Sunday, October 19, 2014

हार और निराशा को विश्वास से जीतें

शहर से दूर एक छोटी सी पुलिया पर एक सुन्दर रोबीला युवक  गहन चिंता में बैठा अपने आप में बुद बुदा  रहा था बीच बीच में आँखों के कोरों से यदा कदा  आंसू गाल पर आजाते थे परन्तु वह उन्हें रोकने का  भरसक प्रयत्न भी करता रहा था, कई राह गीर जो सुबह की सैर के लिए निकल रहे थे प्रश्न भरी नजर से देखते जा रहे थे कुछ एक ने पूछा भी क्या हुआ नवयुवक मौन स्तब्ध और निश्छल एक और टकटकी लगाये देखता रहा बहुत देर बाद एक बहुत बुजुर्ग आकर युवक के बगल  बैठ  गएचलते चलते थक गए थे शायद , बुजुर्ग ने सबकी तरह उसे भी कहा गुड मॉर्निंग यंग   मेन युवक चुप रहा बुजुर्ग को बड़ा अजीब लगा उसने जब ध्यान से देखा तो पाया की युवक किसी गहन चिंता में है उसने बड़े ही वात्सल्य भाव से पूछा बेटा  क्या हुआ है में  तुम्हारे पिता के जैसा हूँ शायद ईश्वर ने मुझे तुम्हारे लिए ही भेजा है युवक जोर जोर से रोने लगा बुजुर्ग ने उसे सम्बल दिया और पूछा क्या बात है युवक ने बताया कि में  बहुत बड़े खान दान का पुत्र हूँ  मेरा पूरा जीवन ऐशो आराम में बीता है  मेरे दादा जी जब कभी आदर्शों की बात करते थे तो मुझे अच्छा लगता था सोचता था मै  भी समाज को नए प्रतिमान दूंगा , मगर कॉलेज, स्कूल ,और समाज में मेरे चारों और चापलूसों की भीड़ जमा होती गई और मैं नशे , ऐय्याशी में डूबता चला गया ,जीवन के आदर्श लक्ष्य और दादाजी के आदर्श सब कहानी बनकर रह गए , अभी कुछ दिन पहले मेरी तबियत ख़राब हुई जाँच बाद डॉक्टर ने यह कहा   कि बेटा आप के पास केवल छै  माह का जीवन है आपके फेफड़े ९०% तक निष्क्रिय होचुके है और दुनिया में आज तक  बीमारी  का इलाज नहीं है तो पिछली १० रातों में मैं बहुत रोया  , दादाजी बार बार दिखाते रहे , आदर्श जीवन के प्रतिमान बनाने की बात मुह चिढ़ाती रही,मैंने सोचा अपने समाज , अपने मित्रों , अपने सहपाठियों को इस जहर से अवश्य बचाउंगा यह भाव  लेकर  मैं सबके घर घर गया सबको जैसे ही मेरी स्थिति का ज्ञान  वो मेरे साथ छोड़ गए मैंने बहुत कहा यह जहर  तुम सब छोड़ दो , वो सब मेरा मजाक उड़ाने  लगे और मुझे छोड़कर चले गए अब मैं क्या करूँ युवक फिर रोने लगा बुजुर्ग ने हाथ फेरते हुए कहा  बेटा  आप मुझे देख रहे हो मुझे भी डॉक्टर ने   बताया है की मुझ पर जीवन कम है परन्तु ध्यान रखो कि  समाज मे क्रांति अल्प समय में भी संभव है  अनेक ऐसे लोग  ही समाज को   धरोहर  दे गए है | ,विवेकानंद , आदिगुरुशंकराचार्य अनेक विभूतिया है , भारतीय धर्म के अनुसार राजा परीक्षित ने सात दिनों में जो ज्ञान , प्रकाश और जीवन का सत्य बांटा  वो  दुर्लभ है पुत्र जीवन बड़े और छोटे का सम्मान नहीं करता वह तो केवल उनका सम्मान करना जनता है जो भाव पूर्ण तरीके से अपने ठोस कर्त्तव्य मार्ग से  उसकी दिशा बदलदे | तुमपर बहुत समय है मैं और तुम मिलकर वो मानदंड अवश्य बनाएंगे युवक की आँखों में चमक आगई और वह बुजुर्ग का हाथ पकड़ कर  पूर्ण विश्वास से आगे बढ़ने लगा |

जीवन का यही सत्य है कि हम जिन चीजों के अनुभव लेकर अपनी आगामी पीढ़ी  का प्रयत्न करते है वह हमारी एक नहीं सुनती और उसी पतन के मार्ग पर खुद भी कष्ट भोगती है जहाँ से हम उन्हें बचाने का प्रयत्न कररहे होते है |
जीवन का बड़ा या छोटा होना महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है  कि आपको जीवन में अपना उद्देश्य प्राप्त करने में कितना समय लगता है , और आप जीवन के प्राप्त समय को कितना सफल और लोक कल्याण कारी बना पाते है जीवन की सार्थकता के लिए ये बिंदु अधिक उपयोगी हो सकते है 

  • जीवन में समय सबसे अनमोल विषय है उसके हर पल का  प्रयोग इस प्रकार करें जिस प्रकार लक्ष्य पर जाता हुआ कोई अंतरिक्ष यान यदि एक पल को भी दिशा भ्रमित होता है तो असफलता  दिखने  लगती है | 
  • जीवन में  एकला चलो रे का सिद्धांत सबसे सशक्त विषय है, आपका जो भी सुख दूसरे पर आधारित हुआ कालान्तर मेंवह  आपको  केवल दुःख ही देने  वाला है 
  • बहुत लम्बी भीड़ , चापलूसों और प्रसंशकों के स्थान पर कुछ एक मित्र और आलोचक अधिक अच्छे है  आपको बार बार और श्रेष्ठ और श्रेष्ठ  की  प्रेरणा अवश्य देंगे | 
  • जीवन की अवश्यम्भावी परिस्थितियों  से  घबराएं  नहीं  अपने कर्त्तव्य की दिशा में  रहे  धर्म के अनुरूप आत्मा अमर है और वह अपने लक्ष्य अवश्य पूर्ण करती है तो आपके आदर्श अवश्य पूर्ण होंगे 
  • अपने समाज से उन लोगो की खोज अवश्य करें जिन्हें आपकी आवश्यकता है , और समयानुसार उनकी यथोचित मदद  करें | 
  • आपपने लक्ष्य में वैसे कार्यरत  हो जैसे कोई बहरा आदमी आपको मुंह चलाता तो देख सकता है मगर  प्रभाव आप पर नगण्य ही पड़ेगा , और आप उचित  गति से अपने गंतव्य पर पहुँच जावेंगे | 
  • जीवन से भागने का प्रयत्न न करें  से जितना भागेंगे परिस्थितियां उतनी ही विकराल होती जावेंगी क्योकि जीवन में हर अच्छे ख़राब को  भोगना आपका ही   प्रारब्ध है ।
  •  कार्य के साथ  आदर्शों के लिए भी  निकाले ये आदर्श क्रियान्वयन विपरीत परिस्थिति में  आपको धनात्मक सम्बल अवश्य  देंगे | 
  •  मित्र , सहयोगी और समाज केवल समय, साधन और आपके व्यक्तित्व से अपनी तुलना करके स्वयं को सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहेंगे उन्हें केवल उतना महत्व दे जो आपके लक्ष्य की प्राप्ति में रोड़ा न बन सके| 
  • आप जो व्यवहार लोगो को दे रहे है वही व्यवहार आपको मिलेगा यदि आप सत्य ,प्रेम कल्याण उदारता का भाव  रखते है तो आपका मार्ग सहज ही होगा | 
  • हर परिस्थिति में कुछ श्रेष्ठ किया जा  सकता है केवल भाव से उसे तय किया जाए और पूर्ण ईमानदारी से उसका क्रियान्वयन किया जावे 






