Sunday, August 3, 2014

विकास, भारतीय मूल्य और संस्कार

वर्तमान में युवा मष्तिष्क में विकास उन्नति और अपना परचम  सम्पूर्ण विश्व में फहराने की आकांक्षा बनी रहती है इसीप्रकार राष्ट्रों  होड़ मची है की वे अपने  पूर्ण विकसित करने की चेष्टा कर सकें , और हर जगह एक गाला काट प्रतियोगिता सी दिखाई दे रही है , भावना  विहीन विकास जिसमे केवल स्वयं के अलावा कुछ नहीं है , और कैसे भी विकास के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर स्वयं को साबित कर पाये , उसके लिए चाहे कुछ भी करना हो परन्तु वह विकास  उसके ही नाम होना चाहिए । अब ऐसी स्थिति में जब हर व्यक्ति अपने अपने विकास के लिए संकल्पित है सम्पूर्ण समाज में एक ऐसी स्थिति निर्मित हो गई है जहाँ केवल अपनी इच्छाएं ,अपने स्वार्थ अपनी उपलब्धियां , महत्वपूर्ण रह गई है चाहे उसके बदले समाज ,हमारे अपनों को कितना भी कष्ट क्यों न झेलना पडे । 

शिक्षा , चिंतन , तकनीकी और समाजार्थिक दृष्टी से हमने बहुत उन्नति की है सम्पूर्ण विश्व सुपर कम्यूटर के युग में खड़ा है राष्ट्रों के सुरक्षा साधन एटम बम्ब परमाणु बॉम्ब और हाइड्रोजन बोम्ब के रूप में बदल गए है । जन  उपयोग में आने वाली हर वस्तु  की मात्रा और गुणात्मक आधार और अधिक बढ़  गए है , जल थल नभ में सुरक्षा के अति विकसित साधन रक्षा क्षेत्र में खड़े हो गए है ,लोगो की कार्य क्षमता , शिक्षित और पेशेवर क्रियात्मक शिक्षा ,से युवा लाभान्वित हुआ है , जो माता पिता बच्चे को दूर के स्कूल में भेजने में डरते थे वो आज उच्च शिक्षा और काम के लिए बच्चो को हजारों किलोमीटर दूर  भेज कर विकास का लाभ ले रहे है , कहने का आशय यह की सम्पूर्ण विश्व एक विकास की दौड़ का मैदान बन गया है  और हर एक को जल्दी है की वह कैसे भी स्वयं को सिद्ध करके आगे बढ़ जाए | 

पेशेवर विकास की दौड़ में हम यह भूल गए की विकास के आधार पर खड़ा हुआ हमारा अस्तित्व स्वयं अपने लिए ही एक छलावा साबित हो रहा है ,हमे जल्दी में अपने आपके लिए और कुछ सोचने का वक्त ही नहीं रहगया है ,की हम  इस प्रगति से प्रसन्न है भी की नहीं , यहाँ कोई किसी को सम्मान , आदर , और प्रभुत्व देने  के लिए तैयार नहीं है सब यही सिद्ध करना चाहते है की वे सर्व श्रेष्ठ है , परन्तु दोस्त, बड़ा मानने के लिए भी तो एक पक्ष होना चाहिए जो आपकी सत्ता को स्वीकार  कर आपको बड़ा मान कर सम्मान दे पाये , परन्तु हमारे विकास में यही कमी रह गयी की वह दूसरों के सुख दुःख ,और उनके चिंतन से दूर केवल अपने ही स्वार्थो के चारो और लिपट कर रह  गया है जबकि हमारा विकास दूसरों के सुख का कारक होना चाहिए था | 

भारत को विश्व गुरु माना गया है यहाँ की सभ्यता में संस्कारों , संस्कृति और उसके मूल्यों को समझने की शक्ति नैसर्गिक मानी  जाती थी बाल्य  अवस्था  से  युवा अपने अपने परिवार में मूल्यों और  एक श्रेष्ठ अनुसाशन  जीता था , धर्म  मान्यताएं पहले  संस्कृति ,समाज और दूसरों को वरीयता देती थी , सम्मान आदर और समाज में स्त्री शक्ति को माँ  बहिन,  बेटी और देवी के रूप में माना गया था ,पिता माता और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान  और आदर के बड़े पदों में रखा जाता था , सत्य अहिंसा , अपरिग्रह , परमार्थ और उच्च शिक्षा जैसे गुणात्मक आधारों की नीवों में केवल परहित का भाव बना रहता था ,और यही वो भारत था जिसको विश्व  गुरु की पदवी दी गई थी | 

 भारतीय संस्कार और संस्कृति के मूल्य राजा सगर की उन  संतानों से आरम्भ समझे जिन्होंने परहित के कारण कई पीढ़ियों को बलिदान कर गंगा को आरम्भ होने का मार्ग दिया ,भारतीय सभ्यता का इतिहास गवाह है की दूसरो के हित  के कारण नानक तुलसी  बुद्ध , और ईश्वर  ने कई बार अवतार लिए है और पीड़ित मानवीयता को सहायता दी है | 

 संस्कारों एवं  मूल्यों के बिना  पेशेवर विकास वैसा ही है जैसे एक जानवर की बोटियों को चींथते पक्षी जिनका                    चरम लक्ष्य  ज्यादा से ज्यादा मांस अपने हिस्से में लेकर स्वयं को सफल सिद्ध करना होता है  जबकि उस जानवर की पीड़ा और उसका दर्द उनके लिए कोई मायने नहीं रखता |  बस हम सब भी अपने स्वार्थों में लगे है अपने संस्कारों औरपरहित भाव की अनदेखी कर रहे है  तो हम श्रेष्ठ कैसे हो सकते है | 



संतोष के स्तर का मूल्याकंन   मन को करना होता है और मन का खुश एवं दुखी होना दूसरों पर ही निर्भर होता है 
क्योकि मन धन, सम्पदा , श्रेष्ठता , निकृष्टता हीन और उत्तम   ये सब दूसरों के मानने से ही बड़े छोटे दिखाई देते है जो मन किसी के दुःख और सुख का अनुभव नहीं कर सकता वह जीवन में अपने संतोष के चरम को कभी प्राप्त नही कर सकता 

