजयी, सम्राट , और अजेय होगा वह तप के स्थान पर केवल इसमें लिप्त होगया कि उसे कैसे प्राप्त किया जाए ,तप खंडित होगया , एकाग्रता मानसिक विचलन में बदल गई ,रूप ,योवन ,काम ,और सबकुछ प्राप्त करने की इच्छा ने उनकी सम्पूर्ण शांति नष्ट करदी , और अंत में वो जिसका ध्यान , चिंतन और तप कररहे थे उन्हे ही अपशब्द बोलकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति नष्ट करडाली | और अंत में जब सत्य जाना कि यह एक परीक्षा थी तो घोर पश्चाताप में उबरने का कारण पूछा गया तो यह पाया की आप सबकुछ पाने की चाह में पथ भ्रष्ट हुए है अब शिव स्वरुप में परमार्थ का व्रत धारण करें तब आप इस क्षोभ से मुक्त हो सकेंगे |

अादमी कोई ऐसा सुपर  मेन  नहीं है की वह कल्पना की उड़ान के सहारे सब कुछ प्राप्त करले ,और जीवन के स्वप्नों और दिवा स्वप्नों को हर आदमी देखता अवश्य है और हमेशा देश, काल परिस्थिति और कुछ  प्राप्त करने की स्थिति का आलोचक बना रहता  है और जितना हम समाज और क्रियाओं के आलोचक होते है वैसे वैसे हमारा पतन होता जाता है परिणाम हमारे दिवा स्वप्न कभी पूर्ण नहीं हो पाते जो हमे जीवन के हर पल अपनी उपस्थिति दर्शाते रहते है और जीवन  हमेशा यह सोचता रहता  क्या यह उपलब्धि इतनी ही कठिन थी और पूरा जीवन इसी  अपनी गलतियों , समय का दुरुपयोग और लोगो द्वारा किये गए शोषण  की सोच की कहानी बन कर रह जाता है बस  यहीं से उसका तमाम विकास रुकजाता है क्योकि जीवन का एक सहज नियम यह भी है  कि वह ऋणात्मक सोच  कभी भी सकारात्मक  परिणाम नहीं दे सकती  | 

परिवर्तन  की सोच दिमाग में आते ही  सबसे पहले यह विचार आने लगता है  कि  क्या क्या सीखें , क्या क्या परिवर्तन करें और क्या क्या उपकरण ,प्रशिक्षण  लें जिससे वो सब प्राप्त कर सकें जो हम सोच रहे है | 
मित्रों जीवन में  तीन तरह की परिस्थितियां  हमारे सामने होती है 