Sunday, September 21, 2014

सफलता का एक मात्र साधन है आत्म नियंत्रण

एक राजा था जो अपनी प्रजा और राज्य के राज काज में निपुण था मगर उसमे केवल यह अवगुण था  कि वह अपने सामने किसी की विद्वता को मानने को तैयार नहीं होता था , बहुत से शुभ चिंतकों ने उसे समझने का प्रयत्न किया मगर वह  मानाने को ही तैयार नहीं होता था एक बार राजा का एक मात्र पुत्र जंगल में शिकार पर गया और सकुशल लौटने कोही था अचानक एक सर्प पेड़ से उसके उपर गिरा  और उसने उसे काट लिया तत्क्षण उस  उस राजकुमार की मृत्यु हो गई , लोगो ने बताया यहाँ पास ही एक तपस्वी रहते है उन्हें बुलाया जाये वो शायद आपकी कुछ सहायता कर पाये , राजा के सामने केवल अन्धकार छाया हुआ था उसने कहा अब मै  हार गया हूँ आपलोग जैसा चाहो वैसा करो मंत्री ने उस सन्यासी से प्रार्थना की और सन्यासी ने आकर कुछ एक जड़ी बूटियों से राजकुमार को  जीवित कर दिया राजा मूर्खों सामान हतप्रभ सा उसे देखता रह गया , बाद में उसने साधु से कहा हे देव मेरी और से ये तुच्छ भेंट स्वीकार करें साधु ने देखा हीरे मोतियों से भरे कुछ थाल है उसने कहा  बस इतना सा , राजा ने कहा पूरा खजाना दे देता हूँ स्वीकार करें आप साधु ने कहा राजा तेरा खजाना है ही कितना ,राजा बोल पूरा राज्य लेलो साधु बोला बहुत छोटा है तेरा राज्य, राजा को क्रोध आ गया वो कहने लगा आपपर कुछ है नहीं और मुझे आप कंगाल ठहरा रहे हो बताओ क्या है आपके पास साधु शांत भाव से बोला राजन आओ बैठो मैं  बताता हूँ  पुत्र जब आप  घर परिवार , राज्य स्थान के मालिक होना बताते हो तो   आप केवल उसके ही मालिक होते हो और आपके आधीन जो होते है बस उनका ही आधिपत्य होता है आपपर. और आप कभी अपने अंतरकी शक्ति और उसके साम्राज्य का अनुभव करके तो देखो ,एक बार इन बंधनों से हट  कर देखें तो सारा आसमान और पूरा संसार आपका हो जाता है ।सधु ने राजा को एकाग्र करके मन का  शक्ति शाली  वैभव दिखाया  राजा को लगा वो आकाश में घूम रहा है हजारों सूर्यों की रौशनी के साथ उसे मालूम होगया की साधु सबको तुच्छ  क्यों कह रहा है उसे  राज्य अपनी सम्पत्ति सब बहुत छोटी दिखाई देने लगी  और वह भी परम सत्य की खोज में साधु के साथचल दिया |

आज हम जिस  समय से  है  वहां केवल भौतिक संसाधन और हर  स्वयं को श्रेष्ठ बताने की होड़ है हम एक दूसरे को अपने सामने छोटा  सिद्ध करके  स्वयं को अतुलनीय बनाने में लगे रहते  है जबकि हमारी सम्पूर्ण  शक्ति इसमें लगी रहती है  कर्त्तव्य , आदर्श और सरकारात्मक गुणों  चाहे  समाहित करें या नहीं करें लेकिन अनेक बुराइयों ,  कमियों और नकारत्मकताओं के बाद भी श्रेष्ठ बने रहे , काल अबाध गति से चलता रहता है ,हर युग में मनुष्य अपने आपको सर्वोच्च बनाने की कोशिश में लगा रहता है फिर एक दिन समय के हाथों   हारा  चला जाता है , कहने का अर्थ यह की समय उसके प्रभुत्व को मानने से इंकार कर   देता है |

हर इंसान को ईश्वर ने पूर्ण शक्ति , धर्म , और सकारात्मकता के  गुण  दिए है मगर हर आदमी सफल नहीं हो सका अधिकांश  बीच में ही अपने मूल लक्ष्य से भटकते  दिखाई दिए क्योकि उस  व्यक्ति को  पूर्ण बना कर  परीक्षा   लिए हजारों प्रलोभन  संसार में फ़ेंक   दिए है जिनमे उलझ उलझ कर व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य या सफलता  तक नहीं पहुँच  पाता युवा अवस्था में उसने बहुत  आदर्श , सकारात्मक गुण , एवं सार्थक उद्देश्यों को लक्ष्य बनाया फिर जैसे ही धीरे धीरे  बढ़ा  उसे समाज पैसा ,  योवन , संसाधन ऐशोआराम , और  की तमाम  रंगीनियाँ,  आधुनिक कहलवाने के मद ने घेर लिया और उसके मूल उद्देश्य समय निकलने के साथ हारते चले गए और अधिकाँश लोग उस ईश्वर की श्रेष्ठ कृति होकर भी स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध नहीं कर सके |

इस समय की गति में सफल सिद्ध वही हो पाये जिनके लक्ष्य और कर्म के संकल्प पूर्ण शक्ति संपन्न थे , अनादि काल से यह कथा महाभारत में  द्रोण  ने अर्जुन से चिड़िया की आँख के लक्ष्य के रूप में कही है और वही सत्य आपको सफल या असफल सिद्ध करदेगा , सफलता के कोई लघु मार्ग होते ही नहीं है , जो लोग लक्ष्य की नीरसता भरे कठिन परिश्रम को ही जीवन मान लेते है समय उनके सामने समय  स्वयं नतमस्तक हो जाता है ,उनका केवल एक गीत होता है

      जिंदगी  रंगीनियों को  देख लूँगा  फिर कभी  , 
     वक्त  मुझको मंजिलों पर खुद फतह पाने तो दे 

अर्थात उसे केवल यह मालूम रहता है की उसे  कौन सा काम किस प्राथमिकता पर करना है , और यही मूल मंत्र उसे सफलता के उस पायदान पर खड़ा कर देता है जहाँ समय उसका प्रसंशक  बन जाता है |