 संस्कारों एवं  मूल्यों का एकी कृत सम्मिश्रण ही वास्तविक विकास है जिसमे दीर्घ कालिक शांति  समाहित है इन तथ्यों को अपने चिंतनीय  विकास के विषयों  में शामिल करें | 
  •  हम जो भी कर्म करते है उसका सम्बन्ध तो दूसरों से होता है मगर हमारी मानसिकता में अपना ही अपना सोचना अर्थात स्वार्थ होता है यदि ये मानसिकता भी परहित का भाव लेले तो सफलता निश्चित है | 
  • मूल्यों की अनुपस्थिति से विकास का अर्थ हम अपनी धन, सम्पदा ,वैभव और चल अचल संपत्ति में तो वृद्धि कर सकते है मगर , मन  की खुराख वो आदर्श है जो आपने प्रयोग ही नहीं किये , अर्थात विष के प्याले में अमृत भरना उसे भी दूषित कर देगा | 
  • स्वानुशासन , सत्य , सहजता सरलता ,और कठिन परिश्रम के साथ परहित के भाव हेतु किया गया प्रत्येक कार्य सफल ही रहता है चाहे उसमे कुछ बाधाएं आएं या थोड़ा विलम्ब हो मगर वह मन के लिए तृप्ति कारक  ही होगा 
  • विकास में वेदोक्त ,पृथक २ धर्म के अनुशासन  के आधारों को भी ध्यान रखना आपको सफलता के साथ अनेक प्रकार की प्रसन्नता दे सकता है | 
  • प्रकृति का एक नियम यह भी है की वह अपने आप पर उधारी नहीं रखती आप जितना अधिक परहित में कार्य करेंगे आपको उतनी ही अधिक प्रसन्नता अपने आप से होगी | 
  • विकास बहुत आवश्यक है मगर उसके लिए भी एक नियत अनुशासन अवश्य चाहिए यदि अनियंत्रित विकास स्वार्थों में हुआ तो वह स्वयं को ही नष्ट कर देगा | 
  • वर्तमान पाश्चात्य देशों की तर्ज पर होने वाला विकास समाज को हिंसात्मक प्रवृति की और धक्का दे रहा है जबकि उससे पैदा हुआ असंतोष घोर हिंसा , आत्महत्या और राष्ट्र को आतंकी गतिविधियों की और मोड़ रहा है | 
  • मन को एकाग्र करके अपने उद्देश्य और कर्म को पूजा समझ कर करने वाली संस्कृति है भारत और हमें अपने धर्म मूल्यों के अनुसार ही कर्म को सम्पादित करना  चाहिए। 
  • सबको आदर सम्मान , और सहायता दें यह मान कर चलें की आपको ईश्वर ने आपकी मानसिकता एवं इन्ही गुणों के कारण सफल बनाया है  


Sunday, July 20, 2014

प्रचंड युवा शक्ति के ज्ञान को संस्कार दो

प्राचीन काल में  हिमालय की तराई में एक राजा राज्य करता था , स्वाभाव से वह बड़ा क्रूर ,अजेय और क्रोधी था उसके स्वाभाव गत गुणों में चापलूसी ,हत्या ,फांसी , दूसरे की धन सम्पति , अश्व, स्त्रियां,बच्चों का अपहरण करना दूसरे की पीड़ा में प्रसन्न होना और तरह तरह की यातनाओं से प्रजा को परेशान करना उसका स्वाभाव बन गया था | राजा की सैन्यशक्ति और हथियारों के सामने कोई राजा सिर नहीं उठा सकता था।,उसी राज्य में  एक सिद्ध तपस्वी भी निवास करते थे  यदा कदा  हिमालय से उतर   कर अपने आश्रम में आजाते थे , राजा ने उनका बहुत नाम सुना था उसने अपने मंत्री से कहा की तीनों राजकुमारों को वो  ही शिक्षा  देगा ,तपस्वी को पकड़ कर लाया गया और बताया की तुम्हे तीन राज कुमारों को शिक्षा देनी है  सोचा  कि ईश्वर मानवता की भलाई के लिए मुझसे सहयोग  मांग रहे है चलो यही सही ,तीनों तपस्वी ने राजकुमारों को राज महल जैसी सुख सुविधाओं में रखा , शिक्षा में मन  न लगने पर उनकी रूचि अनुसार कार्य  दिया , उनके अनुसाशन को राजा के कहे अनुसार शिथिल कर दिया गया और  धीरे धीरे तपस्वी  ने  उन्हें , अमोघ शस्त्रों से सुसज्जित  कर दिया परन्तु  दया, धर्म , संस्कार , सत्य , आदर और मानवीयता के सम्पूर्ण गुण धर्म उन्हें रुचिकर ही नहीं लगे जिससे वो उन्हें सीख पाते ।  और  एक दिन अमोघ  शस्त्रों  की होड़ में तीनों राज कुमारों ने राज्य पर हमला कर दिया क्योकि मानवीयता के गुण सम्मान  आदर औरमानवीयता के गुण उन्होंने सीखे ही नही थे , इसी प्रकार राजा राजकुमार सब अमोघ शस्त्रों से  राज्य के लालच में मारे गए , तपस्वी ने राजा के एक  सत्यनिष्ठ मंत्री को राज्य सौपा और वह पुनः हिमालय चला गया |
संस्कारों और आदर्शों के बिना अजेय और अमोघ शक्तियां भी वैसी ही मालूम होती है जैसे किसी बड़े बम से पिन निकालने की चेष्टा करता कोई अबोध शिशु 
 सम्पूर्ण विश्व आज भारत की सबसे अधिक युवाओं की शक्ति ,  देख कर हतप्रभ है  कि एक प्रगति शील देश विज्ञान , शिक्षा , ज्ञान , विकास , और तकनीकी क्रान्ति के क्षेत्र में अग्रणीय पक्ति में खड़ा हो गया है , कम्यूटर,  क्रान्ति , जीवन निर्वाह के  सम्पूर्ण उत्पादों , तकनीकी ज्ञान के प्रत्येक आयाम पर भारत ने अपना  लहरा  दिया है ।दोस्तों ज्ञान , शक्ति,धन वैभव और अमोघ  विनाशकारी   शस्त्र  केवल विनाश जानते है उनमे अपना पराया होता ही  कहां  है । अति ज्ञान , शक्ति और अमोघ शस्त्र  एक अबोध या अत्याचारी के हाथ में देने का आशय है विनाश ,और कमोवेश  हम भी उसी विनाश पथ पर जाने को लड़खड़ा रहे है ।

जिस ज्ञान और बल से विनम्रता ,मानवहित , धर्म , अहिंसा और परमार्थ की भावना और संस्कार  न जुड़े हो तो वह शक्ति स्वयं अपने स्वामी  को समाप्त कर देती है , सत्य ,अहिंसा, अपरिग्रह ,और परहित के समर्पण  को जीने वाले को प्रकृति गुण संपन्न समझ कर इतिहास के सुनहरी पन्नों में संजों  देती  है यही उच्चतम मानवीय गुण  भी माने  जाते हैं । 


आज जब हम सब लोग विकास संस्कृति और सर्वांगीण  परिवर्तन की  दौड़ में आगे आने  कोशिश कररहे है तब ध्यान यह रहे  कि हम विकास का  सही   अर्थ अवश्य समझे ,यदि समाज  राष्ट्र और हमारे पूर्ण परिवेश का सही अर्थों में विकास न हुआ तो हम स्वयं को पूर्ण सिद्ध नहीं कर पाएंगे , अभी हम अपने नियत लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाये है , आज जब हम विकास की बात करते है तो  तो व्यक्तिगत स्तर पर आकलन किये जाने लगते है और व्यक्तिगत आकलन का समाज और धर्म की दृष्टी से कोई मूल्य ही नहीं होता , हम पशु वत आधारों पर जीने की इस कला को पूर्ण नहीं मान सकते जब तक वह स्वयं से समाज कओ पोषित करने का माध्यम न बन जाए |


