Tuesday, July 16, 2013

विश्वास की सीमाएं और आज

विश्वास की सीमाएं और आज 

आज  आदमी का सम्पूर्ण कलेवर जटिलताओं झूठ ,फरेब, और कैसे भी काम निकालने की तकनीक का मायने बना खड़ा है,उसे केवल यह ध्यान है कि कैसे उसका काम सहजता से निकल जाए चाहे उसके लिए उसे कितना भी गिरना हो ,अनादर्शों पर चलकर  खुद को सिद्ध करना हो उसे सब मंजूर है  बस उसे कैसे भी लाभ होना चाहिए। शॉर्टकट ,सुपीरीओरिटी ,और हजारों कलेवर बदलने के बाद भी यदि उसे थोडा सा लाभ मिलने की उम्मीद दिखती है  तो आप सच माने  कि धर्मवादी अपने सारे धर्मों को ताक पर रख देता है गुरु अपनी सारी स्मिता भूलकर अपनी गुरुता खो बैठता है ,और सारे आदर्श सारे सत्य और सारे मानदंड धराशाही होजाते है और बार बार जीत होती है इस आधार हीन और खोखले व्यक्तित्व की जिसेहम सामान्य भाषा में प्रेक्टिकल कहते है। 

दोस्तों ऐसे ही समाज में हम जीवन गुजार रहे है यहाँ हम उन्हीं लोगों से घिरे खड़े  है जो किसी भी  अर्थ में हमारे अपने  नहीं  हो  सकते है उनका हमसे सम्बन्ध केवल इतना है कि  हम उनके किस काम आ सकते है हम उनके   हितों को साधने में जैसे ही अक्षम होते है उस समाज के लिए हम उसी क्षण नाकारा बेकार और व्यर्थ हो जाते है ,बुद्धि यह समझ नहीं समझ पाती  कि  अभी हाल में जो  सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति था और अचानक उसका महत्व क्यों ख़त्म हो गया वह आलोचना का कारक कैसे होगया और उसे ही ऐसे प्रदर्शित किया जाने लगा जैसे उससे ज्यादा ख़राब कोई है ही नहीं , और हमारी विडम्बना यह  कि  हम इसी समाज में ऐसे अपनों के साथ अपने विश्वास  को तौल  रहे है । 

अब  हमे अपने  विश्वास  को  तौलना होगा की उसके उपयुक्त कौन है हर आदमी चाहे वह परिवार हो या समाज दोस्त हों या सहकर्मी या सहपाठी या सह यात्री सबके अपने अपने स्वार्थ् है और हर आदमी आपसे सम्बन्ध  बनाने से पहले यह जानता है कि आप उसके किस काम  के कितने समय तक उसकी स्वार्थ आपूर्ति में सहयोगी हो सकते है   बस  केवल उस समय तक वो आपके लिए अपने है और उस सीमा के बाद उनके लिए आप अस्तित्व हीन अनाकार बेकार हो । 

विश्वास की सीमाएं तय  की जावें  और यह ध्यान रहे की जीवन में आपसे गलतियाँ कम से कम हों ,आपका लक्ष्य केवल अपने तय कार्यक्रम जीवन के संकल्प और आदर्शों  पर निर्भर हो आप एकला चलो रे की तरह अपने को आत्म  केन्द्रित कर स्वयं को और अपने परिवेश को पूरी तरह से समझने का प्रयत्न अवश्य  करें बदलती हुईं परिस्थितियों  समाज और कार्यों की स्थिति पर नजर बनाएं रखे समाज  और नवागंतुक  के लिए हमेशा जल्दी राय  न  बनाएं  ,साथ ही अपने सिद्धांत अवश्य बनाए और लाभ हानि की भावना से परे कड़ाई से उनपर अमल करें तो शायद इस  नकारात्मक  सामाजिक परिवेश से आप स्वयं को बचा कर अपने आपको सिद्ध  कर सकें ।  




Sunday, May 12, 2013

अभिमानी से दूरी बनाएं रखेँ

 अभिमानी   से दूरी बनाएं रखेँ
दैनिक जीवन मे  बार बार यह प्रश्न उठता है  कि समाज के तमाम  लोगो  परिवार और हमारे अपनों के साथ सामंजस्य  व्यवहार कैसे बनाये रखा जा सके और किस प्रकार अपने स्वयं के आदर्शों को कायम रखा  जा सकें । समान्यत:  हम अलग अलग लोगों से मिलते है उनमें से कई ऐसे होते है
जिनमें  अपने रूप रंग यश धन वैभव और अनेक तरह के अभिमान जाग्रत  होते दिखाई देते है वे किसी भी स्थिति में अपने आप को ऊँचा बताने की चेष्टा में लगे रहते है परिणाम यह होता है कि  हम अपने आपको हीन समझने लगते है और यहीं से सारी ऋणात्मकताएँ हमारे व्यक्तित्व में घर करने लगती है । 