१  प्राकृतिक नियमों  की परिस्थितियां 
२  अकस्मात् आयीं परिस्थितियां 
३  जीवन शैली और सोच 
  अब यहाँ  यह प्रश्न खड़ा होता है कि जीवन का २\३ भाग मनुष्य के हाथ में ही नहीं होता प्राकृतिक परिवेश में जीवन, मृत्यु , आरोग्य ,सुख , दुःख ये सब उन परिस्थितियों से बंधे होते है जिनपर केवल प्रकृति का ही वश  होता है इसी प्रकार आपात काल की परिस्थितियों पर भी हमारा कोई वश  नहीं हो पाता  है अब रह गयी  केवल हमारी सोच जीवन को जीने का तरीका और हमारी अपनी कमियां | ,
दोस्तों हम सब कुछ सोचने और स्वयं को बहुत ऊँचे लक्ष्य तक ले जाने के लिए नया रास्ता अवश्य बनाये मगर सबसे पहले स्वयं की कमियों को दूर करने का प्रयास  करें जैसे जैसे क्रोध ,असत्य काम और बनावटी यश पाने की कामना कम होगी जीवन में सकारात्मक गुणों का उदय अपने आप होने लगेगा 
आप विकास की सकारात्मक सोच के लिए बहुत कुछ सीखे कि  नहीं? आपने जीवनको विकास के शिखर पर लेजाने के लिए कठिन मार्ग चुनें कि नहीं ?और क्या आपने किसी के पद चिन्हों का अनुशरण किया या नहीं ? ये सब बाते बहुत अर्थ नहीं रखती ,जबकि हम नए सिरे से बदलाव के लिए सब कुछ बदल डालना चाहते है और वहां भी असफल ही रहते है । 
जीवन के बगीचे में अपने दुर्गुणों  की खरपतवार को समयानुरूप उखाड़कर फैंकते रहे ,जीवन में विकासोन्मुखी सोच स्वयं पैदा होती है बस आवश्यकता  इस बात की है अपनी कमजोरियों को रोकने का प्रयत्न करें विकास स्वयं अपने नैसर्गिक स्वरुप में आपको इतिहास के पन्नो का अभिनेता बना देगा | 
निम्न का प्रयोग अवश्य करें 
  • जिस प्रकार खरपतवार हटाते हुए एक क्षेत्र को संरक्षित कर देने से बड़े बड़े जंगल विशाल स्वरुप ले लेते है वैसे ही जीवन की कमियों को निकालते रहने से  मनुष्य के विकास स्वयं होने लगते है | 
  • जीवन के प्रत्येक परिवर्तन को पूर्ण रूप से विचार करते हुए उसके कारण हुए नकारात्मक प्रभाव को शून्य करने की चेष्टा करें क्योकि इससे  ही आपको सरल रास्ता मिलेगा | 
  • कमियों का पता लगते ही पूर्ण निष्ठां और संकल्प के द्वारा उसपर चिंतन जारी रखें और यही नियंत्रण आपको अपने गंतव्य को सहज बनाने में मदद देगा | 
  • प्राकृतिक और आकस्मिक दुर्घटनाएं  आपका भविष्य नहीं है और उनके घटित होने पर आप अपना हौसला और संकल्प बार बार दोहराइए और अपनी सकारात्मकता को बनाये रखिये | 
  • देश,काल ,परिस्थितियों और समय के साथ ख़राब व्यवहार करने वालों के बारे में चिंतन न करें क्योकि इनके लेश मात्र चिंतन से नकारात्मकता का पहाड़ खड़ा हो जाता है | 
  • जिस प्रकार मन मरे हुए लोगों का विचार करके हम उन्हें जल्द ही छोड़ने का अादी हो जाता है उसी प्रकार खराब लोगों का चिंतन  किया जाना चाहिए और मन को यह विश्वास दे की वो सब मर चुके है | 
  • जिन परिस्थितियों पर आपका वश  नहीं था उनके लिए आप दोषी नहीं हो सकते मगर जिनपर आप का वश है उन परिस्थितियों में आपका अपराध अक्षम्य होगा ऐसी त्रुटियों से बचें | 
  • दूसरों की आलोचनाएँ करने वाला मानसिक रोगी ,अस्थिर , और कमजोर होता जाता है क्योकि उसके सारे गुण उसमे जाने लगते है जिसकी वह आलोचना कर रहा है | 
  • जब तक आप दूसरों के कल्याण के लिए अपना मन नहीं बनाएंगे तब तक आप संतोष के परम सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते अतैव परमार्थ का भाव सर्वोपरि है | 
  • सम्पूर्णता का अर्थ   यह  कि आप और आपका परिवेश राष्ट्र और आपसे जुड़े लोग आप पर गर्व कर सकें आप अपने आदर्शों मान दण्डों और भविष्य के लिए मिसाल बन सकें |