भारत विश्व गुरु की पदवी पर इस  आसीन हुआ कि यहाँ सनातन की परंपरा में सर्व  धर्म संभाव का मूल मंत्र निहित था यहाँ की संस्कृति ने धर्म का आशय यह बताया कि सः धारयते इति  धर्मः  अर्थात जो सबके धारण करने योग्य था वो धर्म था , भारत  की धर्म व्यवस्था इतनी विशाल है जिसमे अनेक संस्कृति अनेक धर्म और पुरानी गूढ़ परम्पराएँ अन्तर्निहित है , गीता का वैराग्य , रामायण  की मर्यादाएं , भागवत महापुराण का निश्छल प्रेम , कुरआन शरीफ की गहन आयतें गुरुग्रंथ साहेब की चेतावनियां और उपदेश बाइबल की जीवन शैली और ऐसे ही अनेक पुराण उपनिषद और हजारों स्थानीय आदर्श ग्रन्थ भारत की विश्व गुरु परंपरा  की एक छोटी सी बानगी भर है | जो यह बताते है कि जीवन में कोई भी विकास यदि संस्कारों और आदर्शो के साथ हो तभी श्रेष्ठ साबित हो सकता है ,

एक और ज्ञान और दूसरी और धर्म मान्यताएं और मर्यादाएं यदि इनका उचित सामंजस्य हो जाए तो भारत एक बार फिर विश्व गुरु की पदवी  पर स्वयं को प्रतिस्थापित करसकेगा , विकास के साथ निम्न  का ध्यान अवश्य रखें


  • शिक्षा , ज्ञान अर्जन के साथ पारिवारिक , सामाजिक , और राष्ट्रीय भावनाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए क्योकि यही हमारी असली पहिचान है | 
  • विकास के साथ रिश्तों की गरिमा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए , और सबको यथोचित सम्मान अवश्य दें क्योकि हम जो दे रहे है  वही कई गुना होकर हमे मिलेगा यही सोचें | 
  • हमारे व्यवहार और कार्यों से दूसरों को कोई कष्ट न पहुंचे , क्योकि यदि हमारा व्यवहार  लिए दुःख का विषय बना तो हमे भी उसकी नकारात्मकता उठानी होगी 
  • ध्यान रहे कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं हैअतैव दूसरे की आलोचनाओं से अपने आपको बचाएं क्योकि यदि आप स्वयं को ऐसी आलोचनाओं से न बचा पाये तो आपका व्यक्तित्व भी नकारात्मक होने लगेगा । 
  • आप यह याद रखें की आपका हर समय आकलन किया जारहा है और आप इस दृष्टा भाव को देखते रहें तो आप स्वयं का आकलन करके उसमे सुधार कर सकते है । 
  • एक परम शक्ति शाली परमेश्वर आपको प्रत्येक पल अपनी ऊर्जा प्रदान कर रहा है अपनी चेतना को पूर्ण शक्ति से उसकी और लगा कर हम स्वयं में जैसा चाहे वैसा परिवर्तन ला सकते है | 
  • माता, पिता ,गुरु , अपने शरीर और आत्मा के प्रति आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते और आपको इस सेवा से  सुख, श्रेष्ठ कार्य संतोष ,संतान, आय, पराक्रम , तथा बल ,शौर्य , निरोगी काया और शांति एकाग्रता और शून्यता प्राप्त होगी यही धर्म का मूल भी है । 
  • अपने संस्कारों आदर्शों को जीवन में थामे रखे ध्यान रखे  कि इन्हीं के सहारे आपको जीवन की परम शान्ति प्राप्त हो सकेगी क्योकि आदमी का अंतिम लक्ष्य परम शान्ति की और ही है | 
  • घ्यान विज्ञान और संस्कारों और आदर्शों के चयन में आप पूर्ण भाव से दूसरों के हितार्थ लक्ष्य तय करें क्योकि यह तो ऐसा सौदा है जो बिना मोल भाव किये आपको असंख्यों उपलब्धियां देगा | 








Sunday, July 13, 2014

स्वयं का साक्षात्कार

एक बहुत बड़े संत ने अपने शिष्यों  से पूछा तुमने आज तक कैसा जीवन जिया है ,और तुम संसार और जीवन को क्या समझते हो, शिष्य सुनते  रहे  फिरप्रथम शिष्य  बोला   गुरुदेव  मैं एक करोड़ पति पिता का पुत्र था ,और जीवन के हर ऐशो आराम को जीवन  मायने समझ कर जिया हूँ, मैंने संसार को शराब अय्याशी और क्लबों के शोर में देखा है , और हर ऐशो आराम की वस्तुओं का  मैं  ढेर बन  गया था मेरे अपनों ने ही मेरी संपत्ति शांति सब कुछ लूट ली  है मुझसे | दूसरे शिष्य ने कहा गुरुदेव दुनिया में आभाव है गरीबी है धोखा है और मैंने बड़ी मुश्किल से जीवन यापन किया है जीवन मेरे लिए निराशा है ,और विपत्ति काल में कोई अपना होता ही  कहां है ,तीसरे शिष्य ने कहा  गुरुदेव मैंने शिक्षा , ज्ञान ,शास्त्रों के अम्बार लगा दिए और हजारों ग्रंथों के ज्ञान के बाद मैं सशंकित हो गया हूँ की वास्तव में जीवन  और संसार और उसका नियंता है भी या नहीं , मैं  जीवन के इस बिंदु पर स्वयं अनजान और अबूझी पहेली सा समझ  रहा हूँ | 
 लम्बे मौन के बाद गुरु ने  कहा  बेटा एक पर साधन थे वो अपने साधनों के लुटे जाने पर परेशान है , दूसरे पर साधन नहीं है वो उनके न होने पर परेशान है ,और तीसरा ज्ञान और शिक्षा के उच्चतम शिखर पर भी अनजान और ठगा हुआ सा खड़ा है अर्थात  और संतोष की स्थिति में कोई नहीं है | क्योकि हमने जीवन , संसार , रिश्तों और साधनों की व्याख्या तो की मगर हम अपना मूल्यांकन करना भूल गए की हम संसार   के लिए कैसे उपयोगी है , और जीवन भी हमे वही देगा जो हम उसे दे रहे है | जिस जीवन में स्वयं को आत्मसात करने का  गुण नहीं है वह अपनी अंतरात्मा की कामनाओं को ही नहीं समझ पाता  परिणाम हमारी हर उपलब्धि व्यर्थ सी दिखाई देने लगती है । 