आज आवश्यकता इस बातकी है कि  हम अपने स्वयं के व्यक्तित्व को चिंतन का विषय बनाये रखें और दूसरे की स्वयं   को बड़ा दिखाने की भावना को  अपने चिंतन का विषय नहीं बनाये और यह बात ध्यान  रखे जब कोई आपको इस प्रकार प्रताड़ित करे तो  सहज भाव से आप उससे एक नियत दूरी बनालीजिये और जैसे जैसे आप दूर जायेंगे वैसे वैसे उस व्यक्ति का कद बोना होता जाएगा और यही से आपकी जीत आरम्भ हो जायेगी जिसमे तुलना नहीं वरन स्वयं के व्यक्तित्व के विकास की बात होगी । 

Wednesday, February 27, 2013

शारीरिक अपवित्रता को श्रेष्ठ गुणों से जीतें

 शारीरिक अपवित्रता को श्रेष्ठ गुणों से जीतें


मनुष्य सदैव से अपनी  की खोज  में परेशान होता रहा है जब भी आत्म चिंतन  किया तो यह पाया कि   सम्पूर्ण मनुष्य जीवन बड़ा अद्भुत सार प्रदर्शित करता है प्रकृति में हर  वस्तु  व्यक्ति और जीव अपने को  सुंदर  समयानुरूप तथा खुबसूरत बनाने का प्रयत्न करता रहता है । शरीर पर हजारो लेप सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग और एतिहासिक  प्रयास  में शरीर को सुन्दर बनाने के लिए बार बार नयी  नयी विधियों का  प्रयोग करता रहा है मनुष्य। अर्थात मनुष्य को सुगन्धित ,सुन्दर  और समय के साथ  स्वयं को खुबसूरत बनाने के लिएबहुत  बड़े बड़े प्रयास करने पड़ते है  अर्थात यह हुआ की  जीव मूलत : अशुद्धि  गन्दगी और ऋणात्मक्ता के साथ जुडा  रहा है परन्तु इतिहास गवाह है की इसी परिवेश से महानता , पवित्रता और पूर्ण समर्पण का भाव जिनका अस्तित्व है वे लोग निकलकर संस्कृतियों की धरोहर बने रहे है और यह कथन इस बात को सिद्ध करता है की मनुष्य शारीरिक परिवेश में वीभत्स है जबकि गुण धर्म कर्म और समर्पण की पराकाष्ठ के कारण महान सिद्ध  हुआ है ।

धर्म कर्म समर्पण परहित का भाव और सत्य उसे उस ऋणात्मकता  से मुक्त करके महान बनाने का कार्य करता है जन्म से अपवित्र शरीर केवल  महान इसीलिये बन पाया जिसमे सत्य अहिंसा परहित काभाव और अनेकों गुण  उसकी अपवित्रता से कई गुने भारी पड़े और वह महान बन पाया सारत :यही कहा जा सकता है कि
"सबसे दुर्लभ मनुज शरीरा " शरीर और जीव का हर भौतिक  भाग पूर्णत;अपवित्र है और उसे अपने गुण धर्म भाव और पूर्ण धनात्मक भाव से श्रेष्ठ बनाया जा सकता है आइये  हम सब एक संकल्प लें की अपनी सम्पूर्ण ऋण। त्मक्ताओं को अपने गुण और सत्य अहिंसा की अजस्र धरा से इतना निर्मल करदें जो मनुष्य को देव तुल्य बना सके ।

शारीरिक अपवित्रता को श्रेष्ठ गुणों से जीतें 

Monday, January 21, 2013

परिवर्तन स्वीकार कीजिये 100% सफलता मिलेगी

 परिवर्तन  जीवन का आधार है और उसकी स्वीकारोक्ति  और समयानुसार शीघ्र निर्णय से जीवन में बहुत तेजी से सफलता पाई जा सकती है ।सामान्यत जीवन में घटनाएँ गुजरती जाती है और हम अपने परिवेश और समय की स्थिति के साथ चलते चले जाते है ।कभी हमे परिवेश प्रभावित करता है कभी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएं हमारे उद्देश्यों पर प्रश्नवाचक हो जाती है और एक बार हम जैसे ही उनसे हारते है वैसे ही पूरा जीवन सामंजस्य और समस्याओं के समाधान में लग जाता है और जीवन के मूल उद्देश्य हारने लगते है फिर तो केवल एक ही रिजल्ट सामने आता है  केवल हताशा निराशा और अन्धकार ।यह स्थिति केवल कुछ लोगो के साथ की समस्या नहीं है वरन  यह तो बड़े समाज की समस्या का चित्र है ।