Sunday, October 19, 2014

हार और निराशा को विश्वास से जीतें

शहर से दूर एक छोटी सी पुलिया पर एक सुन्दर रोबीला युवक  गहन चिंता में बैठा अपने आप में बुद बुदा  रहा था बीच बीच में आँखों के कोरों से यदा कदा  आंसू गाल पर आजाते थे परन्तु वह उन्हें रोकने का  भरसक प्रयत्न भी करता रहा था, कई राह गीर जो सुबह की सैर के लिए निकल रहे थे प्रश्न भरी नजर से देखते जा रहे थे कुछ एक ने पूछा भी क्या हुआ नवयुवक मौन स्तब्ध और निश्छल एक और टकटकी लगाये देखता रहा बहुत देर बाद एक बहुत बुजुर्ग आकर युवक के बगल  बैठ  गएचलते चलते थक गए थे शायद , बुजुर्ग ने सबकी तरह उसे भी कहा गुड मॉर्निंग यंग   मेन युवक चुप रहा बुजुर्ग को बड़ा अजीब लगा उसने जब ध्यान से देखा तो पाया की युवक किसी गहन चिंता में है उसने बड़े ही वात्सल्य भाव से पूछा बेटा  क्या हुआ है में  तुम्हारे पिता के जैसा हूँ शायद ईश्वर ने मुझे तुम्हारे लिए ही भेजा है युवक जोर जोर से रोने लगा बुजुर्ग ने उसे सम्बल दिया और पूछा क्या बात है युवक ने बताया कि में  बहुत बड़े खान दान का पुत्र हूँ  मेरा पूरा जीवन ऐशो आराम में बीता है  मेरे दादा जी जब कभी आदर्शों की बात करते थे तो मुझे अच्छा लगता था सोचता था मै  भी समाज को नए प्रतिमान दूंगा , मगर कॉलेज, स्कूल ,और समाज में मेरे चारों और चापलूसों की भीड़ जमा होती गई और मैं नशे , ऐय्याशी में डूबता चला गया ,जीवन के आदर्श लक्ष्य और दादाजी के आदर्श सब कहानी बनकर रह गए , अभी कुछ दिन पहले मेरी तबियत ख़राब हुई जाँच बाद डॉक्टर ने यह कहा   कि बेटा आप के पास केवल छै  माह का जीवन है आपके फेफड़े ९०% तक निष्क्रिय होचुके है और दुनिया में आज तक  बीमारी  का इलाज नहीं है तो पिछली १० रातों में मैं बहुत रोया  , दादाजी बार बार दिखाते रहे , आदर्श जीवन के प्रतिमान बनाने की बात मुह चिढ़ाती रही,मैंने सोचा अपने समाज , अपने मित्रों , अपने सहपाठियों को इस जहर से अवश्य बचाउंगा यह भाव  लेकर  मैं सबके घर घर गया सबको जैसे ही मेरी स्थिति का ज्ञान  वो मेरे साथ छोड़ गए मैंने बहुत कहा यह जहर  तुम सब छोड़ दो , वो सब मेरा मजाक उड़ाने  लगे और मुझे छोड़कर चले गए अब मैं क्या करूँ युवक फिर रोने लगा बुजुर्ग ने हाथ फेरते हुए कहा  बेटा  आप मुझे देख रहे हो मुझे भी डॉक्टर ने   बताया है की मुझ पर जीवन कम है परन्तु ध्यान रखो कि  समाज मे क्रांति अल्प समय में भी संभव है  अनेक ऐसे लोग  ही समाज को   धरोहर  दे गए है | ,विवेकानंद , आदिगुरुशंकराचार्य अनेक विभूतिया है , भारतीय धर्म के अनुसार राजा परीक्षित ने सात दिनों में जो ज्ञान , प्रकाश और जीवन का सत्य बांटा  वो  दुर्लभ है पुत्र जीवन बड़े और छोटे का सम्मान नहीं करता वह तो केवल उनका सम्मान करना जनता है जो भाव पूर्ण तरीके से अपने ठोस कर्त्तव्य मार्ग से  उसकी दिशा बदलदे | तुमपर बहुत समय है मैं और तुम मिलकर वो मानदंड अवश्य बनाएंगे युवक की आँखों में चमक आगई और वह बुजुर्ग का हाथ पकड़ कर  पूर्ण विश्वास से आगे बढ़ने लगा |

जीवन का यही सत्य है कि हम जिन चीजों के अनुभव लेकर अपनी आगामी पीढ़ी  का प्रयत्न करते है वह हमारी एक नहीं सुनती और उसी पतन के मार्ग पर खुद भी कष्ट भोगती है जहाँ से हम उन्हें बचाने का प्रयत्न कररहे होते है |
जीवन का बड़ा या छोटा होना महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है  कि आपको जीवन में अपना उद्देश्य प्राप्त करने में कितना समय लगता है , और आप जीवन के प्राप्त समय को कितना सफल और लोक कल्याण कारी बना पाते है जीवन की सार्थकता के लिए ये बिंदु अधिक उपयोगी हो सकते है 