जीवन में इस आत्म नियंत्रण के लिए निन्म प्रयोग करके अवश्य देखे



  • जीवन बहुमूल्य है और इसमे प्रति पल कुछ सकारात्मक किया जा सकता है , मै  किस प्रकार इसे सिद्ध कर सकता हूँ , क्या  मै  सकारात्मक कर्म के लिए संकल्पित हूँ अथवा नहीं | 
  • आत्म नियंत्रण का अर्थं है , मन ,वाणी ,कर्म  से वो मान दंड स्थापित कर पाएं जो भविष्य में समाज को एवं मानवीयता  एक उदाहरण बन कर मिल पाये , अर्थात वह कल्याण कारी हों | 
  • स्वयं के विकास और कर्म को ऐसा सिद्ध करने का प्रयत्न करें  कि  वह आपके लाभ के साथ सामाजिक हिट का भी  कारक  बन सकें | 
  • संकल्प की प्राथमिकता से पहले यह विचार करलें  कि  संकल्प की आपूर्ति के समय तक अनगिनत समस्याएं और प्रलोभन आपको आकर्षित करेंगे , और उनका प्रभाव आपको असफल सिद्ध कर देगा | 
  • अपने संकल्प और शक्ति को बार बार दोहराते रहें , प्रति दिन आपके इस प्रकार याद करने से यह संकल्प आपको पूर्ण सफल कर देगा ,इसके लिए स्वयं को जाग्रत रखें | 
  • आत्म नियंत्रण के प्रश्न पर यह हमेशा याद रखें  कि  हम स्वयं अपने हर अच्छे बुरे कर्म के लिए जिम्मेदार है और हमारा हर कार्य हमें अच्छा या ख़राब सिद्ध करने की शक्ति रखता है | 
  • स्वयं को  संयमित और और सकारात्मक ऊर्जा से ओत  प्रोत  देखे और यह अनुभव करें  कि  संसार को शक्ति देने वाली कोई अभूतपूर्व शक्ति आपको दिशा दे रही है , इससे आपको साक्षात , धनात्मक अनुभव हो सकेंगे | 
  • आप अपने हर कार्य को समय  बद्ध , तरीके से करने का प्रयत्न करें , आप  दिशा भ्रमित तब ही होते है जब आपके  पास कोई  समयानुरूप रूप रेखा नहीं होती  | 
  • अपने कार्यों और मन मष्तिष्क के आवेगों को निरंतर देखते रहिये की क्या कोई  और श्रेष्ठ विधि अपनाई जा सकती है , अपनी क्रिया विधि कीकमियों को दूर करते रहिये | 
  • आत्म  नियंत्रण का सबसे बड़ा सूत्र यह है कि स्वयं को अंतरात्मा की आँखों से उस प्रकार देखें कि शरीर के किये गए कार्यों पर आपको आपकी आत्मा दिशा निर्देशित करती रहे , वह आपको आपके हर कार्य के बारे में दिशा निर्देशित करती रहे और आप स्वयं को सुधरते रहे , ये तकनीक आपको पूर्ण आत्म नियंत्रण सीखा देगी | 






Sunday, August 17, 2014

सकारात्मक परिवर्तन की सोच सर्वोपरि है

एक समय की बात है की एक चोर रात्रि के अँधेरे में  अपने घर के बाहर निकला सोचा आज कोई बड़ा हाथ लग जाए तो अच्छा है और इसी उधेड़ बन में वो धनाढ्यों के निवासों के चक्कर लगता ,राज्य प्रासादों के आस पास मंडराता रहा मगर कहीं भी  उसको सुरक्षा में ढील नहीं मिली सुबह हो चली थी , हार थक कर लौटते हुए अचानक उसकी नजर एक झोपड़ी पर गई दरवाजा अध खुला था ,कुटिया में एक साधुबैठा था उसके  सामने चार पक्तियां लिखी थी ,
  • हर कर्म का फल  तुझे ही मिलना है 
  • अनंत कामनाये  या  शांत मन क्या चाहिए तुझे 
  • ईश्वर सब देख रहा है उसे मन में देख 
  • मै  तुझे भी सब दूंगा सब्र  रख
और अंदर झांक के देखा तो पाया , पूर्ण नीरवता थी और ध्यान से देखने पर उसने देखा की एक साधु महाराज अपने भगवान के ध्यान में पूरी तरह डूबे है ,एक कम्बल जमीन पर बिछा है एक कमंडल पास में रखा है चोर ने सोचा यही सही , उसने दबे पाँव जाकर कमंडल और कम्बल उठाया और चलता बना ,ध्यान के बाद साधु महाराज ने सोचा ईश्वर कुछ नया देना चाहता हैमुझे , समय बीतता गया एक रोज साधु महाराज सोकर उठ भी नहीं पाये की एक पागल जैसा आदमी चिल्लाता हुआ उनके पावों में  लिपट गया बोला ये लो अपना कम्बल और कमंडल, मेरा जीना हराम कर दिया है इन्होनें , जिस दिन मै  ये चोरी करके यहाँ से  आगे गया तो एक और घर से   गहने चुरा कर कम्बल में बांध  कर निकलने को ही था कि एक हल्दी चढ़ी  बच्चीको मुस्कुराते हुए , सोते देखा और जल्दी में मै  भाग तो गया मुझे बार बार वो चारों बाते मेरा पीछ करती रहीं और  वो लड़की, उसके स्वप्न ,उसकी गरीबीमें भी शांती  और अपनी लड़की का ध्यान आता रहा और जब मै  वो गहने लौटने गया तो मुझे पकड़ कर  करावास में डाल दिया गया ,मै  कारावास में भी एक पल को चैन से नहीं रह पाया हूँ वो चारो बाते तीर जैसा मेरे अंतः को बार बार घायल कररही है , जब से आपका कमंडल और कम्बल ले गया हूँ तब से एक दिन भी न सो पाया हूँ न मेरी प्यास बुझ पाई है मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा साधु हँसे , पुत्र जब तू ये ले जारहा था तब मैंने तुझे देख लिया था सोचा ईश्वर ने तुझे अपनी सेवा के लिए चुन लिया है पुत्र
जब तक मन में कुछ पाने और परिवर्तन के लिए व्याकुलता नहीं हो तब तक जीवन में कुछ पाया ही नहीं जा सकता या वह पाया हुआ हमे संतोष नहीं दे सकता | 

चोर शरणागत होकरमहात्मा की शरण में चला गया और  एक दिन बहुत बड़े सिद्ध योगी के रूप में अवतरित हो गया | 


मित्रो अधिकांश प्रबुद्ध  अपनी कामनाओं के जाल में इस तरह से लिप्त है कि आॅंख बंद करके भागे चले जारहे है जिसे हम अपने वर्त्तमान के लाभ का विषय मानते है उसके  ही दूरगामी परिणामों से हम भय भीत हो जाते है , और उनसे भागने का प्रयत्न करते है ,जीवन की सार्थकता और उसकी सकारात्मकता को अपने लाभों के लिए विस्मृत कर देना चाहते है ,शायद हमारे आँख बंद करने से परिस्थितियां अनुकूल नहीं बन पायेंगीं वरन  उसके लिए हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा और यह याद रखें की हमारे दृष्टिकोण बदलते ही हमारी क्रियात्मकता स्वयं सकारात्मक होकर हमारे ही लिए नहीं अपितु हमारे सम्पूर्ण समाज के लिए एक उदाहरण का रूप ले लेगी | 


परिवर्तन  धनात्मक एवं  ऋणात्मक क्रियान्वयनके साथ  हमेशा शेष रहता है केवल हमारी सोच उसे जिन्दा या मुर्दा साबित करती रहती है और हम उसे ही सच समझ कर जीने के आदि होते रहते है ,अपने आपको दोषारोपित करते रहते है , जबकि हमारा चिंतन और विषय के आकलन  की दृष्टी सकारात्मक  होने से ये सारी विपरीत परिस्थितियां हमारे लिए सकारात्मक रूप में खड़ी हो सकती है | 
हम कर्तव्य और कर्त्तव्य बोध से बंधे चलरहे है, हमारा हर काम यंत्रवत होता जा रहा है , पीढ़ियों की आदतों के आधार पर हम भी भागे चले जा रहे है  अपनी वंश  परम्परा   निभाते हुए , इस बात  को अनदेखा किये कि समाज , संस्कृति , आचारों विचारों में तीव्र गामी परिवर्तन होरहे है और  नई सोच तथा उनके अनुरूप हमारी सकारात्मक सोच में भी वृद्धि गामी परिवर्तन होने ही  चाहिए | 