दोस्तों जब भी जीवन का आरम्भ होता है तो उसमे तमाम तरह की सामायिक शारीरिक मानसिक परिवर्तन होते रहते है वही  समाज का बड़ा पक्ष  आपके शोषण और उनके लिए आप कैसे उपयोगी सिद्ध हो सकते है  केवल इससे बंधा होता है  वह बार बार यही कोशिश करता है की आप उसके पास जाकर उनके अनुरूप दासता स्वीकार क र  उनका वर्चस्व  स्वीकार करते रहे ,आप जिन लोगो को दोस्त शुभचिंतक और बहुत  निकट का समझ कर जीवन को गति देना चाहते है  इनमे से अधिकाँश लोग आपका शोषण करने लगते है और यही दुनिया का कडवा और नंगा  सत्य भी है  ।वो लोग जिन्हें हम अपना सहारा मान केर चलने का संकल्प करते है वे ही लोग सबसे बड़े अवसर वादी बनकर अपनी शारीरिक मानसिक और संसाधनों की भूख को लेकर आपको आमंत्रण दे डालते है की कभी आपको उनकी हवस की जरूरत  हो तो आप फिर आजाना वो आपको शोषण के लिए तैयार मिलेंगे ।कैसी दुनियां है कैसे है इस बहुल समाज के लोग कैसी है इनकी आदर्श वादिता यह बहुत बड़ी विडम्बना ही तो है और मेरे युवा को इन से ही बचा  कर अपने आप को सिद्ध करना  होगा ।

मित्रों  सफलता के  जिन मूलभूत विषयों का आपको ध्यान  रखना है उसे निम्नानुसार रख सकते  है  शायद समय आपको  विकास की वो दिशा जरूर देगा जिसकी आपको तलाश है


  • अपने मूल उद्देश्यों के लिए आप किसी का सहारा न लें आवश्यकता पड़ने पर प्रशिक्षण  ले सकते है 
  • जो सुख दूसरों से पैदा होगा उसमे आपको हमेशा दुःख ही मिलेगा 
  •  अपनी समय सारिणी और पूरे दिन का कार्य तय करें अन्यथा आप का दिमाग ऋणा त्मक होने लगेगा 
  •  अपने आदर्शों परिवर्तनों के समय आप उन लोगो से कोई परामर्श न लें जो आपको कमजोर बनाएं 
  • किसी  के कुतर्कों का जबाब देना आप के लिए आवश्यक नहीं है 
  • शरीर की आधारभूत आवश्यकताएं 20%और  80% सफलता जीवन के उद्देश्य और स्तर के साथ जीवन के नियत लक्ष्य की पूर्ती में है तो उन्हें उतना ही महत्व दिया जाए जितना वो आवश्यक हो। 
इसके साथ यह आवश्यक है की आप परिवर्तनों के विरोधी न बनकर अपने आपको पूर्ण बनाने की कोशिश करें ध्यान अध्यात्म साधना से स्वयं को स्थिर रखकर खुदको श्रेष्ठ साबित कर सकते है ।

Saturday, January 19, 2013

क्या जरूरी है ये पता तो चले ,स्वयं को आत्म केन्द्रित करें

क्या जरूरी है ये पता तो चले 
स्वयं को आत्म केन्द्रित  करें 
जीवन निकलता जाता है छण  छण बीता जाता है और जीवन हर पल मन यह जानने   की कोशिश करता रहता है कि  क्या उसके लिए आवश्यक है ,वह जीवन की हर जरूरत को  किस क्रम में रखे जिससे उसे सबसे ज्यादा संतोष प्राप्त हो सके और वह निरंतर इसी क्रम प्रयास करता रहा है ।उम्र समय परिवार परिवेश और हर बदलती स्थिति परिस्थिति में उसकी प्राथमिकताएं बदलती जाती है और वह अपनी बुद्धि और शारीरिक मानसिक आवेगों से प्रभावित होकर ये निर्णय करता रहता है फिर समय भविष्य में जाते हुए यह निर्णय करता है कि  आपके द्वारा किया हुआ निर्णय सफलता का मायने हुआ या असफलता का मायने ।

अब यही आवश्यकता है  कि यह अपने आपको आत्मकेंद्रित कर के यह विचार करें की  आप वस्तुत;चाहते क्या है  क्योकि जीवन में हर पल आपसे अलग अलग विषय वस्तुओं  की उपलब्धि की मांग  करता रहेगा और आपको यही सिद्ध करना होगा कि आप जीवन के  हर भाग को पूर्ण करके जियें है और आपने जीवन को सफल सिद्ध भी किया है ।