हम संसार में  साधनों ,सम्बन्ध , ज्ञान और दुनियां की हर विषय वस्तु का तत्काल मूल्यांकन कर देते है और जब जब अपना खुद का मोबाईल डायल करते है हम  स्वयं को व्यस्त पाते है और इसी तरह सम्पूर्ण जीवन निकल जाता है ,हम अपनी अंतरात्मा से यह कभी नही पूछ पाते की हमे चाहिए क्या इसलिए दुनिया भर की उपलब्धियों के बाद भी हम खाली ,निराश और लाचार ही बने रहते है क्योकि जबतक हम स्वयं से साक्षात्कार नहीं करेंगे तब तक हम हाशियों  पर पड़े हुए जीवन को सफलता नहीं दे पाएंगे अतः जीवन में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है की आप अपने आपसे परामर्श कर यह तय करें कि आप संसार , जीवन , और मानवता के लिए कहां तक उपयोगी है जिस दिन यह साक्षात्कार पूर्ण होगया जीवन स्वयं आपको फर्श से अर्श पर पहुंचा देगा । 

तीनो शिष्यों की भूल भी यही थी एक साधन संपन्न रहा ,एक अभावों में रहा और तीसरा ज्ञान की पर काष्ठा पर रहा मगर जीवन और संसार को समझ ही नही पाये क्योकि अपने स्वयं को समझने से पहले संसार और जीवन को समझना असंभव है और हम सब भी वही गलतियां कर रहे है , जो उन तपस्वी शिष्यों ने की थी स्वयं को जानने से पहले  हम कुछ समझ ही नही सकते और हम हर उपलब्धि के बाद समाज परिवार और परिवेश से प्रसंशा की कामना अवश्य करते है जबकि हमारी अंतरात्मा की प्रसंशा ही सच्ची प्रसंशा है यह भूल जाते है 

 मैं ढूढ़ता रहा  था खुद अपने आपको ही , जीवन के लम्बे समय तक मुझे अपने लिए समय ही नहीं मिल पाया परन्तु यही सोचता रहा कि  मेरी उपलब्धियां , संसार की झूठी प्रसंशा और मेरी साधन , ज्ञान और सांसारिक आपूर्तियाँ , ये सब मेरे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए आवश्यक है , दोस्तों क्या हमे ऐसा नहीं लगता की हमारी सारी क्रियाएँ , प्राप्तियां और संतोष का आधार दूसरों पर आधारित होकर रह गया है ,हमको बड़ा कहने वाले होने चाहिए तब हम बड़े हो पाएंगे , दिखाने के लिए साधनों  का ढेर होना चाहिए और उसे लोग बहुत बड़ा माने , इसी प्रकार धन, संतान, रूप, सौंदर्य, पद , ज्ञान और भी बहुत सी उपलब्धियां दूसरों को बता कर ही हम संतोष पाना  चाहते है  जबकि यहाँ एक  कटु सत्य यह है की हमारे समाज मे दूसरों की उपलब्धियों से प्रसन्न और संतुष्ट होने वाले है ही नही , वे तो दूसरों को समस्या से घिरे  हुए और सहानुभूति का पात्र बना देखना चाहते है जबकि हमारी उपलब्धियों पर सही निर्णय देने वाला हमारा मन मष्तिष्क हमारे व्यवहार से छुब्ध  और उपेक्षित ही पड़ा रहता है । 


  • आपकी अंतरात्मा आपके हर कार्य को दिशा देती है , वह आपको बार बार यह प्रेरित करती है की आप धनात्मक रहें और उसके निर्णयों का पूर्ण ध्यान रखें । 
  • हम यह अवश्य सोचें की हम अपने क्रियान्वयन में कहाँ नकारात्मक हो रहें है और उसका प्रभाव सबसे ज्यादा क्या ख़राब हो सकता है , और हम उसमे कैसे सुधार कर सकते है । 
  • प्रति दिन ५ ---- १० मिनट ध्यान अवश्य करें इसने आपका मानसिक विचलन , उतावलापन और क्रोध इन सब स्थितियों में सुधार होगा । 
  • हर समस्या के समाधान को  हूँ केयर्स कह कर नहीं  छोड़ें क्योकि जीवन सूर्य चन्द्रमा और प्रकृति यह शब्द नहीं दोहरा सकती है अतः आप पूर्ण मनोयोग से चिंतन कर समाधान निकालें | 
  • आपकी सारी उपलब्धियां आपके स्वयं के लिए है और इन उपलब्धियों से आपको और आपकी आत्मा को संतोष होनाचाहिए आप इन उपलब्धियों से दूसरों को छोटा बनाने का प्रयत्न न करें । 
  • प्रकृति , ईश्वर , और अंतरात्मा इन तीनों के सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करें इन तीनों में एक विशेषता है की ये दूसरों के लिए ही कार्य करते है ,  आत्मा मनुष्य , शरीर और इच्छाओं के लिए प्रकृति ईश्वर संसार के हिट के लिए , हमें भी  वही  मूल विशेषतायें ध्यान रखनी है ।
  • जीवन के संवादों में सबसे बड़ा महत्वपूर्ण  संवाद है स्वयं अपने आपसे  किया हुआ संवाद और यहीं जीवन को पूर्ण गति भी देता है जीवन की हर समस्या और क्रियान्वयन के लिए आत्मा से सतत सवाद की आवश्यकता है यही इंसान को आदर्शों का इतिहास बना देता है एक बार प्रयत्न करें समय, प्रकृति सब आपका साथ देने को एक साथ खड़ी हो जाएंगी और आप स्वयं सर्वश्रेष्ठ साबित होंगे । 





Sunday, June 29, 2014

सफलता का सशक्त साधन है चिंतन

एक समय तीन तपस्वी गहन तपस्या में  लीन थे   तभी  एक ईश्वर का दूत वह से गुजरा उसे  पहले सन्यासी ने प्रणाम करउससे प्रार्थना की कि कृपया आप ईश्वर से यह पूछना की वो मुझे कब मिलेंगे कई वर्ष होगये है मुझे ,इसी प्रकार तीनों सन्यासियों ने उस दूत से प्रार्थना की कि एकबार आप पूछ कर अवश्य बताना  कि  ईश्वर हमें कब मिलेंगे ,थोड़े समय बाद वह दूत लौटा और उसने पहले सन्यासी को बताया कि ईश्वर ने कहा है वोआपको १००  वर्ष बाद मिलेंगे ,दूसरे को बताया की आपको वे ५० वर्ष बाद मिलेंगे और तीसरे को उसने बताया की आप जिस पीपल वृक्ष के नीचे तपस्या कररहे है उसके जितने पत्ते हों उतने ही वर्षों बाद ईश्वर आपको दर्शन देंगे | पहले और दूसरे सन्यासी ने यह तय किया जब ईश्वर ५० और १०० वर्ष बाद ही मिलाने है तो  अविधि पूरी होने के एक वर्ष पहले आकर फिर तपस्या करलेंगे ये सोच कर वे दोनो अपनी भोग भरी जिंदगी में लौट गए | तीसरे सन्यासी ने ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद दिया और यह सोच कर और गहरी साधना में जुट गया की अबतो यह निश्चित हो ही गया है की उसे उसके आराध्या अवश्य मिलेंगे ,दोस्तों उसी समय ईश्वर प्रकट होकर उसके सामने आगये अर्थात वह पूर्ण सफल होगया | 