कोई भी व्यक्ति , समाज , और संस्कृति में यदि समयानुसार  सकारात्मक परिवर्तन न हो पाये तो वह संस्कृति , अपने सांस्कृतिक प्रतिमानों के साथ स्वयं नष्ट होजाती है , विश्वकी अनेक सभ्यताओं का मूल्यांकन करने से हमे यह स्पष्ट हो जाएगा  कि जिन सभ्यताओं ने अपने मूल सिद्धांतों के साथ सकारात्मक परिवर्तनों को अपने में स्थान दियाहै केवल वे ही  आज भी अपना  वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे है ,समयके  परिवर्तनों  के साथ  सभ्यता, सोच , और नैतिक मूल्यों के उत्थान को ध्यान में रख कर किये गए परिवर्तन सम्पूर्ण मानवीयता को पुरस्कृत कर सकते  है | 

परिवर्तन के इस युग में जो तथ्य  महत्व पूर्ण है वे निम्न हो सकते है | 
  • सकारात्मकता का विचार अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है और वह किसी भी परिस्थिति में लुप्त नहीं हो सकता क्योकि हर स्थिति में सकारात्मकता का बीज अवश्य बना रहता हैं बस उसे पल्लवित करने की चेष्टा की जानी चाहिए 
  • हमें हरदिन सकारात्मकता को नवीन दृष्टी से सोचना आवश्यक है जब तक हम अपने हर कर्त्तव्य को नयी दृष्टी से नहीं सोच पाएंगे तब तक हमारे विचार और परिवर्तन संभव ही नहीं है | 
  • तात्कालिक लाभों के लिए अपने  से समझौता न करे क्योकि यदि हमने अपने कर्त्तव्य में अपने अडिग आदर्शों को आधार नहीं बनाया तो हमारी सारी उपलब्धियां  समुद्र की रेत पर बने चित्रों जैसी होगी जिनका जीवन बहुत छोटा होता है | 
  • राष्ट्र समाज ,संस्कृति सब लाखों करोडो में से कुछ एक लोगो से यह आशा करते है  कि वे आएंगे और एक नई दिशा में मोड़ कर समाज राष्ट्र और सामाजिक प्रतिमानों को उन्नत बनाएंगे हमे उनमे से ही बनकर स्वयं को सिद्ध करना है | 
  • मनुष्य  ईश्वर की सर्वोच्च कृति  है  और उसे यह स्थान इस लिए प्राप्त है कि उसमे परहित का भाव , परमार्थ , सकारात्मक परिवर्तन , और भविष्य को अपने  त्याग  से परिष्कृत करना आता है , और यही सकारात्मक दृष्टी उसे महानतम बनाने में सक्षम है | 
  • हरदिन  किये जाने वाले कार्य को उसकी उत्तम विधिमे पूर्णकरने का संकल्प किया जावे यह भी विचार किया जाना चाहिए  कि मेरे कार्य से समाज राष्ट्र और सम्पूर्ण सांस्कृतिक सभ्यता को क्या लाभ हो पायेगा यदि उत्तर धनात्मक है तो जीवन सफल सिद्ध होगा | 
  • नवीन परिवर्तनों को इस प्रकार स्वीकार कियाजाना चाहिए जिससे  पूर्व संस्कृति , सभ्यता के मूल रूप से छेड़ छाड़  न होते हुए उसके लाभकारी रूप, आदर्शों की ऊंचाइयां और सकारात्मक क्रियान्वयन को और प्रभावी  बनाया जा सके | 
  • हर घटना को आप समालोचना के दृष्टी कोण से विचार करके अवश्य देखे क्योकि इसके बाद ही आप उस घटना को समाज के लिए सकारात्मक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत कर पाएंगे | 
  • प्रथम दृष्टी में किसी भी क्रियान्वयन को  नकारात्मक सिद्ध करने का प्रयास न करें उसके विश्लेषण के बाद ही उसकी धनात्मकताओं को आत्मसात किया जा सकता है | 


Sunday, August 3, 2014

विकास, भारतीय मूल्य और संस्कार

वर्तमान में युवा मष्तिष्क में विकास उन्नति और अपना परचम  सम्पूर्ण विश्व में फहराने की आकांक्षा बनी रहती है इसीप्रकार राष्ट्रों  होड़ मची है की वे अपने  पूर्ण विकसित करने की चेष्टा कर सकें , और हर जगह एक गाला काट प्रतियोगिता सी दिखाई दे रही है , भावना  विहीन विकास जिसमे केवल स्वयं के अलावा कुछ नहीं है , और कैसे भी विकास के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर स्वयं को साबित कर पाये , उसके लिए चाहे कुछ भी करना हो परन्तु वह विकास  उसके ही नाम होना चाहिए । अब ऐसी स्थिति में जब हर व्यक्ति अपने अपने विकास के लिए संकल्पित है सम्पूर्ण समाज में एक ऐसी स्थिति निर्मित हो गई है जहाँ केवल अपनी इच्छाएं ,अपने स्वार्थ अपनी उपलब्धियां , महत्वपूर्ण रह गई है चाहे उसके बदले समाज ,हमारे अपनों को कितना भी कष्ट क्यों न झेलना पडे । 

शिक्षा , चिंतन , तकनीकी और समाजार्थिक दृष्टी से हमने बहुत उन्नति की है सम्पूर्ण विश्व सुपर कम्यूटर के युग में खड़ा है राष्ट्रों के सुरक्षा साधन एटम बम्ब परमाणु बॉम्ब और हाइड्रोजन बोम्ब के रूप में बदल गए है । जन  उपयोग में आने वाली हर वस्तु  की मात्रा और गुणात्मक आधार और अधिक बढ़  गए है , जल थल नभ में सुरक्षा के अति विकसित साधन रक्षा क्षेत्र में खड़े हो गए है ,लोगो की कार्य क्षमता , शिक्षित और पेशेवर क्रियात्मक शिक्षा ,से युवा लाभान्वित हुआ है , जो माता पिता बच्चे को दूर के स्कूल में भेजने में डरते थे वो आज उच्च शिक्षा और काम के लिए बच्चो को हजारों किलोमीटर दूर  भेज कर विकास का लाभ ले रहे है , कहने का आशय यह की सम्पूर्ण विश्व एक विकास की दौड़ का मैदान बन गया है  और हर एक को जल्दी है की वह कैसे भी स्वयं को सिद्ध करके आगे बढ़ जाए | 

पेशेवर विकास की दौड़ में हम यह भूल गए की विकास के आधार पर खड़ा हुआ हमारा अस्तित्व स्वयं अपने लिए ही एक छलावा साबित हो रहा है ,हमे जल्दी में अपने आपके लिए और कुछ सोचने का वक्त ही नहीं रहगया है ,की हम  इस प्रगति से प्रसन्न है भी की नहीं , यहाँ कोई किसी को सम्मान , आदर , और प्रभुत्व देने  के लिए तैयार नहीं है सब यही सिद्ध करना चाहते है की वे सर्व श्रेष्ठ है , परन्तु दोस्त, बड़ा मानने के लिए भी तो एक पक्ष होना चाहिए जो आपकी सत्ता को स्वीकार  कर आपको बड़ा मान कर सम्मान दे पाये , परन्तु हमारे विकास में यही कमी रह गयी की वह दूसरों के सुख दुःख ,और उनके चिंतन से दूर केवल अपने ही स्वार्थो के चारो और लिपट कर रह  गया है जबकि हमारा विकास दूसरों के सुख का कारक होना चाहिए था | 