  • जीवन में समय सबसे अनमोल विषय है उसके हर पल का  प्रयोग इस प्रकार करें जिस प्रकार लक्ष्य पर जाता हुआ कोई अंतरिक्ष यान यदि एक पल को भी दिशा भ्रमित होता है तो असफलता  दिखने  लगती है | 
  • जीवन में  एकला चलो रे का सिद्धांत सबसे सशक्त विषय है, आपका जो भी सुख दूसरे पर आधारित हुआ कालान्तर मेंवह  आपको  केवल दुःख ही देने  वाला है 
  • बहुत लम्बी भीड़ , चापलूसों और प्रसंशकों के स्थान पर कुछ एक मित्र और आलोचक अधिक अच्छे है  आपको बार बार और श्रेष्ठ और श्रेष्ठ  की  प्रेरणा अवश्य देंगे | 
  • जीवन की अवश्यम्भावी परिस्थितियों  से  घबराएं  नहीं  अपने कर्त्तव्य की दिशा में  रहे  धर्म के अनुरूप आत्मा अमर है और वह अपने लक्ष्य अवश्य पूर्ण करती है तो आपके आदर्श अवश्य पूर्ण होंगे 
  • अपने समाज से उन लोगो की खोज अवश्य करें जिन्हें आपकी आवश्यकता है , और समयानुसार उनकी यथोचित मदद  करें | 
  • आपपने लक्ष्य में वैसे कार्यरत  हो जैसे कोई बहरा आदमी आपको मुंह चलाता तो देख सकता है मगर  प्रभाव आप पर नगण्य ही पड़ेगा , और आप उचित  गति से अपने गंतव्य पर पहुँच जावेंगे | 
  • जीवन से भागने का प्रयत्न न करें  से जितना भागेंगे परिस्थितियां उतनी ही विकराल होती जावेंगी क्योकि जीवन में हर अच्छे ख़राब को  भोगना आपका ही   प्रारब्ध है ।
  •  कार्य के साथ  आदर्शों के लिए भी  निकाले ये आदर्श क्रियान्वयन विपरीत परिस्थिति में  आपको धनात्मक सम्बल अवश्य  देंगे | 
  •  मित्र , सहयोगी और समाज केवल समय, साधन और आपके व्यक्तित्व से अपनी तुलना करके स्वयं को सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहेंगे उन्हें केवल उतना महत्व दे जो आपके लक्ष्य की प्राप्ति में रोड़ा न बन सके| 
  • आप जो व्यवहार लोगो को दे रहे है वही व्यवहार आपको मिलेगा यदि आप सत्य ,प्रेम कल्याण उदारता का भाव  रखते है तो आपका मार्ग सहज ही होगा | 
  • हर परिस्थिति में कुछ श्रेष्ठ किया जा  सकता है केवल भाव से उसे तय किया जाए और पूर्ण ईमानदारी से उसका क्रियान्वयन किया जावे 