जीवन में भी हम हजारों कामनाएं लिए भागे जारहे है एक चीज पूरी हो नही  पाती दूसरी के लिए परेशान होने लगते है और जीत हार हार , हार और फिर जीत कहने का आशय यह कि  जीवन में जीत कम हार अधिक होने लगती है क्योकि हम चाहते बहुत कुछ है परन्तु प्राप्ति के बाद उसका सुख को भी नहीं जी पाते जिसके लिए हमने एड़ी छोटी का जोर लगाकर सारी शांती नष्ट कर दी थी ,और जो कामनाये हम चाहते है उनके चिंतन और धनात्मक सोच के लिए हम पर समय ही नहीं है दोस्तों हम उन पहले और दूसरे सन्यासियों जैसे है जिन्हे लक्ष्य बनाने , बदलने , और  छोड़ने ,में जरा भी समय नहीं लगता परिणाम यह की हम जीवन भर उपलब्धियों से हारते चले जाते है और अपने को भाग्यको ,और ईश्वर को दोष देते रहते है ,जबकि इन सबके लिए हम और हमारा चिंतन ही दोषी है | 

मूल लक्ष्य  को पाने के लिए हजारों छोटे छोटे चरणों  की पूर्ती भी की जानी होती है और उनके लिए संकल्प एवं सशक्त चिंतन की आवश्यकता अवश्य पड़ती है और यह चिंतन निरंतरता के साथ बना रहता है तो सफलता की निश्चितता सामने दिखाई देने लगती है ,परन्तु हम तात्कालिक लाभों और शारीरिक मानसिक प्राप्तियों के लिए वो सौदे करजाते है जिनका मूल्य ही नहीं जानते हम ,दोस्तों जीवन की तमाम सफलताएं आपके चिंतन और क्रियान्वयन से बंधी है ,प्रथम और द्वतीय सन्यासी हम जैसे है वो अपने लक्ष्य , साधना ,क्रियान्वयन के प्रति  अकर्मण्य भाव रखते है और फिर देखेंगे , फिर सही इन्ही बातों में जीवन निकाल कर स्वयं को दोष देते रहते है जबकि तीसरा सन्यासी इस बात से प्रसन्न हो जाता है की मेरी दिशा और क्रियान्वयन सही है  बस  लक्ष्य थोड़ा दूर है मैं  पहुँच  अवश्य जाऊँगा यह भाव  सर्वोपरि  है ,यही कर्म गीता का सार भी है | 



सफलता संकल्प और चिंतन की दासी है ,परन्तु सफलता अपने चारों और अनेकों प्रलोभन रखती है वह अपने आप तक सबको पहुँचाने ही नहीं देती उसके प्रलोभनों में सामाजिक सम्बन्ध ,शारीरिक मानसिक आपूर्तियाँ , साधनों का आकर्षण , समाज में अपनी पहिचान के शॉर्टकट , कैसे भी काम निकालने की तकनीक , और अत्याचार झूठ फरेब और अनाचार से  जीता हुआ जीवन , ये सब सफलता के प्रलोभन है दोस्तों जो इन प्रलोभनों से बच कर पूर्ण चिंतन  और क्रियान्वयन के साथ अपने लक्ष्य  पर चलता रहा उसे सफलता  अवश्य  मिलेगी इसमें कोई संदेह नहीं है , 

सफलता के  चिंतन के लिए निम्न प्रयोग अवश्य करें 


  • लक्ष्य का निर्धारण बहुत चिंतन के बाद करें तथा सबके विचार परामर्श सुनें और फिर अपनी योग्यता और शक्ति का ध्यान रख कर लक्ष्य नियत  करें | 
  • एक परम शक्ति आपके हर कार्य में आपको दिशा निर्देशित कररही है एकाग्र होकर उसकी मंशा को समझे और अपने कर्त्तव्य के लिए सजग रहें | 
  • चिंतन करने से तपस्वी यदि ईश्वर पा सकता है  तो यह अवश्य समझ लें कि  जीवन की सफलता को भी यदि चिंतन के आधार में रखा गया तो सफलता में संदेह नहीं हो सकता | 
  • चिंतन की निरंतरता का भाव सबसे महत्वपूर्ण विषय है हमारी असफलता का एक मात्र कारण यह की हम पूरी ताकत से सोचते है  परन्तुचिंतन की  निरंतरता के अभाव में हम सब कुछ हार जाते है | 
  •  अपने लक्ष्य को  बार नहीं बदलें अन्यथा सफलता को कई जन्मों का इंतज़ार करना पड़ेगा क्योकि जैसे ही एक काम पूर्ण होने को होगा आप लक्ष्य बदल डालेंगे| 
  • चिंतन एवं लक्ष्य की नीवें स्वयं , समाज और राष्ट्र के हित  में धनात्मक हों तो आपकी सफलता  की संभावना शत प्रतिशत हो सकती है | 
  • चिंतन के समय आप किसी भी नकारात्मक व्यक्ति या कर्म के बारे में विचार न करें अन्यथा आपका सम्पूर्ण प्रयास असफल या पूर्ण सफल नहीं हो पायेगा , नकारात्मक चिंतन आपकी शक्ति निचोड़ लेता है | 
  • अपने लक्ष्य प्रयास और कर्म में सफलता और विजयी होने की भावना के अतिरिक्त कुछ नहीं होना चाहिए क्योकि सारे रिश्ते नाते और सामाजिक  ताना बाना इस बात पर निर्भर है की आप सफल हुए की नहीं | 
  • अपने लक्ष्य की आपूर्ति के प्रथम चरण में आप स्वयं खुश रहना और अपने परिवेश को खुश रखने का प्रयास  करें साथ ही यह ध्यान अवश्य रखें  कि आप एक सीमा तक ही किसी के सुख दुःख के साथी है  , अतः आप अपने समय और प्रयासों को धनात्मक रख कर अपने व्यव हार पर अंकुश लगा कर रखें|  
  • सफलता के प्रलोभनों में नहीं फंसे सफलता से पूर्व हजारों सम्बन्ध , साधन , और  शारीरिक और मानसिक आपूर्तियाँ प्रलोभन देती रहती है और मित्रों इसमें ९० % लोग उलझ कर अपनी सम्पूर्ण उपलब्धियां  शून्य करलेते है , बस आपका एकमात्र लक्ष्य यह हो की सफलता के पहले कुछ नहीं है | 