भारत को विश्व गुरु माना गया है यहाँ की सभ्यता में संस्कारों , संस्कृति और उसके मूल्यों को समझने की शक्ति नैसर्गिक मानी  जाती थी बाल्य  अवस्था  से  युवा अपने अपने परिवार में मूल्यों और  एक श्रेष्ठ अनुसाशन  जीता था , धर्म  मान्यताएं पहले  संस्कृति ,समाज और दूसरों को वरीयता देती थी , सम्मान आदर और समाज में स्त्री शक्ति को माँ  बहिन,  बेटी और देवी के रूप में माना गया था ,पिता माता और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान  और आदर के बड़े पदों में रखा जाता था , सत्य अहिंसा , अपरिग्रह , परमार्थ और उच्च शिक्षा जैसे गुणात्मक आधारों की नीवों में केवल परहित का भाव बना रहता था ,और यही वो भारत था जिसको विश्व  गुरु की पदवी दी गई थी | 

 भारतीय संस्कार और संस्कृति के मूल्य राजा सगर की उन  संतानों से आरम्भ समझे जिन्होंने परहित के कारण कई पीढ़ियों को बलिदान कर गंगा को आरम्भ होने का मार्ग दिया ,भारतीय सभ्यता का इतिहास गवाह है की दूसरो के हित  के कारण नानक तुलसी  बुद्ध , और ईश्वर  ने कई बार अवतार लिए है और पीड़ित मानवीयता को सहायता दी है | 

 संस्कारों एवं  मूल्यों के बिना  पेशेवर विकास वैसा ही है जैसे एक जानवर की बोटियों को चींथते पक्षी जिनका                    चरम लक्ष्य  ज्यादा से ज्यादा मांस अपने हिस्से में लेकर स्वयं को सफल सिद्ध करना होता है  जबकि उस जानवर की पीड़ा और उसका दर्द उनके लिए कोई मायने नहीं रखता |  बस हम सब भी अपने स्वार्थों में लगे है अपने संस्कारों औरपरहित भाव की अनदेखी कर रहे है  तो हम श्रेष्ठ कैसे हो सकते है | 



संतोष के स्तर का मूल्याकंन   मन को करना होता है और मन का खुश एवं दुखी होना दूसरों पर ही निर्भर होता है 
क्योकि मन धन, सम्पदा , श्रेष्ठता , निकृष्टता हीन और उत्तम   ये सब दूसरों के मानने से ही बड़े छोटे दिखाई देते है जो मन किसी के दुःख और सुख का अनुभव नहीं कर सकता वह जीवन में अपने संतोष के चरम को कभी प्राप्त नही कर सकता 

 संस्कारों एवं  मूल्यों का एकी कृत सम्मिश्रण ही वास्तविक विकास है जिसमे दीर्घ कालिक शांति  समाहित है इन तथ्यों को अपने चिंतनीय  विकास के विषयों  में शामिल करें | 
  •  हम जो भी कर्म करते है उसका सम्बन्ध तो दूसरों से होता है मगर हमारी मानसिकता में अपना ही अपना सोचना अर्थात स्वार्थ होता है यदि ये मानसिकता भी परहित का भाव लेले तो सफलता निश्चित है | 
  • मूल्यों की अनुपस्थिति से विकास का अर्थ हम अपनी धन, सम्पदा ,वैभव और चल अचल संपत्ति में तो वृद्धि कर सकते है मगर , मन  की खुराख वो आदर्श है जो आपने प्रयोग ही नहीं किये , अर्थात विष के प्याले में अमृत भरना उसे भी दूषित कर देगा | 
  • स्वानुशासन , सत्य , सहजता सरलता ,और कठिन परिश्रम के साथ परहित के भाव हेतु किया गया प्रत्येक कार्य सफल ही रहता है चाहे उसमे कुछ बाधाएं आएं या थोड़ा विलम्ब हो मगर वह मन के लिए तृप्ति कारक  ही होगा 
  • विकास में वेदोक्त ,पृथक २ धर्म के अनुशासन  के आधारों को भी ध्यान रखना आपको सफलता के साथ अनेक प्रकार की प्रसन्नता दे सकता है | 
  • प्रकृति का एक नियम यह भी है की वह अपने आप पर उधारी नहीं रखती आप जितना अधिक परहित में कार्य करेंगे आपको उतनी ही अधिक प्रसन्नता अपने आप से होगी | 
  • विकास बहुत आवश्यक है मगर उसके लिए भी एक नियत अनुशासन अवश्य चाहिए यदि अनियंत्रित विकास स्वार्थों में हुआ तो वह स्वयं को ही नष्ट कर देगा | 
  • वर्तमान पाश्चात्य देशों की तर्ज पर होने वाला विकास समाज को हिंसात्मक प्रवृति की और धक्का दे रहा है जबकि उससे पैदा हुआ असंतोष घोर हिंसा , आत्महत्या और राष्ट्र को आतंकी गतिविधियों की और मोड़ रहा है | 
  • मन को एकाग्र करके अपने उद्देश्य और कर्म को पूजा समझ कर करने वाली संस्कृति है भारत और हमें अपने धर्म मूल्यों के अनुसार ही कर्म को सम्पादित करना  चाहिए। 
  • सबको आदर सम्मान , और सहायता दें यह मान कर चलें की आपको ईश्वर ने आपकी मानसिकता एवं इन्ही गुणों के कारण सफल बनाया है  


Sunday, July 20, 2014

प्रचंड युवा शक्ति के ज्ञान को संस्कार दो

प्राचीन काल में  हिमालय की तराई में एक राजा राज्य करता था , स्वाभाव से वह बड़ा क्रूर ,अजेय और क्रोधी था उसके स्वाभाव गत गुणों में चापलूसी ,हत्या ,फांसी , दूसरे की धन सम्पति , अश्व, स्त्रियां,बच्चों का अपहरण करना दूसरे की पीड़ा में प्रसन्न होना और तरह तरह की यातनाओं से प्रजा को परेशान करना उसका स्वाभाव बन गया था | राजा की सैन्यशक्ति और हथियारों के सामने कोई राजा सिर नहीं उठा सकता था।,उसी राज्य में  एक सिद्ध तपस्वी भी निवास करते थे  यदा कदा  हिमालय से उतर   कर अपने आश्रम में आजाते थे , राजा ने उनका बहुत नाम सुना था उसने अपने मंत्री से कहा की तीनों राजकुमारों को वो  ही शिक्षा  देगा ,तपस्वी को पकड़ कर लाया गया और बताया की तुम्हे तीन राज कुमारों को शिक्षा देनी है  सोचा  कि ईश्वर मानवता की भलाई के लिए मुझसे सहयोग  मांग रहे है चलो यही सही ,तीनों तपस्वी ने राजकुमारों को राज महल जैसी सुख सुविधाओं में रखा , शिक्षा में मन  न लगने पर उनकी रूचि अनुसार कार्य  दिया , उनके अनुसाशन को राजा के कहे अनुसार शिथिल कर दिया गया और  धीरे धीरे तपस्वी  ने  उन्हें , अमोघ शस्त्रों से सुसज्जित  कर दिया परन्तु  दया, धर्म , संस्कार , सत्य , आदर और मानवीयता के सम्पूर्ण गुण धर्म उन्हें रुचिकर ही नहीं लगे जिससे वो उन्हें सीख पाते ।  और  एक दिन अमोघ  शस्त्रों  की होड़ में तीनों राज कुमारों ने राज्य पर हमला कर दिया क्योकि मानवीयता के गुण सम्मान  आदर औरमानवीयता के गुण उन्होंने सीखे ही नही थे , इसी प्रकार राजा राजकुमार सब अमोघ शस्त्रों से  राज्य के लालच में मारे गए , तपस्वी ने राजा के एक  सत्यनिष्ठ मंत्री को राज्य सौपा और वह पुनः हिमालय चला गया |
संस्कारों और आदर्शों के बिना अजेय और अमोघ शक्तियां भी वैसी ही मालूम होती है जैसे किसी बड़े बम से पिन निकालने की चेष्टा करता कोई अबोध शिशु 
 सम्पूर्ण विश्व आज भारत की सबसे अधिक युवाओं की शक्ति ,  देख कर हतप्रभ है  कि एक प्रगति शील देश विज्ञान , शिक्षा , ज्ञान , विकास , और तकनीकी क्रान्ति के क्षेत्र में अग्रणीय पक्ति में खड़ा हो गया है , कम्यूटर,  क्रान्ति , जीवन निर्वाह के  सम्पूर्ण उत्पादों , तकनीकी ज्ञान के प्रत्येक आयाम पर भारत ने अपना  लहरा  दिया है ।दोस्तों ज्ञान , शक्ति,धन वैभव और अमोघ  विनाशकारी   शस्त्र  केवल विनाश जानते है उनमे अपना पराया होता ही  कहां  है । अति ज्ञान , शक्ति और अमोघ शस्त्र  एक अबोध या अत्याचारी के हाथ में देने का आशय है विनाश ,और कमोवेश  हम भी उसी विनाश पथ पर जाने को लड़खड़ा रहे है ।