दोस्तों यही जीवन का सार भी है आप जीवन के हर इम्तहान में सफल ही होंगे शर्त यह है की आपको जीवन को हर पल उसी अंदाज़ में जीना है जैसी परिस्थितियां आपसे मांग करती है है इसमें महत्वपूर्ण विषय यह है की आप जीवन की परिस्थितियों में अपने अस्तित्व को खो न दें आपको कीचड और कमल का सम्बन्ध ध्यान में रखना है आपको केवल विकास की आंधी में निर्लिप्तता बनाये रखनी है आप किसी  भी घटना या जीवन की परिस्थिति में खो न जाएँ वरन  एक कार्य पूर्ण करके दूसरे के लिए संकल्पित हो जाए देखिये जीवन आपको वो ऊँचाइयाँ देगा जिसे समय इतिहास और समाज बार बार सराहते हुए आपको इतिहास पुरुष बना देगा ।

Friday, January 18, 2013

महिला सशक्तिकरण

महिला  सशक्तिकरण की बात आज भारत जैसे देश में  बड़ी विडम्बना का विषय है जिस राष्ट्र में माँ की सम्पूर्ण शक्ति में सारे देवताओं के शक्ति सार को तिरोहित किया गया हो, वहाँ आज हम फिर उसे अबला बना कर  सशक्त करना चाहते है शायद यह कितना  चिंतनीय विषय है ।इस सम्पूर्ण व्यवस्था में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हमारी कार्य पद्धति और सामाजिक ढांचे के क्रियान्वयन में कोई कमी अवश्य रही है जो सम्पूर्ण भारतीय परिवेश को प्रश्नचिन्ह बना रही है ।भारतीय समाज विदेशियों और अलग अलग संस्कृतियों का बाहुल्य रहा और वैसे ही प्रभाव  संस्कृति में आते गए ।

विदेशियों और उनकी संस्कृतियों के प्रभाव   सम्पूर्ण समाज पर दिखाई देने लगे और उनमे निरंतर परिवर्तन दृष्टिगत होने लगा ,मुस्लिम सभ्यता और हिन्दू कट्टर वाद ने धार्मिक गतिविधियों में महिला को कम महत्वदिया  वही पुत्रेक्षा की कामना समाज को कर्म और पराक्रम के स्थान पर मोक्ष से जोड़ा गया परिणाम यह हुआ की समाज में महिला शक्ति को पुरुष के सामने कमतर आँका गया ।

दोस्तों आवश्यकता है हमे अपनी सोच और समाज में अपनत्व का भाव पैदा करने की और भारत जैसे देश में एक बार फिर वाही भाव पैदा हो जाए  जिसमे हम कह सकें कि 

जय जय जय महिषा सुर मर्दनी  रम्यकपर्दिन शैल सुते
संकट हरिणी दुरति  विदारणि  दशुतनु  धारणी जय ललिते



Thursday, January 17, 2013

प्रेम

प्रेम का विराट अर्थ है उसे अपने स्वार्थी अर्थों से जोडकर  छोटा न बनाया जाए अबोध बालक का चाँद से अपनी माँ से और अपने रंग बिरंगे खिलौनों से होता नैसर्गिक प्रेम ,माँ का अपने अबोध बच्चे के कपड़ो, भोजन और हजारों चिंताओं के समूह से उलझा जीवनउसी प्रेम की एक बानगी है ।प्रकृति का ब्रह्माण्ड से और प्रत्येक जीव का अपने परिवेश से प्रेम उसी प्रेम की निशानी है ।प्रेम वात्सल्य  -- समर्पण  दया सौहार्द   की परा काष्ठ है उसमे सबकुछ लुटाने का भाव है ,ऐसे प्रेम की परिभाषा केवल ईश्वर ही बना सकता है और यदि आप उस परमेश्वर की श्रेष्ठ कृति है तो अपने  आचार विचार को उसी प्रेम की पराकाष्ठ पर ले जाइये  तो शायद आपको जीवन का सार मिल सके ।याद रखिये शोषण ,लूट ,और भीख और झूठ की बैसाखियों पर हम जिस  प्रेम को आधार देने का प्रयत्न करते है वह हमारेपरिवेश परिवार समाज और जीवन के हर भाग को ऋणात्मक बना डालता है 

अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि

  अनंत कामनाएँ,जीवन और सिद्धि  सत्यव्रत के राज्य की सर्वत्र शांति और सौहार्द और ख़ुशहाली थी बस एक ही  कमी थी कि संतान नहीं होना उसके लिए ब...