Sunday, May 25, 2014

संकल्प की साधना ही सफलता है (worship of aim)


जीवन बहुत सरल और अत्यधिक कठिन हो  सकता है ,यहां हर आदमी बहुत जल्दी में  है, और भागता जा रहा है| उसकी इच्छाएं बढ़तीजारही है ,जीवन के आंकलन धुंधलें होते जारहे है ,और बार बार की निराशाओं से तंग आकर वह स्वयं को दोषारोपित करने लगा है ,परिणाम यह है की उसने स्वयं अपनी जटिलताएं इस रूप में बढ़। ली है जहाँ  वह स्वयं अपने हीबनाये  चक्रव्ह्यू में फंस गया है | परिवार ,समाज , मित्रों ,और सम्पूर्ण दुनियां में उसका स्थान कहाँ है यह देखने के चक्कर में उसने तमाम तरह की नकारात्मकताएं पैदा कर ली है ,जो उसके भविष्य  की उन्नति के लिए अधिक बाधक बनी रहती है | 

दोस्तों  प्रकृति का एक सिद्धांत है की वह हर काम सब्र से समय ,मर्यादा और कार्यके समाप्त होने के समय का  निर्धारण करके करती है ,उसे उसके कार्यों की तीव्रता और उसके  सामायिक महत्व के बारे में पूर्ण ज्ञानहोता है , धूप।, हवा ,पानी, हिमस्खलन , उर्वरक मिट्टी एवं शून्यता  का सामंजस्य बना कर ही चलती है ,उसका सामंजस्य टूटते ही भयानक आपदाएं आजाती है , चद्रमा की पूर्णता (पूर्णिमा )सूर्य का जल शोषण और बहुत सी स्थितियां समुद्र को ज्वार भाटे  ,शांति और गरूत्वाकर्षण को प्रभावत करती रहती है , ध्यान रहे की इंसान में भी नमक ,और जल का अनुपात कमोवेश वैसा  है जैसा समुद्र का ,तो स्वाभाविक है इंसान का  मन मष्तिष्क भी इन परिवर्तनों से अछुता नही रह सकता | उसमे भीउसी प्रकार परिवर्तन उत्साह निराशा और शून्यता का अनुभव होता ही रहता है । 

समस्याएँ ,समय और  नई  नई चिनौतियां आदमी को हर पल उठानी ही होती है और इन्हीं से संघर्ष कर आदमी संसार में स्वयं को स्थापित करपाता है ,जब हर स्थिति समय और प्रकृति ही सशक्त  है तो हमारे पास क्या है ?दोस्तों हमारे पास है संकल्प कर्त्तव्य और कठिन परिश्रम एवं  सोच और ये ही ऐसी शक्तियां है जिनसे इतिहास लिखे है मनुष्यों ने ,विवेकानन्द का रामकृष्ण , सुकरात  ,ईसा ,मोहोम्मद और नानक  को देवता बनाने वाले और कोई नहीं उनके संकल्प ही थे , मित्रों संकल्प की साधना ही वस्तुतः सफलता का नाम है ,जब हम अपनी संकल्प शक्ति को छोड़ देते है तो हम केवल तात्कालिक विषय वस्तुओं से संतुष्ट दुखी और अकर्मण्य बने बैठे रहते है ,और इस समय हमारी सोच केवल यह 
रहती है  कि हमे क्या अच्छा लग रहा है ,
इसमे एक तथ्य यह भी है कि हमारी शारीरिक कमजोरियां हमारे मन मष्तिष्क पर हावी हो बैठती है और  मन मष्तिष्क से अति आवश्यक कार्य भी हमे कार्य  प्रेरणा नहीं दे पाते अर्थात मन और मष्तिष्क पर शारीरिक कमजोरियों का साम्राज्य हो जाता है और यहीं से पैदा होती  सारी समस्याएं , आलस्य और अकर्मण्यता । 

सारतः यह  कि   जीवन में आगे बढ़ते हुए मनुष्य के के लिए आवश्यक है की वह अपनी नकारत्मकताओं पर अंकुश 
लगाना सीखें , जिसके लिए निम्नांकित को जरूर अपनाएँ । 

  • स्वयं को एक निश्चित योजना में बांधें और उसके पूर्ण करने हेतु क्या क्या कदम उठाने है यह निश्चित करें तथा उन्हें क्रियान्वित करने का तरीका तय करें । 
  • मन और मष्तिष्क के सामंजस्य से यह तय करें कि आपक्या करना चाहते है और उसमें शारीरिक अक्षमताएं पैदा न होने दें ,ध्यान रहे  की शरीर एवं मन को नियंत्रित और बंधन में रखें । 
  • स्वयं अपने संकल्प बनाएं और पूर्ण निष्ठां से उसे वैचारिकता का आधार बनाये उसे छोटे छोटे भागोंमें बाँट कर उन्हें पूर्ण करने का निश्चय करें । 
  • संकल्पों को नियत समय के आधार पर पूर्ण करने का प्रयत्न करें यदि समयके आधार पर आपके संकल्प सही  नहीं हो पाये तो निश्चिततः आपको लाभ नहीं मिल पायेगा । 
  •  शरीर को मन और मष्तिष्क के आधीन ही रखना चाहिए ,   क्योकि  शरीर की आपूर्तियाँ और पोषण तो अति आवश्यक है मगर केवल शारीरिक सुख के लिए हर कार्य छोड़ देना यह पतन का मार्ग है । 
  • कार्य और संकल्प की  पूर्ती के समय यदि कोई  बाधा उत्पन्न होती है तो उसे धैर्य से पूर्ण करने का प्रयत्न करें क्योकि अति आवेश और नैराश्य में सामान्य हल भी समझ नहीं आपाता है । 
  • अपने संकल्प को उस परमशक्तिमान को सौंप  कर कार्य करें  साथ ही  यह प्रार्थना करें कि  मै  आपके दिए हुए मार्ग  में आपकी क्रियान्वयता से कार्य में लगा हूँ आप  इसका निरीक्षण  करते रहिये ,आपका कार्य सफल ही होगा यह विचार करते  रहिये। 
  • संकल्प की साधना या उसके चिंतन और क्रियान्वयन में आपको सामंजस्य की आवश्यकता है आपको यह चाहिए की आप समय कार्य और निरंतरता का मन बना कर कार्य करते रहिये । 
  • अपने संकल्प पर दोनो समय पूर्ण मनोयोग से चिंतन करे और यह भी विचार करें की मैने उसके लिए आज क्या कर सका हूँऔर कल क्या नया और अच्छा कर सकता हूँ । 



Sunday, May 18, 2014

गुणवत्ता पूर्ण जीवन और लक्ष्य (क्वालिटी लाइफ एंड ऑब्जेक्ट )