जिस ज्ञान और बल से विनम्रता ,मानवहित , धर्म , अहिंसा और परमार्थ की भावना और संस्कार  न जुड़े हो तो वह शक्ति स्वयं अपने स्वामी  को समाप्त कर देती है , सत्य ,अहिंसा, अपरिग्रह ,और परहित के समर्पण  को जीने वाले को प्रकृति गुण संपन्न समझ कर इतिहास के सुनहरी पन्नों में संजों  देती  है यही उच्चतम मानवीय गुण  भी माने  जाते हैं । 


आज जब हम सब लोग विकास संस्कृति और सर्वांगीण  परिवर्तन की  दौड़ में आगे आने  कोशिश कररहे है तब ध्यान यह रहे  कि हम विकास का  सही   अर्थ अवश्य समझे ,यदि समाज  राष्ट्र और हमारे पूर्ण परिवेश का सही अर्थों में विकास न हुआ तो हम स्वयं को पूर्ण सिद्ध नहीं कर पाएंगे , अभी हम अपने नियत लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाये है , आज जब हम विकास की बात करते है तो  तो व्यक्तिगत स्तर पर आकलन किये जाने लगते है और व्यक्तिगत आकलन का समाज और धर्म की दृष्टी से कोई मूल्य ही नहीं होता , हम पशु वत आधारों पर जीने की इस कला को पूर्ण नहीं मान सकते जब तक वह स्वयं से समाज कओ पोषित करने का माध्यम न बन जाए |


भारत विश्व गुरु की पदवी पर इस  आसीन हुआ कि यहाँ सनातन की परंपरा में सर्व  धर्म संभाव का मूल मंत्र निहित था यहाँ की संस्कृति ने धर्म का आशय यह बताया कि सः धारयते इति  धर्मः  अर्थात जो सबके धारण करने योग्य था वो धर्म था , भारत  की धर्म व्यवस्था इतनी विशाल है जिसमे अनेक संस्कृति अनेक धर्म और पुरानी गूढ़ परम्पराएँ अन्तर्निहित है , गीता का वैराग्य , रामायण  की मर्यादाएं , भागवत महापुराण का निश्छल प्रेम , कुरआन शरीफ की गहन आयतें गुरुग्रंथ साहेब की चेतावनियां और उपदेश बाइबल की जीवन शैली और ऐसे ही अनेक पुराण उपनिषद और हजारों स्थानीय आदर्श ग्रन्थ भारत की विश्व गुरु परंपरा  की एक छोटी सी बानगी भर है | जो यह बताते है कि जीवन में कोई भी विकास यदि संस्कारों और आदर्शो के साथ हो तभी श्रेष्ठ साबित हो सकता है ,

एक और ज्ञान और दूसरी और धर्म मान्यताएं और मर्यादाएं यदि इनका उचित सामंजस्य हो जाए तो भारत एक बार फिर विश्व गुरु की पदवी  पर स्वयं को प्रतिस्थापित करसकेगा , विकास के साथ निम्न  का ध्यान अवश्य रखें


  • शिक्षा , ज्ञान अर्जन के साथ पारिवारिक , सामाजिक , और राष्ट्रीय भावनाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए क्योकि यही हमारी असली पहिचान है | 
  • विकास के साथ रिश्तों की गरिमा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए , और सबको यथोचित सम्मान अवश्य दें क्योकि हम जो दे रहे है  वही कई गुना होकर हमे मिलेगा यही सोचें | 
  • हमारे व्यवहार और कार्यों से दूसरों को कोई कष्ट न पहुंचे , क्योकि यदि हमारा व्यवहार  लिए दुःख का विषय बना तो हमे भी उसकी नकारात्मकता उठानी होगी 
  • ध्यान रहे कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं हैअतैव दूसरे की आलोचनाओं से अपने आपको बचाएं क्योकि यदि आप स्वयं को ऐसी आलोचनाओं से न बचा पाये तो आपका व्यक्तित्व भी नकारात्मक होने लगेगा । 
  • आप यह याद रखें की आपका हर समय आकलन किया जारहा है और आप इस दृष्टा भाव को देखते रहें तो आप स्वयं का आकलन करके उसमे सुधार कर सकते है । 
  • एक परम शक्ति शाली परमेश्वर आपको प्रत्येक पल अपनी ऊर्जा प्रदान कर रहा है अपनी चेतना को पूर्ण शक्ति से उसकी और लगा कर हम स्वयं में जैसा चाहे वैसा परिवर्तन ला सकते है | 
  • माता, पिता ,गुरु , अपने शरीर और आत्मा के प्रति आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते और आपको इस सेवा से  सुख, श्रेष्ठ कार्य संतोष ,संतान, आय, पराक्रम , तथा बल ,शौर्य , निरोगी काया और शांति एकाग्रता और शून्यता प्राप्त होगी यही धर्म का मूल भी है । 
  • अपने संस्कारों आदर्शों को जीवन में थामे रखे ध्यान रखे  कि इन्हीं के सहारे आपको जीवन की परम शान्ति प्राप्त हो सकेगी क्योकि आदमी का अंतिम लक्ष्य परम शान्ति की और ही है | 
  • घ्यान विज्ञान और संस्कारों और आदर्शों के चयन में आप पूर्ण भाव से दूसरों के हितार्थ लक्ष्य तय करें क्योकि यह तो ऐसा सौदा है जो बिना मोल भाव किये आपको असंख्यों उपलब्धियां देगा | 