Sunday, September 21, 2014

सफलता का एक मात्र साधन है आत्म नियंत्रण

एक राजा था जो अपनी प्रजा और राज्य के राज काज में निपुण था मगर उसमे केवल यह अवगुण था  कि वह अपने सामने किसी की विद्वता को मानने को तैयार नहीं होता था , बहुत से शुभ चिंतकों ने उसे समझने का प्रयत्न किया मगर वह  मानाने को ही तैयार नहीं होता था एक बार राजा का एक मात्र पुत्र जंगल में शिकार पर गया और सकुशल लौटने कोही था अचानक एक सर्प पेड़ से उसके उपर गिरा  और उसने उसे काट लिया तत्क्षण उस  उस राजकुमार की मृत्यु हो गई , लोगो ने बताया यहाँ पास ही एक तपस्वी रहते है उन्हें बुलाया जाये वो शायद आपकी कुछ सहायता कर पाये , राजा के सामने केवल अन्धकार छाया हुआ था उसने कहा अब मै  हार गया हूँ आपलोग जैसा चाहो वैसा करो मंत्री ने उस सन्यासी से प्रार्थना की और सन्यासी ने आकर कुछ एक जड़ी बूटियों से राजकुमार को  जीवित कर दिया राजा मूर्खों सामान हतप्रभ सा उसे देखता रह गया , बाद में उसने साधु से कहा हे देव मेरी और से ये तुच्छ भेंट स्वीकार करें साधु ने देखा हीरे मोतियों से भरे कुछ थाल है उसने कहा  बस इतना सा , राजा ने कहा पूरा खजाना दे देता हूँ स्वीकार करें आप साधु ने कहा राजा तेरा खजाना है ही कितना ,राजा बोल पूरा राज्य लेलो साधु बोला बहुत छोटा है तेरा राज्य, राजा को क्रोध आ गया वो कहने लगा आपपर कुछ है नहीं और मुझे आप कंगाल ठहरा रहे हो बताओ क्या है आपके पास साधु शांत भाव से बोला राजन आओ बैठो मैं  बताता हूँ  पुत्र जब आप  घर परिवार , राज्य स्थान के मालिक होना बताते हो तो   आप केवल उसके ही मालिक होते हो और आपके आधीन जो होते है बस उनका ही आधिपत्य होता है आपपर. और आप कभी अपने अंतरकी शक्ति और उसके साम्राज्य का अनुभव करके तो देखो ,एक बार इन बंधनों से हट  कर देखें तो सारा आसमान और पूरा संसार आपका हो जाता है ।सधु ने राजा को एकाग्र करके मन का  शक्ति शाली  वैभव दिखाया  राजा को लगा वो आकाश में घूम रहा है हजारों सूर्यों की रौशनी के साथ उसे मालूम होगया की साधु सबको तुच्छ  क्यों कह रहा है उसे  राज्य अपनी सम्पत्ति सब बहुत छोटी दिखाई देने लगी  और वह भी परम सत्य की खोज में साधु के साथचल दिया |

आज हम जिस  समय से  है  वहां केवल भौतिक संसाधन और हर  स्वयं को श्रेष्ठ बताने की होड़ है हम एक दूसरे को अपने सामने छोटा  सिद्ध करके  स्वयं को अतुलनीय बनाने में लगे रहते  है जबकि हमारी सम्पूर्ण  शक्ति इसमें लगी रहती है  कर्त्तव्य , आदर्श और सरकारात्मक गुणों  चाहे  समाहित करें या नहीं करें लेकिन अनेक बुराइयों ,  कमियों और नकारत्मकताओं के बाद भी श्रेष्ठ बने रहे , काल अबाध गति से चलता रहता है ,हर युग में मनुष्य अपने आपको सर्वोच्च बनाने की कोशिश में लगा रहता है फिर एक दिन समय के हाथों   हारा  चला जाता है , कहने का अर्थ यह की समय उसके प्रभुत्व को मानने से इंकार कर   देता है |

हर इंसान को ईश्वर ने पूर्ण शक्ति , धर्म , और सकारात्मकता के  गुण  दिए है मगर हर आदमी सफल नहीं हो सका अधिकांश  बीच में ही अपने मूल लक्ष्य से भटकते  दिखाई दिए क्योकि उस  व्यक्ति को  पूर्ण बना कर  परीक्षा   लिए हजारों प्रलोभन  संसार में फ़ेंक   दिए है जिनमे उलझ उलझ कर व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य या सफलता  तक नहीं पहुँच  पाता युवा अवस्था में उसने बहुत  आदर्श , सकारात्मक गुण , एवं सार्थक उद्देश्यों को लक्ष्य बनाया फिर जैसे ही धीरे धीरे  बढ़ा  उसे समाज पैसा ,  योवन , संसाधन ऐशोआराम , और  की तमाम  रंगीनियाँ,  आधुनिक कहलवाने के मद ने घेर लिया और उसके मूल उद्देश्य समय निकलने के साथ हारते चले गए और अधिकाँश लोग उस ईश्वर की श्रेष्ठ कृति होकर भी स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध नहीं कर सके |