हम सब जीवन से बहुत कुछ चाहते है --  सफलता  ,नाम , पैसा , अधिकार , सत्ता , प्रेम , सौहार्द , और भी बहुत कुछ कहने का आशय यह की हर सबसे ऊँचे बिंदु पर पहुचने की कल्पना हमारे मन मष्तिष्क में  बनी  रहती  है और यदि कही हम ये सब प्राप्त नहीं कर पाते तो हमे अपने आपसे कष्ट निराशा और क्षोभ होने लगता है , हर बात में अपने आपको दोष देना, अपने को तिरस्कृत समझना , और अपने कर्म को अति श्रेष्ठ समझ कर उसमे परिवर्तन के सारे रा स्ते बंद कर देना यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है, और हम भी सामान्य आदमी बने खुश , दुखी और सामान्य सोच के साथ पैदा  होने और मरने के  क्रम में अपनी बारी का इन्तजार कर रहे होते  है ,एक कर्त्तव्यहीन ,पराश्रित , और कृतघ्न की तरह जिसे यह भी ध्यान नहीं है की उस ईश्वर, गॉड , मालिक , या अल्लाह ने  अपनी श्रेष्ठ कृति के रूप में पैदा किया है और हम सबको यही सिद्ध करना है की हम उस सर्वशक्ति मान की श्रेष्ठतम कृति है |

दोस्तों जीवन गुणात्मक आधार वाला होना चाहिए और हर व्यक्ति में उस सर्वशक्तिमान में वह शक्ति दी है  जिससे वह अपने आपको सिद्ध कर सकता है ,जीवन का  उद्भव स्वयं एक परीक्षा है जिसमे आपको अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध  करनी है , आपके पास बहुत से शॉर्टकट (कैसे भी सफल होने के मार्ग)है और जीवन  में झूठ , मक्कारी, धोखा , बेईमानी , लालच , और कैसे भी अपना काम निकलने के नकारात्मक उपाय और किसी भी नीचता तक जाने के बाद काम में सफल होने की कला हो सकती है ,मगर ध्यान रहे  आप जिस जीवन के लिए ऐसी सफलता के लिए चुन बैठे है वो जीवन आपको एक दिन तिरस्कृत कर डालेगा और इस सफलता के लिए आपको दोष देता रहेगा  क्योकि आदमी स्वयं से झूठ बोल ही नही पाता  है ,लाख कोशिशों के बाद भी अपने दुष्कर्मों से वह स्वयं मुक्त नहीं हो पाता | इसके विपरीत आपका जन्म एक निश्चित उद्देश्य के लिए हुआ है और उसकी प्राप्ति में आपको अनगिनत स्थानों पर आपको सर्वश्रेष्ठ साबित करना है वह भी सत्य ,दया कठिन परिश्रम ,परमार्थ ,और पूर्ण निष्ठां के साथ आपका भाव वही होना चाहिए कि  आप प्रकृति की भांति , ईश्वरीय गुणों की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित है , एक दिन आप अपने उस महा लक्ष्य पर जरूर पहुँच कर स्वयं को सिद्ध कर पाएंगे |

हम जो कुछ भी पैदा कररहे है वह हमारे जीवन का अंग बनकर हमारे साथ रहने वाला है और उसमे सबसे अधिक
महत्व पूर्ण सत्य यह है की हम जिस तरीके से अपना लक्ष्य प्राप्त कररहे है उसका गहरा प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ने वाला है गुणवत्ता पूर्ण जीवन का अंतिम लक्ष्य संसार को सुख शांति और सौहार्द के उपहारों के लिए अंतिम छण  तक संघर्ष करना और मानवता को सुखी करने का प्रयत्न करना  रहा हैं ,दूसरी और संसारके महान कहलाने वाले बर्बर शासकों  की उपलब्धियां और इतिहास देखें आपको मालूम पड़  जाएगा की आप जीवन  गुणात्मकता की बात कर रहे है बस वाही नहीं थी इन शासकों में और इतिहास उनके जीवन को एक  बदनुमां  धब्बा मान कर याद करता है ,जबकि
हजारों लाखों वैज्ञानिक ,नेताओं  सामाजिक ,धार्मिक प्रवर्तकों ने अपना जीवन अपने निहित  लक्ष्यों के साथ पूर्ण किया उन्हें आज का इतिहास मानवीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ मानव के रूप में याद करता है , दोस्तों हमे  उस गुणात्मक जीवन  आवश्यकता है जो हमारे कार्यों पर हमारे देश , समाज और सम्पूर्ण विश्वको गर्व का अनुभव करा सके |


जीवन की गुणवत्ता के लिए निम्न का प्रयोग करके अवश्य देखें |

  • स्वयं को एकाग्र चित्त करना सीखें जबतक आप पूर्ण एकाग्र चित्त  नहीं हो पाएंगे तब तक आप अपने मुख्या लक्ष्य  तक नहीं पहुँच पाएंगे , बार बार लक्ष्य बदलने होंगें | 
  • मन और शरीर को एक नियत सीमा तक ही खुला छोड़े ,मन और शरीर की स्वतंत्रता आपके दैनिक संकल्पों का अतिकृमण नहीं करें अन्यथा आपका  सफलता का  मार्ग  प्रशस्त  नहीं हो पायेगा | 
  • जीवन को अपने दैनिक प्राप्त समय के हिसाब से बाँध कर रखें ,ध्यान रखे की समय बद्ध योजना के आभाव में आप दिशा भ्रमित हो जावेंगे | 
  • अपने जीवन को गुणात्मक आधारों पर बनाये रखें , सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह , प्रेम , सौहार्द , धैर्य , अक्रोध ,और सबको दया करुणा और सर्वहिताय का चिंतन अपने कार्यों में अवश्य करें | 
  • एक सर्व  शक्ति मान  आपके हर धनात्मक कार्य और व्यवहार में सहयोग कररहा है ,अपने कर्त्तव्य निर्वहन के साथ उसका भी कुछ समय ध्यान करें सोच यह रहे की वह हमे सफलता अवश्य देगा | 
  • अपने जीवन मूल्यों और आदर्शों से कभी समझोता न करे क्योकि जीवन पल पल बदलता जाता है  मगर मूल्य और आदर्श  आपके जीवन को आधार देते रहते है | 
  • समय की गति के साथ हो रहे परिवर्तनों ज्ञान ,विज्ञान , और तकनीकी बदलावों को अपनाते हुए अपने लक्ष्य को सरल बनाया जा सकता है मगर ध्यान रहे की आप उनमे ुलघ कर अपना लक्ष्य न खो दें | 
  • आपको क्या अच्छा लगता है और क्या वह आपके लिए वास्तव में सही है इसका ध्यान अवश्य रखे हमारा लक्ष्य एक है मगर यदि असावधानी और अच्छा लगने के भ्रम में हम समय गावं देंगे तो सफलता भी दूर होने लगेगी | 
  • अपने लक्ष्य और संकल्पों को सदैव और दैनिक प्रक्रिया में दोहराते रहें और उस सर्वशक्तिमान सी रास्ता मांगते रहे मेरा दावा है की आपका लक्ष्य आपको अवश्य मिलेगा | 
  • अपने लक्ष्य और उसके लिए किये गए आज के कार्यों का मूल्यांकन करते रहें यह ध्यान रखें की कर्त्तव्य लक्ष्य की प्रथम सीढ़ी है और वह आपको अपने उच्च बिंदु पर अवश्य पहुंचा देगी यह विशवास रखें | 
  • अंतिम विकल्प यह की लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आज क्या और किया जा सकता है और क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु मेरे प्रयास संतोष जनक है इसका मूल्यांकन अवश्य करते रहें एवं अपने प्रयासों को और सबल और तीव्र करें | 