Sunday, July 13, 2014

स्वयं का साक्षात्कार

एक बहुत बड़े संत ने अपने शिष्यों  से पूछा तुमने आज तक कैसा जीवन जिया है ,और तुम संसार और जीवन को क्या समझते हो, शिष्य सुनते  रहे  फिरप्रथम शिष्य  बोला   गुरुदेव  मैं एक करोड़ पति पिता का पुत्र था ,और जीवन के हर ऐशो आराम को जीवन  मायने समझ कर जिया हूँ, मैंने संसार को शराब अय्याशी और क्लबों के शोर में देखा है , और हर ऐशो आराम की वस्तुओं का  मैं  ढेर बन  गया था मेरे अपनों ने ही मेरी संपत्ति शांति सब कुछ लूट ली  है मुझसे | दूसरे शिष्य ने कहा गुरुदेव दुनिया में आभाव है गरीबी है धोखा है और मैंने बड़ी मुश्किल से जीवन यापन किया है जीवन मेरे लिए निराशा है ,और विपत्ति काल में कोई अपना होता ही  कहां है ,तीसरे शिष्य ने कहा  गुरुदेव मैंने शिक्षा , ज्ञान ,शास्त्रों के अम्बार लगा दिए और हजारों ग्रंथों के ज्ञान के बाद मैं सशंकित हो गया हूँ की वास्तव में जीवन  और संसार और उसका नियंता है भी या नहीं , मैं  जीवन के इस बिंदु पर स्वयं अनजान और अबूझी पहेली सा समझ  रहा हूँ | 
 लम्बे मौन के बाद गुरु ने  कहा  बेटा एक पर साधन थे वो अपने साधनों के लुटे जाने पर परेशान है , दूसरे पर साधन नहीं है वो उनके न होने पर परेशान है ,और तीसरा ज्ञान और शिक्षा के उच्चतम शिखर पर भी अनजान और ठगा हुआ सा खड़ा है अर्थात  और संतोष की स्थिति में कोई नहीं है | क्योकि हमने जीवन , संसार , रिश्तों और साधनों की व्याख्या तो की मगर हम अपना मूल्यांकन करना भूल गए की हम संसार   के लिए कैसे उपयोगी है , और जीवन भी हमे वही देगा जो हम उसे दे रहे है | जिस जीवन में स्वयं को आत्मसात करने का  गुण नहीं है वह अपनी अंतरात्मा की कामनाओं को ही नहीं समझ पाता  परिणाम हमारी हर उपलब्धि व्यर्थ सी दिखाई देने लगती है । 

हम संसार में  साधनों ,सम्बन्ध , ज्ञान और दुनियां की हर विषय वस्तु का तत्काल मूल्यांकन कर देते है और जब जब अपना खुद का मोबाईल डायल करते है हम  स्वयं को व्यस्त पाते है और इसी तरह सम्पूर्ण जीवन निकल जाता है ,हम अपनी अंतरात्मा से यह कभी नही पूछ पाते की हमे चाहिए क्या इसलिए दुनिया भर की उपलब्धियों के बाद भी हम खाली ,निराश और लाचार ही बने रहते है क्योकि जबतक हम स्वयं से साक्षात्कार नहीं करेंगे तब तक हम हाशियों  पर पड़े हुए जीवन को सफलता नहीं दे पाएंगे अतः जीवन में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है की आप अपने आपसे परामर्श कर यह तय करें कि आप संसार , जीवन , और मानवता के लिए कहां तक उपयोगी है जिस दिन यह साक्षात्कार पूर्ण होगया जीवन स्वयं आपको फर्श से अर्श पर पहुंचा देगा । 

तीनो शिष्यों की भूल भी यही थी एक साधन संपन्न रहा ,एक अभावों में रहा और तीसरा ज्ञान की पर काष्ठा पर रहा मगर जीवन और संसार को समझ ही नही पाये क्योकि अपने स्वयं को समझने से पहले संसार और जीवन को समझना असंभव है और हम सब भी वही गलतियां कर रहे है , जो उन तपस्वी शिष्यों ने की थी स्वयं को जानने से पहले  हम कुछ समझ ही नही सकते और हम हर उपलब्धि के बाद समाज परिवार और परिवेश से प्रसंशा की कामना अवश्य करते है जबकि हमारी अंतरात्मा की प्रसंशा ही सच्ची प्रसंशा है यह भूल जाते है 

 मैं ढूढ़ता रहा  था खुद अपने आपको ही , जीवन के लम्बे समय तक मुझे अपने लिए समय ही नहीं मिल पाया परन्तु यही सोचता रहा कि  मेरी उपलब्धियां , संसार की झूठी प्रसंशा और मेरी साधन , ज्ञान और सांसारिक आपूर्तियाँ , ये सब मेरे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए आवश्यक है , दोस्तों क्या हमे ऐसा नहीं लगता की हमारी सारी क्रियाएँ , प्राप्तियां और संतोष का आधार दूसरों पर आधारित होकर रह गया है ,हमको बड़ा कहने वाले होने चाहिए तब हम बड़े हो पाएंगे , दिखाने के लिए साधनों  का ढेर होना चाहिए और उसे लोग बहुत बड़ा माने , इसी प्रकार धन, संतान, रूप, सौंदर्य, पद , ज्ञान और भी बहुत सी उपलब्धियां दूसरों को बता कर ही हम संतोष पाना  चाहते है  जबकि यहाँ एक  कटु सत्य यह है की हमारे समाज मे दूसरों की उपलब्धियों से प्रसन्न और संतुष्ट होने वाले है ही नही , वे तो दूसरों को समस्या से घिरे  हुए और सहानुभूति का पात्र बना देखना चाहते है जबकि हमारी उपलब्धियों पर सही निर्णय देने वाला हमारा मन मष्तिष्क हमारे व्यवहार से छुब्ध  और उपेक्षित ही पड़ा रहता है । 


  • आपकी अंतरात्मा आपके हर कार्य को दिशा देती है , वह आपको बार बार यह प्रेरित करती है की आप धनात्मक रहें और उसके निर्णयों का पूर्ण ध्यान रखें । 
  • हम यह अवश्य सोचें की हम अपने क्रियान्वयन में कहाँ नकारात्मक हो रहें है और उसका प्रभाव सबसे ज्यादा क्या ख़राब हो सकता है , और हम उसमे कैसे सुधार कर सकते है । 
  • प्रति दिन ५ ---- १० मिनट ध्यान अवश्य करें इसने आपका मानसिक विचलन , उतावलापन और क्रोध इन सब स्थितियों में सुधार होगा । 
  • हर समस्या के समाधान को  हूँ केयर्स कह कर नहीं  छोड़ें क्योकि जीवन सूर्य चन्द्रमा और प्रकृति यह शब्द नहीं दोहरा सकती है अतः आप पूर्ण मनोयोग से चिंतन कर समाधान निकालें | 
  • आपकी सारी उपलब्धियां आपके स्वयं के लिए है और इन उपलब्धियों से आपको और आपकी आत्मा को संतोष होनाचाहिए आप इन उपलब्धियों से दूसरों को छोटा बनाने का प्रयत्न न करें । 
  • प्रकृति , ईश्वर , और अंतरात्मा इन तीनों के सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करें इन तीनों में एक विशेषता है की ये दूसरों के लिए ही कार्य करते है ,  आत्मा मनुष्य , शरीर और इच्छाओं के लिए प्रकृति ईश्वर संसार के हिट के लिए , हमें भी  वही  मूल विशेषतायें ध्यान रखनी है ।
  • जीवन के संवादों में सबसे बड़ा महत्वपूर्ण  संवाद है स्वयं अपने आपसे  किया हुआ संवाद और यहीं जीवन को पूर्ण गति भी देता है जीवन की हर समस्या और क्रियान्वयन के लिए आत्मा से सतत सवाद की आवश्यकता है यही इंसान को आदर्शों का इतिहास बना देता है एक बार प्रयत्न करें समय, प्रकृति सब आपका साथ देने को एक साथ खड़ी हो जाएंगी और आप स्वयं सर्वश्रेष्ठ साबित होंगे । 