इस समय की गति में सफल सिद्ध वही हो पाये जिनके लक्ष्य और कर्म के संकल्प पूर्ण शक्ति संपन्न थे , अनादि काल से यह कथा महाभारत में  द्रोण  ने अर्जुन से चिड़िया की आँख के लक्ष्य के रूप में कही है और वही सत्य आपको सफल या असफल सिद्ध करदेगा , सफलता के कोई लघु मार्ग होते ही नहीं है , जो लोग लक्ष्य की नीरसता भरे कठिन परिश्रम को ही जीवन मान लेते है समय उनके सामने समय  स्वयं नतमस्तक हो जाता है ,उनका केवल एक गीत होता है

      जिंदगी  रंगीनियों को  देख लूँगा  फिर कभी  , 
     वक्त  मुझको मंजिलों पर खुद फतह पाने तो दे 

अर्थात उसे केवल यह मालूम रहता है की उसे  कौन सा काम किस प्राथमिकता पर करना है , और यही मूल मंत्र उसे सफलता के उस पायदान पर खड़ा कर देता है जहाँ समय उसका प्रसंशक  बन जाता है |

जीवन में इस आत्म नियंत्रण के लिए निन्म प्रयोग करके अवश्य देखे



  • जीवन बहुमूल्य है और इसमे प्रति पल कुछ सकारात्मक किया जा सकता है , मै  किस प्रकार इसे सिद्ध कर सकता हूँ , क्या  मै  सकारात्मक कर्म के लिए संकल्पित हूँ अथवा नहीं | 
  • आत्म नियंत्रण का अर्थं है , मन ,वाणी ,कर्म  से वो मान दंड स्थापित कर पाएं जो भविष्य में समाज को एवं मानवीयता  एक उदाहरण बन कर मिल पाये , अर्थात वह कल्याण कारी हों | 
  • स्वयं के विकास और कर्म को ऐसा सिद्ध करने का प्रयत्न करें  कि  वह आपके लाभ के साथ सामाजिक हिट का भी  कारक  बन सकें | 
  • संकल्प की प्राथमिकता से पहले यह विचार करलें  कि  संकल्प की आपूर्ति के समय तक अनगिनत समस्याएं और प्रलोभन आपको आकर्षित करेंगे , और उनका प्रभाव आपको असफल सिद्ध कर देगा | 
  • अपने संकल्प और शक्ति को बार बार दोहराते रहें , प्रति दिन आपके इस प्रकार याद करने से यह संकल्प आपको पूर्ण सफल कर देगा ,इसके लिए स्वयं को जाग्रत रखें | 
  • आत्म नियंत्रण के प्रश्न पर यह हमेशा याद रखें  कि  हम स्वयं अपने हर अच्छे बुरे कर्म के लिए जिम्मेदार है और हमारा हर कार्य हमें अच्छा या ख़राब सिद्ध करने की शक्ति रखता है | 
  • स्वयं को  संयमित और और सकारात्मक ऊर्जा से ओत  प्रोत  देखे और यह अनुभव करें  कि  संसार को शक्ति देने वाली कोई अभूतपूर्व शक्ति आपको दिशा दे रही है , इससे आपको साक्षात , धनात्मक अनुभव हो सकेंगे | 
  • आप अपने हर कार्य को समय  बद्ध , तरीके से करने का प्रयत्न करें , आप  दिशा भ्रमित तब ही होते है जब आपके  पास कोई  समयानुरूप रूप रेखा नहीं होती  | 
  • अपने कार्यों और मन मष्तिष्क के आवेगों को निरंतर देखते रहिये की क्या कोई  और श्रेष्ठ विधि अपनाई जा सकती है , अपनी क्रिया विधि कीकमियों को दूर करते रहिये | 
  • आत्म  नियंत्रण का सबसे बड़ा सूत्र यह है कि स्वयं को अंतरात्मा की आँखों से उस प्रकार देखें कि शरीर के किये गए कार्यों पर आपको आपकी आत्मा दिशा निर्देशित करती रहे , वह आपको आपके हर कार्य के बारे में दिशा निर्देशित करती रहे और आप स्वयं को सुधरते रहे , ये तकनीक आपको पूर्ण आत्म नियंत्रण सीखा देगी | 






अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...