Sunday, April 20, 2014

सफलता की सीढ़ी है समस्याएं ,घबराएं नहीं

महाभारत के युद्ध के बाद कृष्ण ने सबको यथोचित आशीर्वाद दिए और जब अंत में वे कुंती से यह कहने लगे की बुआ अब आप भी जो चाहो वो मांग सकती हो ,कुंती ने विनम्र भाव से यही कहा केशव मुझे दुःख दो समस्याएं दो और ऐसी यातनाएं दो जिनसे मै प्रति पल आपसे जुडी रहूँ और आपके ध्यान में बनी रहूँ ,केशव सुख ,साधन सम्पन्नता और अधिक सत्ता का केंद्रीयकरण स्वयं अहंकार को जन्म देता है और केवल यही कारण है जिनसे  मनुष्य अपने मूल उद्देश्य और जीवन का अर्थ खो डालता है केशव मुझे ऐसा सुख नहीं चाहिए | धन्य है भारत की संस्कृति जो मनुष्य को एक बार में ही  पूरी संस्कृति के दर्शन करा डालती है | 

दोस्तों जीवन में जिन लोगो ने समस्या अभाव और कठिन परिथितियों  का सामना नहीं किया हैं वे सब किसी न किसी रूप में पूर्णता नहीं पा सके है ,विवेकानंद, सुकरात, बुद्ध,, टॉलस्टाय ,गांधी और हर बड़े व्यक्तित्व ने उन समस्याओं और कठिन परिस्थितियों का सामना किया है जो सामान्य इंसान की सोच से भी परे  है | सहजता स्वयं सारे द्वार बंद कर देती है वहां इस बात का सोच नहीं होता की हम अपने लिए या समाज के लिए कुछ कर रहे है या नहीं वहां केवल एक आलस्य,प्रमाद और सुख के अतिरेक की स्थिति होती है  जो और अधिक और अधिक सुख की कामना करते करते स्वयं क्षुब्ध हो बैठती है वहीँ से जीवन के मूल्यों का पराभव होने लगता है | 

यहाँ मेरे कहने का आशय यह नहीं  है की हम बेकार ही समस्याओं को बुलाते रहें बल्कि जब जीवन के विपरीत समय में हम खड़े हो तब उन परिस्थितियों से घबरा कर भागे नहीं अपितु उनका सामना धैर्य और निर्भीकता से करें ,जिससे समयोचित उत्तर देकर उन परिस्थितियों को संभाला जा सके | एक छोटे बच्चे को मान बाप रोज डरते रहते थे की दूध पी ले नहीं तो बाबा आजायेगा , ये काम करले नहीं तो बाबा आजायेगा ,स्कूल जा नहीं तो बाबा आजायेगा परन्तु समय और परिस्थिति ने उसे बताया बाबा का भय केवल समस्या और उसके आने पर आपके द्वारा उठाये गए  क़दमों की सफलता की कहानी हैं | 

मित्रों जीवन जिस बड़े सफर का नाम है वहां अच्छा ख़राब ,ऊबड़ खाबड़ , और अनेक कंटकों भरी डगर मिलाना अवश्यम्भावी है और चाहते न चाहते आपको उनका सामना करना ही होगा अब सामना करने के दो मार्ग है एक अपने आपको बेचारा बना कर रो रो कर काम करना और दूसरा पूर्ण धैर्य और शक्ति के साथ समस्या का सामना करना और जीत की प्रबल ज्योति को मन में जलाये रखना बस यहीं से सरे सफलता के रास्ते आपके लिए अति आसान होकर जीवन का पथ प्रदर्शन करने लगेंगे फिर यहीं क्रम जीवन को सफलता की नई नई  दिशाएं प्रदान करता रहेगा और वास्तव में जीवन पूर्ण सफल हो पायेगा | जीवन में इनका प्रयोग अवश्य करके देखें | 

  • यदि बहुत अच्छा समय है तो विपरीत समय भी निश्चित रूप से आने को है और विपरीत समय और अच्छे समय में यही समानता रखना आवश्यक है की दोनों में हम अपनी  आदर्श सोच बनाये रखें | 
  • धैर्य की आवश्यकता केवल विपरीत समय में ही होती है अतैव यह ध्यान रखे की विपरीत समय के निर्णय समय परिस्थितियों और काल के अनुरूप हों क्योंकि प्रेम साश्वत है वैर का अस्तित्व छोटा होता है | 
  • किसी भी परिस्थिति में अपने ,तन  मन और व्यवहार पर पूर्ण नियंत्रण बनाये  रखें क्योकि यदि घबराहट , जल्दबाजी और नैराश्य का आधार बनाया तो हम आधी जंग संघर्ष से पहले ही हर जाते है | 
  • समस्याएँ आने पर यह अवश्य समझे की अब कोई नई उपलब्धि आपके आस पास है और आपको उनका डटकर और पूरी ताकत से निराकरण करना है | 
  • समस्याएं अपना हल स्वयं लेकर आती है एक दार्शनिक ने यह कहा की समस्याएं आपको जीत का बड़ा सुख देने आती है उनके बिना कभी आप स्वयं को जीता हुआ नहीं समझ पाते । 
  • समस्याओं के निराकरण में सकल्प और निरंतर कड़े परिश्रम की आवश्यकता होती है आपको समस्या के समाधान के लिए तुरंत एक कार्य रूप रेखा बना कर कार्य करने की आवश्यकता है । 
  • समस्याओं के समय केवल उनका सोच या दुःख मनाएं जिसमे आप समय रहते कुछ कर सकते थे मगर आप नहीं कर पाये ,उन समस्याओं  जिनपर आपका वश  नहीं है उनका दुःख नही मनाएं | 
  • समस्याओं में कोशिश यह करें की आप अपने शक्ति प्रयत्न और प्रयासों से उन पर विजय प्राप्त करें ज्यादा लोगों को उसमे सह भागी न बनाये अन्यथा वे आपको और हतोत्साहित  कर देंगें | 
  • समस्या के  समय आप अपने कर्त्तव्य और नियत कार्य योजना पर बने रहें और यह विशवास बनाये रहें की ये सब कुछ समय में पूर्णतः ठीक हो जावेगा | 




अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...