Sunday, June 29, 2014

सफलता का सशक्त साधन है चिंतन

एक समय तीन तपस्वी गहन तपस्या में  लीन थे   तभी  एक ईश्वर का दूत वह से गुजरा उसे  पहले सन्यासी ने प्रणाम करउससे प्रार्थना की कि कृपया आप ईश्वर से यह पूछना की वो मुझे कब मिलेंगे कई वर्ष होगये है मुझे ,इसी प्रकार तीनों सन्यासियों ने उस दूत से प्रार्थना की कि एकबार आप पूछ कर अवश्य बताना  कि  ईश्वर हमें कब मिलेंगे ,थोड़े समय बाद वह दूत लौटा और उसने पहले सन्यासी को बताया कि ईश्वर ने कहा है वोआपको १००  वर्ष बाद मिलेंगे ,दूसरे को बताया की आपको वे ५० वर्ष बाद मिलेंगे और तीसरे को उसने बताया की आप जिस पीपल वृक्ष के नीचे तपस्या कररहे है उसके जितने पत्ते हों उतने ही वर्षों बाद ईश्वर आपको दर्शन देंगे | पहले और दूसरे सन्यासी ने यह तय किया जब ईश्वर ५० और १०० वर्ष बाद ही मिलाने है तो  अविधि पूरी होने के एक वर्ष पहले आकर फिर तपस्या करलेंगे ये सोच कर वे दोनो अपनी भोग भरी जिंदगी में लौट गए | तीसरे सन्यासी ने ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद दिया और यह सोच कर और गहरी साधना में जुट गया की अबतो यह निश्चित हो ही गया है की उसे उसके आराध्या अवश्य मिलेंगे ,दोस्तों उसी समय ईश्वर प्रकट होकर उसके सामने आगये अर्थात वह पूर्ण सफल होगया | 

जीवन में भी हम हजारों कामनाएं लिए भागे जारहे है एक चीज पूरी हो नही  पाती दूसरी के लिए परेशान होने लगते है और जीत हार हार , हार और फिर जीत कहने का आशय यह कि  जीवन में जीत कम हार अधिक होने लगती है क्योकि हम चाहते बहुत कुछ है परन्तु प्राप्ति के बाद उसका सुख को भी नहीं जी पाते जिसके लिए हमने एड़ी छोटी का जोर लगाकर सारी शांती नष्ट कर दी थी ,और जो कामनाये हम चाहते है उनके चिंतन और धनात्मक सोच के लिए हम पर समय ही नहीं है दोस्तों हम उन पहले और दूसरे सन्यासियों जैसे है जिन्हे लक्ष्य बनाने , बदलने , और  छोड़ने ,में जरा भी समय नहीं लगता परिणाम यह की हम जीवन भर उपलब्धियों से हारते चले जाते है और अपने को भाग्यको ,और ईश्वर को दोष देते रहते है ,जबकि इन सबके लिए हम और हमारा चिंतन ही दोषी है | 

मूल लक्ष्य  को पाने के लिए हजारों छोटे छोटे चरणों  की पूर्ती भी की जानी होती है और उनके लिए संकल्प एवं सशक्त चिंतन की आवश्यकता अवश्य पड़ती है और यह चिंतन निरंतरता के साथ बना रहता है तो सफलता की निश्चितता सामने दिखाई देने लगती है ,परन्तु हम तात्कालिक लाभों और शारीरिक मानसिक प्राप्तियों के लिए वो सौदे करजाते है जिनका मूल्य ही नहीं जानते हम ,दोस्तों जीवन की तमाम सफलताएं आपके चिंतन और क्रियान्वयन से बंधी है ,प्रथम और द्वतीय सन्यासी हम जैसे है वो अपने लक्ष्य , साधना ,क्रियान्वयन के प्रति  अकर्मण्य भाव रखते है और फिर देखेंगे , फिर सही इन्ही बातों में जीवन निकाल कर स्वयं को दोष देते रहते है जबकि तीसरा सन्यासी इस बात से प्रसन्न हो जाता है की मेरी दिशा और क्रियान्वयन सही है  बस  लक्ष्य थोड़ा दूर है मैं  पहुँच  अवश्य जाऊँगा यह भाव  सर्वोपरि  है ,यही कर्म गीता का सार भी है | 



सफलता संकल्प और चिंतन की दासी है ,परन्तु सफलता अपने चारों और अनेकों प्रलोभन रखती है वह अपने आप तक सबको पहुँचाने ही नहीं देती उसके प्रलोभनों में सामाजिक सम्बन्ध ,शारीरिक मानसिक आपूर्तियाँ , साधनों का आकर्षण , समाज में अपनी पहिचान के शॉर्टकट , कैसे भी काम निकालने की तकनीक , और अत्याचार झूठ फरेब और अनाचार से  जीता हुआ जीवन , ये सब सफलता के प्रलोभन है दोस्तों जो इन प्रलोभनों से बच कर पूर्ण चिंतन  और क्रियान्वयन के साथ अपने लक्ष्य  पर चलता रहा उसे सफलता  अवश्य  मिलेगी इसमें कोई संदेह नहीं है , 

सफलता के  चिंतन के लिए निम्न प्रयोग अवश्य करें 


  • लक्ष्य का निर्धारण बहुत चिंतन के बाद करें तथा सबके विचार परामर्श सुनें और फिर अपनी योग्यता और शक्ति का ध्यान रख कर लक्ष्य नियत  करें | 
  • एक परम शक्ति आपके हर कार्य में आपको दिशा निर्देशित कररही है एकाग्र होकर उसकी मंशा को समझे और अपने कर्त्तव्य के लिए सजग रहें | 
  • चिंतन करने से तपस्वी यदि ईश्वर पा सकता है  तो यह अवश्य समझ लें कि  जीवन की सफलता को भी यदि चिंतन के आधार में रखा गया तो सफलता में संदेह नहीं हो सकता | 
  • चिंतन की निरंतरता का भाव सबसे महत्वपूर्ण विषय है हमारी असफलता का एक मात्र कारण यह की हम पूरी ताकत से सोचते है  परन्तुचिंतन की  निरंतरता के अभाव में हम सब कुछ हार जाते है | 
  •  अपने लक्ष्य को  बार नहीं बदलें अन्यथा सफलता को कई जन्मों का इंतज़ार करना पड़ेगा क्योकि जैसे ही एक काम पूर्ण होने को होगा आप लक्ष्य बदल डालेंगे| 
  • चिंतन एवं लक्ष्य की नीवें स्वयं , समाज और राष्ट्र के हित  में धनात्मक हों तो आपकी सफलता  की संभावना शत प्रतिशत हो सकती है | 
  • चिंतन के समय आप किसी भी नकारात्मक व्यक्ति या कर्म के बारे में विचार न करें अन्यथा आपका सम्पूर्ण प्रयास असफल या पूर्ण सफल नहीं हो पायेगा , नकारात्मक चिंतन आपकी शक्ति निचोड़ लेता है | 
  • अपने लक्ष्य प्रयास और कर्म में सफलता और विजयी होने की भावना के अतिरिक्त कुछ नहीं होना चाहिए क्योकि सारे रिश्ते नाते और सामाजिक  ताना बाना इस बात पर निर्भर है की आप सफल हुए की नहीं | 
  • अपने लक्ष्य की आपूर्ति के प्रथम चरण में आप स्वयं खुश रहना और अपने परिवेश को खुश रखने का प्रयास  करें साथ ही यह ध्यान अवश्य रखें  कि आप एक सीमा तक ही किसी के सुख दुःख के साथी है  , अतः आप अपने समय और प्रयासों को धनात्मक रख कर अपने व्यव हार पर अंकुश लगा कर रखें|  
  • सफलता के प्रलोभनों में नहीं फंसे सफलता से पूर्व हजारों सम्बन्ध , साधन , और  शारीरिक और मानसिक आपूर्तियाँ प्रलोभन देती रहती है और मित्रों इसमें ९० % लोग उलझ कर अपनी सम्पूर्ण उपलब्धियां  शून्य करलेते है , बस आपका एकमात्र लक्ष्य यह हो की सफलता के पहले कुछ नहीं है | 




अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...